गवरी बाई के सबद : Gavri Bai Ke Sabad
डूंगरपुर की गवरी बाई अठारहवीं शताब्दी की संत-कवयित्री थीं, जिन्हें वागड़ की भक्ति परंपरा में विशेष स्थान प्राप्त है। बाल्यावस्था में ही वैधव्य आने के बाद उनका जीवन ईश्वर-साधना की ओर मुड़ गया। डूंगरपुर के महारावल शिवसिंह ने भी उनकी भक्ति और साधना से प्रभावित होकर उनके लिए मंदिर बनवाया था। लोक में वे ‘वागड़ की मीरा’ नाम से प्रसिद्ध हुईं।
गवरी बाई की कविता में कृष्ण के प्रति अनुराग के साथ निर्गुण चिंतन, वैराग्य और आत्मज्ञान का मेल दिखाई देता है। उनके पद और दोहे मनुष्य को मोह-माया, अहंकार तथा सांसारिक आसक्ति से सावधान करते हैं और सतगुरु तथा हरि-स्मरण की ओर प्रेरित करते हैं। ‘अब समझ रे, मन भाई’ और ‘नक्करा मौत का बाजे’ जैसे पदों में जीवन की क्षणभंगुरता और साधना की आवश्यकता स्पष्ट रूप से सामने आती है।.
चेत, चेत मन अंधा
चेत, चेत मन अंधा, भज ले नागर नंदा।
सुमरण साँवरिया नुं करतां, कट जाये यम फंदा॥
पुरण ब्रह्म परम कृपाल हे, करूणा सागर सिंधु।
अधम उधारण अघ निवारण, तारण भवजल सिंधु॥
कइ जुग बीते विषय रस पीते, अजहु न मूढ़ अघायो।
भव सें भटके, उंधे मुख लटके, फिर जनम्यो फिर जायो॥
प्राणी पड़ियो नरक नी खानी, चीड़ा नुं चुंटी खायो।
हरी भज मेटो, स्तुती कर छुटो, उदर न क्यूँ बिसरायो॥
बाहिर आयो, भजन भुलायो, माया में मुरजानो।
बालापन में खाया खेल्यो, पर हाथ पर बेठानो॥
जो आंनी में रातो मातो, विषय रंग में भीनो।
मोह मदिरा, पीत अधीरा, मूरख मत को हीनो॥
तीस चालीसे बरसे न चेत्यो, पापी पइसो जोड़े।
कुंटुब कबीलो, विषय में पडियो, अधिक नेह कूँ जोड़े॥
आइ साठी बुद्धि सब नाठी, लाठी ग्रहवा लाग्यो।
करूप काया, बल घटाया, परमारथ नहीं जाग्यो॥
श्रवणे न बुझे नयणे न सुझे नासिका झरने लागी।
कुटंब कहे कब, टरे मरे कब, तोये न चेत्यो अभागी॥
यम आव लगा, सब भये अलगा, मारन लागे प्रहार।
तब पछतावे सिर धुणावे, अगणित दुःख अपार॥
ना दिया दान, न किया सनमान, कहो कैसे आवे आडी।
हरि नहीं पूज्या, गुरु नहीं बुझ्या, पडयो चोरासी खाडी॥
दास गवरी कहे सिव परदेसी पूरण परमानंदा।
मन, क्रम, वचने, साचे दल चलने, कटिया यम का फंदा॥
अजहु चेते तो भला रे मन
अजहु चेते तो भला रे मन, माया ये सब जुग छल्या रे।
लख चोरासी भटकत मानव देह छे मिल्या रे॥
मेरी-मेरी कर जनम गमाया, काल अजगरे गल्या रे।
और उपाय करो जीव कोउ हरी बिन दुःख नहीं टल्या रे॥
मोह मदिरा पी के छक्यो रे, विषय पंक में कल्या रे।
त्रिश्ना जल सरिता में पर्यो रे, सुख सपने नहीं मिल्या रे॥
भुरकी नांखी सब पर माया, रूप देखी ने रल्या रे।
