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आनंदघन के सबद : Anandghan Ke Sabad

आनंदघन 17वीं शताब्दी के जैन संत-कवि थे, जिनकी पहचान मुख्यतः आध्यात्मिक और रहस्यवादी पदों के कारण बनी। उनके जीवन की घटनाओं और सांसारिक नाम को लेकर निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम हैं। जैन परंपरा में उन्हें आत्मानुभूति और साधना के कवि के रूप में विशेष स्थान मिला है।उनकी रचनाओं में आत्मा, परम सत्य, वैराग्य और भीतर मिलने वाले आनंद की खोज दिखाई देती है। पदों की भाषा में कहीं गहरी आध्यात्मिक अनुभूति है तो कहीं कबीर जैसी तीखी बात और मीरा जैसी आत्मीयता का मेल दिखाई देता है। ‘आनंदघन बहोत्तरी’ तथा ‘आनंदघन चौबीसी’ जैसी रचनाएँ उनसे संबद्ध मानी जाती हैं। हिंदी के साथ राजस्थानी, गुजराती और अन्य लोकप्रचलित भाषिक रूपों में भी उनकी पदावली मिलती है। जैन भक्ति और ज्ञानमार्गी काव्य में आनंदघन का उल्लेख इसी आत्मानुभूति प्रधान काव्यधारा के कारण किया जाता है।

राम कहो, रहमान कहो कोउ

राम कहो, रहमान कहो कोउ, कान्ह कहो, महादेव री।

पारसनाथ कहो, कोउ ब्रह्मा, सकल ब्रह्म स्वयमेव री॥

भाजन भेद कहावत नाना, एक मृत्तिका रूप री।

तैसे खंड कल्पना रोपित, आप अखंड स्वरूप री॥

निज पद रमै राम सो कहिये, रहिम कहै रहमान री।

करषै कर्म कान सो कहिए, महादेव निर्बान री॥

परसे रूप पारस सो कहिये, ब्रह्मा चिह्ने सो ब्रह्म री।

इस बिध साधो आप आनँदघन, चेतनमय नि:कर्म री॥

क्या सोवे, उठ जाग बाउरे

क्या सोवे, उठ जाग बाउरे।

अंजलि जल ज्यूँ आयु घटत है, देत पहोरिया घरिय घाउ रे॥

इंद्र चंद्र नागेंद्र मुनींद्र चले, कुण राजा-पतसाह-राउ रे।

भमत भमत भव-जलधि पाय के, भगवत भजन बिन भाउ न्याउ रे॥

कहा बिलंब करे अब बाउरे, तरि भव-जलनिधि पाठ पाउ रे।

आनँदघन चेतनमय मूरति, सुद्ध निरंजन देव ध्याउ रे॥

मेरे घट ग्यान-भानु भयो भोर

मेरे घट ग्यान-भानु भयो भोर।

चेतन चकवा, चेतन चकवी, भागो बिरह को सोर॥

फैली चहूँ दिस चतुर भाव रूचि, मिट्यो भरम-तम जोर।

आपकी चोरी आप ही जानत, और कहत ना चोर॥

अमल जु कमल बिकच भए भूतल, मंद विषय-ससि-कोर।

‘आनंदघन’ एक वल्लभ लागत, और न लाख किरोर॥

अब मेरे पति-गति देव निरंजन

अब मेरे पति-गति देव निरंजन।

भटकूँ कहाँ, कहाँ सिर पटकूँ, कहा करूँ जन-रंजन॥

खंजन-दृग सों दृग न लगाऊँ, चाहुँ न चितवन अंजन।

संजन घट अंतर परमातम, सकल दुरित-भय-भंजन॥

एह काम-गति, एह काम-घट, एही सुधारस-मंजन।

‘आनँदघन’ प्रभु घट-बन-केहरि, काम-मत्त-गज-गंजन॥

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