गुरु अर्जुनदेव के सबद : Guru Arjundev Ke Sabad
गुरु अर्जुन देव जी का सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक और धार्मिक कार्य आदि ग्रंथ का संकलन था। उन्होंने पहले चार गुरुओं की वाणी, विभिन्न संतों और भक्तों की रचनाओं तथा अपनी वाणी को एकत्र कराया और 1604 में आदि ग्रंथ को हरमंदिर साहिब में प्रतिष्ठित कराया। उनकी अपनी बाणी में नाम-स्मरण, सेवा, विनम्रता, ईश्वर-भक्ति और जीवन की सच्चाई जैसे विषय मिलते हैं। 30 मई 1606 को लाहौर में उन्होंने शहादत प्राप्त की।
कतिक करम कमावणे
कतिक करम कमावणे दोस न काहू जोग॥
परमेसर ते भुलिआं विआपन सभे रोग।
वेमुख होए राम ते लगन जनम विजोग॥
खिन मह कउड़े होए गए जितड़े माइआ भोग।
विच न कोई कर सकै किस थै रोवह रोज॥
कीता किछू न होवई लिखिआ धुर संजोग।
वडभागी मेरा प्रभ मिलै तां उतरह सभ बिओग॥
नानक कउ प्रभ राख लेह मेरे साहिब बंदी मोच।
कतिक होवै साधसंग बिनसह सभे सोच॥
सावण सरसी कामणी
सावण सरसी कामणी चरन कमल सिउ पिआर॥
मन तन रता सच रंग इको नाम अधार।
बिखिआ रंग कूड़ाविआ दिसन सभे छार॥
हर अंम्रित बूंद सुहावणी मिल साधू पीवणहार।
वण तिण प्रभ संग मउलिआ संम्रथ पुरख अपार॥
हर मिलणै नो मन लोचदा करम मिलावणहार।
जिनी सखीए प्रभ पाइआ हंउ तिन कै सद बलिहार॥
नानक हर जी मइआ कर सबद सवारणहार।
सावण तिना सुहागणी जिन राम नाम उर हार॥
असुन प्रेम उमाहड़ा
असुन प्रेम उमाहड़ा किउ मिलीऐ हर जाए॥
मन तन पिआस दरसन घणी कोई आण मिलावै माए।
संत सहाई प्रेम के हउ तिन कै लागा पाए॥
विण प्रभ किउ सुख पाईऐ दूजी नाही जाए।
जिंन्ही चाखिआ प्रेम रस से त्रिपत रहे आघाए॥
आप तिआग बिनती करह लेहो प्रभू लड़ लाए।
जो हर कंत मिलाईआ से विछुड़ कतह न जाए॥
प्रभ विण दूजा को नही नानक हर सरणाए।
असू सुखी वसंदीआ जिना मइआ हर राए॥
आसाड़ तपंदा तिस लगै
आसाड़ तपंदा तिस लगै हर नाह न जिंना पास॥
जगजीवन पुरख तिआग कै माणस संदी आस।
दुयै भाए विगुचीऐ गल पईस जम की फास॥
जेहा बीजै सो लुणै मथै जो लिखिआस।
रैण विहाणी पछुताणी उठ चली गई निरास॥
जिन कौ साधू भेटीऐ सो दरगह होए खलास।
कर किरपा प्रभ आपणी तेरे दरसन होए पिआस॥
प्रभ तुध बिन दूजा को नही नानक की अरदास।
आसाड़ सुहंदा तिस लगै जिस मन हर चरण निवास॥
हर जेठ जुड़ंदा लोड़ीऐ
हर जेठ जुड़ंदा लोड़ीऐ जिस अगै सभ निवंन॥
हर सजण दावण लगिआ किसै न देई बंन।
माणक मोती नाम प्रभ उन लगै नाही संन॥
रंग सभे नाराइणै जेते मन भावंन।
जो हर लोड़े सो करे सोई जीअ करंन॥
जो प्रभ कीते आपणे सेई कहीअह धंन।
आपण लीआ जे मिलै विछुड़ किउ रोवंन॥
साधू संग परापते नानक रंग माणंन।
हर जेठ रंगीला तिस धणी जिस कै भाग मथंना॥
माघ मजन संग साधूआ
माघ मजन संग साधूआ धूड़ी कर इसनान॥
हर का नाम धिआए सुण सभना नो कर दान।
जनम करम मल उतरै मन ते जाए गुमान॥
काम करोध न मोहीऐ बिनसै लोभ सुआन।
