सैन भगत के पद : Sain Bhagat Ke Pad
रात भर का है डेरा
सैन भगत
रात भर का है डेरा, सवेरे जाना है।यो जीवन सदन सराय, सवेरे जाना है॥
कोई आए कोई जाए, सवेरे जाना है।
यां जोगी वालो डेरो अलख जगाए, सवेरे जाना है॥
राज पाट महल माड़ियाँ, दौलत माल खजाना है।
चलती वेरा संग नहिं जाए, क्युँ इतना इतराना है॥
ना कुछ तेरा ना कुछ मेरा है, सवेरे उठकर जाना है।
रात भर का है डेरा, सवेरे जाना है॥
यो जीवन सदन सराय, सवेरे जाना है।
साँसां को पंछी कब उड़ जाए, कोई जान न पाय॥
कद जाणे माटी की काया, माटी में मिल जाय।
तेरा नहीं है अटल बसेरा, सवेरे जाना है॥
माया मोह के चक्कर फंस्यो, यो तो देस बेगाना है।
सैन कहे सद्मतया रेहवो, अंत अकेले जाना है॥
रात भर का है डेरा, सवेरे जाना है।
यो जीवन सदन सराय अकेले जाना हो॥
म्हारी नाव फँसी मझधार
सैन भगत
म्हारी नाव फँसी मझधार, सतगुरू तारे तो तरे।नाव पुरानी वजन घनेरो, नहीं कोई खेवनहार।
सागर गेहरो मच्छ बढेरा, लेहरा घणो गुबार॥
खेतां-खेतां हाथ दूखिया, डांडो हुआ बेकार।
अणभौ काचो मारग भटक्यो, नी होवे निरधार॥
नाव तड़कगी डूबण आई, होवण लगी खुवार।
बड़ा भयानक मच्छ घिर आया, जीव हुओ घनच्चार॥
सतगरु साहिब तुरतां आओ, नाव लगाओ पार।
एक आसरो एक भरोसो, सतगुरू तारनहार॥
सतगुरू सायक नी होया, तद नाव नहीं उबरे।
सयना नाव फँसी मझधार, सतगुरू तारे तो तरे॥
चार दिनां दी जिंदगी
सैन भगत
चार दिनां दी जिंदगी, करलई खरच खुवार।इक दिन बाल पणे विच बीत्यो, दूजो विच मुटियार।
तीजो मौजां माणन बीत्यो, चौथो हे अनिहार॥
ना कुझ बीज्या ना कुझ कतया, ना तिनका ना तार।
कम्म किसे दे आयो नाहीं, न सुच्चा विपार॥
जिभड़ी राम रट्यो नहीं कदयाँ, ए जई जिभड़ी ने धिणकार।
टोटे-टोटे बेड़ी होई, ना कोई आयो तारणहार॥
आख ओए सैण भगत की खट्या, क्यूँ आयो संसार।
सद्गुरु दी शरणा विच झल्या, होसी बेड़ापार॥
प्रभुजी म्हारी सुण लो आरत पुकार
सैन भगत
प्रभुजी म्हारी सुण लो आरत पुकार।ऊमर पाकी नाव जरजरी, भवनद हे पुरजार।
खेवण नाव न जाणू हरिजी, नी हे सगत सम्हार॥
एक आसरो एक सहारो, एक ही अटल सहार।
बणो खेवटिया खेवण हारा, नाव लगा दो पार॥
सद्गुरु कृपा खेवटो पायो, नाव करे संतार।
सैन कहे मन पाको राखो, तारे क्रसन मुरार॥
चंचल मन कबजे नहीं आवे
सैन भगत
चंचल मन कबजे नहीं आवे।मन माया की मदिरा पीवे, बार-बार मदकावे।
झूमें झुके झकोरा खावे, बेमतलब बिलमावे॥
सुरत गँवावे समत खोवे, गेल डगर ठुकरावे।
मनमत होयो बेगत्यो वै, भमरा ने भरमावे॥
सूकर स्वान गदेड़ा जेसो, गलियाँ में घुमरावे।
चंचल चित्त कबजे नहीं आवे॥
दुरमत दुगन दुस्ट संग होई, मगन मोज मरजादा खोई॥
कड़वी बेल काकड़ी बोई, विस बोयाँ ती विस फल होई॥
