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मलूकदास के सबद : Malukdas Ke Sabad

सत्रहवीं शताब्दी के संत-काव्य में मलूकदास का नाम अपनी स्पष्ट सामाजिक दृष्टि और आध्यात्मिक चिंतन के कारण उल्लेखनीय है। उनका जन्म 1574 में प्रयाग के निकट कड़ा में हुआ था और 1682 में उनका निधन माना जाता है। आरंभ से ही उनमें दान और विरक्ति की प्रवृत्ति दिखाई देने लगी थी। आगे चलकर उन्होंने गृहस्थ जीवन और सांसारिक मोह से दूरी बनाते हुए भक्ति तथा साधना को अपने जीवन का केंद्र बनाया।

मलूकदास ने बाहरी आडंबर के बजाय मन की शुद्धता, दया, सत्य, वैराग्य और ईश्वर-स्मरण को महत्व दिया। उनके दोहों में जाति और धार्मिक भेद से ऊपर उठकर मनुष्य को देखने की दृष्टि मिलती है। ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम’ वाला प्रसिद्ध दोहा भी उन्हीं से संबद्ध है, हालांकि उनके काव्य को केवल इस एक दोहे तक सीमित करना उनके व्यापक विचार-जगत को छोटा कर देता है। ‘ज्ञानबोध’, ‘रतनखान’, ‘भक्त बच्छावली’, ‘भक्ति-विवेक’ और ‘ज्ञानपरोछि’ उनकी प्रमुख कृतियों में गिनी जाती हैं। उनकी भाषा में अवधी के साथ आरंभिक खड़ी बोली के रूप भी दिखाई देते हैं।


