बुल्ला साहब के सबद : Bulla Sahib Ke Sabad
बुल्ला साहब का मूल नाम बुलाकी राम बताया जाता है। वे संत यारी साहब के शिष्य थे और बावरी संत परंपरा से जुड़े रहस्यवादी कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनके आध्यात्मिक जीवन में गुरु और आंतरिक साधना का विशेष स्थान था। आगे चलकर गुलाल साहब और संत जगजीवन जैसे संत उनके शिष्य बने। बाहरी कर्मकांड के बजाय वे मनुष्य को अपने भीतर की चेतना पहचानने और गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने की ओर ले जाते थे।
बुल्ला साहब की उपलब्ध वाणी में सबद और दोहे प्रमुख हैं। ‘गुरु नाम मिलो सच पाया है’, ‘बटोही खोजहु क्यों नहिं आप’ और ‘दया बिनु छार सकल माया’ जैसे पदों में आत्मखोज, गुरु-ज्ञान, प्रेम और माया से विरक्ति के स्वर सुनाई देते हैं। उनके कई सबदों में अनहद नाद, सुरति और आंतरिक अनुभवों का उल्लेख मिलता है। भाषा संत परंपरा की लोकधर्मी शैली में है, जिसमें गूढ़ साधना-विचारों को प्रतीकात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।
समुझ मन मानि ले जोगिया
समुझ मन मानि ले, जोगिया कहल संदेस।
रैनि दिवस रबि ससि वहँ नाहीं, तहवाँ कर उपदेस॥
जटा भभूत बैराग जोग तप, यह तौ जोगिया न भाय।
सुन्न निरंतर जोगी बोलै, आपा उलटि समाय॥
आपै जोगी आपै भोगी, आपै सर्ब समान।
वा जोगिया के दरस परस पर, किया सीस क़ुरबान॥
गगन मंडल अनहद धुनि बाजै, तहँ जोगिया कै फेर।
कह जन बुल्ला वा जोगीबर, सत्त सब्द कै चैर॥
पूरब देस कर आपुहिं बँभना
पूरब देस कर आपुहिं बँभना, आपु भयल अबधूता॥
अपरंपार पारब्रह्म बँभना, आयो हमरे घर अँगना।
परम तत्त ले पूजि आपु हीं, सरल गावै अनहद ततना॥
रजगुन तमगुन सतगुन सारल, हारल तन मन दोऊ।
गगन मँडल में हरि रस चाखल, बूझै बिरला कोऊ॥
ज्ञान की तरकस सब्द तीर भरि, प्रेम धनुष धरि तानल।
सुरति कै सीस निसाना मारल, भव का भंडा फोरल॥
निर्भय जन इक निर्गुन गावल, स्वामा सुर्गुन भावल।
जन बुल्ला बिन स्वासहि गावहि, सेत प्रकास समावल॥
अहो मन ज्ञानी
अहो मन ज्ञानी, तूँ तो परम प्रीति पहिचानी।
उदय अस्त जाकी महिमा बोलै, सब घट अमृत बानी॥
सुरति डोरि लव लागि रहानी, राम नाम निजु जानी॥
रबि ससि पवन बिलोकै मनुवाँ, गगन मगन मन मानी॥
अगम अपार सिंधु सागर प्रभु, कह बुल्ला जिन जानी॥
मन बसंत खेले अगम फाग
मन बसंत खेले अगम फाग।
चरन कमल अनुराग जाग॥
खेले ब्रह्मा औ महादेव।
खेले नारद औ जैदेव॥
खेले ध्रुव प्रहलाद जानि।
खेले सुकदेव भक्ति मानि॥
हनुमत खेले सेवक होय।
अरजुन खेले गति बिलोय॥
सहदेव खेले अगम गाय।
परम जोति में रहे समाय॥
खेले नाभा औ कबीर।
खेले नानक बड़े धीर॥
दसम द्वार पर दरस होय।
जन बुल्ला देखु आपु सोय॥
प्रभु निराधार अधार उज्जल
प्रभु निराधार अधार उज्जल, बिंदु सकल बिराजई।
अनंत रूप सरूप तेरो, मो पै बरनि न जावई॥
बाँधि पवनहिं गगनहिं, गरजि-गरजि सुनावई।
तहँ हंस मुनि जन चूगते मनि, रस परसि परसि अघावई॥
बिना कर मुख बेनु बाजै, बीन स्त्रवनन गुंजई।
बिना नैनन दरस देखो, अगति गतिहिं जनावई॥
वा के जाति पाँति न नेम धर्मा, भर्म सकल गँवावई।
आपु-आपु बिचारि देखो, ऐसो है वह रावई॥
जीति पाँच पचीस तीनों, चौथे जा ठहरावई।
तब दास बुल्ला लियो गढ़, जब गुरु दीन्ह लखावई॥
गुरु नाम मिलो सच पाया है
गुरु नाम मिलो सच पाया है।
बिसरी देह गेहब सुख संपति, जोतिहिं जोति समाया है॥
जीतो नगर नवो दर मूँदो, ब्रह्म अगिन तन लाया है।
दसवें द्वार कै ताला खोलो, गगन मंडल मठ छाया है॥
जहँ नहिं अवन गवन कै चिंता अनंद भयो घर आया है।
संत साध मिलि खेलन लागे, दरसन को फल पाया है॥
सतगुरु मो को अलख लखाया, आदि अंत इक साया है।
जन बुल्ला याही बिधि खेलो, तब अवधूत कहाया है॥
बूझहु पंडित अचरज एक
बूझहु पंडित अचरज एक।
