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चरनदास जी के सबद : Charandas Ji Ke Sabad

 चरनदास (1706–1785) राजस्थान की संत परंपरा के प्रमुख संत-कवि और चरणदासी संप्रदाय के प्रवर्तक थे। उनका जन्म अलवर क्षेत्र में हुआ था। उन्होंने भक्ति, आत्मज्ञान और सदाचार को अपने आध्यात्मिक विचारों का आधार बनाया। उनकी शिक्षाओं में गुरु की महिमा, नाम-स्मरण, वैराग्य और मन की शुद्धता पर विशेष बल मिलता है।


चरनदास ने अपनी वाणी में आध्यात्मिक साधना के साथ मनुष्य के आचरण और जीवन-मूल्यों से जुड़े विषयों को भी सरल भाषा में व्यक्त किया। उनके अनुयायियों से आगे चलकर चरणदासी संप्रदाय का विस्तार हुआ और इस परंपरा में संत-काव्य की समृद्ध धारा विकसित हुई। उनकी रचनाएँ हिंदी संत साहित्य में भक्ति और ज्ञान के समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती हैं

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अपना हरि बिन और न कोई

चरनदास

अपना हरि बिन और न कोई॥
मातु पिता सुत बंधु कुटुंब सब, स्वारथ ही के होई।
या काया कूँ भोग बहुत दै, मरदन करि करि धोई॥
सो भी छूटत नेक तनिक सी, संग न चाली वोई।
घर की नारि बहुत ही प्यारी, तिनमें नाहीं दोई॥
जीवत कहती साथ चलूँगी, डरपन लागी सोई।
जो कहिये यह द्रव्य आपनी, जिन उज्जल मति खोई॥
आवत कष्ट रखत रखवारी, चलत प्रान लै जोई।
या जग में कोई हितू न दीखै, मैं समझाऊँ तोई॥
चरनदास सुकदेव कहैं यों सुनि लीजै नर लोई।

सुद्धि बुद्धि सब गई खोय री

चरनदास

सुद्धि-बुद्धि सब गई खोय री मैं इस्क दिवानी।
तलफ़त हूँ दिन-रैन ज्यों मछली बिन पानी॥
बिन देखे मोहिं कल न परत है देखत आँख सिरानी।
सुधि आये हिय में दव लागै नैनन बरखत पानी॥
जैसे चकोर रटत चंदा को जैसे पपिहा स्वाती।
ऐसे हम तलफ़त पिय दरसन बिरह बिथा यहि भाँती॥
जब ते मीत बिछोहा हूवा तब ते कछु न सुहानी।
अंग-अंग अकुलात सखी री रोम-रोम मुरझानी॥
बिन मनमोहन भवन अँधेरी भरि भरि आवै छाती।
चरनदास सुकदेव मिलावो नैन भये मोहिं घाती॥

साधौ टेक हमारी ऐसी

चरनदास

साधौ टेक हमारी ऐसी।
कोटि जतन करि छूटै नाहीं करी अब कैसी॥
यह पग धरो सँभाल अचल होइ बोल चुके सोइ बोलै।
गुरु मारग में लेन न देनो अब इत उत नहिं डोलै॥
जैसे सूर सती अरु दाता पकरी टेक न टारैं।
तन करि धन करि मुख नहिं मोड़ैं धर्म न अपनो हारैं॥
पावक जारों जल में बोरो टूक-टूक करि डारो।
साध सँगति हरि भक्ति न छोडूँ जीवन प्रान हमारो॥
पैज न हारूँ दाग न लागे नेक न उतरे लाजा।
चरनदास सुकदेव दया से सब विधि सुधरैं काजा॥

