बुद्धसिंह हाड़ा री रचनावां : Budhsingh Hada Savaiyya Chhand Kavitt
बुद्धसिंह हाड़ा (1695–1739) हाड़ा वंश के शासक और बूंदी राज्य के नरेश थे। वे हाड़ौती क्षेत्र के प्रमुख शासकों में गिने जाते हैं। उनका शासनकाल बूंदी के इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। राजस्थान के इतिहास में बुद्धसिंह हाड़ा का उल्लेख बूंदी के हाड़ा शासक के रूप में मिलता है।
बुद्धसिंह हाड़ा के कवित्त : Kavitt Buddha Singh Hada
अैसी यह रीतिसौ लुभानै
अैसी यहं रीतिसौं लुभांनै बलि बारंबार,कहीहू न जात सुनी बात न जे चलियां।
रावरै तौ रीझि इन बातनकी परी आय,
चंद चाहि चंदमुखि मिलियां न गलियां।
भीजी अनुराग उन अंगनकैं राग अंग,
अंग प्रति राग जाकैं रंगरीझ छलियां।
चन्द्रिकान चलियां चकोरूंकी अवलियां वे,
चौकीदार भई हैं चंबेलिनकी कलियां॥
भोर पति संग ते ससंक अंक ‘जोर आली’
भोर पति संग ते ससंक अंक ‘जोर आली’,बैठी सखियन साथ छबि साथ टूटी हैं।
छूटैं कल अलकैं बिछूटै नैंन स्यामताई,
ओठ ‘रदन-छंद’ सौ ‘सबै जात लूटी हैं’,
ता छबि निहारि आंखै ‘हसी अनहसी हसी’,
हसिबे कौं भई ताकी उपमां यौ जूटी हैं।
रबि के उदैतैं मांनौं सब वे सरोजनी सी,
खुली अधखुली एंकै खुलैं एकै खूटी हैं॥
चन्द्रकों चकोर ज्यौं
चन्द्रकों चकोर ज्यौं दिवाकरकों चक्रवाक,जैसे मघवांनकों कलापी वरजोरी हैं।
जोगी जोग-ध्यानकों जुराफा ज्यों जुरानकों,
महोदधिके थानकों मराल मति मोरी है।
ए री बलि चंदमुखी तेरे मुखचंद पर,
वृंदांवनचंदकी लगनि यों निहोरी है।
चाय वरजोरी यन चातकन लोचननि,
चातकतें चोरी कैंधो चातकन चोरी है॥
चन्द्र कों चकोर ज्यौं दिवाकर कों चक्रवाक
चन्द्रकों चकोर ज्यौं दिवाकरकों चक्रवाक,जैसे मघवान कों कलापी वरजोरी हैं।
जोगी जोग-ध्यान कों जुराफा ज्यों जुरान कों,
महोदधि के थान कों मराल मति मोरी है।
ए री बलि चंदमुखी तेरे मुखचंद पर,
वृंदांवनचंद की लगनि यों निहोरी है।
चाय वरजोरी यन चातकन लोचननि,
चातक तें चोरी कैंधो चातकन चोरी है॥
एक समैं हरि राधिका सौं
एक समैं हरि राधिकासौं, समैं प्रात लसैं छबिता सरसी है।एक सखी तहां सौतिकी आय, गुपांलसौं बोलकैं रोस गसी है।
अैसे प्रसंगनिकौं लखिकैं, मिलि सारी सकोचकौं देखी लसी है।
एक सखी लखि रीझि हसी, एक आखैं हसी एक बोल हसी है॥
एक वोर मगा गगो
एक वोर मंगा गंगा सोहै एक वोर आधैं,छूटि रहे केस आधैं छूटी जटा भेसकौं।
आधैं दुपटा है लंक सोहत बघंबर सौं,
सोहैं ससि भाल नव बेस केल बेसकौं॥
आखिन तरंग भंग भ्रिकुटी अनंग बर,
दैंन कौं उमंग राजैं भसम उजेसकौं।
भूषन फनेस सुर सेवत सुरेस बेस,
मेरी वोर की हमेस आदेस भूतेसकौं॥
जा दिनतै लगे नैंन तिहारे
जा दिनतै लगे नैंन तिहारे, सो ता दिन तैं वे बिके तन त्यौं हैं।काहू कौं ‘लाच दै काहू कौं सांच दै, काहू कौं आंच दै जाच दै ज्यौं हैं।
अंबु ज्यौं ओछै परी सफरी, नफरी भये त्यौं अकुलात से यौं हैं।