करनी कर पाछे पछतावे,
चंचल चित कबजे नहीं आवे॥
चार चुमेरां भटके-अटके, ठाँव-ठोर नी पावे।
अछतावे-पछतावे मूरख, पड्यो पछीटा खावे॥
बिलख-बिलख सिर धुने बावलो, धीरज कूण बँधावे।
पास-पड़ोसी समधी साथी, कोई नहीं वतरावे॥
सैन भगत कोई पुण्य उग्यो जद, सद्गुरु शरणा आवे।
एक झाप सद्गुरु की पड़याँ, साध चरित बण जावे॥
रसना सोई जो राम रस पागी
सैन भगत
रसना सोई जो राम रस पागी।जिस रसना नाम रस पीयो, सुरती राम संग लागी।
काम क्रोध लोभ नी व्यापे, माया दूरी भागी॥
रसना सोई जो राम रस पागी॥
अणहद नाद बाजे घट भीतर, मन चित वे अनुरागी।
अमरत झरन झरे रस मीठो, मज कुंडलनी जागी॥
रसना सोई जो राम रस पागी॥
जिनकी नहीं चाह नहीं तृसना, द्वेस ईरसा त्यागी।
जिनके हिरदै राम बिराजें, वे जन हैं बड़भागी॥
रसना सोई जो राम रस पागी॥
तीन लोक घट भीतर बसते, रागी और बैरागी।
सैन भगत सद्गुरु की किरपा, सुरत राम संग लागी॥
रसना सोई जो राम रस पागी।
दास नहीं छाड़िये हो
सैन भगत
दास नहीं छाड़िये हो, तेरो जन जे अपराधी होई।अमृत अनूप सरोदिका, संतति भीतरि वास।
एक बूँद प्रापति नहीं, जन क्युँ पावे विसवास॥
हूँ तुझ कारनि बीनऊँ, निसि दिन खरौ उदास।
उदिक तीर पसु बाँधियो, बिन खसमहिं मरे पियास॥
और नहीं अवलंबना, जन सेन कहे समझाय।
तुम ठाकुर मैं सेवगा, कृपा करो रामराय॥
मोरे मन उपज्यो हरस अपार
सैन भगत
मोरे मन उपज्यो हरस अपार।अमरत वेला आ पहुँची हे, मन चित में उजियार।
ना चित्त चिंता ना मन मंसा, ना कोई दरकार॥
ना तिरिया ना पूत परवरा, ना नाती ना नातेदार।
सबको संग छोड़यो बरसां, तोड़यो मोह मकार॥
समचित्त रिदै तन व्याधि न कोई, रसना राम रकार।
सद्गुरु साहिब सामे ऊबा, रलक-झलक उणियार॥
चलती वेलां दरसन दीया, सुण ली आरत पुकार।
नाव जरजरी भवनद गेहरो, खेवटियो दमदार॥
पार उतारे सद्गुरु साहिब, धन-धन तारणहार।
सैना परमानंद मिलन की, लाग चुकी हे तार॥
सिरजन हारी की कला
सैन भगत
सिरजन हारी की कला, मोसो बरनि न जाई।बाजीगर ज्युँ खेल रचावे, लीला समझ न आई।
नजर न आवे लीला राचे, अजबो राम रमाई॥
एक बूँद ती जगत रचावे, एक बीज चरनाई।
खुद ही राचे विनासे खुद ही, खूब करे चतराई॥
माया झूठ माया पति साँचो, मन चित की भरमाई।
सैन भगत मायापति अद्भुत, लीला अजब रचाई॥
मन रे मांधाता बिच जई रह्यो
सैन भगत
मन रे मांधाता बिच जई रह्यो, माया जाण न देवे॥पचमड़ी पांडो बसे, पाँची करे असनाना।
छत्तीस मूरत जाँ बसि रह्या, उनका अम्मर नाम।
आसी बड़ जीव जाणतो, वाली सीतल छाया।
ज्यां रे मादेव तपसी बेठ्या, उणकी अगण्या बुझाय।
मड़प हाथी जोत्या, गड़प पांडयो छरोल।
अबीर कंकू प हांसी निसर्या, गड़प हुई चगा बोल।
रेवा कँवरे व्यऊं झरमले, जिस घर कपला हो गाय।
