सैन भगत के सबद : Sain Bhagat Ke Sabad
सैन भगत मध्यकालीन संत परंपरा के प्रमुख संत-कवियों में माने जाते हैं। वे रामानंद के बारह शिष्यों में गिने जाते हैं और सैन समुदाय में विशेष श्रद्धा से स्मरण किए जाते हैं। उनकी वाणी में भक्ति के साथ गुरु-महिमा, आत्मज्ञान, वैराग्य और संसार की नश्वरता के भाव प्रमुख रूप से मिलते हैं।
सैन भगत ने अपनी बात सहज लोकभाषा में कही। उनके पदों, दोहों और सबदों में नाम-स्मरण, सद्गुरु की कृपा और मनुष्य के आचरण पर विचार मिलता है। जाति-पाँति और बाहरी आडंबर के स्थान पर वे भक्ति और सदाचार को महत्व देते हैं। उनकी रचनाओं में कबीर, रैदास, नामदेव, पीपा और धन्ना जैसे संतों के प्रति आत्मीयता भी दिखाई देती है। उनकी वाणी आज भी संत साहित्य की भक्ति और समतावादी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
साधौ भाई जगत देख बौरायो
सैन भगत
साधौ भाई जगत देख बौरायो।भीतर थो जद साँस उसाँसा, तू ही तू दोहरायो।
बाहर आतां जगत रूप लख, माया वस बौरायो॥
तू-तू करतां दरसन करतो, मैं-मैं नजर नी आयो।
बाहर को जग सुंदर देख्यो, माया बस बिलमायो॥
गर्भवास की जातना भूल्यो, ऊँचे माथ लटकायो।
मल-मूतर में भयो लपेटो, रगत कीच लपटायो॥
लख चौरासी पार करी जद, मनख जमारो पायो।
सैन भगत गुरु शरण गयां बिन, सुरत ज्ञान नहीं आयो॥
साधौ कर लो सहज उपाया
सैन भगत
साधौ कर लो सहज उपाया।एक राम त्रिकुटी में बैठा, दूजा कौसल्या जाया।
तीजो जग का पालन हारा, चौथा पालन आया॥
एक राम का जगत पसारा, एक राम की माया।
चारइ राम हे एक सरूपा, कारण भेद दिखाया॥
एक राम ने माया राची, अणगण नाम धराया।
राम नाम की महिमा न्यारी, पाथर समंद तराया॥
सद्गुरु सबद ज्ञान जद दीयो, भेद अरथ समझाया।
परमब्रह्म की लीला न्यारी, कोई जाण न पाया॥
ना वो जनमे ना मर जावे, ना वो करम बंधाया।
मात-पिता कुल-वंस न कोई, ना कण जननी जाया॥
वेद पुराण में वचन सुण्यो हे, ब्रह्म रची खुद माया।
ज्ञानी ध्यानी ध्यान लगावें, भेद न कोई पाया॥
लिख-लिख थाका पढ़-पढ़ हारा, आखिर में भरमाया।
पोथी पतरी छोटी पड़गी, भरम नहीं कढ़ पाया॥
अन्त न जाण्यो वे अंता को, सबने यूँ फरमाया।
कोटि ज्ञान ते न्यारा साहिब, सतगुरुजी दरसाया॥
सहजो ज्ञान दियो म्हारे सतगुरु, पारख ज्ञान कराया।
सैन भगत सतगुरू की किरपा, अन्तरघट उपजाया॥
सद्गुरु ने साहिब दरसायो
सैन भगत
सद्गुरु ने साहिब दरसायो।दक्खन ती उत्तर तई भरम्यो, पूरब ती पच्छिम में आयो।
चौपाला अर चौक चौकड़े, ऊँचा सुर में हरिगुण गायो॥
वेद पुराण सुण्या अर गुण्या, मन मूरखड़ो हमज नी पायो।
दरसन परसन करतो फरयो, डेहरी द्वारे सीस नमायो॥
साहिब का दरसन नी होया, पंडे मौलवी नहीं बतायो।