सबहिन के हम सबै हमारे

सबहिन के हम सबै हमारे। जीव जंतु मोहि लगै पियारे।

तीनों लोक हमारी माया। अंत कतहुँ से कोइ नहि लाया।

छत्तिस पवन हमारी जात। हमहीं दिन और हमही रात।

हमहीं तरवर कीट पतंगा। हमहीं दुर्गा हमहीं गंगा।

हमहीं मुल्ला हमहीं क़ाज़ी। तीरथ वरत हमारो बाज़ी।

हमहीं पंडित हमीं बैरागी। हमहीं सूम हमीं हैं त्यागी।

हमहीं देव औ हमही दानौ। भावै जा को जैसा मानों।

हमहीं चोर हमहीं, बटमार। हम ऊँचे चढ़ि करै पुकार।

हमहीं महावत हमहीं हाथी। हमहीं पाप पुन्न के साथी।

हमहीं अस्व हमहीं असवार। हमही दास हमहीं सरदार।

हमहीं सूरज हमहीं चंदा। हमहीं भये नंद के नंदा।

हमहीं दसरथ हमहीं राम। हमरे क्रोध हमारे काम।

हमह रावन हमहीं कंस। हमहीं मारा अपना बंस।

हमही जियावैं हमहीं मारैं। हमहीं बोरैं हमहीं तारैं।

जहाँ तहाँ सब जोति हमारी। हमहीं पुरुष हम्ही है नारी।

ऐसी बिधि कोई लव लावै। सो अविगत से टहल करावै।

सहै कुसब्द और सुमिरै नांव। सब जग देखै एकै भाव।

या पद का कोई करै निबेरा। कह मलूक मैं ता का चेरा।

हमारा सतगुरु बिरले जानै

हमारा सतगुरु बिरले जानै।

सुई के नाके सुमेर चलावै, सो यह रूप बखानै॥

की तो जानै दास कबीरा, की हरिनाकस पूता।

की तो नामदेव औ नानक, की गोरख अवधूता॥

हमरे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।

ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै॥

बिन तरवर फल फूल लगावै, सों तो वा का चेला।

छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहैं अकेला॥

बिन दीपक उंजियारा देखै, एड़ी समुंद थहावै।

चींटी के पग कुंजर बाँधे, जा को गुरू लखावै॥

बिन पंखन उड़ जाय अकासे, बिन पंखन उड़ि आवे।

सोई सिष्य गुरू का प्यारा, सूखे नाव चलावै॥

बिन पायन सब जग फिरि आवै, सो मेरा गुरु भाई।

कहै मलूक ता की बलिहारी, जिन यह जुगत बताई॥

अब मैं अनहद पदहिं समाना

अब मैं अनहद पदहिं समाना।

सब देवन को मर्म भुलाना, अविगत हाथ बिकाना॥

पहिला पद है देई देवा, दूजा नेम अचारा।

तीजे पद में सब जग बंधा, चौथा अपरंपारा॥

सुन्न महल में महल हमारा, निरगुन सेज बिछाई।

चेला गुरु दोउ सैन करत हैं, बड़ी असाइस पाई॥

एक कहै चल तीरथ जइये, एक ठाकुरद्वारा बतावे।

परम जोति के देखे संतो, अब कछु नजर न आवे॥

अवागवन का संसय छूटा, काटी जम की फांसी।

कह मलूक मै यही जानि के, मित्र कियो अवनासी॥

अवधू याही करो बिचार

अवधू याही करौ बिचार।

दस अवतार कहाँ ते आये, किन रे गढ़े करतार॥

केहि उपदेस भये तुम जोगी, केहि विधि आतम जारा।

केहि कारन तुम काया सताइ, केहि विधि आतम मारा॥

योथे बांट बाँधि के भोंदू, येहि बिधि जाव न पारा।

ऋद्धि सिद्ध में बूड़ि मरोगे, पकड़ो खेवनहारा॥

अगल बगल का पैंड़ा पकड़ा, दिन दिन चढ़ता भारा।

कहत मलूक सुनो रे भोंदू, अबिगत मूल बिसारा॥

आपा खोज रे जिय भाई

आपा खोज रे जिय भाई।

आपा खोजे त्रिभुवन सूझे, अंधकार मिटि जाई॥

जोई मन सोई परमेसुर, कोइ बिरला अवधू जाने।

जौन जोगी सुर सब घट व्यापक, सो यह रूप बखाने॥

सब्द अनाहत होत जहाँ तें, तहां ब्रह्म कर बासा।

गगन मंडल में करत कलोले, परम जोति परगासा॥

कहत मलुका निरगुन के गुन, कोई बड़भागी गावै।

क्या गिरही और क्या बैरागी, जेहि हरि देय सो पावै॥

अवधू का कहि तोहि बखानों

अवधू का कहि तोहि बखानों।

गगन मंडल में अनहद बोलै, जाति बरन नहिं जानों॥

अहो अहो मैं कहा कहों तोहि, नांव न जानों देवा।

सुन्न महल की जुगती बतावे, केहि बिधि कीजे सेवा॥

तीरथ भरमै बड़े कहावे, बाद करत हैं सोंई।

अंधधुंध चलजात निरंजन, मर्म न जानै कोई॥

अविगत गति तुम्हरी अविनासी, घट घट रहत चलाया।

जहां तहां तेरी माया खेलै, सतगुरु मोंहि लखाया॥

