तुरसीदास निरंजनी निरंजनी संप्रदाय के प्रमुख संत-कवि, साधक और विचारक थे। वे ज्ञान, भक्ति और योग के साथ रहस्यवादी साधना के समर्थ कवि माने जाते हैं। उनकी वाणी में आत्मशुद्धि, गुरु-भक्ति, राम-नाम, विरह और प्रेम के साथ निर्गुण-सगुण ब्रह्म के विचार भी मिलते हैं। विद्वान पीतांबर दत्त बड़थ्वाल ने उन्हें निरंजनपंथ के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रमुख प्रतिपादक माना है।
धनि-धनि पीव की राजधानी हो
तुरसीदास निरंजनी
धनि-धनि पीव की राजधानी हो।सुरनर मुनि जाकै उलगाणा, इंद्र धुरै नीसानी हो॥
औनी आप जमाइ जुगति स्यूँ, मारुति माहिं समानी हो।
अंबर अधर धर्यो बिन खंभा, चंद सूर अगिवानी हो॥
ब्रह्मा कुलाल कुमेर भडारी, चित्र विचित्र लिखतानी हो।
धरम राइ जाकै कोटवाल, छप्पन कोडि भरै पानी हो॥
सेस सहस मुखि कीरत गावै, नारद से मुनि ग्यानी हो।
सनकादिक जाकै ब्रह्माचारी, शंकर से मुनि ध्यानी हो॥
सब देवन में देव गुसाईं, सबके अंतरजामी हो।
अरध-अरध मधि तुम्ह ही व्यापिक, तीनि लोक सिरिनामी हो॥
जैसे नदीया समदि समानी, बहोरि न उलधै पानी हो।
जन तुरसी मिलि रह्या परसिपरि, सबद रह्या सहबानी हो॥
आवो री सखी हो मिली गोविंद गावै
तुरसीदास निरंजनी
आवो री सखी हो मिली गोविंद गावै।गाइ-गाइ प्रीति सूँ पीव अपनो मनावै॥
अपनै-अपनै मंदिरन सूँ, झूँडन चलि-चलि आवै।
जेनि केनि केहू प्रकार, अपनो राम रिझावै॥
पाँच छठी सातई मिलि, औरहू बुलावै।
हिरदै राम रूप में, जल बूँद लौं मिली जावै॥
तीनि लोक भर में तो ऐसो न औसर पावै।
जन तुरसी अपने प्रभु कूँ मिली, जीति निसान बजावै॥
बिचालै नदी बहै जी
तुरसीदास निरंजनी
बिचालै नदी बहै जी, अब पीव क्यूँ करि आऊँ पार॥बहे बिचालै नदी अप्रबल, औंडी गहिर गंभीर।
मैं अबला तिरि न सकूँ, गहूँ किसि बिधि तीर॥
तामहिं मगरमछ बहुतेरा, केतो उठहिं तरंग।
पैली पार मोरा पीव बसै, होइ कहौ क्यौं सग॥
है कोई तारू ततबेता, पार उतारै मोहि।
साऊ सूँ मेला करै, पै बड़ उपगारी सोइ॥
कामी तलफै काम कूँ, ज्यूँ निरधन धन की पाहि।
जन तुरसी तलफै दरस कूँ, जैसे चात्रिग घन की चाहि॥
हरि बिन ए दिन जात दुखारे
तुरसीदास निरंजनी
हरि बिन ए दिन जात दुखारे।सकल सिंगार सेज सुख त्यागे, जा दिन ते भये न्यारे॥
सुनि री सखी सावन रुति आई, बरसि सबे बन पारे।
हमरे तन अजहूँ नहिं उलह्त, बिरह अगनि के जारे॥
कासूं कहौ कौन यह मानै, अंतर करवत सारे।
मन ही मनहिं त्रिसूरि बिरहिनी, मुरछि नैन जल ढारे॥
आरतिवत आस चाबिग लौ, सारी रैनि पुकारे।
जन तुरसी प्रभु प्रीति जानि कै, घन लौं आनि गलारे॥
रमईया तुम बिन रह्यो न जाइ
तुरसीदास निरंजनी
रमईया तुम बिन रह्यो न जाइ।दया मया करि अंदरि मेरै, बेगि मिलिउ किनि आइ॥
दीन दुखी दरसन बिन दिन, अति गति रहै उदास।
करम कपाट खोलि सब स्वामी, बेगिन करिउ प्रकास॥
जैसे हो तैसे तुम प्रगटी, प्रगट दरसन देह।
दिन दरसन मेरे क्यों मनमानै, पल-पल छीजै देह॥
तन मन मेरा तुमहीं ताईं, का कहौं बहोत बनाई।
जन तुरसी कूं मिलिउ कृपा करि, बेगि विलंब न लाई॥
जग सूं प्रीति करे जिनि कोइ
तुरसीदास निरंजनी
जग सूं प्रीति करे जिनि कोइ।हंस मूवौ कउवा संगि होई॥
कनक कामनी विषफल योई।
जिहिं देख्या विष व्यापै सोई॥
खाए ते तन कौ होइ नास।
इनका संग तजै सोइ दास॥
अहनिस रहै एक सूँ लीन।
जैसे पानी माँही मीन॥
तबसंताप व्यापै नहिं कोई।
निहचै सब सुख पावै सोइ॥
जन तुरसी ऐसा जन कोई।
राम नाम जपि निरभै होइ॥
उनमन ताली रहै लगाइ।
आपा तजि हरि माहि समाइ॥
मन बनिजारा रे भाई
