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आरजू लखनवी की गज़लें : Aarzu Lakhnavi Ghazal

आरज़ू लखनवी (1873–1951) उर्दू के प्रसिद्ध शायर और गीतकार थे। उनका मूल नाम मोहम्मद हुसैन और तख़ल्लुस ‘आरज़ू’ था। लखनऊ में जन्मे आरज़ू ने कम उम्र में ही शायरी शुरू कर दी थी और बाद में जलाल लखनवी के शागिर्द बने। ग़ज़ल, गीत और मर्सिये के साथ उन्होंने मसनवी, रुबाई, नात, क़सीदा और अन्य काव्य-विधाओं में भी लिखा। छंदशास्त्र पर उनकी अच्छी पकड़ थी और अपने समय में वे उस्ताद शायर के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

‘फ़ुग़ान-ए-आरज़ू’, ‘जहान-ए-आरज़ू’, ‘निशान-ए-आरज़ू’ और ‘सुरीली बाँसुरी’ उनकी चर्चित कृतियों में हैं। 1942 में वे बंबई चले गए, जहाँ फिल्मों के लिए गीत और संवाद भी लिखे। बाद में पाकिस्तान चले गए और कराची में रेडियो पाकिस्तान से जुड़े। 16 अप्रैल 1951 को कराची में उनका निधन हुआ।

रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी : आरज़ू लखनवी

रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी
सैंकड़ों डूब गए फिर भी है इतना पानी
आँख से बह नहीं सकता है भरम का पानी
फूट भी जाएगा छाला तो न देगा पानी
चाह में पाऊँ कहाँ आस का मीठा पानी
प्यास भड़की हुई है और नहीं मिलता पानी
दिल से लौका जो उठा आँख से टपका पानी
आग से आज निकलते हुए देखा पानी
किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी
झूम कर आई घटा टूट के बरसा पानी
फैलती धूप का है रूप लड़कपन का उठान
दोपहर ढलते ही उतरेगा ये चढ़ता पानी
टिकटिकी बाँधे वो तकते हैं मैं इस घात में हूँ
कहीं खाने लगे चक्कर न ये ठहरा पानी
कोई मतवाली घटा थी कि जवानी की उमंग
जी बहा ले गया बरसात का पहला पानी
हाथ जल जाएगा छाला न कलेजे का छुओ
आग मुट्ठी में दबी है न समझना पानी
रस ही रस जिन में है फिर सैल ज़रा सी भी नहीं
माँगता है कहीं उन आँखों का मारा पानी
न सता उस को जो चुप रह के भरे ठंडी साँस
ये हवा करती है पत्थर का कलेजा पानी
ये पसीना वही आँसू हैं जो पी जाते थे हम
'आरज़ू' लो वो खुला भेद वो टूटा पानी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं : आरज़ू लखनवी

जिन रातों में नींद उड़ जाती है क्या क़हर की रातें होती हैं
दरवाज़ों से टकरा जाते हैं दीवारों से बातें होती हैं
आशोब-ए-जुदाई क्या कहिए अन-होनी बातें होती हैं
आँखों में अंधेरा छाता है जब उजाली रातें होती हैं
जब वो नहीं होते पहलू में और लम्बी रातें होती हैं
याद आ के सताती रहती है और दिल से बातें होती हैं
घिर घिर के बादल आते हैं और बे-बरसे खुल जाते हैं
उम्मीदों की झूटी दुनिया में सूखी बरसातें होती हैं
उम्मीद का सूरज डूबा है आँखों में अंधेरा छाया है
दुनिया-ए-फ़िराक़ में दिन कैसा रातें ही रातें होती हैं
तय करना हैं झगड़े जीने के जिस तरह बने कहते सुनते
बहरों से भी पाला पड़ता है गूँगों से भी बातें होती हैं
आँखों में कहाँ रस की बूँदें कुछ है तो लहू की लाली है
इस बदली हुई रुत में अब तो ख़ूनीं बरसातें होती हैं
क़िस्मत जागे तो हम सोएँ क़िस्मत सोए तो हम जागें
दोनों ही को नींद आए जिस में कब ऐसी रातें होती हैं
जो कान लगा कर सुनते हैं क्या जानें रुमूज़ मोहब्बत के
अब होंट नहीं हिलने पाते और पहरों बातें होती हैं
जो नाज़ है वो अपनाता है जो ग़म्ज़ा है वो लुभाता है
इन रंग-बिरंगी पर्दों में घातों पर घातें होती हैं
हँसने में जो आँसू आते हैं नैरंग-ए-जहाँ बतलाते हैं
हर रोज़ जनाज़े जाते हैं हर रोज़ बरातें होती हैं
जो कुछ भी ख़ुशी से होता है ये दिल का बोझ न बन जाए
पैमान-ए-वफ़ा भी रहने दो सब झूटी बातें होती हैं
जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं
जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं
हिम्मत किस की है जो पूछे ये 'आरज़ू'-ए-सौदाई से
क्यूँ साहब आख़िर अकेले में ये किस से बातें होती हैं

