भीखा साहब के सबद : Bheekha Sahab Ke Sabad
भीखा साहब निर्गुण संत परंपरा के प्रमुख संत-कवियों में माने जाते हैं। वे संत भजनदेव के शिष्य थे और उनकी साधना तथा काव्य परंपरा में गुरु-भक्ति, आत्मज्ञान, नाम-स्मरण और ईश्वर की निर्गुण उपासना को विशेष स्थान मिला। उनकी वाणी में बाहरी आडंबर के बजाय मन की शुद्धता और आत्मचिंतन पर बल दिखाई देता है।
भीखा साहब ने अपनी बात सरल लोकभाषा में कही, जिससे उनके पद और वचन सामान्य जन तक सहज रूप से पहुँच सके। उनकी रचनाओं में आध्यात्मिक अनुभव के साथ जीवन और मनुष्य के आचरण से जुड़े विचार भी मिलते हैं। संत साहित्य की परंपरा में उनकी वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के भावों को व्यक्त करने वाली महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।
होरी सो खेलै जा के सतगुरु ज्ञान बिचार
भीखा साहब
होरी सो खेलै जा के सतगुरु ज्ञान बिचार।यहि सिवाइ जो और करतु है, ता को जन्म खुवार॥
इँगल पिंगल ह्वै सुन्न भँटानो, सुखमन भयो उँजियार।
नूर जहूर बदन पर झलकत, बरखत अधर अधार॥
बाजत अनहद घंटा तहँ धुनि, अबिगत सब्द अपार।
पुलकि पुलकि मन अनुभव गावत, पावत अलख दिदार॥
अजर अबीर कुमकुमा केसरि, उमगो प्रेम पोखार।
राम नाम रस रंग भयो, गत काम क्रोध हंकार॥
ब्यापक पूरन अगम अगोचर, निज साहब बिस्तार।
भीखा बोलत एक सभन में, है जग सकल हमार॥
भजन तें उत्तम नाम फ़क़ीर
भीखा साहब
भजन तें उत्तम नाम फ़क़ीर।छिमा सील संतोष सरल चित दरदवंद पर पीर॥
कोमल गदगद गिरा सेाहावन प्रेम सुधा रस छीर।
अनहद नाद सदा फल पायो भोग खाँड घृत खीर॥
ब्रह्म प्रकास को भेख बनायो नाम मेखला चीर।
चमकत नूर ज़हूर जगामग ढाँके सकल सरीर॥
रहनि अचल अस्थिर कर आसन ज्ञान बुद्धि मति धीर।
देखत आतम राम उघारे ज्यौं दरपन मद्धे हीर॥
मोह नदी भ्रम भँवर कठिन है पाप पुन्य दोउ तीर।
हरि जन सहजे उतर गये ज्यों सूखे ताल को झीर॥
जग परपंच करम बहतो है जैसे पवन अरु नीर।
गुरु गम सब्द समुद्रहिं जावे परत भयो जल थीर॥
केलि करत जिय लहरि पिया संग मति बड़ गहिर गंभीर।
ताहि काहि पटतरो दीजै जिन तन मन दिया सीर॥
मन मतंग मतवार बड़ो है सब ऊपर बल बीर।
भीखा हीन मलीन ताहि को छीन भयो जस जीर॥
को लखि सकै राम को नाम
भीखा साहब
को लखि सकै राम को नाम।देइ करि कौल करार बिसारो, जियना बिनु भजन हराम॥
बरनत बेद बेदांत चहूँ जुग, नहिं अस्थिर पावत बिसराम।
जोग जज्ञ तप दान नेम ब्रत, भटकत फिरत भर अरु साम॥
सुर नर मुनि गन पचि पचि हारे, अंत में मिलत बहुत से लाम।
साहब अलख अलेख निकट हीं, घट घट नूर ब्रह्म के धाम॥
खेाजत नारद सारद अस अस, जातु है समय दिवस अरु जाम।
सुगम उपाय जुक्ति मिलबे की, भीखा इह सतगुरु से काम॥