अरे नर हरि का हेत न जाना

चरनदास

अरे नर हरि का हेत न जाना।
उपजाया सुमिरन के काजे, तैं कछु औरे ठाना॥
गर्भ माहिं जिन रच्छा कीन्हीं, ह्वाँ खाने कूँ दीन्हा।
जठर अगिन सों राखि लियो है, अंग संपूरन कीन्हा॥
बाहर आय बहुत सुधि लीन्हीं, दसन बिना पय प्यायो।
दाँत भये भोजन बहु भाँती, हित सों तोहिं खिलायो॥
और दिये सुख नाना बिधि के, समुझि देखु मन माहीं।
भूलो फिरत महा गर्बायो, तू कछु जानत नाहीं॥
तुव कारन सब कुछ प्रभु कीन्हो, तू कीन्हा निज काजा।
जग व्यौहार पगो ही बोलै, तोहि न आवै लाजा॥
अजहूँ चेत उलट हरि सौंही, जन्म सुफल करु भाई।
चरनदास सुकदेव कहैं यों, सुमिरन है सुखदाई॥

हमारो नैना दरस पियासा हो

चरनदास

हमारो नैना दरस पियासा हो।
तन गयो सूखि हाय हिये बाढ़ी, जीवत हुँ वोहि आसा हो॥
बिछुरन थारो मरन हमारो, मुख में चलै न प्यासा हो।
नींद न आवै रैनि बिहावै, तारे गिनत आकासा हो॥
भये कठोर दरस नहिं जाने, तुम कूँ नेक न साँसा हो।
हमरी गति दिन-दिन औरे ही, बिरह बियोग उदासा हो॥
सुकदेव प्यारे रहु मत न्यारे, आनि करो उर बासा हो।
रन जीता अपनो करि जानी, निज करि चरनन दासा हो॥

सुनु राम भक्ति गति न्यारी है

चरनदास

सुनु राम भक्ति गति न्यारी है।
जोग जस संजम अरु पूजा,
प्रेम सबन पर भारी है॥
जाति बरन पर जो हरि जाते,
तौ गनिका क्यों तारी है।
सेबरी सरस करी सुर मुनि ते,
हीन कुचील जो नारी है॥
दुस्सासन पत खोवन लागेव,
सब हीं ओर निहारी है॥
होय निरास कृस्न कहँ टेरी,
बाढ़ो चीर अपारी है॥
टेली लौंडी कंस राजा का,
दीन्हीं रूप कनारी है॥
एक सों एक अधिक ब्रजनारी,
कुविजा कीन्ही प्यारी है॥
पांचो पँडवन जाय सजो है,
सगरी सजी सँवारी है॥
बाल्मीक विनकाज न हो तो,
बाजो संख मुरारी है॥
साधौं की सेवा में राचौ,
भूप सुरति बिसारी है॥
सेना भक्त के कारन हरि जू,
वाकी सूरत धारी है॥
दास कबीरा जाति जुलाहा,
भए संत उपकारी है॥
साखि सुनो रैदास चमारा,
सो बाग में उजियारी है॥
कनक जनेऊ काढ़ि देखायो,
विप्र गये सब हारी है॥
अजामील सदना तिरलोचन,
नामा नाम अधारी है॥
धना जाट कालू अरु कूबा,
बहुत किये भा पारी है॥
प्रीत बराबर और न देखै,
बेद पुरान बिचारी है॥
चरनदास सुकदेव कहत है,
ता बस आप मुरारी है॥

सतगुरु निज पुर धाम बसाये

चरनदास

सतगुरु निज पुर धाम बसाये।
जित के गये अमर ह्वै बैठे भव जल बहुरि न आये॥
जोगी जोग जुक्ति करि हारे ध्यानी ध्यान लगावै।
हरि जन गुरु को दया बिना यों दृष्टि नहीं दरसावै॥
पंडित मुंडित चुंडित ढूंढ़ै, पढ़ि सुनि बेद पुरांनै।
जासूँ वै सब पायो चाहैं सो तौ नेति बखानै॥
जंगम जती पती संन्यासी सब हीं वा दिसि धावैं।
सुरति निरति की गम जहँ नाहीं वै कहि कैसे पावैं॥
देस अटपटा बेगम नगरी निगुरे राह न पाया।
चरनदास सुकदेव गुरु न किरपा करि पहुँचाया॥