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं : आरज़ू लखनवी

आराम के थे साथी क्या क्या जब वक़्त पड़ा तो कोई नहीं
सब दोस्त हैं अपने मतलब के दुनिया में किसी का कोई नहीं
गुल-गश्त में दामन मुँह पे न लो नर्गिस से हया क्या है तुम को
उस आँख से पर्दा करते हो जिस आँख में पर्दा कोई नहीं
जो बाग़ था कल फूलों से भरा अटखेलियों से चलती थी सबा
अब सुम्बुल ओ गुल का ज़िक्र तो क्या ख़ाक उड़ती है उस जा कोई नहीं
कल जिन को अंधेरे से था हज़र रहता था चराग़ाँ पेश-ए-नज़र
इक शम्अ जला दे तुर्बत पर जुज़ दाग़ अब इतना कोई नहीं
जब बंद हुईं आँखें तो खुला दो रोज़ का था सारा झगड़ा
तख़्त उस का न अब है ताज उस का अस्कंदर ओ दारा कोई नहीं
क़त्ताल-ए-जहाँ माशूक़ जो थे सूने पड़े हैं मरक़द उन के
या मरने वाले लाखों थे या रोने वाला कोई नहीं
ऐ 'आरज़ू' अब तक इतना पता चलता है तिरी बर्बादी का
जिस से न बगूले हों पैदा इस तरह का सहरा कोई नहीं

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी : आरज़ू लखनवी

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी
रात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी
क़ैद को तोड़ के निकला जब मैं उठ के बगूले साथ हुए
दश्त-ए-अदम तक जंगल जंगल भाग चला वीराना भी
हाथ से किस ने साग़र पटका मौसम की बे-कैफ़ी पर
इतना बरसा टूट के बादल डूब चला मय-ख़ाना भी
एक लगी के दो हैं असर और दोनों हस्ब-ए-मरातिब हैं
लौ जो लगाए शम्अ' खड़ी है रक़्स में है परवाना भी
दोनों जौलाँ-गाह-ए-जुनूँ हैं बस्ती क्या वीराना है
उठ के चला जब कोई बगूला दौड़ पड़ा वीराना भी
ग़ुंचे चुप हैं गुल हैं हवा पर किस से कहिए जी का हाल
ख़ाक-नशीं इक सब्ज़ा है सो अपना भी बेगाना भी
हुस्न ओ इश्क़ की लाग में अक्सर छेड़ उधर से होती है
शम्अ' का शो'ला जब लहराया उड़ के चला परवाना भी
ख़ून ही की शिरकत वो न क्यूँ हो शिरकत चीज़ है झगड़े की
अपनों से वो देख रहा हूँ जो न करे बेगाना भी
दौर-ए-मसर्रत 'आरज़ू' अपना कैसा ज़लज़ला-आगीं था
हाथ से मुँह तक आते आते छूट पड़ा पैमाना भी

आँख से दिल में आने वाला : आरज़ू लखनवी

आँख से दिल में आने वाला
दिल से नहीं अब जाने वाला
घर को फूँक के जाने वाला
फिर के नहीं है आने वाला
दोस्त तो है नादान है लेकिन
बे-समझे समझाने वाला
आँसू पोंछ के हँस देता है
आग में आग लगाने वाला
है जो कोई तो ध्यान उसी का
आने वाला जाने वाला
हुस्न की बस्ती में है यारो
कोई तरस भी खाने वाला
डाल रहा है काम में मुश्किल
मुश्किल में काम आने वाला
दी थी तसल्ली ये किस दिल से
चुप न हुआ चिल्लाने वाला
ख़्वाब के पर्दे में आता है
सोता पा के जगाने वाला
इक दिन पर्दा ख़ुद उल्टेगा
छुप-छुप के तरसाने वाला
'आरज़ू' इन के आगे है चुप क्यूँ
तुम सा बातें बनाने वाला

वो सर-ए-बाम कब नहीं आता : आरज़ू लखनवी

वो सर-ए-बाम कब नहीं आता
जब मैं होता हूँ तब नहीं आता
बहर-ए-तस्कीं वो कब नहीं आता
ए'तिबार आह अब नहीं आता
चुप है शिकवों की एक बंद किताब
उस से कहने का ढब नहीं आता
उन के आगे भी दिल को चैन नहीं
बे-अदब को अदब नहीं आता
ज़ख़्म से कम नहीं है उस की हँसी
जिस को रोना भी अब नहीं आता
मुँह को आ जाता है जिगर ग़म से
और गिला ता-ब-लब नहीं आता
भोली बातों पे तेरी दिल को यक़ीं
पहले आता था अब नहीं आता
दुख वो देता है उस पे है ये हाल
लेने जाता हूँ जब नहीं आता
'आरज़ू' बे-असर मोहब्बत छोड़
क्यूँ करे काम जब नहीं आता

भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो : आरज़ू लखनवी

भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो
जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो
रस्में इस अंधेर-नगर की नई नहीं ये पुरानी हैं
मेहर पे डालो रात का पर्दा माह को रौशन रहने दो
रूह निकल कर बाग़-ए-जहाँ से बाग़-ए-जिनाँ में जा पहुँचे
चेहरे पे अपने मेरी निगाहें इतनी देर तो रहने दो
ख़ंदा-ए-गुल बुलबुल में होगा गुल में नग़्मा बुलबुल का
क़िस्सा एक ज़बानें दो हैं आप कहो या कहने दो
इतना जुनून-ए-शौक़ दिया क्यूँ ख़ौफ़ जो था रुस्वाई का
बात करो ख़ुद क़ाबिल-ए-शिकवा उल्टे मुझ को रहने दो

मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने : आरज़ू लखनवी

मासूम नज़र का भोला-पन ललचा के लुभाना क्या जाने
दिल आप निशाना बनता है वो तीर चलाना क्या जाने
कह जाती है क्या वो चीन-ए-जबीं ये आज समझ सकते हैं कहीं
कुछ सीखा हुआ तो काम नहीं दिल नाज़ उठाना क्या जाने
चटकी जो कली कोयल कूकी उल्फ़त की कहानी ख़त्म हुई
क्या किस ने कही क्या किस ने सुनी ये बता ज़माना क्या जाने
था दैर-ओ-हरम में क्या रखा जिस सम्त गया टकरा के फिरा
किस पर्दे के पीछे है शोअ'ला अंधा परवाना क्या जाने
ये ज़ोरा-ज़ोरी इश्क़ की थी फ़ितरत ही जिस ने बदल डाली
जलता हुआ दिल हो कर पानी आँसू बन जाना क्या जाने
सज्दों से पड़ा पत्थर में गढ़ा लेकिन न मिटा माथे का लिखा
करने को ग़रीब ने क्या न किया तक़दीर बनाना क्या जाने
आँखों की अंधी ख़ुद-ग़र्ज़ी काहे को समझने देगी कभी
जो नींद उड़ा दे रातों की वो ख़्वाब में आना क्या जाने
पत्थर की लकीर है नक़्श-ए-वफ़ा आईना न जानो तलवों का
लहराया करे रंगीं-शोला दिल पलटे खाना क्या जाने
जिस नाले से दुनिया बेकल है वो जलते दिल की मशअल है
जो पहला लूका ख़ुद न सहे वो आग लगाना क्या जाने
हम 'आरज़ू' आए बैठे हैं और वो शरमाए बैठे हैं
मुश्ताक़-नज़र गुस्ताख़ नहीं पर्दा सरकाना क्या जाने

गोरे गोरे चाँद से मुँह पर काली काली आँखें हैं : आरज़ू लखनवी

गोरे गोरे चाँद से मुँह पर काली काली आँखें हैं
देख के जिन को नींद आ जाए वो मतवाली आँखें हैं
मुँह से पल्ला क्या सरकाना इस बादल में बिजली है
सूझती है ऐसी ही नहीं जो फूटने वाली आँखें हैं
चाह ने अंधा कर रक्खा है और नहीं तो देखने में
आँखें आँखें सब हैं बराबर कौन निराली आँखें हैं
बे जिस के अंधेर है सब कुछ ऐसी बात है उस में क्या
जी का है ये बावला-पन या भोली-भाली आँखें हैं
'आरज़ू' अब भी खोटे खरे को कर के अलग ही रख देंगी
उन की परख का क्या कहना है जो टेकसाली आँखें हैं

आज बे-आप हो गए हम भी : आरज़ू लखनवी

आज बे-आप हो गए हम भी
आप को पा के खो गए हम भी
दाने कम थे दुखों की सिमरन में
थोड़े मोती पिरो गए हम भी
देर से थे वो जिस के घेरे में
उसी झुरमुट में खो गए हम भी
जा कै ढूँडा कहाँ कहाँ न तुम्हें
जब न पाया तो खो गए हम भी
नाम जीने का जागना रख कर
आज बे नींद सो गए हम भी
रोएँगे गर तो जग-हँसाई हो
करते क्या चुप से हो गए हम भी
हाए रे 'आरज़ू' की बे-आसी
आप बे-बस थे रो गए हम भी