भटक-भटक गुरु सरणा आयो, सेना सद्गुरु दरस करायो॥
मुझ पे सद्गुरु कृपा करी
सैन भगत
मुझ पे सद्गुरु कृपा करी।सूधो हाट बताओ सद्गुरु सूधी गेल करी॥
ना कोई ऊबड़ ना कोई खाबड़, ना टेड़ी-संकरी।
ना कोई साँस रोकणी होई, ना कोई षट्चकरी॥
सीधो नाम बताओ सद्गुरु, साँस-साँस सतरी।
रामानंद गुरु पूरा पाया, मनख देह उघरी॥
राम ती बड़ो नाम बताओ, गेल नहीं वकरी।
सैन भगत साहिब दरवाजे, राम नाम छकरी॥
साधू भाई आदि अनादि भज लीजै
सैन भगत
साधू भाई आदि अनादि भज लीजै॥तन-मन-चित सब अर्पण करता, गुरु चरणा सुख लीजै।
गुरु शरणा म्हारो साहब मलसी, साँची बात पसीजै॥
लुर-लुर होया एक धुन लाग्याँ, परमानंद रस पीजै।
आपो मेट एक रस होयाँ, अन्तर राम पसीजै॥
अलख पुरुख घर विरत हमारी, नत दन फेरी दीजै।
सैन भगत सद्गुरु रामानंद, चरण शरण वई रीजै॥
दो कौड़ी का सेना नाई
सैन भगत
दो कौड़ी का सेना नाई, सतगुरु कृपा करी।ना कोई ठौर ठिकानो पूरो, ना कोई धिरत धरी।
मन निरमल चित्त ऊजल राख्यो, आँख नहीं उघरी॥
सतगुरु साहिब आँख उघारी, धीर हुई सबरी।
सूधी वाट लगाई सतगुरु, रिदै हुई खबरी॥
रामानंद गुरु पूरा मिलिया, सिवजी की नगरी।
दास कबीरा पीपा धन्ना ने, झट अँगुरी पकरी॥
रैदास की छपरी बैठ्यो, संगत खूब करी।
साहिब के दरबार नी पाँच्यो, हेर बड़ी सकरी॥
पीपा ने सति सीता के संग, मुझ पे कृपा करी।
सीता सति जी सरग सिधार्या, टोड़ा में छतरी॥
सति सीता की करी परकमा, सरधा अरज करी।
सयना जतरी संगत लिखी, सन्त नेम गुजरी॥
कर परनाम छोड़ दियो, सिद्ध टोड़ा को धाम।
सत संगत करता चल्या, मारग गामो गाम॥
छै मइना में पौंच्या, गागरोन सुखधाम।
आहू-काली सिंध के, संगम कर्या मुकाम॥
पीपा के संग गागरोन में, संगत खूब करी।
पाँच बरस मुक्काम लगायो, रसना राम सरी॥
सबद-सबद सत संगत होई, कही-सुणी सब री।
ना कोई लेणो ना कोई देणो, मेहर बड़ी रब री॥
संगम की खोह ताड़ी लागी, पीपे देह छरी।
मिल्यो पौन में पौन देह, धरती पे रही धरी॥
साठ घड़ी तईं हिरदै भीतर, व्यापी बे सबरी।
रहूँ मुकामी कै चल जाऊँ, सत संगत बिगरी॥
आँख मूँद ने सतगुरु ध्यायो, आरत विनय करी।
सयना सतगुरु परचो दीयो, दुवधा विपद हरी॥
साधू तो चलता भला, बहता सुच्चा नीर।
सयना माया मोह तजे, साधू संत फकीर॥
ठाँव ठौर मुकाम को, छूट गयो सब मोह।
सयना सतगुरु की क्रपा, रह्यो नहीं कोई भोह॥
राम धर्या घट भीतरा, सुमरूँ साँस उसाँस।
सयना झोलो खाँद के, हाथाँ धर्या बाँस॥
सरधा राखी हिरदा भीतर, सतगुरु साख भरी।
धोग लगाई साध समाधी, ऊबी वाट पकरी॥
साँत सुवानी मालव माटी, चीतूँ घरी-घरी।
पाकी उमर सितत्तर होई, देह हुई जजरी॥
सयना भगत सतगुरु चरणा में, सुरती लाग परी।