दास गवरी कहे चेत बड़भागी, प्रभु ने भज्या सो तर्या रे॥
तेहारा नाम में मिट्टी की बंधी
तेहारा नाम में मिट्टी की बंधी।
मिट्टी से बनाइ देह ये गाफिल गंधी॥
मिट्टी का ओढना, मिट्टी का जु बिछौना।
आखिर की निशान मिट्टी में समाना॥
मिट्टी के धन, मिट्टी के भंडार।
मिट्टी के हीरा, मिट्टी के सरदार॥
मिटी के घोड़ा, मिट्टी के असवार।
मिट्टी के हस्ती, मिट्टी के राजकुमार॥
गवरी कहे संसारी तो, आकाश केरे फूल।
निज राम नाम सुमरो, माया देखी मत भूल॥
नक्करा मौत का बाजे
नक्करा मौत का बाजे।
कि सावन मेघ ज्यूं गाजे॥
हाँ रे मन, समझ वे करना।
कि सतगुरू नाम लिये रहना॥
अमूलख अवसर आयो।
दुर्लभ देह मनुष को पायो॥
सिर पर यम वे लागा।
खबरदार चेत मत भागा॥
क्षमा की खड्ग धरना वे।
कि नाम की बात करना वे॥
शील संतोष की चोकी।
धीरज से ध्यान धरने की॥
ग्यान का भर वे गोला।
कुबुद्धि दूर कर भोला॥
सोदागर सौदे आया वे।
समझ ने मन मेरा वे॥
अनित्य का भरोसा कैसा।
छिन में हारेगा ऐसा॥
लक्ष लगी निस-दिन मेरी।
लग गई अलख सें दोरी॥
आनंद घन, गवरी पाइ।
सतगुरु चरन चित्त लाइ॥
अब समझ रे, मन भाई
अब समझ रे, मन भाई, इस जग में झूठी सगाइ।
संगु समधी, कलत्र, कुटंब, सब, स्वारथ को मल्यो आइ।
आखर बिरीयां आयगी जब, रहेगी न्यारा चटकाइ॥
झूठी रे काया, झूठी रे माया, झूठे ब्हेन और भाई।
अंत काल कोइ संग न साथी, हंस अकेला जाइ॥
सोना, चांदी और हीरा, मोती तामें रह्यो ललचाइ।
मुआ पीछे सब लुंट चलेगी, पिंजरा दीया जलाइ॥
कहे 'गवरी' सतगुरु की किरपा, ले गोविंद कुं गाइ।
सुकृत सौदा कर ले बंदे, आवागमन मिटाइ॥
मत कर मन मगरूर गुमाना
मत कर मन मगरूर गुमाना।
काची काया छिन में उड़ जाये, जैसे पीपल का रे पाना॥
राजपाट अरू छत्र सिंघासन छांड चले राजा राना।
जल गया तेल, बुझाइ गइ मिट्टी, मिट्टी में मिल जाना॥
बावन बजार, चौरासी चौवटा, सात समुंदर कोट कहाना।
सोइ रावण रण में रुल्या, ठाम नहीं रे ठिकाना॥
हीरा, मोती आभूषण पैहनते, लौंग सोपारी पान खाना।
झीणा मलमल, जामा पैहनते, सो चले रे मसाना॥
आवे देखन में, जाये जीन्ने, रूप ने नाम धराना।
'गवरी' राम रूठे नहीं जान्या, दुनिया भूली रे दिवाना॥
भजन बिना, मिथ्या जनम गमावे
भजन बिना, मिथ्या जनम गमावे।
आ संसार धुंआ जैसा धवला, हाथ कछु नहीं आवे॥
मृगतृष्णा वे सरोवर भरीया, दूर से नीर दरसावे।
नजीक गये जब, प्यास न जावे, उलटा प्रान गमावे॥
जैसे श्रवान है हाड कूँ चूसता, जीभ्या इंद्री कूँ वडाने।
आपको लोही आप कूँ रवावे, मूरख मन नहीं पावे॥
सुपने में निरधन धन पायो, जाग्यो तो तभी न जावे।
'गवरी' कहे भज ले गोविंद कुं, याते परम पद पावे॥
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