सेत बरन तहँ सदा अलेख॥
साधि पवन षट चक्र छुड़ावो।
तिरबेनी के घाटै आवो॥
उनमुनि मुद्रा लगी समाधी।
रबि ससि पवनहिं राखो बाँधी॥
चाचरि मुद्रा से प्रीति लगावो।
खेचरि मुद्रा से दरस दिखावो॥
जो पंडित तै करु पंडिताई।
चरन रेनु हिरदे लै लाई॥
चरन रेनु का करहु जनेवा।
तौ तू पंडित पावहु भेवा॥
जो यह अचरज देइ बुझाई।
सोई सतगुरु अगम कहाई॥
अगम जोति का धारै ध्यान।
बुल्ला बोलहि सब्द निदान॥
हिंडोला झूलहि आतम नारी
हिंडोला झूलहि आतम नारी।
काम क्रोध जे कर्म पटरी, मन पवन डोरी लाय॥
तहँ चाँद सूरज खंभ गड़िया, गंग जमुन बँधाय।
पौढ़िया ब्रह्मंड चढ़िके, गगन गरजि सुनाय॥
जगमगति जोति प्रकास उज्जल, दरस की बलि जाय।
झूलहिं जो हंस कलोल करि के, सखिन को सँग लाय॥
तहँ मिलै बिरही हंस जन कोउ, अगम दियो है लखाय।
तहँ दास बुल्ला कियो संगति, रह्यो चरन समाय॥
निसु दिन गगन निरेखो जाय
निसु दिन गगन निरेखो जाय।
छोड़ि दे बहु बात बिषया, मगन ह्वै गुन गाय॥
तिरकुटी जहैं बसत संगम, गंग जमुन बहाय।
बरत झिलमिलि होत जगमग, तहाँ रहु अरुझाय॥
सुन्न के मनि भवन में, तहँ ध्यान रहु ठहराय।
खोजि ले निज बस्तु अपनी, सकल घट रहि छाय॥
तीन लोक में गम्म जा के, द्वार सेवा लाय।
जन बुल्ला कहि अगम मेला, बिरल जन कोइ पाय॥
अनहद ताल दृग थेइ बाजै
अनहद ताल दृग थेइ-थेई बाजै।
सकल भुवन जा की जोति बिराजै॥
ब्रह्मा बिस्नु खड़े सिव द्वारे।
परम जोति सो करहिं जुहारे॥
गगन मँडल महँ निर्तन होय।
सतगुरु मिलै तो देखै सोय।
आठ पहर जन बुल्ला गाजै।
भक्ति भाव माथे पर छाजै॥
बटोही खोजहु क्यों नहिं आप
बटोही खोजहु क्यों नहिं आप। सुमिरहु अजपा जाप।
बिन खोजे कहुँ राह न पैहो, कोटिन करहु बिलाप।
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहिं जाहि मिलाप॥
हाज़िर हज़ूर त्रिबेनी संगम, झिलिमिलि नूर जो जाप।
जन बुल्ला महबूब नूर में, यारी पीर प्रताप॥
देखो पिया काली घटा
देखो पिया काली घटा मो पै भारी।
सूनी सेज भयावन लागी, मरौं बिरह की जारी॥
प्रेम प्रीति यहि रीति चरन लगु, पल छिन नाहिं बिसारी।
चितवन पंथ अंत नहिं पायो, जन बुल्ला बलिहारी॥
राम राय लावल फुलवारी
राम राय लावल फुलवारी॥
मूल सींचि के बाग लगाया। कलियाँ भईं तबहिं चुनवाया॥
एक फूल ते अनेक कहाय। फूल झरी झरि रहि कुम्हिलाय॥
काहू फूल के मरम न पाया। सरगुन मद्दे रहल समाया॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी। सेत फूल जिन लिहल बिचारी॥
सुखमनि सुरति डोरि बनाव
सुखमनि सुरति डोरि बनाव।
मेटि है सब कर्म जिय के, बहुरि इतहिं न आव॥
पैठि अंदर देखु कंदर, जहाँ जिय को बास।
उलटि प्रान अपान मेटो, सेत सब्द निवास॥
गंग जमुना मिलि सरस्वति, उमँगि सिखर बहाव।
लवकंति बिजुली दामिनी, अनहद गरज सुनाव॥
जोति आया आपहीं, गुरु यारि सब्द सुनाव।
तब दास बुल्ला भक्ति ठानो, सदा रामहिं गाव॥
हौं अबला बनि आई
हौं अबला बनि आई, देहु दरस गति पाई।
सुभ घरी सुभ दिन सुभ पल छिन, जब तुमहीं लौ लाई॥
मनसा बाचा कर्मना, मेरे धन राम गुसाईं॥
केतिक जन्म चूक प्रभु मेरो, कहँ लग बिनय सुनाई॥
जन बुल्ला सरनागति आयो, सुमिरि-सुमिरि गुन गाई॥
साची भक्ति गुपाल की
साची भक्ति गुपाल की, मेरो मन माना।
मनसा बाचा कर्मना, सुनु संत सुजाना॥
लँगरा लुंजा ह्वै रहो, बहिरा अरु काना।
राम नाम से खेल है, दीजै तन दाना॥
भक्ति हेतु गृह छोड़िये, तजि गर्ब गुमाना।
जन बुल्ला पायो बाक है, सुमिरो भगवाना॥
दया बिनु छार सकल माया
दया बिनु छार सकल माया, कबहीं राम नाम नहिं आया।
पोखरा खनावहिं बाग लगावहिं, पावहिं मन माया।
आतम राम न नीके जानहिं, ज्यों आया त्यों जाया॥
समुझि न परहि साध को मारग, जिन हरि नामहिं गाया।
जन बुल्ला रामहिं को सेवक, मिथ्या जानहि माया॥
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें