बांकीदास आशिया की रचनाएँ : Bankidas Ji Ashiya Geet Dohe Kavya Khand
बांकीदास आशिया (1771–1833) मारवाड़ के प्रसिद्ध चारण कवि और साहित्यकार थे। वे डिंगल काव्य परंपरा के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक जीवन, वीरता और राजपूत संस्कृति का प्रभाव दिखाई देता है। उनकी काव्य-भाषा में ओज, व्यंग्य और ऐतिहासिक दृष्टि का विशेष महत्व है। मारवाड़ के साहित्यिक इतिहास में बांकीदास आशिया का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
बांकीदास आशिया रा गीत : Kaviraja Bankidas Ashiya Ra Geet
आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर
आयो इंगरेज मुलक रै ऊपर,आहंस लीधा खैंचि उरा।
धणियां मरे न दीधी धरती,
धणियां ऊभां गई धरा॥
फोजां देख न कीधी फोजां,
दोयण किया न खळा-डळा।
खवां-खांच चूड़ै खावंद रै,
उण हिज चूड़ै गई यळा॥
छत्रपतियां लागी नँह छाणत,
गढपतियां धर परी गुमीं।
बळ नँह कियो बापड़ा बोतां,
जोतां-जोतां गई जमीं॥
दुय चत्र मास वादियो दिखणी,
भोम गई सो लिखत भवेस।
पूगो नहीं चाकरी पकड़ी,
दीधो नहीं मड़ैणो देस॥
वजियौ भलो भरतपुर वाळो,
गाजै गजर धजर नभ गोम।
पहिलां सिर साहब रो पड़ियो,
भड़ ऊभां नँह दीधी भोम॥
महि जातां चींचातां महिलां,
ऐ दुय मरण तणा अवसांण।
राखो रै किहिंक रजपूती,
मरद हिन्दू की मुस्सळमाण॥
पुर जोधाण उदैपुर जैपुर,
पहु थारा खूटा परियाण।
आंकै गई, आवसी आंकै,
बांकै आसल किया बखाण॥
करणी माताजी जी रौ गीत
ऊंडा पाणियां नदियां उतरतांझड़ मंडियां खग-झाटां।
सगती! कीजै सहाय सेवगां,
बहतां घाटां-बाटां॥
मेवासां मांझल ठग मळियां,
नाहर आयां नेड़ां।
कुसल आपरां राखै,
‘करनी’ बैठां सायर बेड़ां॥
बैरी विषधर सरब निवारै,
बळती लाय बुझावै।
लोवड़ियाळ तणां भुज लांबा,
आंच न दासां आवै॥
डाकण भूत कुवै पग डगतां,
कड़की बीज अकासां।
करतां याद मेहासुत “करनी”
देव! उबेळो दासां॥
बड़ांबड़ी किनियाणी “बांका”
पोष पूजगां पाळे।
देस विदेस मँहीं डाढ़ाळी,
राजदवार रूखाळै॥
बांकीदास आशिया के काव्य खंड : Bankidas Ashiya Ke Kavya Khand
बांकीदास आशिया के दोहे : Bankidas Ashiya Ke Dohe
- अत सीतळ उतराद सूं
- बांको खिण नह वीसरै
- भीतर धर दढ़भाव
- भुरजाल भूषण
- चाव घणौ कर चेत
- छटा अलौकिक छाय
- देखै भव दरियाव
- धवळा तो जळधार
- दूध वरणना पाणियां
- गंगा जिण थानक गई
- हंस, मीन, कूरम हूवौ
- जग मांझळ थारो जितै
- ज्यां हंदा क्रत जोय
- ज्यां थारै तट जाय
- मंदायण तो माग
- नदी साह हंसा संग नित
- नार मिलै तो नीर में
- नारायण पग नीर
- नीति-मंजरी
- पाप जिता तूं पलक में
- पतित नहाय छो पीत पत
- प्राणी तुझवौ पुखत
- श्रीपत चरण सरोज रौ
- वहता रहै विमांण
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