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सगरामदास के सबद : Sagramdas Ke Sabad

सगरामदास की कविता में लोकजीवन से निकली सहज सीख और राम-भक्ति साथ-साथ दिखाई देती है। वे छोटी-छोटी बातों और रोजमर्रा के उदाहरणों से मनुष्य को जीवन की अस्थिरता, मोह और सांसारिक दिखावे से सावधान करते हैं। उनके पदों में भक्ति के साथ सदाचार और आत्मचिंतन का आग्रह भी मिलता है।

भाषा कठिन आध्यात्मिक शब्दावली से दूर, बोलचाल के निकट और सीधे प्रभाव डालने वाली है। ‘कोउ जात न पाँत कुटुँब तेरा’ जैसे पदों में वे सांसारिक संबंधों की क्षणभंगुरता समझाते हुए राम-स्मरण की ओर संकेत करते हैं। इसी सरल लोकधर्मी अभिव्यक्ति के कारण सगरामदास की रचनाएँ संत काव्य की सहज परंपरा में अपना अलग स्थान रखती हैं।

या में कोई नहीं नर तेरो रे

या में कोई नहीं नर तेरो रे।

राम संत गुरुदेव बिना है, सब ही जगत अँधेरो रे॥

हृदय देख विचार खोज कर, दे मन माहीं फेरो रे।

आयो कौन चले कौन संगी, सहर सराय बसेरो रे॥

मात-पिता-सुत-कुटुम-कबीलो, सब कह मेरो-मेरो रे।

जब जम किंकर पास गहे गल, तहाँ नहीं कोइ तेरो रे॥

धरिया रहे धाम धन सब ही, छिन में करो निबेरो रे।

आयो ज्यूँ ही चले उठ रीतो, ले न सके कछु डेरो रे॥

मगन होय सब कर्म कमावे, संक नहीं हरि केरो रे।

होय हिसाब, ज्वाब जब बूझै, वहाँ न होय उबेरो रे॥

निरपख न्याय सदा समता से, राव रंक सब केरो रे।

जैसा करे तैसा भुगतावै, भुगत्यों होय निबेरो रे॥

अबही चेत हेत कर हरि से, अजहूँ हरि पद नेरो रे।

सतगुरु साध संगत जग माँहीं, भव तिरने को बेरो रे॥

होय हुँसियार सिंवर ले साईं, मान कह्यो अब मेरो रे।

'सेवगराम' कह-कह समझावै, परसराम को चेरो रे॥

कोउ जात न पाँत कुटुँब तेरा

कोउ जात न पाँत कुटुँब तेरा, घर धाम धरया रहै जायेगा रे।

अरु मात न तात न भ्रात सँगी, सब सुत दारा न्यारा थायेगा रे॥

जब जम जोरावर आय घेरे, तब आडा कोउ नहिं आयेगा रे।

कहै सेवगराम सँभार साँई, ए तो जीव अकेला ही जायेगा रे॥

अब कहा सोय राम कह भाई

अब कहा सोय राम कह भाई। रैन गई बासर भयो आई॥

पूर्व पुन्य ते नर देह पाई। हरि बे मुख मत भूल गमाई॥

ताते एह उर करो बिचारा। नर तन मिलै न बारंबारा॥

जात कपूर उड़ै कर सेती। तो बहुरै आवै नहिं जेती॥

तिरिया तेल चढ़ै इक बारा। बहुरि न चढ़हि दूसरी बारा॥

केल फूल फल एक ही होई। बहुरै फल लागै नहिं कोई॥

काच फूट किरची हुय जावे। सौ बहुरै साबत नहिं थावै॥

सत्तिया छिटक परीसिंध माँही। सो कबहूँ कर आवै नाहीं॥

एक बार कागज लिख सोई। जो दूसर लिखिहै नहिं कोई॥

जो मोती बींधत जो फूटा। तो कबहूँ मीले नहिं पूठा॥

फाट पषाण तेड़ जो आई। सो कबहूँ मीलै न मिलाई॥

सती सिंगार किया सज सोई। या तन और करै नहिं कोई॥

ऐसे ही यह नर तन कहिये। सो बिनसै बहुरैं नहिं पइये॥

नर तन अखै होय तब भाई। सेवगराम राम लिव लाई॥

नर जाग जगावत हैं सतगुरू

नर जाग जगावत हैं सतगुरू, अब सोय रह्याँ कैसे सझिये रे।

सठ! आग गिरे माँहि काँहि जरे, चल साध सँगत में रँजिये रे॥

नित लगा रहौ निज नाम सेती, इक सँग बिषयन न तजिये रे।

तेरा भाग बड़ा भगवंत भजो, कहै सेवगराम समझिये रे॥

सब दानव देव पुनंग कहा

सब दानव देव पुनंग कहा, यह धर्म है चारूँ वरण का रे।

पुंन नर रु नार अंतज येहि, फिर मुसलमान हिंदुन का रे॥

तुम पैंडा पिंजर में पेश करो, नर यहि है राह रसूल का रे।

कहै सेवग रामहि राम रटो, निज जानिये मंत्र मूल का रे॥

बंदे चेतन होय चितार साईं

बंदे चेतन होय चितार साईं, सतगुरु दे ज्ञान चेतावता है।

नित निरभे अति आनंद करे, काल कीरतै जीव बँचावता है॥

सचा सैंण सों साईं मिलाय देवे, जग झूठा कूँ झूठ बतावता है।

कहै सेवगराम समझ नीके, सब सुख दे दुःख छुड़ावता है॥

परसा गुरुदेव मो सिर तपे

परसा गुरुदेव मो सिर तपे, निज नाम निशान रुपावता है।

सब भाँज भरम्म करम दूरा, जिव जम की पास छुड़ावता है॥

दरियाव दुखन सूँ काढ लेवे, सुख सागर मायँ झुलावता है।

कर सेवगराम ही सेव सदा, उर ज्ञान वैराग उपावता है॥

इन देख दया मोहि आवत है

इन देख दया मोहि आवत है, नर मार मुगद्दर खायेगा रे।

याँ तो किये करम निशँक मानी, वहाँ तो ज्वाब कछु नहीं आयेगा रे॥

हक पूछ हिसाब हजूर माहिं, जब लेखा दिया नहिं जायगा रे।

कहै सेवग स्याम सूँ चोर भया, नर जम के हाथ बिकायगा रे॥

देखो देखो दुगीन की दोस्ती रे

देखो देखो दुगीन की दोस्ती रे, मोहि देख अचंभाहि आत है रे।

कछु सार असार बिचार नहीं, सठ छोड़ अमी, बिष खात है रे॥

नित भोगत भोग अघाय नहीं, फिर ये ही दिनाँ ये ही रात है रे।

सुन सेवगराम हैरान भया, कछु बात कही नहिं जात है रे॥

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