जब सू मन चंचल घर आया

चरनदास

जब सू मन चंचल घर आया।
निर्मल भया मैल गये सगरे तीरथ ध्यान जो न्हाया॥
निर्बासा ह्वै आनंद पाये या जग सूँ मुख मोड़ा।
पांचौ भई सहज बस मेरे जब इनका रस छोड़ा॥
भय सब छूटै अब को लूटै दूजी आस न कोई।
सिमिटि-सिमिटि रहा अपने माहिं सकल विकल नहिं होई।
निज मन हुआ मिटि गम दूआ को बैरी को मीता।
बंधु मुक्ति का संसय नाहीं जन्म मरन की चीता॥
गरू सुकदेव मेव मोहि दोनों जब सूँ यह गति साधी।
चरनदास सूं ठाकुर हुए बुटि गये बाद बिबादी॥

भाई रे समझ जग व्यवहार

चरनदास

भाई रे समझ जग व्यवहार।
जब ताईं तेरे धन पराक्रम करैं सब हीं प्यार।
अपने सुख कूँ सबहि चाहैं मित्र सुत अरु नारि।
इनहीं तो अप बस कियो है मोह बेड़े डारि॥
सबन तो कूँ भय दिखायो लाज लकुटी मार।
बाजीगर के बांदरा ज्यों फिरत घर-घर दुवार॥
जबै तो को बिपत्ति आवै जरा कोर बिकार।
तबै ते सूँ लाज मानैं करैं ना तेरि सार॥
इनकी संगति सदा दुख है समझ मूंड गंवार।
हरि प्रीतम कूँ सुमिरि ले कहैं चरनदास पुकार॥

सो नैना मोरे तुरिया तत पद अटके

चरनदास

सो नैना मोरे तुरिया तत पद अटके।
सुरति निरति की गम नहिं सजनी जहाँ मिलन को लटके॥
भूलो जगत बकत कछ औरै बेद सुरानन ठठके।
प्रीति रीति की सार न जानै डोलत भटके भटके॥
किरिया कर्म मर्म उरझे रे ये माया के भटके।
ज्ञान ध्यान दोउ पहुँचत नाहीं राम रहीमा फटके॥
जग कुल रीति लोक मर्यादा मानत नाहीं हटके।
चरनदास सुकदेव दया सूँ त्रैगुन तजि के सटके॥

अँखिया गुरु दरसन की प्यासी

चरनदास

अँखिया गुरु दरसन की प्यासी।
इक टक लागी पंथ निहारूँ तन सूँ भई उदासी॥
रैन दिना मोहि चैन नहीं है चिंता अधिक सतावै।
तलफ़त रहूँ कल्पना भारी निःचल बुधि नहिं आवै॥
तन गयो सूख हूक अति लागै हिरदै पावक बाढ़ी।
खिन में लेटी खिन में बैठी घर अँगना खिन ठाढ़ी॥
भीतर-बाहर संग सहेली बातन ही समझावैं।
चरनदास सुकदेव पियारे नैनन ना दरसावैं।

प्रभु जू सरन तिहारी आयो

चरनदास

प्रभु जू सरन तिहारी आयो।
जो कोइ सरन तिहारी नाहीं भरम भरम दुख पायो॥
औरन के मन देवी देवा मेरे मन तुहि भायो।
जब सों सुरति सम्हारी जग में और न सीस नवायो॥
तरपति सुरपति आस तुम्हारी यह सुनि के मैं धायो।
तीरथ बरत सकल फल त्याग्यौ चरन कमल चित लायो॥
नारद मुनि अरु सिव ब्रह्मादिक तेरो ध्यान लगायो।
आदि अनादि जुगादि तेरो जस बेद पुरानन गायो॥
अब क्यों न वाँह गहो हरि मेरी तुम काहे बिसरायो।
चरनदास कहैं करता तूही गुरु सुकदेव बतायो॥