वेद पढ़े पढ़ि पंडित भूले, ज्ञानी कथि कथि ज्ञाना।

कह मलूक तेरी अद्भुत लीला, सो काहू नहिं जाना॥

अब मैं सतगुरु पूरा पाया

अब मैं सतगुरु पूरा पाया।

मन तें जनम जनम डहकाया॥

कई लाख तुम रंडी छांड़ी, केते बेटी बेटा।

कितने बैठे सिरदा करते, माया जाल लपेटा॥

कितने के तुम पुत्र कहाये, केते पित्र तुम्हारे।

गया बनारस कर कर थाके, देत देत पिंड हारे॥

कई लाख तुम लसकर जोड़े, केते घोड़े हाथी।

तेऊ गये बिलाय छिनक में, कोई रही न साथी॥

आवागवन मिटाया सतगुरु, पूजी मन की मासा।

जीवन मुक्त किया परमेसुर, कहत मलूकादासा॥

नैया मेरी नीके चलन लागी

नैया मेरी नीके चलन लागी।

आंधी मेंह तनिक नहि डोलो, साहु चढे बड़भागी॥

रामराय डगमगी छोड़ाई, निर्भय कड़िया लैया।

गुन लहासि की हाजत नाही, आछा साज बनैया॥

अवसर पड़े तो पर्बत बोझै, तहूँ न होवै भारी।

धन सतगुरु यह जुगत बताई, तिन की मैं बलिहारी॥

सूखे पड़े तो कछु डर नाहीं, ना गहिरे का संसा।

उलटि जाय तो बार न बांके, या का अजब तमासा॥

कहत मलूक जो बिन सिर खेवै, सो यह रूप बखाने।

या नैया के अजब कथा, कोइ बिरला केवट जाने॥

अजब तमासा देखा तेरा

अजब तमासा देखा तेरा। ता तें उदास भयो मन मेरा॥

उतपति परलय नित उठ होई। जग में अमर न देखा कोई॥

माटी के पुतरे माया लाई। कोई कहे बहिन कोई कहे भाई॥

झूँठा नाता लोग लगावै। मन मेरे परलीत न आवै॥

जबहीं भेजै तबहिं बुलावै। हुकुम भया कोइ रहन न पावै॥

उलटत पलटत जग की अंचली। जैसे फेरे पान तमोली॥

कहत मलूक रह्यो मोहि घेरे। अब माया के जाऊं न नेरे॥

बाबा मुरदे मूंड उठाया

बाबा मुरदे मूंड उठाया।

लागी अंग बाय दुनिया की, राम राम बिसराया॥

आये पहिरि करम की बेड़ी, हाथ हाथ करि गाढ़ी।

फूले फिरैं जनु अमर भये हैं, प्रीति बिषय सों बाढ़ी॥

काहू के मन चार पाँच की, काहू के मन बीस।

काहू के मन सात आठ की, सब बाँधे जगदीस॥

अब भये सौतिन हाथ केरे, घर बीघा सौ कीन्ह।

मेरी मेरी कहि उमर गवाई, कबहुँ राम ना चीन्ह॥

दिना चार के घोड़ सोड़े, दिना चार के हाथी।

कहत मलूका दिना चार में, बिछुरि जायँगे साथी॥

साधो भाई अपनो करनी नाहीं

साधो भाई अपनो करनी नाहीं।

जे करनी का करैं भरोसा, ते जम के घर जाहीं॥

ना जानू धौं कहां मुए थे, ना जानू कहं आये।

ना जानू हरि गर्म बसेरा, कौने भांति बनाये॥

मही कठिन या हरि की माया, या तें कौन बचावे।

जौन कहै जड़ मूलहिं त्यागी, तिन को हाथ लगावे॥

यह संसार बड़े भौसागर, प्रलय काल ते भारी।

बूड़त तें या सोई बाचे जेहि राखै करतारी॥

लच्छ गऊ दे अन्न खात थे, राजा नृग से प्यारे।

पुन्न करत जमा और गंवाई, ले गिरगिट के डारे॥

गौतम नारि बड़ी पतिवरता, बहुते कीन्हे दाना।

करनी करि बैकुंठ न पैठो, काहे भई पषाना॥

मारहु मान छेम करि बैठो, छोड़ो गर्व गुमाना।

आपा मेटो राम भजो तुम, कहत मलूक दिवाना॥

एक तुम्हें प्रभु चाहौं राज

एक तुम्हें प्रभु चाहौं राज।

भूपति रंक सति नहिं पूछों, चरन तुम्हार संवारयो काज॥

पांचों पांडव जरत उबारयो, द्रुपद सुता को राख्यो लाज।

संत विरोधी ऐसो मारो, ज्यों तीतर पर छूटे बाज॥

तुम्हें छोड़ि जाने जो दूजा, तेहि पापी पर परि है गाज।

कहें मलूक मेरी प्रान रमइया, तोन लोक ऊपर सिरताज॥

बंदे दुनिया को दीन गंवाया

बंदे दुनिया को दीन गंवाया।

सो दुनिया तेरे संग न लागी, मूड़ अजाब चढ़ाया॥

क़मर जो लोगा बदी ख़लक़ की, किन तुझको फर्माया।

गुनहगार तू हुआ सरासर, दोज़ख़ बांध चलाया॥

ख़ाक सेती जिन पैदा कीन्हा, सो साहेब बिसराया।

मोहकम मार पड़ी गुरजन की, तब कछु ज्वाब न आया॥

अब किसहूँ को दोष न दीजै, गंदा अमल कमाया।

कह मलूक जस ख़िदमत पहुँचा, सोई नतीजा पाया॥

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