आजु कछू फिरि काल्हि कछू परसौतै कछू तरसौतै कछू हैं॥
प्रीतिके उपायनसौं
प्रीतिके उपायनसौं भांति भांति भायनसौं,सहज सुभायनके भाय़नकौं लै रहे।
निपट प्रगट उघटत न घटत नट,
सु लटैं सुघट उछटनि छबि छै रहे॥
बृंदाबनचंदके दरस पर बारबार,
जीतिबेके जंत्रनसे जतन जितै रहे।
खंजन पंटतर न लागत निरंतर,
सो नैंना पट-अंतर धनंतरसे ह्वै रहे॥
प्रीति के उपायन सौं भांति-भांति भायन सौं
प्रीति के उपायन सौं भांति भांति भायन सौं,सहज सुभायन के भायन कौं लै रहे।
निपट प्रगट उघटत न घटत नट,
सु लटै सुघट उछटनि छबि छै रहे।
बृंदाबनचंद के दरस पर बार-बार,
जीतिबे के जंत्रन से जतन जितै रहे।
खंजन पटंतर न लागत निरंतर,
सो नैनां पट-अंतर धनंतर से व्है रहे॥
सरद के चन्द्रमा सौ राजत बदन-चंद
सरद के चन्द्रमा सौ राजत बदन-चंद,छूटे केस-पास भारे लंक बिसतारे है।
कंचन के कुंभ जैसे उंनत उरोज अति,
भारे-भारे अंग गहि भायकै उतारे है।
चितवनि हसनि चलनि चातुरी सौं चारु,
अैसी उपमांनि निरधार न बिचारे है।
मांन मद परवे गुमांन गति परवे सो,
तेरी गति गरवे गयंद लखि हारे हैं॥
बुद्धसिंह हाड़ा के सवैया छंद : Savaiyya Buddha Singh Hada
आज लसै ब्रजनारी सबै
आज लसैं ब्रजनारी सबै, जमना तटपैं जुरि आई अलेखैं।ता समैं आप कढे नंदनंदन, सोहैं चढे उपमांन बिसेखैं॥
रीझि रही अपनैं अपनैं मन, देखि सबै प्रगटें य्यों असेखैं।
कोरि चकोरनकी चित चाह, रही जैसे चौदहैं चंदके देखैं॥
आजु कछूं बलि राधिकासौं
आजु कछूं बलि राधिकासौं, हरि सोहत रूठिकै बैठे अपूठैं।आय घिरी चहुं औरनतैं, यौं मनावन लागी सखीन अहूठैं॥
ता छबिकौं लखिकैं इहि भायसौं, दौरी यों उप्पमता न अनूठैं।
चंदमुखी चहुं औरनतैं, मनु चंदकौ चंद मनावत रूठैं॥
आजु कहौं फिरि काल्हि कहौं
आजु कहौं फिरि काल्हि कहौं, परसौंकौं, कहौं बिन बातन जीहैं।केते खिजैं बरजैं लरजैं, तरजैं न तऊ अरजैं समही हैं।
लाज न लेस कुलाज कलेस न, अैसी हमेस न रीति नई हैं।
प्रीति सरीति कितेकनसौं, पे लियें फिरैं चाहि चकोरनकी हैं॥
आजु मैं देखी है गोपसुता मुख
आजु मैं देखी है गोपसुता मुख, देखै तै चन्द्रमा फीकौ व्है जोतो।गोर गुलाब की आबहू तैं, गहराई गुराई कैं संग समोतो।
सिंधुसुता सम ताकैं समांन, सो वा बलिकौ रंग ओर अन्होतो।
होती जो कुंदन कै अंग बास जौ, जौ कहुं केतकी कांटौ न होतो॥
अंजन मंजन कैं दृग-रंजन
अंजन मंजन कैं दृग-रंजन, खंजन चंचलताई चुराई।मांग बनी सजनी सिरि ज्यौं गिरि, बिंध पै गंग की धार धसाई॥
टीका जराय कौं साथ लसै मिलि, भाल पैं बंदन की चतुराई।
बैंनी बनाय गुही बलि आजु मैं, मांनौं भुजंगनि पांख लगाई॥
हौं पठई कबकी मत लैंन
हौं पठई कबकी मत लैंन, सौ तेरैं कहा कितहू मन भायौ।कौंनसी बातन कैसी करै, नहिं जांनत कैसैं कहा समझायौ॥
और सीमेटि सबै चितकी, मिलबौ करिए अति ही अकुलायौ।
तू सुनि री बलि चंदमुखीसों, चलै क्यौं न चंद सिरांहनै आयौ॥
जा दिन तैंभये रावरैं मांन