जो कोउ राम नाम चित धरै
भीखा साहब
जो कोउ राम नाम चित धरै।तन मन धन न्योछावर वारै, सहज सुफल फल फरै॥
गुरु परताप साध की संगति, जाग जुक्ति उर भरै॥
इंगला पिंगला सुखमन सोधै, ज्ञान अगिन उदगरै॥
चाँद सरज एकागर करि कै, उलट उरध अनुसरै॥
नाद बिंद को जोहु गगन में, मन माया तब मरै॥
आठ पहर नौबल धुनि बाजै, नेक पलक नहिं टरै॥
भीखा सब्द सुनतहिं अबुध बुध, अमरख हरख करै॥
समुझि गहो हरिनाम
भीखा साहब
समुझि गहो हरिनाम,मन तुम समुझि गहो हरिनाम।
दिन दस सुख यहि तन के कारन,
लपटि रहो धन धाम॥
देखु बिचारि जिया अपने,
जत गुनना गुनन बेकाम।
जग जुक्ति अरु ज्ञान ध्यान तें,
निकट सुलभ नहिं लाम॥
इत उत की अब आसा तजि कै,
मिलि रहू आतम राम।
भीखा दीन कहाँ लगि बरनै,
धन्य घरी वहि जाम॥
करुनामय हरि करुना करिये
भीखा साहब
करुनामय हरि करुना करिये,कृपा कटाच्दछ ढरन ढरिये।
भक्तन के प्रतिपाल करन को,
चरन कँवल हिरदै धरिये।
ब्यापक पूरन जहाँ तहाँ लगु,
रीतो ने कहूँ भरन भरिये॥
अब की बार सवाल राखिये,
नाम सदा इक फर फरिये।
जन भीखा के दाता सतगुरु,
नूर जहूर बरन बरिये॥
मन तोहिं कहत कहत सठ हारे
भीखा साहब
मन तोहिं कहत कहत सठ हारे।ऊपर और अंतर कछु औरै, नहि बिस्वास तिहारे॥
आदिहिं एक अंत पुनि एकै, मदुहुँ एक बिचारे।
लबज लबज एहृवर ओहृवर करि, करम दुइत करि डारे॥
बिषया रत परपंच अपरबल, पाप पुन्न परचारे।
काम क्रोध मद लोभ मोह कब, चोर चहत उँजियारे॥
कपटी कुटिल कुमति बिभिचारी, हो वा को अधिकारे।
महा निलज कछु लाज न तो को, दिन-दिन प्रति मोहिं जारे॥
प्रीति की यह रीति बखानौ
भीखा साहब
प्रीति की यह रीति बखानौ।कितनौ दख सख परै देह पर, चरन कमल कर ध्यानौ।
हो चेतन्य बिचारि तजो भ्रम, खाँड धूरि जनि सानौ॥
जैसे चात्रिक स्वाँति बूँद बिनु, प्रान समरपन ठानौ।
भीखा जेहिं तन राम भजन नहिं, काल रूप तेहिं जानौ॥
निज घर काहे न छावत मन तुम
भीखा साहब
निज घर काहे न छावत मन तुम।सिर पर काल कराल घटा लै, तन को त्रास दिखावत॥
अनहद नाद गगन घहरानो, आयुस समय जनावत।
हेइ होउ आजु कालि दिन बीतते, भ्रम बसि चेत न आवत॥
जब आयो तब का कहि आयो, जाहु तो का कहि जावत।
अगुवन चेतु समय बीते पर, पाछे काम नसावत॥
सतसंगति करु ज्ञान को संग्रह, सुरति निरति सुरझावत।
आतम राम प्रकास को छाजा, जम जल निकट न आवत॥
जल भरि थल भरि पूरन उमग्यो, भाव रहस्य बढ़ावत।
जहँ देखो तहँ रूपहि भासै, अपुहिं आपु दरसावत॥
घर में मौज बाहर फिर मौजै, मौजे मौज बनावत।
कह भीखा सब मौज साहब की, मौजी आपु कहावत॥
धुनि बजत गगन महँ बीना
भीखा साहब
धुनि बजत गगन महँ बीना।जहँ आपु रास रस भीना॥
भेरी ढोल संख सहनाई, ताल मृदंग नवीना।
सुर जहँ बहुतै मौज सहज उठि, परत है ताल प्रबीना॥