तुरसीदास निरंजनी
मन बनिजारा रे भाई।दिना दस ब्यौपार करि ले, गुरु ग्यांन लै साईं॥
नर नारायण देह, पूरब पुनि ते पाई।
भजन बिना पछिताइगौ, जब समै चलि जाई॥
संसार सहर बाजार मांहीं, तू भूलि मति जाई।
धकाधकी तहँ पाइये, हरि नांव बिसराई॥
जा कारनि दहु करम करते, रेणि दिन ध्याई।
सगि न कोई चालि है, जम पकरि ले जाई॥
समझ सौंज सवारि अपनी, रैणि पडि जाई।
पंच चोर महाबली, तोहिं हरहिंगे आई॥
चेतन पहरै जागि निस दिन, सोई मति जाई।
यहु औसर बहोरि न, तोहि कहू समझाई॥
ब्रह्म वस्त विसाहि कै हम लादि चल ले भाई।
जन तुरसी बनिजारिया, जन ठेटि पहुँचाई॥
बादल बरसन लागै दोइ
तुरसीदास निरंजनी
बादल बरसन लागै दोइ।ररौ ममौ उर माहिं उमंगि कै, जल-थल डारे बोइ॥
ऊनै आई घटा ज्ञान की, दामनि दमकत सोइ।
प्रीति पवन चलि हरि जल बूडी, इम्रत धारा सोइ॥
तपति मिटी तन भयौ सीतल, सुरति सुधा रसभोइ।
नख-सख नगरी आनंद उपज्यौ, सुख बिलसै सब कोइ॥
दुरभक्ष मिटि सुरभष्य उपजानी, दुख दलिद्र गए सोइ।
तुरसी आदि अति भई अभैता, मंगल गावै लोइ॥
भली भई ज्ञान प्रकास भयौ
तुरसीदास निरंजनी
भली भई ज्ञान प्रकास भयौ।मिट्यौ जु तिमिर तन-मन सुरझानौ, कालखिसाइ गयौ॥
पाप-पुनि कौ उदिम थाक्यौ, निर उदिम होइ रह्यो।
जुरामरन जुगजीति जुगति सूँ, हरि मारग निबह्यो॥
साच झूठ भिनि करि दिखलाए, भरम तजि करम दह्यो।
नृगुन घृत मथि लीयौ जुगति सूँ, छाड्यो श्रगुन मह्यौ॥
पंचतत गुनतीन विबरजित, सोई पद उलटि गह्यो।
जन तुरसी गुरकबीर करता सगि, सकल सुहाग लह्यो॥
चलौ जीव हमारा
तुरसीदास निरंजनी
चलौ जीव हमारा, चलि रे जाहिं अपने देस।तहाँ सुख ही सुख आदि अति मधि, नहीं दुख कौ अहि लेस॥
जोगी कै तै फेरी दीन्ही, च्यारि दिसावर माहिं।
लख चौरासी होइ फिर्यो, कहूँ सचु पायौ नाहिं॥
कहूँ चतुर पद कहुँ दुपर एक पद, कहूँ बहुतन पद पाइ।
ब्रह्म बिछोहैं तैं यहु दुख भुगत्यौ, बरि धरि नामां काइ॥
मजहुँ समझि सावधान होइ, जुग की मोह मिटाइ।
अनत सुतन सौं उलटि गगम धरि, रहिए वा सुपहिं समाइ॥
या झूठ बजन में निरंजन, काकरि रह्यो अज्ञान।
अपनी शरम रूप क्यूँ न संभारै, निराबरन निरबांन॥
होइ सजाती मिलहु ब्रह्म कूँ, बिजाती मत खोइ।
जन तुरसी जो वे होइ रहौ, ज्यूँ बहुरि बिछोह न होइ॥
अब मैं आयो सरन तुम्हारी
तुरसीदास निरंजनी
अब मैं आयो सरन तुम्हारी।भजन की मोहिं राम दुहाई, मडीयौ चरन मुरारी॥
यहु संसार झूठ हम देख्या, तामहिं सचु नहिं भाई।
राम भजन विचि अंतर पारै, बिषमहि देइ भुलाई॥
भरम-करम का मना दिठावै, भरमावै अति भारी।
नाव छुड़ाइ नरक में बोवै, ऐसे जीव विकारी॥
झूठी काया झूठी माया, झूठा परपंच पसारा।
जम की त्रास अधिक ता माहीं, तातै किया प्रहारा॥
वोछी आ अलप जीवन प्रभु, विनसत नाहिन बारा।
जन तुरसी सरनाई आयौ, देहु-देहु दीदारा॥
ऐसो ज्ञान बिचारहु रे
तुरसीदास निरंजनी
ऐसो ज्ञान बिचारहु रे, तो तुम आपा तारहु रे॥मानि अमृत संसार में औमान जु खारो रे।
औमानै अमृत गिनै, सोई साधू सारो रे॥
मांन औमान की ठागनि माँझ, दाझत सब लोई रे।
ता झर में सतत झरे तौ अधिकार न कोई रे॥
सम लोष्ठ सम काँधना, दुःख-सुख समि जानौ रे।
सीत उश्न को बिथा मांनि, मन मं मति आमौ रे॥
कोउ निंदौ दुःख पाइके सुख पाइजु कोऊ रे।
हरषि-हरषि असतुति करै तुति जोंनौ दोऊ रे॥
लख चौरासी जीव जंत अलिभलि जिते जानौ रे।
निरबर हाइ सकल माँझ एक ब्रह्म पिछानौ रे॥
सकल सासत्र कौ सारभूत ऐ ताँही आही रे।
जन तुरसा सुभ सरूप में भिखि रही है नांही रे॥
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