गऊ मुख अमरत वां झरे, झरे गंगा जी के माँय।
अणहद बाजा बाज्या जी, सद्गुरु के दरबार।
सैन भगत थारी वीनती, जी राखो सरण लगाय॥
साधौ भाई राम बसें जिन हिरदै
सैन भगत
साधौ भाई राम बसें जिन हिरदै, तिन घट धीरज होय॥जे जन राम रटें संग साँसाँ, तिन जिह्वा रसना होय।
ईरस ताप जरै नहीं भीतर, हिरदा सीतल होय॥
काम क्रोध लोभ नहीं व्यापे, सुख संतोस समोय।
मोह नहीं व्यापे द्रोह नहीं आवे, भरम न बीजे कोय॥
चाह मिटे अर चिंता जावे, पातक आतक धोय।
एक राम में समचित रेहवे, एकहि तार पिरोय॥
सदा रहे तिनके घट हरसा, हरसावे सब कोय।
सद्गुरु की किरपा जद होवे, तन-मन चानण होय॥
सैन भगत सद्गुरु परबोध्यो, खबर पड़ी जद मोय।
साधौ भाई राम बसें जिन हिरदै, तिन घट धीरज होय॥
सुख-दुख तन-मनि लावणा
सैन भगत
सुख-दुख तन-मनि लावणा, रघुनाथ न लिखाया।कोई टाल्यां नंई टले, नल सरिका राज वई।
जिन घट दमिता हो राणी, चीऊ लई बाज गई॥
मछ कूद्या जल पाणी, हरिचंद सरिका राज वई।
जिन घर तारामती राणी, सीता सरखी सतवंती॥
जिनका राम चंद्रजी स्वामी।
रावण की दृष्टि ले गई सुंदर बिलखाणी॥
महावीर सरखा महाबली सीता की सोध लगाई।
सनीदन मरदन हो रया, पाय तेल लंगोटा॥
अणहद बाजा बाज्या, सद्गुरु के दरबार।
सैन भगत थारी वीनती, राखो सरन लगाय॥
मंगल हरि मंगला
सैन भगत
मंगल हरि मंगला, नित मंगलु राजा राइ कौं।धूप दीप घ्रित साजि आरती, जाऊँ वारने मंगलापति॥
उत्तम दिअसरा निरमल बाती, तुहि निरंजनु कंवलापति॥
राम भगति रामानंदु जाणौं, पूरन परमानंद बखाणैं॥
मंगल मूरति भौ तारि गोविंद, सैन भणे भजि परमानंद॥
लीला सिरजन हार की
सैन भगत
लीला सिरजन हार की, कोई जाण नी पावे।काची माटी गारो लावे, काचो पिंड बणावे।
कहाँ पिंड कहाँ प्राण जाणिए, कहाँ ते रगत रचावे॥
हाड़ माँस मज्जा को तदबो, माटी से उपजावे।
पाँच तत्त को मेलो करतां, पुतलो अजब बणावे॥
अपणो तत्त भरे घट भीतर, जण में प्राण सिरावे।
सैन भगत सिरजणहारा की, लीला समझ नी आवे॥
यों संसार फूल सेमर को
सैन भगत
यों संसार फूल सेमर को, बूर-बूर उड़ जावे।चार दिनां की मिली कोठरी, बेमतलब पोमावे।
समय बीतयाँ ख़ाली करने, हाट-बाट उड़ जावे॥
बाहर पोते भीतर पोते, भाँत-भाँत चितरावे।
वेश क़ीमती सज्जा साजे, मन ही मन इतरावे॥
भरा हाट में उमगो-उमगो, बणज बणजवा आवे।
ख़ाली मुट्ठी आयो मूरख, कसतर बणज कमावे॥
पुण्य कमाई करी न मासा, तोला भर ले जावे।
बंधी मुट्ठी आयो बाँवला, ख़ाली हाथा जावे॥
खरी कमाई करी न कोई, गाँठ कटा घर आवे।
बे अरथां की सोच सोचतां, काल कतरतो जावे॥
खरी कमाई कर ले मूरख, सोई संग में आवे।
सैन भगत बड़भाँगा पायो जन्म अकारथ जावे॥
यो संसार फूल सेमर को, बूर-बूर उड़ जावे॥
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