बाजत अनहद नाद गहागह, धुधुकि धुधुकि सुर झीना।
अँगुली फिरत तार सातहुँ पर, लय निकसत भिन भोना॥
पाँच पचीस बजावत गावत, निर्त चारु छबि दीना।
उघटत तननन ध्रितां ध्रितां, कोउ ताथेइथेइ तत कीना॥
बाजत जल तरंग बहु मानो, जंत्री जंत्र कर लीन्हा॥
सुनत सुनत जिव थकित भयेा, मानो ह्वै गयो सब्द अधीना॥
गावत मधुर चढ़ाय उतारत, रुनझुन रुनझुन धीना।
कटि किंकिनि पगु नूपुर की छबि, सुरति निरति लौलीना॥
आदि सब्द ओंकार उठतु है, अटुट रहत सब दीना।
लागी लगन निरंतर प्रभु सों, भीखा जल मन मीना॥
मन में आनंद फाग उठो री
भीखा साहब
मन में आनंद फाग उठो री॥इँगला पिंगला तारी देवै, सुखमन गावत हारी॥
बाजत अनहद डंक तहाँ धुनि, गगन में ताल परो री॥
सतसंगति चोवा अबीर करि, दृष्टि रूप लै घोरी॥
गुरु गुलाल जी रंग चढ़ायो, भीखा नूर भरो री॥
मन तुम छोड़हु सकल उदासी
भीखा साहब
मन तुम छोड़हु सकल उदासी।राम के नाम तीर्थ घट ही में, दिल द्वारिका औ काया कासी॥
करते जग अपने कर बाँधेा, तिरगुन डोरि की फाँसी।
भिन्न-भिन्न निज गुन बरतावहिं, काहू कै कछु न सिरासी॥
तेहि तें कनक कामनी अरुझो, हरि सों सदा निरासी।
अंतै नैन स्रवन अंतै है, रसना अंतै साँसी॥
ब्रह्म सरूप अनूप भूप बर, सोभा सुख को रासी।
केवल आतम दाम बिराजत, परमातम अबिनासी॥
अपरंपार अखंडित बानी, अकथ कथी नहिं जासी।
सो परभाव प्रगट सतसंगति, जेाग जुगत अभ्यासी॥
सतगुरु ज्ञान बान जेहिं मार्यो, लगी मरम उर गाँसी।
घायल घुरमित उलटि गयो त्यों, चेतन उदित प्रकासी॥
जग समुद्र नवका नर देही, कनिहर गुरु बिस्वासी।
अमृत हरि को नाम सजीवन, चाखत छकि न अघासी॥
बेद बेदांत संत मुख भाखहिं, धन्य जो नाम उपासी।
मन क्रम बचन जु हरि रंग राते, तजे जगत उपहाँसी॥
जे एकै ब्यापक आतम तौ, को ठाकुर को दासी।
ब्रह्म सरूप है साहब सेवक, दिब्य दृष्टि है खासी॥
अलख राम को लखै सोई जन, जो भ्रम भीति को ढासी।
सोइ जोगी जोगेसुर ध्यानी, जा की रहनि अकासी॥
हरि सों प्रीति निरंतर दिन दिन, छुट्टी भूख पियासी।
सुरति मिली अवलोकि निरति महँ, कहँ आवे कहँ जासी॥
त्यागि सकल परपंच बिषै हरि, ताहि मिलै अन्यासी।
निरमोही निर्बान निरंजन, निरममता सन्यासी॥
मोहनभेाग सेख लै बैठो, सुन्न में आसन डासी।
भीखा पावत मगन रैन दिन, टाटक हात न बासी॥
जो कोउ या बिधि हरि हिय लावै
भीखा साहब
जो कोउ या बिधि हरि हिय लावै।खेती बनिज चाकरी मन हैं, कपट कुचाल बहावै॥
या बिधि करम अधर्म करते है, ऊसर बीज बेवावै।
कोटि कला करि जतन करै जे, अंत से निस्फल जावै॥
चौरासी लछ जीव जहाँ लगु, भ्रमि भ्रमि भटका खावै।
सुरसरि नाम सरूप की धारा, सो तजि छाँहि गहावै॥
सतगुरु बचन सत्त सुकिरित सों, नित नव प्रीति बढ़ावै।
भीखा उमग्ये सावन भाद, आपु तें आपु समावै॥
ऐसो राम कवनि बिधि जानी
