नरेंद्र शर्मा के गीत : Narendra Sharma Ke Geet
नरेन्द्र शर्मा (1913–1989) हिंदी के प्रसिद्ध कवि और गीतकार थे। उनकी रचनाओं में प्रेम, प्रकृति, राष्ट्रभावना और मानवीय संवेदनाओं के साथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना के स्वर भी मिलते हैं। कविता में वे भाव और विचार को सरल, मधुर तथा लयात्मक भाषा में व्यक्त करने के लिए जाने जाते हैं।
नरेन्द्र शर्मा ने हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी फिल्म जगत में भी गीतकार के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके लिखे गीतों में काव्यात्मकता और संगीत की सहज लय का सुंदर मेल दिखाई देता है। ‘ज्योति कलश छलके’ जैसे लोकप्रिय गीत उनकी गीत-रचना की पहचान बन गए। वे आकाशवाणी से भी लंबे समय तक जुड़े रहे और रेडियो के लिए साहित्य तथा गीतों के क्षेत्र में काम किया। कविता और फिल्मी गीत, दोनों क्षेत्रों में उनकी रचनात्मक उपस्थिति ने उन्हें हिंदी के विशिष्ट कवि-गीतकारों में स्थान दिया।
तुम से
नरेंद्र शर्मा
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,कण-कण अनुरंजित है!
तुम मानस में स्वर-रूप-रंग-रस
बन कर लहराई हो,
अनदेखे अंतर्शतदल पर
परिमल बन कर छाई हो;
मेरे उर का सर्वस्व आज
उन नयनों में सस्मित है!
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,
कण-कण अनुरंजित है!
जब मुस्कानों के हंस दूत
संदेश हृदय का लाए,
पहचान प्राण को प्राण—
सहज मधुबंधन में बँध पाए!
दो पथिक अपरिचित दूरागत,
अंतर्चित चिर-परिचित है!
तुम से जीवन का क्षण-क्षण गुंजित,
कण-कण अनुरंजित है!
निराला जी के प्रति
नरेंद्र शर्मा
एक
स्वार्थ तज परमार्थ के तट पर गए,
बाँधे न बौद्धिक सेतु!
ख्याति के निखरे शिखर पर रोप आए
तुंग भगवा केतु!
दो
शत्रु और शिकार
सामाजिक अनैतिक अपहरण के!
अमित बल घन्नाद स्वर-संगीत
जीवन-जागरण के!
भद्र, तुम शिव सुंदरम् के सत्यव्रत
बलभद्र पायक!
वज्र दृढ़ औ कुसुम कोमल
वीर बादल-राग-गायक!
तीन
‘है अनित्य प्रपंच जग का,
राग-द्वेष अनित्य जग में!
चल-विचल गति में अगति में
नित्य बस साहित्य-जग में!’
पुण्यवाणी ध्वनित जिसमें
देश स्वर्ग-प्रवेश है यह!
ऋषि मनस्वी, कवि यशस्वी,
संत जन का देश है यह!
चार
दिग्गजों की जाति के तुम
मनुज जन्मे जगत में इस हेतु—
आर्य नभ में पुण्य छवि छहराय,
फिर फहराय कवि का त्याग-गैरिक केतु!
कौन हो तुम
नरेंद्र शर्मा
कौन हो तुम, कामिनी?अचल हिम-गिरि-शिखर-सी,
चंचला सौदामिनी?
कौन हो तुम, कामिनी?
प्रतीक्षा ऐसी कि लोचन देख पथ
पथरा गए,
बिखरने बिखरी लटों पर मेघ भी
मँडरा गए :
यों बुलाकर पास होतीं दूर क्यों,
ध्रुवस्वामिनी?
कौन हो तुम, कामिनी?
हो नहीं हो? क्यों मुझे इस भेद में
भरमा रहीं?
कर सलज संकेत फिर निर्मोह को
शरमा रही?
दे रही उन्माद क्यों दिन-दिन मुझे,
उन्मादिनी!
कौन हो तुम, कामिनी?
माँगती तुम कुछ नहीं तो चाहतीं
सर्वस्व क्यों?
बुद्धि का तेजस्व लेतीं, व्यक्ति का
वर्चस्व क्यों?
तुम न बनती भोर, तुम रहतीं
नहीं बन यामिनी,
कौन हो तुम, कामिनी?
लय निहित जैसे प्रलय में, रहो
मेरे हृदय में!