कछु मन तुम सुधि राखौ वा दिन की

चरनदास

कछु मन तुम सुधि राखौ वा दिन की।
जा दिन तेरी देह छुटैगी, ठौर बसौगे बन की॥
जिनके संग बहुत सुख कीन्हें, मुख ढकि ह्वै हैं न्यारे।
जम का त्रास होय बहु भांती, कौन छुटावन हारे॥
देहरी लौं तेरी नारि चलैगी, बड़ी पौरि लों माई।
मरघट लौ सब बीर भतीजे, हंस अकेलो जाई॥
द्रव्य गड़े अरु महल खड़े ही, पूत रहैं घर माहीं।
जिनके काज पचे दिन राती, सो सँग चालत नाहीं॥
देव पितर तेरे काम न आवैं, जिनकी सेवा लावै।
चरनदास सुकदेव कहत है, हरि बिन मुक्ति न पावै॥

साधो राम भजै ते सुखिया

चरनदास

साधो राम भजै ते सुखिया।
राजा परजा नेमी दाता सबहीं देखे दुखिया॥
जो कोई धनवत जगत में राखत लाख हज़ारा।
उनकूँ तौ संसय है निसिदिन बटन बढ़त ब्यौहारा॥
जिनके बहु सुत नाती कहिये और कुटुंब परिवारा।
वे तो जीवन मरन के काजै भरत रहैं दुख भारा॥
नेमी नेम करत दुख पावैं कर स्नान सबेरा।
दाता कूँ देबे का दुख है जब मंगतौ ने घेरा॥
चारि बरन में कोउ न देखो जाको चिंता नाहीं।
हरि की भक्ति बिना सब दुख है समझ देख मन माहीं॥
सत संगति अरु हरि सुमिरन करि सुकदेवा गुरु कहिये।
चरनदास बिपदा सब तजि के आनंद में नित रहिये॥

साधो भरमा यह संसारा

चरनदास

साधो भरमा यह संसारा।
गति मति लोक बड़ाई, उरझे कैसे हो छटकारा॥
मर्म पड़े नाना विधि सेती, तीरथु बर्त अचारा।
देह पड़े कर्म अभिमानी भूले, छूँछ पकरि तत डारा॥
जोगी जोग जुक्ति करिं हारे, पंडित बेद पुराना।
षट दरसन पग आप पुजावैं, पहिरि-पहिरि रंग बाना॥
जानत नाहिं आप हमको हैं, को है वह भगवाना।
को यह जगत कौन गति लागै, संभलैं ना अज्ञाना॥
जा कारन तुम इत उत डोलो, ताको पावत नाहीं।
चरनदास सुकदेव बतायो, हरि हैं अंतर माहीं॥

राखो जी लाज ग़रीब निवाज़

चरनदास

राखो जी लाज ग़रीब निवाज़।
तुम बिन हमरे कौन सँवारे, सबही बिगरे काज॥
भक्त बछल हरि नाम कहावा, पतित उधारन हार।
करो मनोरथ पूरन जन की, सीतल दृष्टि निहार॥
तुम जहाज़ मैं काग तिहारो, तुम तज अंत न जाऊँ।
जो तुम हरिजू मारि निकासो, और ठौर नहिं पाऊँ॥
चरनदास प्रभु सरन तिहारी, जानत सब संसार।
मेरी हँसी सो हँसी तुम्हारी, तुमहूँ देखु बिचार॥

साधो निंदक मित्र हमारा

चरनदास

साधो निंदक मित्र हमारा।
निंदक कूँ निकटे ही राखों होन न देउँ नियारा॥
पाछे निंदा करि अघ धोवै सुनि मन मिटै बिकारा।
जैसे सोना तापि अगिन में निरमल करै सोनारा॥
घन अहरन कसि हीरा निबटै कीमत लच्छ हज़ारा।
ऐसे जाँचत दुष्ट संत कू करन जगत उँजियारा॥
जोग जज्ञ जस पाप कटन हित करै सकल संसारा।
बिन करनी मम कर्म कठिन सब मैटै निंदक प्यारा॥
सुखी रहो निंदक जग माहीं रोगी नहीं तन सारा।
हमरी निंदा करने वाला उतरै भव निधि पारा॥
निंदक के चरनों की अस्तुति भाखों बारंबारा।
चरनदास कहँ सुनियो साधो निंदक साधक भारा॥