अंत समै में दरसन दीजो, सतगुरु हाम भरी॥
दो कौड़ी को सेना नाई, सद्गुरु कृपा करी।
कै सद्गुरु कै साहिब दाता, जामिन ले उतरी॥
साधौ भाई यो जग माया जाल
सैन भगत
साधौ भाई यो जग माया जाल।जो दीसे ऊ साँचो नाहीं, कर देखो पड़ताल।
जो जनम्यो सो अवस विनासे, क्यूँ मन करो मलाल॥
मकड़ी जाल बुने श्रम करतां, अद्भुत करे कमाल।
वो ही काल बणे मकड़ी को, एसो मक्कड़ जाल॥
माया का हे बाग-बगीचा, माया नदिया ताल।
माया सूरज चंदा ऊगे, माया काल अकाल॥
माया खिंड्यो कमल ताल में, माया वण की नाल।
माया औचक माया कौतक, माया हे खुसहाल॥
माया सिरजन करे जगत को, माया ही महाकाल।
सैना माया बाँधे खोले, माया है जंजाल॥
सद्गुरु दियो जी मारग खोल
सैन भगत
सद्गुरु दियो जी मारग खोल।सदगुरु के वचना चले, चौरासी कट जाय॥
एसो मंतर दियो म्हारा सतगुरू, पारख ज्ञान कराय।
तन-मन-चित्त एक तार बाँध्यो, तनक नहीं भरमाय॥
भीतर बाहर संसो नास्यो, अज्ञान धुंध नहीं राखी।
साहिब के दरबार हाजरी, सतगुरु कर दी साखी॥
सयना झट फरमा दियो, सतगुरु साँचो बोल।
सतगुरू दियो जी मारग खोल॥
साधौ भाई भीतर का छब न्यारा
सैन भगत
साधौ भाई भीतर का छब न्यारा।भीतर सुरज भीतर चंदो, भीतर नवलख तारा।
भीतर बाग-बगीचा मेहके, भीतर अमरत धारा॥
भीतर सबद ब्रह्म को गूँजे, नाद-निनाद इकतारा।
सात समंदर लहरा लेवे, कोई मीठा कोई खारा॥
भीतर गंगा जमना वेवे, सुरसत नरमद धारा।
चामल सिपरा सिवना वेवे, काँवेरी गोमत झारा॥
छोटी-मोटी अणगण वेवे, कोई नदी कोई नारा।
झर-झर झर-झर झरना झरता, अद्भुत उड़े फुव्वारा॥
बारहों सिवजी, सातहों तीरथ, सगत पीठ सतवारा।
जेसी सृष्टि बाहर दीसे, वेसो घट बीच नजारा॥
भीतर घट झलमल उजियारा, जिण बिच सिरजणहारा।
वीण बजावे सरसद नारद, बंसी बंसीवारा॥
सैन भगत घट भीतर बेठ्या, सद्गुरु राम हमारा।
बाहर भीतर एक राम हे, उसका जगत पसारा॥
साधौ भीतर का छब न्यारा॥
नित प्रत करूँ हजामताँ
सैन भगत
नित प्रत करूँ हजामताँ, रटू राम को नाम॥दरपण साँच विवेक को, कैंची विरत विराम।
जल छिड़कूँ सुख शाँति को, मुँडन करूँ तमाम॥
लम्बी चोटी गरब की, बाँधूँ गाँठ दुराम।
अगल-बगल का रुगचा, लोभ ईरसा काम॥
करूँ सफाई ध्यान ती, नाखूँ खोरे हाम।
हेडूँ माया को मारग, रगड़ूँ गुठली आम॥
लोभ मोह अर क्रोध का, नख छाटूँ बिन दाम।
सहजो समचित भाव रख, सेवा करूँ हजाम॥
भेदभाव राखूँ नहीं, ऊजल नाई काम।
सैन राजा रंक ने, जाणू एक समान॥
राम नाम में नहीं रे लाग्यो मन तेरा
सैन भगत
राम नाम में नहीं रे लाग्यो मन तेरा॥चाम की छुरहरी चाम की बाँधी, चामी लागा डेरा।
चामे मुँडे चार मुडावे, समुझि देख मन मोरा॥
कंधो टूट्यो तेल ढरकायो, होई गया साँझ सेवरा।
देनों होय सो दे दे झटपट, आई घर की वेरा॥