वास करता सत्य जैसे शून्य नभ के
निलय में!
लीला करो अभिनव, प्रिये,
प्रतियाम अंतर्यामिनी
कौन हो तुम कामिनी?
15 अगस्त 1947
नरेंद्र शर्मा
अन्न-वस्त्र-हीन दीन थी निरक्षरा,भस्मसात् थी हिरण्यमयि वसुंधरा;
अप्रकेत शक्ति-सिंधु, सुप्त चेतना,
विकृति से विषाक्त थी विशद परंपरा!
किंतु अब तिमिरमयी निशा चली गई,
शापमुक्त, पापमुक्त, हो रही मही!
तिमिर-क्रोड़ फोड़ भानु भासमान रे—
नव विहान, नव निशान, भारती नई!
अब न जन रहें विपन्न, ग्रास त्रास के
नृत्य करें ओस पुष्प अश्रुहास के!
आज देश माँगता पवित्र एक वर,
दास फिर बनें न कभी पुत्र दास के!
कायर मत बन
नरेंद्र शर्मा
कुछ भी बन, बस कायर मत बन!ठोकर मार! पटक मत माथा!—
तेरी राह रोकते पाहन!
कुछ भी बन, बस कायर मत बन!
ले-दे कर जीना, क्या जीना?
कब तक ग़म के आँसू पीना?
मानवता ने सींचा तुझको
बहा युगों तक ख़ून-पसीना!
कुछ न करेगा? किया करेगा—
रे मनुष्य—बस कातर क्रंदन?
कुछ भी बन, बस कायर मत बन!
युद्धम्देहि कहे जब पामर,
दे न दुहाई पीठ फेर कर!
या तो जीत प्रीति के बल पर,
या तेरा पथ चूमे तस्कर!
प्रतिहिंसा भी दुर्बलता है,
पर कायरता अधिक अपावन!
कुछ भी बन, बस कायर मत बन!
तेरी रक्षा का न मोल है,
पर तेरा मानव अमोल है!
यह मिटता है, वह बनता है;
यही सत्य की सही तोल है!
अर्पण कर सर्वस्व मनुज को,
कर न दुष्ट को आत्म-समर्पण!
कुछ भी बन बस कायर मत बन!
पत्नी के प्रति
नरेंद्र शर्मा
चीर कुहासे को सुहासिनीसुषमा-स्वर्णकिरण—
आईं तुम मेरे जीवन में,
तन्वी ज्योतिवरण!
आईं कंपित, किंतु अशंकित
धर सुकुमार चरण;
कुसुमों से भर दिए नयन,
स्वप्नों से आलिंगन!
श्रद्धादेही, आशागेही,
स्नेही रूप-लता—
श्री लाईं तुम, शोभा लाईं,
लाईं मधुमयता!
तुम वह क्षमता, जिस पर
अवलंबित मेरी प्रभुता;
तुमने मुझे दिया मेरापन,
मेरी पत्नी बन!
पुलकित बाहुलता में
मेरी विह्वलता लेकर,
मेरी तृष्णा को दुलार की
कांति शांति देकर,
अनुरंजित कर दिवा-निशा
बरसा सनेह-केसर,
पार्थिव और क्षणिक जीवन को
करतीं मन-भावन!
आज
नरेंद्र शर्मा
आज परिणति पा रहे हैं जन्म जन्मांतर!यह युगांतर है, न क्षण लघु एक भयकातर!
क्या न मानव-सभ्यता ही भूमिजा पावन?
क्या न इसको क़ैद में डाले हुए रावण?
क्या न बँधता जा रहा पर सेतु रामेश्वर?
स्वर्णलंका और अणु के अस्त्र की माया,
दर्पमति लंकेश फिर सब विश्व पर छाया;
किंतु नवयुग-रविउदय से हारते निशिचर!
मूल मानव जूझता फिर मनुज दानव से,
प्रगति का जयघोष उठता रक्त-अर्णव से!
क्रांति के ज्वालामुखी ही शांति के निर्झर!
चिर पुनीता है हमारी सभ्यता सीता,
पर न उसका भी परीक्षाकाल है बीता!
नियति-शासित हैं यहाँ जगदंब-जगदीश्वर!
नियतिगति भ्रू-भंगिमा है जिस अगोचर की,
वही सीमाबद्ध अपरंपार होकर भी!
आज वह संघर्षरत कण में बसा आकर!