अवधू ऐसी मदिरा पीजै

चरनदास

अवधू ऐसी मदिरा पीजै।
बैठि गुफ़ा में यह जग बिसरै चंद सूर सम कीजै॥
जहाँ कुलाल चढ़ाई भाठी ब्रह्म ज्वाल पर जारी।
भरि-भरि प्याला देत कुलाली बाहै भक्ति खुमारी॥
माता ह्वै करि ज्ञान खड्ग लै काम क्रोध कूँ मारै।
घूमत रहै गहे मन चंचल दुबिधा सकल बिडारै॥
जो चाखै यह प्रेम सुधा रस निज पुर पहुँचै सोई।
अमर होय अमरा पद पावै आव गवन न होई॥
गुरु सुकदेव किया मतवारा तीन लोक तृन बूझा।
चरनदास रनजीत भये जब आनंद आनंद सूझा॥

हमरा नैना दरस पियासा हो

चरनदास

हमरा नैना दरस पियासा हो।
तन गयो सूखि हाय हिये बाढ़ी जीवत हूँ वहि आसा हो॥
बिछरन थारो मरन हमारो मुख में चलै न ग्रासा हो।
नींद न आवै रैनि बिहावै तारे गिनत अकासा हो॥
भये कठोर दरस नहिं जाने तुम कूँ नेक न साँसा हो।
हमरी गति दिन दिन औरै ही बिरह बियोग उदासा हो॥
सुकदेव पियारे मत रहु न्यारे आनि करो उर बासा हो।
रनजीता अपनी करि जानी निज करि चरनन दासा हो॥

अब घर पाया हो मोहन प्यारा

चरनदास

अब घर पाया हो मोहन प्यारा॥
लखो अचानक अज अविनासी उघरि गये दृग तारा।
भूमि रह्यो मेरे आँगन में टरत नहीं कहुँ टारा॥
रोम-रोम हिय माहीं देखो होत नहीं छिन न्यारा।
भयो अचरज चरनदासन पै ये खोज कियो बहुबारा॥

जब से अनहद घोर सुन

चरनदास

जब से अनहद घोर सुन।
इंद्री थकित गलित मन हूवा, आसा सकल भुनी॥
घूमत नैन सिथिल भइ काया, अमल जु सुरत सनी।
रोम-रोम आनंद उपज करि, आलस सहज भनी॥
मतवारे ज्यों सबद समाये, अंतर भींज कनी।
करम-भरम के बंधन छूटे, दुबिधा बिपति हनी॥
आपा बिसरि जक्त कू बिसरो, कित रहिं पाँच जनी।
लोक भोग सुधि रही न कोई, भूले ज्ञान गुनी॥
हो तहँ लीन चरनही दासा, कहै सुकदेव मुनी।
ऐसा ध्यान भाग सूँ पैये, चढ़ि रहै सिखर अनी॥

अरे नर परनारी मत तक रे

चरनदास

अरे नर परनारी मत तक रे।
जिन-जिन ओर तकी डायन की, बहुतन कूँ गह भखरे॥
दूध आक को पात बठैया, झाल अगिन की जान।
सिंह मुछारे बिप कारे को, वैसे ताहि पिछानी॥
खानि नरक की अति दुखदाई चौरासी भरमावै।
जनम-जनम कूँ दाग लगावै, हरि गुरु तुरंत छुटावै॥
जग में फिरि-फिरि महिमा खोवै, राखै तन-मन मैला।
चरनदास सुकदेव चितावैं, सुमिरौं राम सुहेला॥

अब की तारि देव बलबीर

चरनदास

अब की तारि देव बलबीर।
चूक मोसूँ परी भारी कुबुधि के संग सीर॥
भौ सागर को धार तीच्छन महा गंधीरो नीर।
काम क्रोध मद लोभ भँवर में चित न धरत अब धीर॥
मच्छ जहँ बलवंत पाँचौ थाह गहिर गँभीर।
मोह पवन झकोर दारुन दूर पैलव तीर॥
नाव तौ मँझधार भरमी हिये बाढ़ा पीर।
चरनदास कोउ नाहिं संगी तुम बिन हरि हीर॥