चिमटा नहरन और कतरनी, दरपन साहब तेरा।
सैन भगत मुजरे को आवे, आद-अंत का चेरा॥
चहुँ दिस निरखूँ एक सरूप
सैन भगत
चहुँ दिस निरखूँ एक सरूप।सगुण-निगुण के भरम न भटकूँ, मंदिर मसजिद बीच न अटकूँ।
नी रेहूँ अंध के कूप। चहुँ दिस निरखूँ एक सरूप॥
एक सरूप राम को जाणू, पूरन परमानंद पिछाणू।
सद्गुरु दरस्यो सोइ परमाणू, अणगण नामा एकहि रूप॥
चहुँदिस निरखूँ एक सरूप॥
ना वो सोवे ना जो जागे, ना वो ढबे ना वो भागे।
ना वो पाछे ना वो आगे, ना अनुरागे ना वीरागे॥
सैन भगत को छाया-धूप, चहुँदिस निरखूँ एक सरूप॥
साधौ भाई कै जनम्या कै मर्या
सैन भगत
साधौ भाई कै जनम्या कै मर्या।राम नाम रटयो नहीं रसना, बिरथा सबद उचर्या।
मीठा सबद कह्या नहीं जिव्हा, जे कह्या विस भर्या॥
परहित कारण जनम लियो हे, निज सुवारथ सँभर्या।
जनम अकारथ बीत चल्यो रे, नी चेतयो संकर्या॥
दान दियो नहीं पाई-धेला, पर धन रुच-रुच हर्या।
जतरो धन भर लियो कोथरी, छल करतां संघर्या॥
अंत समै भवसागर फँसयो, ना डूबा ना तर्या।
सैन भगत जद डूबण लागो, सतगुरू नाम सिमर्या॥
साधौ भाई राम नाम चित धारो
सैन भगत
साधौ भाई राम नाम चित धारो।चंचल चित कबजे नहीं रेहवे, मदवयो मन मतवारो।
मन-चित दोई कबजे होवे, तन कई करे बिचारो॥
सुन्दर स्याम अद्भुत छब राजे, रूप रंग को कारो।
घट के भीतर रास रचावे, कान्हों मुरली वारो॥
राम रमैयो क्रसन कन्हैयो, अनंत नाम निरधारो।
नाग नथैयो नाथ रह्यो हे, मदक्यो मन पटबारो॥
आँख मूँद ने एक रस होओ, एसो मतो हमारो।
किरपा कर सद्गुरु परबोध्यो, मिटि गयो तमसो भारो॥
सैन भगत साँसाँ की सरणी, एकई नाम उचारो।
साधौ भाई राम नाम चित्त धारो॥
ओए झलया किस दा करे गुमान
सैन भगत
ओए झलया किस दा करे गुमान।पंञ्ज ततवां दा बण्या पिंजरा, रब ने कर्या मिलान।
पृथ्वी अगन जल पवना कहंदे, पञ्जवां तत आसमान॥
इस पिंजरे विच पंछी बैठ्या, कुहु-कुहु करदा गान।
पंछी उडूया पिंजरा ख़ाली, पंञ्जई तत्त गरकान॥
ए संसार सुपने दी माया, कआं न सच्चा जान।
कूड़ा धन परवार ओए झलया, कूड़ा दिसे जहान॥
सैना कूड़ कमांदा फिरदाएँ, कूड़ा करदाएँ जखाण।
सतगुरु सच्चा साहेब मिलिया, दिता नाम फरमान॥
मो पे सद्गुरु कृपा करी
सैन भगत
मो पे सद्गुरु कृपा करी।मन भटक्यो तन भटक्यो, कितहुँ न ठौर धरी।
भटक-भटक तन हार गयो, मन में दुई भरी॥
ना निरगुण ना सरगुण जाणू, बात सदा बिगरी।
ना कोई जाणे ना समझावे, खूब पड़ी भमरी॥
भीतर देखूँ जोति सरूपों, बाहर सोई खरी।
भीतर बाहर एकहि दीखे, लीला अजब करी॥
सैन कहे सद्गुरु परचायो, संसा दूर करी।
मो पे सद्गुरु कृपा करी॥
प्रभु जी रहिजो सदा सहाई
सैन भगत
प्रभु जी रहिजो सदा सहाई।अनगन भगतां तार दिया, प्रभु मुझ पे कृपा बणाई।