तक़दीर पे शाकिर रह कर भी ये कौन कहे तदबीर न कर : आरज़ू लखनवी

तक़दीर पे शाकिर रह कर भी ये कौन कहे तदबीर न कर
वा बाब-ए-इजाबत हो कि न हो ज़ंजीर हिला ताख़ीर न कर
ग़म बढ़ने दे ऐ दिल और ज़रा जाँच आह की बे-तासीर न कर
है ख़्वाब अधूरा आप अभी बे-समझे ग़लत ताबीर न कर
जब ज़ुल्म का बदला ज़ुल्म हुआ मज़लूम का हक़ कुछ भी न रहा
दे दर्द ही में लज़्ज़त यारब नाले को अता तासीर न कर
हो लाख कमान कड़ी क़ातिल कुछ जज़्ब निशाने में भी है
बाज़ू के बल पे नज़र कर के अंदाज़ा-ए-ज़ख़्म-ए-तीर न कर
अब तक जो निगाहें सीधी हैं मुमकिन है कल ये पलट जाएँ
जो करना हो करे ऐसे में किस सोच में है ताख़ीर न कर
पैमान-ए-मोहब्बत ख़त्म हुआ अब ज़िक्र से उस के फ़ाएदा क्या
मुँह बिखरी कड़ियों के न मिला तय्यार नई ज़ंजीर न कर
उल्फ़त के अहद-ए-मोहकम में बूदे काग़ज़ की ज़मानत क्या
ये दिल से दिल की बातें हैं रख याद फ़क़त तहरीर न कर
हर दिल है हयात का सरमाया हर दिल में जोश मोहब्बत का
तू 'आरज़ू' और कहेगा क्या बस रहने भी दे तक़रीर न कर

क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता : आरज़ू लखनवी

क्यूँ किसी रह-रौ से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता
मौज-ए-दरिया ख़ुद लगा लेती है साहिल का पता
है निशान-ए-लैला-ए-मक़्सूद महमिल का पता
दिलरुबा हाथ आ गया पाया जहाँ दिल का पता
राह-ए-उल्फ़त में समझ लो दिल को गूँगा रहनुमा
साथ है और दे नहीं सकता है मंज़िल का पता
कहता है नासेह कि वापस जाओ और मैं सादा-लौह
पूछता हूँ ख़ुद उसी से कू-ए-क़ातिल का पता
राहबर रहज़न न बन जाए कहीं इस सोच में
चुप खड़ा हूँ भूल कर रस्ते में मंज़िल का पता
आई इक आवाज़-ए-तीर और निकली दिल से उफ़
फिर न क़ातिल का निशाँ पाया न बिस्मिल का पता
बाँकी-चितवन वाले महशर में हज़ारों हैं तो हों
मिल ही जाएगा किसी सूरत से क़ातिल का पता
उस जगह बिस्मिल ने दम तोड़ा जहाँ की ख़ाक थी
यूँ लगाते हैं लगाने वाले मंज़िल का पता
पूछने वाले ने ये पूछा कि क्यूँ बे-दिल हो क्यूँ
और मुझ को मिल गया खोए हुए दिल का पता
मौजें टकराई हुईं दुश्मन भी निकलीं दोस्त भी
पीछे कश्ती को ढकेला दे के साहिल का पता
रह गया है टूट कर ज़ख़्म-ए-जिगर में तीर-ए-नाज़
अब लगा लेना नहीं दुश्वार क़ातिल का पता
सोख़्ता परवाने कुश्ता शम्अ फ़र्श-ए-दाग़दार
दे रहे हैं रात की गर्मी-ए-महफ़िल का पता
मैं वफ़ा-केश 'आरज़ू' और वो वफ़ा-ना-आश्ना
पड़ गया मुश्किल में पा कर अपनी मुश्किल का पता