भीखा साहब
ऐसो राम कवनि बिधि जानी।दृष्टि मुष्टि कबहीं नहिं आवत, जनम मरन जुग बहुत सिरानी॥
अगम अगोचर बसत निरंतर, जा के सीस न पाँव न पानी।
निर्गुन निर्विकार सुख सागर, अपरंपार अखंडित बानी॥
ईसुर के केतहि ईसुरता, साहब अविगत अकथ कथानी।
अगह अकह अनभव अन मूरति, थाके सकल खेाजि मुनि ज्ञानी॥
अलख को लखे अदेख को देखे, ब्यापक पूरन चारिउ खानी।
निरंकार निरुपाधि निरामय, भीखा रंग न रूप निसानी॥
गुरु गोबिंद की करत आरती
भीखा साहब
गुरु गोबिंद की करत आरती।दिन दिन मंगल सद बिहारती॥
प्रेम प्रीति तन मनहिं गारती।
जोग ध्यान दीपक सँवारती॥
बाती सुत सनेह बरि डारती।
सतगुरुबिरह अगिन उद्गारती॥
पाप पुन्न सब करम जारती।
भाव थार भक्ती सों धारती॥
अभि अंतर हरि नाम उचारती।
तजि बिषयारति चरन निहारती॥
भीखा आरति सहज उतारती॥
ए साहब तुम दीनदयाला
भीखा साहब
ए साहब तुम दीनदयाला।आयहु करत सदा प्रतिपाला॥
केतिक अधम तरे तुम चरनन,
करम तुम्हार कहा कहि जाला॥
मन उनमेख छुटत नहिं कबहीं,
सौच तिलक पहिरे गल माला॥
तनिकौ कृपा करहु जेहिं जन पर,
खुल्यो भाग तासु को ताला॥
भीखा हरि नटवर बहु-रूपी,
जानहिं आपु आपनी काला॥
अस करिये साहब दाया
भीखा साहब
अस करिये साहब दाया॥कृपा कटाच्छ होइ जेहि तें प्रभु, छूट जाय मन माया॥
सोवत मोह निसा निस बासर, तुमहीं मोहिं जगाया॥
जनमत मरत अनेक बार, तुम सतगुरु होय लखाया॥
भीखा केवल एक रूप हरि, ब्यापक त्रिभुवन राया॥
बारहमासा
भीखा साहब
कोटि करै जे कोय, सतगुरु बिन प्रभु ना मिलैं॥मास असाढ़ जन्म सुभ, बादर अलप सुनाव।
करम भरम जल अंतर, प्रभु सों परल दुराव॥
सावन सहज सोहावन, गरजै औ घहराय।
बुंद झलाझलि झलकै, हरि बिनु कछु न सोहाय॥
भादों भवन भयंकर, सुनि रैनी उतपात।
कहिं-कहिं दमकै दामिनी, डरपत है बहू गात॥
मास कुवार अवधि दिन, बरखा बरखि सिराय।
नैन निमिख नाहीं लगै, सिर धुनि-धुनि पछिताय॥
कातिक मास उदासित, सुरति चललि परदेस।
निरति मिलन के कारन, कब धौं मिटहिं कलेस॥
अगहन मास जु ध्यान धन, खेती करत किसान।
नाम बीज लव लावै, बावै से लवै निदान॥
पूस जु मास हवाल है, जाड़-जाड़ नियराय।
ओढ़न जब हरि मिलन को, आनंद प्रेम अघाय॥
माघ मास जु बसंत रितु, फुल्यो काया बन झारि।
सगुन संजेाग बिबिधि तन, मिलि है देव मुरारि॥
फागुन मास जु राग रंग, गुरु के वचन अस्थूल।
नाद बिंद इक सम भयो, जीव सीव करि मूल॥
चैत मास निर्मल तनै, द्रुम नव पल्लव लेत।
रूप अरुन मृदु सकल है, निज आतम छबि देत॥
बैसाख मास फल पूरन, जाग जुक्ति प्रनयाम।
दृष्टि उलटि कै लगि रहो, निसु दिन आठों जाम॥
जेठ बिषम तप भजन को, केवल ब्रह्म बिचार।
कह भीखा सोई धन्न है, जेकर नाम अधार॥
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