गति और गंतव्य
नरेंद्र शर्मा
एक
क्षणिक शक्तिबल, दाँव-पेंच
या कूटनीति की क्षमता!
विस्मृत सब आदर्श,
लुप्त मानवता के प्रति ममता!
इष्टभ्रष्ट कोई, अनिष्टकर साधन
यहाँ किसी के;
श्वास-श्वास में द्वंद्व छिड़ा है
जो न निमिष भर थमता!
रक्तपात से नहीं रुकेगी
गति पर मानवता की!
पशुता लड़ती है, कटती
जाती है जड़ जड़ता की!
मानवता गिरि-शिखर,
गहन गह्वर-सी है पाशवता—
सीमा नहीं मनुज के गिर कर
उठने की क्षमता की!
दो
जिनकी शक्ति और भय-संशय
साथ-साथ बढ़ते हैं;
जो मोहार्त प्राण रक्षा हित
मृत्युभीत लड़ते हैं,
संशयशील अविश्वासी
अविवेकी वे गत युग के—
उनकी मिट्टी में नव युग के
प्राणांकुर उगते हैं!
सभी प्रयोजन मात्र नियति को
भाव-अभाव-विनिर्मित,
देकर जन्म कलानिधि को
हो जाता तिमिर तिरोहित!
प्रगति, अगति, दुर्गति, सद्गति;
गंतव्य एक जीवन का—
हो यह वसुधा शुचितर अभिनव
मनुष्यत्व से शोभित!
होली
नरेंद्र शर्मा
खेल रहा होली, शर भर भरतेजस का तूणीर!
बेध रहा भूरज की देही
सूरज अमित अधीर!
प्राणशक्ति का धनुष बनाया,
तेज-बीज के बान!
तरुण अरुण रवि उगा क्षितिज पर
भोर बनी मुस्कान!
वल्कलधारिण धरा किरातिन
रवि किरात रणधीर!
खेल रहा होली, शर भर भर
तेजस का तूणीर!
मदोन्मत्त फाल्गुन फिर आया,
फिर रंजिश नभ नील!
फिर सतरंग ब्रजरज उड़ती बन
नयन कल्पनाशील!
गोरसधारिणि धरा अहीरिनि
सूरज मत्त अहीर!
खेल रहा होली, शर भर भर
तेजस का तूणीर!
तंद्रातिमिर वसन, माटी तन,
क्षण भर का उल्लास!
फिर भी धरती के जीवन में
आता है मधुमास!
किलक रही कलिका बन धरती,
सूरज मधुकर वीर!
खेल रहा होली, शर भर भर,
तेजस का तूणीर!
नारी
नरेंद्र शर्मा
संचरण हित पुरुष की इच्छाप्रबल होने लगी!
देख अतिविस्तार, इच्छा—
शक्ति-बल खोने लगी!
प्रकृति अति-गतिप्रिय पुरुष के
मनोरथ-रथ के लिए
चक्रयुगयुत अंगना के
बीज तब बोने लगी!
केंद्रप्रिय है दृष्टि, अतिशय संकुचित
गति की परिधि;
किंतु नारी काटती विस्तार
द्रुत रथचक्र-विधि!
पुरुष के समतल-सरण की
कामना की पूर्ति वह—
विघ्नहारिणि, बीजधारिणि,
सृष्टि की अनमोल निधि!
जन्म लेती कोख से
गतिप्रिय पुरुष की पीढ़ियाँ!
ऊर्ध्वगित में वह पुरुष के हित
बनाती सीढ़ियाँ!
मुक्ति दी उसने पुरुष को
एक दिन यम-पाश से
जब लकड़हारे पुरुष की
चेतना सोने लगी!
संचरणहित पुरुष की इच्छा
प्रबल होने लगी—
मेरा मन
नरेंद्र शर्मा
मर्मरित हरित अगणित तरुओं के वन-सा मेरा मन है,जड़ जमी हुई है मिट्टी में, शिखरों पर मरकत-घन है!
धरती करती रहती पोषण, सूना नभ करता सिंचन;
आते जाते पतझर वसंत, करते संपन्न अकिंचन!
प्रतिपल पुष्पित पल्लवित पाश ऋतुओं का भुज-बंधन है!
मर्मरित हरित अगणित तरुओं के वन-सा मेरा मन है!