क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं : आरज़ू लखनवी

क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं
मैं दूर हट रहा हूँ वो पास आ रहे हैं
एजाज़-ए-पाक-बाज़ी हैरत में ला रहे हैं
दिल मिल गया है दिल से पहलू जुदा रहे हैं
वो दिल से ग़म भुला कर दिल को लुभा रहे हैं
गुज़रे हुए ज़माने फिर फिर के आ रहे हैं
सीने में ज़ब्त-ए-ग़म से छाला उभर रहा है
शो'ले को बंद कर के पानी बना रहे हैं
ऐ बे-ख़ुदी कहाँ है जल्दी मिरी ख़बर ले
भूले थे जो ब-मुश्किल फिर याद आ रहे हैं
लें काम ज़ब्त से क्या उल्टा है दिल का फोड़ा
उतना उभर रहा है जितना दबा रहे हैं
फ़ुर्क़त में साज़-ए-राहत सामाँ 'अज़ाब का है
ठंडी हवा के झोंके क्या जी जला रहे हैं
हैं हुस्न के करिश्मे क्या इंक़लाब-आगीं
ग़म-ख़्वार जो थे कल तक अब ख़ार खा रहे हैं
ख़ुद इन की जुस्तुजू में हम दूर भागे वर्ना
वो कब अलग रहे हैं वो कब जुदा रहे हैं
ले ले के ठंडी साँसें पूछो न हाल देखो
तुम भेद खोलते हो और हम छुपा रहे हैं
देख 'आरज़ू' ये रोना शाना हिला हिला कर
तू आज ख़्वाब में है और वो जगा रहे हैं

वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था : आरज़ू लखनवी

वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था
कल बदल जाएगी दुनिया मुझे मालूम न था
हुस्न है मश्ग़ला-ए-ज़ुल्म को गहरा पर्दा
पस-ए-पर्दा है अंधेरा मुझे मालूम न था
इश्क़ वो शय है कि चरके भी मज़ा देते हैं
वर्ना क़ातिल हैं हसीं क्या मुझे मालूम न था
दिल की ज़िद इस लिए रख ली थी कि आ जाए क़रार
कल ये कुछ और कहेगा मुझे मालूम न था
झूटी उम्मीदों ने क्या क्या न हरे बाग़ लगाए
वक़्त झोंका है हवा का मुझे मालूम न था
जितने क़िस्मत के सहारे थे वो झूटे निकले
है बंधी मुट्ठियों में क्या मुझे मालूम न था
बरसों भटका किया और फिर भी न उन तक पहुँचा
घर तो मालूम था रस्ता मुझे मालूम न था
राज़-ए-ग़म फ़ाश न हो इस लिए रोकी थी ज़बाँ
चुप भी रह कर यही होगा मुझे मालूम न था
दिल मज़े लेता है जिस ग़म के वो है काहिश-ए-जाँ
ज़हर भी होता है मीठा मुझे मालूम न था
इश्क़-आबाद के नाके ही से रुख़्सत हुए होश
है ये दीवानों की दुनिया मुझे मालूम न था
होगा इमरोज़ की सूरत में ज़ुहूर-ए-फ़र्दा
वअ'दा यूँ रोज़ टलेगा मुझे मालूम न था
आरज़ू हाँ भी हसीनों की नहीं होती है
इन की हर बात है धोका मुझे मालूम न था

दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया : आरज़ू लखनवी

दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया
आसान काम आप ने मुश्किल बना दिया
हर साँस एक शो'ला है हर शो'ला एक बर्क़
क्या तू ने मुझ को ऐ तपिश-ए-दिल बना दिया
इस हुस्न-ए-ज़न पे हम-सफ़रों के हूँ पा-ब-गिल
मुझ बे-ख़बर को रहबर-ए-मंज़िल बना दिया
अंधा है शौक़ फिर नज़र इम्कान पर हो क्यूँ
काम अपना दिल ने आप ही मुश्किल बना दिया
दौड़ा लहू रगों में बंधी ज़िंदगी की आस
ये भी बुरा नहीं है जो बिस्मिल बना दिया
ग़र्क़ ओ उबूर दोनों का हासिल है ख़त्म-ए-कार
मजबूरियों ने मौज को साहिल बना दिया
उस शान-ए-आजिज़ी के फ़िदा जिस ने 'आरज़ू'
हर नाज़ हर ग़ुरूर के क़ाबिल बना दिया

नाले मजबूरों के ख़ाली नहीं जाने वाले : आरज़ू लखनवी

नाले मजबूरों के ख़ाली नहीं जाने वाले
हैं ये सोता हुआ इंसाफ़ जगाने वाले
हद से टकराती है जो शय वो पलटती है ज़रूर
ख़ुद भी रोएँगे ग़रीबों को रुलाने वाले
चुप है परवाना तो क्या शम्अ' को ख़ुद है इक़रार
आप ही जलते हैं औरों को जलाने वाले
'आरज़ू' ज़िक्र ज़बानों पे है इबरत के लिए
मिटने वाले हैं न बाक़ी हैं मिटाने वाले