सचै मारग चलदिआ उसतत करे जहान॥
अठसठ तीरथ सगल पुंन जीअ दइआ परवान।
जिस नो देवै दइआ कर सोई पुरख सुजान॥
जिना मिलिआ प्रभ आपणा नानक तिन कुरबान।
माघ सुचे से कांढीअह जिन पूरा गुर मिहरवान॥
वैसाख धीरन किउ वाढीआ
वैसाख धीरन किउ वाढीआ जिना प्रेम बिछोह॥
हर साजन पुरख विसार कै लगी माइआ धोह।
पुत्र कलत्र न संग धना हर अविनासी ओह॥
पलच-पलच सगली मुई झूठै धंधै मोह।
इकस हर के नाम बिन अगै लईअह खोह॥
दयु विसार विगुचणा प्रभ बिन अवर न कोए।
प्रीतम चरणी जो लगे तिन की निरमल सोए॥
नानक की प्रभ बेनती प्रभ मिलहो परापत होए।
वैसाख सुहावा तां लगै जा संत भेटै हर सोए॥
चेत गोविंद अराधीऐ
चेत गोविंद अराधीऐ होवै अनंद घणा॥
संत जना मिल पाईऐ रसना नाम भणा।
जिन पाइआ प्रभ आपणा आए तिसह गणा॥
इक खिन तिस बिन जीवणा बिरथा जनम जणा।
जल थल महीअल पूरिआ रविआ विच वणा॥
सो प्रभ चित न आवई कितड़ा दुख गणा।
जिनी राविआ सो प्रभू तिंना भाग मणा॥
हर दरसन कंउ मन लोचदा नानक पिआस मना।
चेत मिलाए सो प्रभू तिस कै पाए लगा॥
मंघिर माहे सोहंदीआ
मंघिर माहे सोहंदीआ हर पिर संग बैठड़ीआह॥
तिन की सोभा किआ गणी जे साहिब मेलड़ीआह।
तन मन मउलिआ राम सिउ संग साध सहेलड़ीआह॥
साध जना ते बाहरी से रहन इकेलड़ीआह।
तिन दुख न कबहू उतरै से जम कै वस पड़ीआह॥
जिनी राविआ प्रभ आपणा से दिसन नित खड़ीआह।
रतन जवेहर लाल हर कंठ तिना जड़ीआह॥
नानक बांछै धूड़ तिन प्रभ सरणी दर पड़ीआह।
मंघिर प्रभ आराधणा बहुड़ न जनमड़ीआह॥
पोख तुखार न विआपई
पोख तुखार न विआपई कंठ मिलिआ हर नाह॥
मन बेधिआ चरनारबिंद दरसन लगड़ा साह।
ओट गोविंद गोपाल राए सेवा सुआमी लाह॥
बिखिआ पोह न सकई मिल साधू गुण गाह।
जह ते उपजी तह मिली सची प्रीत समाह॥
कर गह लीनी पारब्रहम बहुड़ न विछुड़ीआह।
बार जाउ लख बेरीआ हर सजण अगम अगाह॥
सरन पई नाराइणै नानक दर पईआह।
पोख सोहंदा सरब सुख जिस बखसे वेपरवाह॥
भादुइ भरम भुलाणीआ
भादुइ भरम भुलाणीआ दूजै लगा हेत॥
लख सीगार बणाइआ कारज नाही केत।
जित दिन देह बिनससी तित वेलै कहसन प्रेत॥
पकड़ चलाइन दूत जम किसै न देनी भेत।
छड खड़ोते खिनै माहे जिन सिउ लगा हेत॥
हथ मरोड़ै तन कपे सिआहहो होआ सेत।
जेहा बीजै सो लुणै करमा संदड़ा खेत॥
नानक प्रभ सरणागती चरण बोहिथ प्रभ देत।
से भादुइ नरक न पाईअह गुर रखण वाला हेत॥
फलगुण अनंद उपारजना
फलगुण अनंद उपारजना हर सजण प्रगटे आए।
संत सहाई राम के कर किरपा दीआ मिलाए॥
सेज सुहावी सरब सुख हुण दुखा नाही जाए।
इछ पुनी वडभागणी वर पाइआ हर राए॥
मिल सहीआ मंगल गावही गीत गोविंद अलाए।
हर जेहा अवर न दिसई कोई दूजा लवै न लाए॥
हलत पलत सवारिओन निहचल दितीअन जाए।
संसार सागर ते रखिअन बहुड़ न जनमै धाए॥
जिहवा एक अनेक गुण तरे नानक चरणी पाए।
फलगुण नित सलाहीऐ जिस नो तिल न तमाए॥
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