कोमल कोंपल के पंख लगा कल्पना डाल कर आती,
दिक्काल बाँधने के प्रयत्न में इच्छा बन उड़ जाती;
जो उड़ता है वह तो मन है, इच्छा केवल वाहन है!
मर्मरित हरित अगणित तरुओं के वन-सा मेरा मन है!
इच्छा के टूटे हुए पंख पतझर के पत्र कहाते;
जो पत्र पवन में उड़ जाते वह लिखित गीत बन जाते!
मन में अगणित अलिखित गीतों के मर्मर का क्रंदन है!
मर्मरित हरित अगणित तरुओं के वन-सा मेरा मन है!
मधुमालती
नरेंद्र शर्मा
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!किरण-कन तन पर गिराती,
शारदीया चंदिरा-सी;
कौन है, कर धन्य जो
मधुभार मुझ पर डालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!
आ रही मेरे हृदय में;
ज्योति-सी, सूने निलय में!
कौन है, धर चरण जो—
स्मृति-दीप उर में बालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!
वह मुझे उर से लगाती,
सुप्त पुलकों को जगाती;
कौन है, सुख मूर्च्छना जो—
सलज सहज सँभालती?
मेरे हृदय निकुँज की मधुमालती!
प्रतिपदा की शशिकला वह,
आ गई निस्सीम में बह!
कौन है, भव शून्य में जो—
नियति-प्रतिमा ढालती?
मेरे हृदय-निकुंज की मधुमालती!
मानव
नरेंद्र शर्मा
आनत शिर नहीं रेंगते हमपृथ्वी तल पर!
क्या नहीं प्राप्त है हमें
युगल युगवाही कर?
उपजा नवान्न, निर्मित कर घर,
अर्जित कर यश,
हम रहे नहीं पशु-पक्षी-से
विधि पर निर्भर!
ध्वनि और अर्थ को गूँथ
चित्र लिख कर अक्षर,
करते संचित संकलित ज्ञान
जीवन-पथ पर!
ईश्वर कह सुलभ किए हमने
शतश: रहस्य;
हम प्रकृति नियति के
सार्थवाह हैं, नारी-नर!
चेतनाकेंद्र में क्रियाशील
जो महाशक्ति
बाहर विराट भव में
अबाध जो महाशक्ति
कर त्रिपुरसुंदरी में चित्रित,
दे अतुल भक्ति,
हम मूर्तिमती कर देते
संज्ञा लोकोत्तर!
युग की संध्या
नरेंद्र शर्मा
युग की संध्या कृषक वधू-सीकिसका पंथ निहार रही?
उलझी हुई समस्याओं-सी
बिखरी लटें सँवार रही!
धूलि धूसरित अस्त-व्यस्त वस्त्रों की
शोभा मन मोहे,
माथे पर रक्ताभ चंद्रमा की
सुहाग-बिंदिया सोहे,
उचक-उचक ऊँची खूँटी से
नया सिंगार उतार रही!
रँभा रहा है बँधा-बँधा बछड़ा
बाहर के आँगन में,
गूँज रही अनुगूँज भूख की
युग की संध्या के मन में!
जंगल से आती सुमंगला धेनु
सुदूर पुकार रही!
युग की संध्या कृषक वधू-सी
किसका पंथ निहार रही?
जाने कब आएगा मालिक,
मनोभूमि का हलवाहा?
कब आएगा युग-प्रभात,
जिसको युग-संध्या ने चाहा?
सूने छाया-पथ पर संध्या
लोचन-तारक वार रही!
युग की संध्या कृषक वधू-सी
किसका पंथ निहार रही?
राहें
नरेंद्र शर्मा
कुहरा छाया है गिरि-वन पर,गिरि-शिखरों पर;
नहीं रहा आकाश आज आकाश,
घिरे हैं बादल धौरे;
मैं नीचे समतल पठार पर
चला जा रहा—
लेकिन ऊँचे तल की राहें
धुँधग्रस्त हैं!
परिणति का फल
नरेंद्र शर्मा
वर्णों की क्वणित किंकणीछंदों की छम छम छागल
धारण कर, कविता मेरी,
तुम नाचो कर मन पागल!
अधरों पर ललित गीति बन,
प्राणों में ज्वलित प्रीति बन,
नाचो नस नस, निर्झरिणी,
बन सुधा, सुरा, हलाहल!
ओ मुग्ध हृदय की देवी!
लय और प्रलय की देवी!
नाचो तुम जन्म-मरण में
बन बन कर परिणति का फल!