धन्ना नामदेव तार्या, दास कबीर सुखदाई॥॥
रैदास की साखी राखी, गंगा ठाम परगटाई।
भगतां की सेवा व्रत पालन, खूब करी सेवकाई॥
अणीदास की लाज बचावा, बण आया प्रभु नाई।
चक्र सुदरसन छोड़ प्रभु नापी, धारी ठाकुर की सेवकाई॥
ठाकुर ने तो तार दियो प्रभु, ठाकुर की पुण्याई।
म्हारो पुण्य कदां उगसी प्रभु, किरपा करो कनहाई॥
सैन भगत सद्गुरु किरपा, सबदां कही न जाई।
प्रभु रहिजो सदा सहाई॥
साधौ भाई गाठो रखो बिसास
सैन भगत
साधौ भाई गाठो रखो बिसास।सगुण-निगुण मन क्युँ भटकावो, रेवो मती उदास।
साई तो भीतर बेठ्या हे, उचरो साँस-उसाँस॥
आँखा मीच निहारो भीतर, चलके अजब उजास।
भीतर-बाहर एकहि जाणो, एकहि राम निवास॥
दुई को क्युँ भरम भरावो, एकहि इस्ट सुवास।
सैन भगत सद्गुरु की मेहर, एक राम की आस॥
साधौ भाई माया भरम बढ़ाया
सैन भगत
साधौ भाई माया भरम बढ़ाया।माया अद्भुत जाणो भाई, अजब गजब की माया।
एक मिलावे राम हरि संग, एक राम बिलमाया॥
माया को परदो नहीं खोल्यो, माया खूब पचाया।
ना तो दीखे ना पतरीखे, ना छाया ना काया॥
हाथ पकड़ मारग लै चाले, माया वाट भुलाया।
तीन देव माया के पंजे, माया खूब नचाया॥
माया विश्वामित ने मोहयो, नारद ने भरमाया।
पांडे कर ली घर की घरनी, हँस-हँस खूब लुभाया॥
भोग भरम में सब धन लुट्यो, तन धन मान गंवाया।
सतगुरू ने जद आँख उघाड़ी, तो पाछे पछताया॥
बिलख-बिलख ने बक्का फाड़े, सद्गुरु धीर बँधाया।
माया की करणी ना जाणी, जिण जाय तिण खाया॥
माया नागण बण घट भीतर, बांबी विवर बणाया।
सद्गुरु अणहद नाद बजायो, झट बाहर ले आया॥
सैन भगत सद्गुरु किरपा ने, माया भरम नसाया।
साधौ भाई माया भरम बढ़ाया॥
किण विध ठाकुर के ढिग जाऊँ
सैन भगत
किण विध ठाकुर के ढिग जाऊँ।गेल नी जाणूं, गमत नी जाणूँ, जाणू नहीं उपाऊं।
कबीर पौंच्या पीपा पौंच्या, रहि गयो सैनो नाऊं॥
धन्नो पौंच्यो रैदास पौंच्यो, सबको बड़ो सुभाऊं।
म्हारी भगति ओछी होई, मदद करी न काऊं॥
सद्गुरु की किरपा बिन पायाँ, पौंच नी पावे राऊं।
सैन भगत के निहचो पूरो, चरण कमल चित लाऊं॥
निस दिन सिमरूँ राम ही राम
सैन भगत
निस दिन सिमरूँ राम ही राम॥राम सिमरताँ भव भय भागे, सीत न लागे घाम।
भूख नी लागे तरस नी व्यापे, नहीं थकान विसराम॥
एक लगन एक मन लिवता, एक रटन एक नाम।
अंत समै गुरू दरसन होवे, काशी गुरू सुख धाम॥
गागनोन ती ओंकारेसर, नहीं लागो विसराम।
साधू संगत भली सुभागं, कासी कयो पयाम॥
पाँच बरस में कासी पौंच्या, गुरू आसरम सुख धाम।
अब नहीं छोड़ूँ अंत समै सुद, पाको करूँ मुकाम॥
सैन भगत सद्गुरु के दरसन, मिट्या सकल विसकाम।
निस दिन सिमरूँ, राम ही राम॥
अण तन को कई माजनो
सैन भगत
अण तन को कई माजनो, यो तन काचीगार।पंचतत्त को बण्यो फूतरो, जीव फँस्यो बिच कार।