जा दिन तैंभये रावरैं मांन, सम्हारै न बातनकी गहराई।वा दिनकी उन बातनपैं बलि, कीजिये क्यौं यतनी सतराई॥
वाकै भये मुख रूखैं कछू, ज्यौं सबै सखियानकी उप्पम छाई।
रातिकै आंवन पांतिकी पांति, मनौं जलजातकी जात लजाई॥
केती मजूरी सुधारी कमांन
केती मजूरी सुधारी कमांन, भर्यौ भलका जिहिं बीच सराहैं।हेरि समुद्रसौं लाल मगायकै, लाखनि साथ लई लखि लाहैं॥
ल्याई तिहारे सिंगारकैं काजु, छकी मति रीझि लखैं छबि ताहैं।
मोंलके मैघेसौ मोती मनौं, नथ मोतिय-चंद मिल्यौ मुख चाहैं॥
मंद भयौ पियकौ मुख चंदसौ
मंद भयौ पियकौ मुख चंदसौ, चंद्रिका हौंन चली सरनैं है।सौंतिनके खुले नैंन-सरोज, हितू चित जैसैं मुद्रा बरनैं हैं॥
मोतिनहार नखित्रन-जोति, यौं मानसमैं उपमां झरनैं हैं।
जेठ समैं मांनौं तापसौं तूटिकैं, छूटि परी रबिकी किरनैं हैं॥
प्रातहुतै मुख पांन दये नहि
प्रातहुतै मुख पांन दये नहि, रैंनि जगी अंखिया अनुरागी।याहीतै मैं पठई सबही मिलि, बोलन साथ बडी बडभागी॥
चालौ मिलौ उठिकैं हितसौं, उनकी अैसैं चाहि रही उरझागी।
चक्रत चाहि चहूंदिसितैं, अवसेरि ज्यौं चंद-चकोरन लागी॥
राधेसौं आजु कछु नंदनंदन
राधेसौं आजु कछु नंदनंदन, भारी हियें मन मांन भर्यौ है।सारी सखीन मनांवनकौं, मिलिबेकौं तऊ मनहूं न कर्यौ है॥
ता छबिकौं लखिकैं छकिकैं, मन मेरौ यौं उपम्मताई तर्यौ है।
सांझ समैं अरबिंदनपैं ससि, सोलै कलानि लयें उघर्यौ है॥
राधिके रोसमैं आजु लखी
राधिके रोसमैं आजु लखी, गरैं मोतिनकी मिलि माल बिछूटीं।बातैं बकैं सक सैंन थकै, अैसैं नाखैं कितेकसी घातैं अफूटीं॥
गोरी मनांवनकौं सब दौरीसी, जे उपमां मंन मेरेमैं जूटीं।
लै छबि यौं अध-अंबरतैं, चपला मनु चंद मनांवन टूटीं॥
रैनि समैं सलिता मधि मैं
रैनि समैं सलिता मधि मैं, नंदनंदन राधे लसैं यौ तिरे हैं।सोहैं कमोदनि सी सखियां, परसैं अति आंनद-रंगभरे हैं।
यौं दुहु-वोरन की छबिता सौं, समाज सौं आखिन बीचि धरे हैं।
ज्यौं ससि साथ नछित्रन कै, प्रतिबिंब त्यौं छूटि दुहूं उघरे हैं॥
रातिके जागतही बृजचंद
रातिके जागतही बृजचंद, निहारत आरसी ज्यौं सरसी है।पीछैसौं आय मनांवनकौं, सुखसौं प्रतिबिंब दै कैं परसी है॥
आपनैं कंठकौ हार हियें पर, डारत उप्पमता दरसी है।
फेरि फिरैं मुखचंदकी ओर, मनौं करि कांम-कमान कसी है॥
रावरी बातैं सुभायकैं भायसौं
रावरी बातैं सुभायकैं भायसौं, चाहिकै भाय कहूं जी चढैंगी।ता पर आवन यौं तमको, मग फैलिकैं चांदनी कुंज मढैंगी॥
मोही महा डर है धौं बडौ, पढै मंत्रन जंत्र अनेक बढैंगी।
राधिकाकी वे बड़ी-बड़ी-आंखैं, गडी तो गडी न वे काढी कढैंगी॥
स्यांम-सरीर लसै पट पीत
स्यांम-सरीर लसै पट पीत, मनौं घन-दामनि रूप भयौ है।बीरा बन्यौं मुख सांथ मनौहर, यौं उमह्यो अनुराग नयौ है॥
मोर की चंद्रिका मोहै महा मन, अंग-प्रकासन तै उगयौ है।
चंद से आंनन पैं दिये खौरि, सुचंदन की चित चोरि लयौ है॥
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