क्यों प्रकाश हँसता है
नरेंद्र शर्मा
बाती के जलने पर जानेक्यों प्रकाश हँसता है?
मिट्टी के तन दिवला में ही
ज्योतिर्मय बसता है!
सूरज की किरणें होती हैं
सूरज पर न्योछावर,
बन-बन कर पर्जन्य, बरसते
रसनिधि सातों सागर!
मिट्टी कठिन कसौटी, निज को
जहाँ राम कसता है!
बाती के जलने पर जाने
क्यों प्रकाश हँसता है?
मिट्टी की जड़ता में ही तो
जमती जड़ भी जग की
तम का अंतहीन आँचल ही
ओट किए दीपक की!
मिट्टी ही आश्रय देती जब
काल सर्प डँसता है!
बाती के जलने पर जाने
क्यों प्रकाश हँसता है?
जीवनशक्ति
नरेंद्र शर्मा
चिंतन-विचार, भावना-भक्त,या त्यागमयी कर्मानुरक्ति;
हैं मार्ग अनेक एक मुझ तक
मैं अखिल-व्याप्त जीवनीशक्ति!
दो अधिकाधिक, पाओ समुचित;
मैं ही असीम, जीवन सीमित!
मैं सरस्वती दुर्गा लक्ष्मी,
करतीं जो विश्व-मुकुल पुष्पित!
मैं कालावधि के पंख लगा
गति के रथ पर आरूढ़ सदा,
चेरी हूँ जिसकी उसकी भी
छाया छू आती यदा-कदा!
कामना
नरेंद्र शर्मा
सिंधु नित अनंत उर्मिजाल डालता,छाँह ही मिली, न प्राप्य इंदु की कला!
प्रेम की तृषा न प्रेम प्राप्त कर सकी,
हृदय भी सदैव रत्न-दीप सा जला!
कामना-निकुंज बीच विरह कोकिला
गा रही अनंत काल गीतिमालिका!
पुष्प पर तुषारविंदु, अश्रुधर कपोल,
प्राण-प्रत्र पर लिखी उदास तालिका!
चाह और आह से न मुक्त मानुषी,
पूर्णकाम पद्मधाम चेतना कहाँ?
ले चलो मुझे, प्रवाह, पार ले चलो—
पिंड-प्राण-युक्त दुख-अयुक्त हों जहाँ!
गृद्ध लगे मँडराने
नरेंद्र शर्मा
जब से भावी महायुद्ध की ख़बर लगी है आने,फिर लोभी के मनोगगन में गृद्ध लगे मँडराने!
सोच रहा है नफ़ाख़ोर कब गोली-गोले छूटें!
कब बरसें बम, कब बम के संग भाग्य अनेकों फूटें!
कब लालच की चीलें भू पर गोल बाँध कर टूटें,
कब वह जीतों को धोखा दें और मरों को लूटें!
फिर लोभी के मन को यों चिंताएँ लगीं सताने,
जब से भावी महायुद्ध की ख़बर लगी है आने!
कब लाखों की जानें लेकर अपने लाख बनाऊँ?
कब लाखों के घर उजाड़ कर अपना घर भर पाऊँ?
मानवता की नींव हिलाकर अपने पाँव जमाऊँ,
कब अनगिनती दीप बुझाकर दीपावली मनाऊँ?
लोलुप मन-मकड़ी दिन गिनता बिनता ताने-बाने,
जब वे भावी महायुद्ध की ख़बर लगी है आने!
राष्ट्र धर्म के बिल्ले लेकर घर-घर बँटवाएगा,
विश्व-शांति के लिए गरजती तोपें ढलवाएगा,
बारूदी विष भरी सुरंगें पथ में बिछवाएगा,
कभी न जाएगा जिस पथ से हमको भिजवाएगा!
लगा बावली दुनिया को वह राहें नई सुझाने,
जब से भावी महायुद्ध की ख़बर लगी है आने!
फिर सोने का रंग मिलाएगा बनिया केसर में,
ख़ूनी माणिक टँकवाएगा पूँजी के ज़ेवर में,
फिर विषबुझी कटार छिपाएगा अपने तेवर में,
दुश्मन! दुश्मन! चिल्लाएगा बैठा अपने घर में,
दुनियादार गँवार लगे फिर राग उसी का गाने,
जब से भावी महायुद्ध की ख़बर लगी है आने!

0 comments:
एक टिप्पणी भेजें