हूड़ो बेठ्यो टें-टें बोले, खुल्या हुआ दस दुवार॥
दूधां-रोटी मीठा मेवा, खूब मले सतकार।
गार फूतरो मौजां माणे, खूब करे सिणगार॥
परमतत्त ने भूल गयो हे, भूल्यो सिरजणहार।
माया मोह लोभ में बिलम्यो, किसतर निकले बाहर॥
चार दिनाँ की मुद्दत पूरी, लिख्यो कोलकरार।
परमानन्द राम मिलन की, करले सुरत सम्हार॥
सैन भगत उड़ जा रे हूड़ा, खुला सुरत दुवार।
पूरन परमानंद मिल्यां बिन, नी हे तार नितार॥
सैन धन्ने ख़ूब करी सेवकाई
सैन भगत
सैन धन्ने ख़ूब करी सेवकाई।राछ-पीछ को थेलो टांग्यो, वाज्यो सेनो नाई॥
दर-दर हाँक लगातो फिर्यौ, करन गयो सेवकाई।
ठाकर-ठाकुर करे तुकारो, पीड़ा बरनि न जाई॥
राम नाम की ताड़ी लागी, नी पौच्यो सेवकाई।
भेस बणा राम खुद पौंच्या, धन रे सेनो नाई॥
राछ-पीछ सब परमा फैंक्या, राम नाम चितलाई।
सैन भगत हिरदै पट खुल्या, सद्गुरु की करुनाई॥
भगत जनों के कारण
सैन भगत
भगत जनों के कारण करी नहीं ठकुराई।जाति बरन कुल नहीं जाणे, लोग करे चतराई।
शबरी जात भीलनी होई, बेर तोड़ने लाई॥
प्रेम सहित वण का फल खाया, रामचंद्र रघुराई।
करमा कसो आचरण कयो, मन हरि भक्ति बसाई॥
छप्पन भोग कर भोजन कर्यो, रुच-रुच खिचड़ी खाई।
नामा पीपा धन्ना रैदास, दास कबीर गुरुभाई॥
सब पर एक सरीखी मेहर, महिमा बरनि न जाई।
सैन कहे प्रभु लाज बचावा, खुद बण आया नाई॥
बंदया कर लै करम कमाई
सैन भगत
बंदया कर लै करम कमाई।शबरी अते अहिल्या कीती, पीपे-सीता माई।
जंगलां दे विच होके देन्दा, खुद आया रघुराई॥
करम कमाई कबीर ने कीती, नामदेव चित्त लाई।
धन्ने भगत कंकर बीज्या, खेती होई सवाई॥
रैदास दा सबद सुचन्या, गंगा कछोटी आई।
करम कमाई परल्हाद ने बीती, हरि चित्त दिल विच लाई॥
भगतां दा प्रभ रक्खा हारा, छोड़ दिती ठकराई।
सच्चा सौदा जिस-जिस कीता, कदां न घाटा पाई॥
सद्गुरु पूरा रामानंदा, बार-बार शरणाई।
सैन भगत दी भगति कच्ची राम नाम चित लाई॥
साहिब तो भीतर घट बैठ्या
सैन भगत
साहिब तो भीतर घट बैठ्या, मैं भरमू चहुँ देस।जग माया घण सुंदर लागे, सुंदर रूप रूपेस।
जें देखूँ आँखाँ करमावे, नजर न आवे लेस॥
भाँत-भाँत का गेहणा बत्ता, भाँत-भाँत का वेस।
होड़म-होड़ मची जग भीतर, होवे खूब करेस॥
म्हारो मंदर ऊँची जाणू, थारो घणो छरेस।
म्हारी मूरत हे अत सुन्दर, थारी घणी घरेस॥
सुन्दर छवियाँ मंदर दीसे, रघुपति राम रमेस।
मूरत में हंकार थोपयो, मंदर में बड़वेस॥
घट-घट शाम समाया साधौ, कण-कण राम रमेस।
निरख-निरख चित हरसित होवे, रोम-रोम हरसेस॥
सैना सतगुरू किरपा कर दी, संग मल्या दखेस।
भीतर घट का द्वार उघार्या, चानण चलक नभेस॥
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