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की : आरज़ू लखनवी

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की
शम्अ' लौ दे के ज़बाँ बन गई परवाने की
शान बस्ती से नहीं कम मिरे वीराने की
रूह हर बोंडले में है किसी दीवाने की
आमद-ए-मौसम-ए-गुल की है ख़बर दौर-ए-दिगर
ताज़गी चाहिए कुछ साख़्त में पैमाने की
आई है काट के मीआ'द-ए-असीरी की बहार
हतकड़ी खुल के गिरी जाती है दीवाने की
सर्द ऐ शम्अ' न हो गर्मी-ए-बाज़ार-ए-जमाल
फूँक दे रूह नई लाश में परवाने की
उठ खड़ा हो तो बगूला है जो बैठे तो ग़ुबार
ख़ाक हो कर भी वही शान है दीवाने की
'आरज़ू' ख़त्म हक़ीक़त पे हुआ दौर-ए-मजाज़
डाली काबे की बिना आड़ से बुत-ख़ाने की

पानी में आग ध्यान से तेरे भड़क गई : आरज़ू लखनवी

पानी में आग ध्यान से तेरे भड़क गई
आँसू में कौंदती हुई बिजली झलक गई
कब तक ये झूटी आस कि अब आए वो अब आए
पलकें झुकीं पपोटे तने आँख थक गई
खिलना कहीं छुपा भी है चाहत के फूल का
ली घर में साँस और गली तक महक गई
आँसू रुके थे आँख में धड़कन का हो बुरा
ऐसी तकान दी की प्याली छलक गई
मेरी सनक भी बढ़ती है उन की हँसी के साथ
चटकी कली कि पाँव की बेड़ी खड़क गई

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं : आरज़ू लखनवी

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं
अब अहद-ए-वफ़ा टूटा कि रहा तुम और कहीं हम और कहीं
बे-आप ख़ुशी से एक इधर कुछ खोया हुआ सा एक उधर
ज़ाहिर में बहम बातिन में जुदा तुम और कहीं हम और कहीं
आए तो ख़ुशामद से आए बैठे तो मुरव्वत से बैठे
मिलना ही ये क्या जब दिल न मिला तुम और कहीं हम और कहीं
वअ'दा भी किया तो की न वफ़ा आता है तुम्हें चर्कों में मज़ा
छोड़ो भी ये ज़िद लुत्फ़ इस में है क्या तुम और कहीं हम और कहीं
बरगश्ता-नसीब का यूँ होना सोना भी तो इक करवट सोना
कब तक ये जुदाई का रोना तुम और कहीं हम और कहीं
दिल मिलने पे भी पहलू न मिला दुश्मन तो बग़ल ही में है छुपा
क़ातिल है मोहब्बत की ये हया तुम और कहीं हम और कहीं
यकसूई-ए-दिल मर्ग़ूब हमें बर्बादी-ए-दिल मतलूब तुम्हें
इस ज़िद का है और अंजाम ही क्या तुम और कहीं हम और कहीं
दिल से है अगर क़ाएम रिश्ता तो दूर-ओ-क़रीब की बहस ही क्या
है ये भी निगाहों का धोका तुम और कहीं हम और कहीं
सुन रक्खो क़ब्ल-ए-अहद-ए-वफ़ा क़ौल आरज़ू-ए-शैदाई का
जन्नत भी है दोज़ख़ गर ये हुआ तुम और कहीं हम और कहीं

नज़र उस चश्म पे है जाम लिए बैठा हूँ : आरज़ू लखनवी

नज़र उस चश्म पे है जाम लिए बैठा हूँ
है न पीने का ये मतलब कि पिए बैठा हूँ
रख़ना-अंदाज़ी-ए-अंदोह से ग़ाफ़िल नहीं मैं
है जिगर चाक तो क्या होंट सिए बैठा हूँ
क्या करूँ दिल को जो लेने नहीं देता है क़रार
जो मुक़द्दर ने दिया है वो लिए बैठा हूँ
इल्तिफ़ात ऐ निगह-ए-होश-रुबा अब क्यूँ है
पास जो कुछ था वो पहले से दिए बैठा हूँ
दिल-ए-पुर-कैफ़ सलामत कि अकेले में भी
एक बोतल से बग़ल गर्म किए बैठा हूँ
'आरज़ू' जलते हुए दिल के शरारे हैं ये अश्क
आग पानी के कटोरों में लिए बैठा हूँ

मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ : आरज़ू लखनवी

मिरी निगाह कहाँ दीद-ए-हुस्न-ए-यार कहाँ
हो ए'तिबार तो फिर ताब-ए-इंतिज़ार कहाँ
दिलों में फ़र्क़ हुआ जब तो चाह प्यार कहाँ
चमन चमन ही नहीं आएगी बहार कहाँ
जिसे ये कह के वो हँस दें कि क़िस्सा अच्छा है
वो राज़ खुल के भी होता है आश्कार कहाँ
उमंग थी ये जवानी की या कोई आँधी
मिला के ख़ाक में हम को गई बहार कहाँ
उमीद-वार बनाने से मुद्दआ क्या था
जब आस तुम ने दिला दी तो अब क़रार कहाँ
मिली है इस लिए दो-चार दिन की आज़ादी
कि सर्फ़ करता है देखें ये इख़्तियार कहाँ
ये शौक़ ले के चला है चमन से शक्ल-ए-नसीम
कि देखें मिलती है जाती हुई बहार कहाँ
है एक शर्त वफ़ा की वो क़ैद-ए-बे-ज़ंजीर
सब इख़्तियार हैं और कुछ भी इख़्तियार कहाँ
मिटे निशाँ पे नज़र कर के रो जिसे चाहे
तिरे सितम की है तुर्बत मिरा मज़ार कहाँ
तुम ऐसा अहद-शिकन 'आरज़ू' सा ना-उम्मीद
कहो जो सच भी तो आता है ए'तिबार कहाँ

करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से : आरज़ू लखनवी

करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से
मुझे सू-ए-ज़न नहीं है कि दुआ करूँ ख़ुदा से
दिल-ए-मुतमइन की वुसअ'त कोई कम है मा-सिवा से
मुझे काहे की कमी है जो तलब करूँ ख़ुदा से
हुई ख़त्म ग़म की आँधी वही दिल की लौ है अब भी
यही शो'ला था वो शो'ला कि लड़ा किया हवा से
कहे कौन उसे पतिंगा जो है शो'ले पर धुआँ सा
तुझे ले उड़े हैं कितना तिरे पर ज़रा ज़रा से
जो है सब का देने वाला मैं उसी को चाहता हूँ
मिरी भीक वो नहीं है कि मिले किसी गदा से
ये है क़स्र-ए-ज़िंदगानी कि हबाब-ए-बहर-ए-फ़ानी
अभी बन गया हवा से अभी मिट गया हवा से
ये ख़याल ख़ुद है ऐसा जो ख़ुशी बना दे ग़म को
कि है इब्तिदा ख़ुशी की मिरे ग़म की इंतिहा से
मिरा दिल रज़ा पे राज़ी करम उस का जोश पर है
जो अब आ गई ज़बाँ तक तो असर गया दुआ से
मिरी लाख मिन्नतों पर तिरी इक हया है भारी
कोई पर्दा है वो पर्दा कि हिले-डुले हवा से
तिरे पाक-बाज़-ए-उल्फ़त नहीं हारने के हिम्मत
जो मरेंगे डूब कर भी तो मरेंगे रह के प्यासे
किसी दिल की आस यूँ भी कभी 'आरज़ू' न टूटे
ये कहे बनी है दम पर वो कहे मिरी बला से

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना : आरज़ू लखनवी

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना
किस दर्जा दुखे दिल का रंगीन है अफ़्साना
जो कुछ था न कहने का सब कह गया दीवाना
समझो तो मुकम्मल है अब 'इश्क़ का अफ़्साना
दो ज़िंदगियों का है छोटा सा ये अफ़्साना
लहराया जहाँ शो'ला अंधा हुआ परवाना
इन रस भरी आँखों से मस्ती जो टपकती है
होती है नज़र साक़ी दिल बनता है पैमाना
वीराने में दीवाना घर छोड़ के आया था
जब होगा न दीवाना घर ढूँढेगा वीराना
अफ़्साना ग़म-ए-दिल का सुनने के नहीं क़ाबिल
कह देते हैं सब हँस कर दीवाना है दीवाना
जब 'इश्क़ के मारों का पुरसाँ ही नहीं कोई
फिर दोनों बराबर हैं बस्ती हो कि वीराना
ये आग मोहब्बत की पानी से नहीं बुझती
फिर शम' से जा लिपटा जलता हुआ परवाना

किस मस्त अदा से आँख लड़ी मतवाला बना लहरा के गिरा : आरज़ू लखनवी

किस मस्त अदा से आँख लड़ी मतवाला बना लहरा के गिरा
आगे तो हैं राहें और कठिन दिल पहले ही ठोकर खा के गिरा
आगे जो बढ़ा थर्राए क़दम वो हँस जो दिए शर्मा के गिरा
बेहोश नहीं होश्यार था मैं उठने का सहारा पा के गिरा
दिल शौक़ के जोश में दौड़ चला और जोश तो होता है अंधा
दर बंद पड़ा था क़िस्मत का टक्कर जो लगी त्योरा के गिरा
जितनी भी दिल की ज़रूरत थी बस उतनी ही हिम्मत-ओ-ताक़त थी
रस्ते की खखेड़ें झेल गया पास आते ही मैं चकरा के गिरा
क्या इश्क़ की मंज़िल भी है कड़ी बंध बंध कर हिम्मत टूट गई
जो एक क़दम चल कर सँभला वो दो क़दम आगे जा के गिरा
सुलगी हुई है ग़म की भट्टी दिल क्यूँ न पिघल के बने पानी
जो क़तरा आँसू हो के बहा लहरा के चला त्योरा के गिरा
वो नाला फ़लक से टकराया वो 'आरज़ू' इक तारा टूटा
दुश्मन की तरफ़ जो लपका था शोला वो मुझी पर आ के गिरा

