समान बाई के सबद : Saman Bai Ke Sabad
सीकर की समान बाई (1825–1885) राजस्थान की कृष्ण-भक्ति परंपरा की प्रसिद्ध कवयित्री थीं। वे डिंगल कवि रामनाथ कविया की पुत्री थीं और अपने भक्तिपूर्ण काव्य के कारण ‘मत्स्य री मीरा’ के नाम से जानी जाती हैं। उनके पदों में श्याम के प्रति प्रेम, विरह और दासीभाव के साथ भगवान की शरण में जाने की आकांक्षा बार-बार उभरती है।
समान बाई की रचनात्मकता केवल भक्ति पदों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने राम और कृष्ण से जुड़े प्रसंगों के साथ राजस्थानी जीवन और विवाह संस्कारों के अवसर पर गाए जाने वाले गीत भी लिखे। उनके मंगलगीतों में विवाह की विभिन्न रस्मों और लोकाचार का जीवंत चित्र मिलता है। ‘हेलो म्हारो सुणज्यो जी जगदीश’ और ‘हरि कैहर गये परसूं’ जैसे सबद उनके कृष्ण-प्रेम और विरह को सामने रखते हैं।
हेलो म्हारो सुणज्यो जी जगदीश
हेलो म्हारो सुणज्यो जी जगदीश।
जगतपति जग रखवाळा रै मुरली वाळा रै॥
प्रथम पूतना मारण कारण, कुच रै विष लपटायो रै।
उनको जसमत की गत दीनी, सुरग पठाई रै।
गज अर ग्राह लड़ै जळ भीतर, लड़त-लड़त गज हार्यो रै।
गज की बेर पयादेहि धाये, गरुड़ बिसार्यो रै।
खंभ फाड़ नरसिंग रूप धार्यो, हिरणाकुश रिपु मार्यो रै।
उनको सुत प्रहलाद उबार्यो, धूजी तार्यो रै।
मैं मति हीन कछु नहीं लायक, कौन भांति गुण गाऊँ रै।
कहै ‘समान’ सुणो सांवरिया, शरण आऊँ रै।
नाथ क्यों एतो कष्ट सहायो
नाथ क्यों एतो कष्ट सहायो, वाको कारण मैं नहीं पायो।
जीव ब्रह्म सम वेद बतावत, पाप पुण्य क्यों ल्यायो।
जो ओ जीव ब्रह्म ही होतो, क्यों जंजाळ लगायो॥
कंठ किसी को मैं नहीं काट्यो, ना कोई संत सतायो।
पर सुख देख दुःख नही मान्यो, पर धन खोस न खायो॥
सो पूरबला पाप कह्या छै, तुम नहीं न्याय चलायो।
बीं देही तो कर्म किया छा, ईनैं क्यूं भुगतायो॥
जगत कहै हरि भगत न तावै, मैं तोको कब गायो।
सोनो व्है तो बधै सवायो, तामो वृथा तपायो॥
कहत ‘समान’ सह्यो हरि मैं तो, जो तुमने भुगतायो।
ऐसी भूल फेर मत कीज्यो, यह तो अकल ठगायो॥
सांवरिया म्हे कांई ऐसा भोळा जी
सांवरिया म्हे कांई ऐसा भोळा जी।
हंसि-हंसि प्रीति करत औरन सूं, म्हासूं बोलत मोळा जी।
बींनै तो थे अगड़ घड़ावो, म्हां सूं मीठा न बोला जी॥
हमां धरिगा सो लेय पधारो, वींका ही भरज्यो झोळा जी।
बार रहो भीतर जनि आवो, बरज दिया बर सोळा जी॥
प्रेम की राड़ निजर में ही जाणै, नाहिं बहैं छै गोळा जी।
‘समनी’ के स्याम हंसे सुनि के, चंद्रावलि के रोळा जी॥
हरि कैहर गये परसूं
हरि कैहर गये परसूं, कब आवेगी बैरन परसूं॥
मन चाहत है उड़ जाय मिलूं पर, उड्यो न जाय बिना पर सूं।
घन घोर घटा बिजळी चमके, मेह कहे बरसूं-बरसूं।
दादुर मोर पपीहा बोलै, कोयल बोलै मधुर सुर सूं।
ऐसी न करूं, कुण लाज डरूं, आंगन बीच खड़ी तरसूं।
कहत ‘समान’ सुणो ब्रजनंदन, हरि दरसन बिन मैं तरसूं।
सांवरा थांकी दासी नै
सांवरा थांकी दासी नै, कदे तो याद कीज्यो जी।
मैं औगुण की झाज सांवरा, म्हारा औगुण गुण कर लीज्यो जी।
मैं अनाथ तुम नाथ जगत के, भूल बिसर मत दीज्यो जी॥
राधा, रुकमणि अरु सतभामा, कुबजा ज्यों संग लीज्यो जी।
कहत ‘समान’ सुणो जी निरंजन, चित्त चरणां में लीज्यो जी॥
जसोदा राणी लाला कूं पौढावै
जसोदा राणी लाला कूं पौढावै।
रतन जड़ित को पलंग ढळावै, ऊपर वस्त्र बिछावै।
जरी बाफता को धरै गींदवो, कुसुम सुगंध लगावै॥
ताज झुगलिया खोल धरे है, अजंन दृगन लगावै।
ले गोदी पौढाय स्याम को, ऊपर साल उढावै॥
पलंग पास बैठी बड़ भागण, हालरिया हुलरावै।
सो छवि सुक सारद सिव निरखै, ‘समनी’ भाग सरावै॥
घर आवो जी स्याम भलांई सूं
घर आवो जी स्याम भलांई सूं॥
बैठो पलंग पान मुख लीजै, राजी करूं अब कांई सूं।
जाळू जीभ लूंण भरूं यामें, राड़ि करी आतांई सूं।
तुम सूं कौन और मोहि प्यारो, जीवन म्हांको थांई सूं।
‘समनी’ के स्याम रिझाय लियो है, चंद्रावलि बातां ई सूं।
जा दासी ग्वाला नै कीज्यो
जा दासी ग्वाला नै कीज्यो, बाछ्या गाय मिलावै री।
बांद्योड़ो बाछ्यो बोलैगो, मोहन ओझक जागै री।
अब तो रैन रही बस थोड़ी, टुक-इक लोयण लागै री॥
धीरै बोलो, धीरै चालो, जनि झांझर झणकाओ री।
अब जनि दही बिलोवो कोई, न परभाती गावो री॥
पूरब द्वार पै परदा करदो, लेवो खोल पछियारै री।
चहूँ ओरन पंछी न बोले, कोई बैठो जाय अटारी री॥
पहरायत चौकस सब करद्यो, भरि नींद पिया सब सोवै री।
‘समनी’ कूं स्याम प्रभात समै, हरि को दरसण फिर होवै री॥
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