तुव गुन करूँ बखान

चरनदास

तुव गुन करूँ बखान यह मोरी बुद्धि कहाँ है।
चतुर मुखी ब्रह्मा गुन गावैं तिनहुँ न पायौं जान॥
गुन गावत संकर जब हारे करने लागे ध्यान।
गुन अपार कछु पार न पायो सनकादिक कथि ज्ञान॥
गुन गावत नारद मुनि थाके सहस मुखन सूँ सेस।
लीला को कछु पार ना पायो ना परिमान न भेष॥
सक्ति धनी अनगिनित तुम्हारी बहुतच रूप बहु नावँ।
जबहिं विचारूँ हिये में हारूँ अचरज हेरि हिरावँ॥
अति अथाह कछु थान पाऊँ सोच अचक रहिजावँ।
गुरु सुकदेव थके रनजीता मैं कहु कौन कहाव॥

पतित उधारन बिरन तुम्हारो

चरनदास

पतित उधारन बिरन तुम्हारो।
जो यह बात साँच है हरि जू, तौ तुम हम कूँ पार उतारो॥
बालपने औ तरुन अवस्था, और बुढ़ापे माहीं।
हम से भई सभी तुम जानौ, तुमसे नेक छिपानी नाहीं॥
अगनिन पाप भये मनमाने, नखसिख औगुन धारी।
हिरि फिरि कै तुम सरनै आयौ, अब तुम को है लाज हमारी॥
सुभ करमन को मारग छूटो, आलस निद्रा घेरो।
एकहिं बात भली बनि आई, जग में कहायो तेरो चेरो॥
दीन दयाल कृपाल बिसंभर, स्त्री सुकदेव गुसाईं।
जैसे और पतित घन तारे, चरनदास की गहियो बाहीं॥

करौ नर हरि भक्तन को संग

चरनदास

करौ नर हरि भक्तन को संग।
दुख बिसरे सुख होय घनेरी तन मन फाटे अंग॥
है निःकाम मिलो संतनसूँ नाम पदारथ मंग।
जेहि पाये सब पातक नासैं उपजे ज्ञान तरंग॥
जो वे दया करैं तेरे पर प्रेम पिलावैं भंग।
जाके अमल दरस हो हरि को नैनन आवै रंग॥
उनके चरन सरन ही लागों सेवा करो उमंग।
चरनदास तिनके पग परसन आस करत हैं गंग॥

गुरु हमरे हेम पियायो हो

चरनदास

गुरु हमरे हेम पियायो हो।
ता दिन तें पलटो भयो, कुल गोत निसायो हो॥
अमल चढ़ो गगनैं लगो, अनहद मन छायो हो।
तेज पुंज की सेज पै, प्रीतम गल लायो हो॥
गये दिवाने देसड़े, आनंद दरसायो हो।
सब किरिया सहजै छूटी, तप नेम भुलायो हो॥
त्रैगुन तैं ऊपर रहूँ, सकुदेव बसायो हो।
चरनदास दिन रैन नहिं, तुरिया पद पायो हो॥

अरे नर क्यन भूतन की सेवा

चरनदास

अरे नर क्यन भूतन की सेवा।
दृष्टि न आवै मुख नहिँ बौलै, ना लेवा ना देवा॥
जेहिं कारन घी जोति जलावै, बहु पकवान बनावै।
सो खर्चे तू अधिक चाव सूं, वह सुपने नहिं खावै॥
राति जगावैं भोपा गावें, झूटै मूँड हिलावैं।
कुटुंब सहित तोहिं पैर पड़ावैं, मिथ्या बचन सुनावैं॥
ताहि भरोसे जन्म गँवावै, जीवत मरत न साथा।
बड़ भागन नर देही पाई, खोबै अपने हाथा॥
चारि बरन में बुधि का, ऊँच नीच किन होई।
जो कोई झूठी आसा राखै, जगत जायगा सोई॥
ताते सत बिस्वास टेक गहि, भक्तिकरो हरि केरी।
चरनदास सुकदेव कहत हैं होय मुत्तिल गति तेरी॥

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