दूर थे होश-ओ-हवास अपने से भी बेगाना था : आरज़ू लखनवी

दूर थे होश-ओ-हवास अपने से भी बेगाना था
उन को बज़्म-ए-नाज़ थी और मुझ को ख़ल्वत-ख़ाना था
खींच लाया था ये किस आलम से किस आलम में होश
अपना हाल अपने लिए जैसे कोई अफ़्साना था
छोटे छोटे दो वरक़ जल जल के दफ़्तर बन गए
दर्स-ए-हसरत दे रहा था जो पर-ए-परवाना था
जान कर वारफ़्ता उन के छेड़ने की देर थी
फिर तो दिल इक होश में आया हुआ दीवाना था
ज़ौ-फ़िशाँ होने लगा जब दिल में हुस्न-ए-ख़ुद-नुमा
फिर तो काबा 'आरज़ू' काबा न था बुत-ख़ाना था

जहाँ कि है जुर्म एक निगाह करना : आरज़ू लखनवी

जहाँ कि है जुर्म एक निगाह करना
वहीं है गुनह पे डट के गुनाह करना
बुतों से बढ़ा के मेल निबाह करना
जहाँ के सफ़ेद को हे सियाह करना
सिखाया है मुझ को इस मिरी बे-कसी ने
उसी को सितम का उस के गवाह करना
लुभाने से दिल के था तो ये मुद्दआ था
ग़रीब की ज़िंदगी को तबाह करना
यही तो है हाँ यही वो अदा-ए-मासूम
अलग हुई जो सिखा के गुनाह करना
जफ़ा से भी लें मज़ा न वफ़ा का क्यूँकर
हमें तो हर इक तरह है निबाह करना
ये कहता है चश्म-ए-होश-रुबा का जादू
तुझे तिरे हाथ से है तबाह करना
तिरी नज़र से सीखा है आह-ए-दिल ने
जिगर में शिगाफ़ डाल के राह करना
नज़र में नज़र गड़ाए है यूँ वो ज़ालिम
कि 'आरज़ू' अब कठिन है इक आह करना

ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से : आरज़ू लखनवी

ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से
आँसू टपक रहे हैं लफ़्ज़ें मिलें कहाँ से
है रब्त दो दिलों को बे-रब्ती-ए-बयाँ से
कुछ वो कहें नज़र से कुछ हम कहें ज़बाँ से
ये रोते रोते हँसना तरतीब-ए-ज़िक्र-ए-ग़म है
आया हूँ इब्तिदा पर छेड़ा था दरमियाँ से
हासिल तो ज़िंदगी का थी ज़िंदगी यहीं की
अब मैं हूँ इक जनाज़ा उठवा दो आस्ताँ से
इस तूल-ए-ख़ामुशी का ज़ोर-ए-बयाँ भी देखा
थी बात मेरे दिल की निकली तिरी ज़बाँ से
जब हुस्न ख़ुद-नुमा है और इश्क़ रख़्ना-अफ़्गन
इस कश्मकश में पर्दा निकलेगा दरमियाँ से
मैदान-ए-इम्तिहान में ऐ बे-ग़रज़ मोहब्बत
दिल की ज़मीन तू ने टकरा दी आसमाँ से
उस राज़दार-ए-ग़म की हालत न पूछ जिस को
कहना तो है बहुत कुछ महरूम है ज़बाँ से
ऐ जज़्ब-ए-शौक़-ए-मंज़िल मम्नून-ए-ग़ैर क्यूँ हों
ख़ुद रास्ता बदल कर बिछड़ा हूँ कारवाँ से
हर गाम पर ठिठकना हर बार मुड़ के तकना
ओ मुस्कुराने वाले क्या ले चला यहाँ से
ज़ाहिर फ़रेब-ए-वअ'दा फिर ए'तिबार इतना
वो लिख गया दिलों पर जो कह दिया ज़बाँ से
आँखों से बाग़बाँ की शोले निकले रहे हैं
तिनके दबाए मुँह में निकला हूँ आशियाँ से
दिल का सकूँ गँवा कर हों आरज़ू पशेमाँ
कुछ ले के रख न छोड़ा क्यूँ जिंस-ए-राएगाँ से

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