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मेघराज मुकुल की रचनाएँ कविताएँ गीत : Meghraj Mukul Poems

मेघराज मुकुल (1923–1996) बीकानेर के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। उन्होंने राजस्थानी भाषा और साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रचनाओं में राजस्थान की लोक-संस्कृति, इतिहास, वीरता और जनजीवन के विविध स्वर दिखाई देते हैं। उनकी काव्य-भाषा में ओज, लोकभावना और सामाजिक चेतना का प्रभाव मिलता है।

Meghraj mukul
Meghraj Mukul


मेघराज मुकुल की कविताएँ : Meghraj Mukul Kavita

सैनाणी

सैनाण पड़्यो हथळेवै रो, हिंगळू माथै में दमकै ही।

रखड़ी फेरां री आण लियां, गमगमाट करती गमकै ही॥

काँगण-डोरो पोंचै मांही, चुड़लो सुहाग ले सुघड़ाई।

चुँदड़ी रो रंग न छूट्यो हो, था बँध्या रह्या बिछिया थांई॥

अरमाण सुहाग-रात रा ले, छत्राणी महलां में आई।

ठमकै सूं ठुमक-ठुमक छम-छम, चढगी महलां में सरमाई॥

पोढण री अमर लियां आसा, प्यासा नैणां में लियां हेत।

चूंडावत गंठजोड़ो खोल्यो, तन-मन री सुध-बध अमिट मेट।

पण बाज रही थी सहनाई, महलां में गूंज्यो संखनाद।

अधरां पर अधर झुंक्या रहग्या, सरदार भूलग्यो आलिङ्गन॥

रजपूती मुख पीळो पड़ग्यो, बोल्यो- “रण में नीं जाऊँला

राणी! थारी पलकां सहळा, हूं गीत हेत रा गाऊँ ला॥

आ बात उचित है कीं हद तक, ब्या में भी चैन न ले पाऊं?

मेवाड़ भलइं क्यूं हो न दास, हूं रण में लड़न नहीं जाऊं।

बोली छत्राणी, नाथ! आज थे मती पधारो रण मांही।

तलवार बताद्यो, हूं जासूं, थे चुड़ी पैर रैवो घर मांही॥

कह कूद पड़ी झट सेज त्याग, नैणां में अगणी भभक उठी।

चंडी रो रूप बण्यो छिण में, विकराळ भवानी झमक उठी॥

बोली, “आ बात जचै कोनी, पति नै चाहूं मैं मरवाणो।

पति म्हारो कोमळ कूंपळ सो, फूलां सो छिण में मुरझाणो॥

पैल्यां कीं समझ नहीं आई, पागल सो बैठ्यो रह्यो मूरख।

पण बात समझ में जद आई, हो गया नैण इकदम्म सुरख॥

बिजळी सी चाली रग-रग में, कव्वच बांध्यां उतर्‌यो पोड़ी।

हुंङ्कार बम-बम महादेव ठक-ठक-ठक-ठपक” बढी घोड़ी॥

पैल्यां राणी नै हरख हुयो, पण फेर ज्यान सी निकळ गई।

काळजो मुंह कानी आयो, डब-डब आंखड़ियां पथर गई।

उन्मत सी भाजी महलां में, फिर बीच झरोखां टिक्या नैण।

बारै दरवाजै चूँडावत, उच्चार रह्यो थो वीर-बैण॥

आंख्या सूं आंख मिली छिण में, सरदार वीरता बिसराई।

सेवक नै भेज रावळै में, अन्तिम सैनाणी मंगवाई।

सेवक पहुंच्यो अन्तःपुर में, राणी सूं मांगी सैनाणी।

राणी सहमी, फिर गरज उठी, बोली, कहदे, मरगी राणी!!

फिर कह्यो, ठहर, ले सैनाणी, कह झपट खड़ग खींच्यो भारी,

सिर कट्यो हाथ में उछल पड़यो, सेवक भाज्यो ले सैणाणी॥

सरदार ऊछळ्यो घोड़ी पर, बोल्यो, ल्या-ल्या-ल्या सैनाणी।

फिर देख्यो कट्यो सीस हँसतो, बोल्यो, “राणी! मेरी राणी!!

तू सुभ सैनाणी दी राणी! है धन्य-धन्य तू छत्राणी!

हूँ भूल चुक्यो हो रण-पथ नै, तू भलो पाठ दीन्यो राणी!!“

कह एड लगाई घोड़ी कै, रण बीच भयङ्कर हुयो नाद।

केहरी करी गर्जन भारी, अरिगण रै ऊपर पड़ी गाज॥

फिर कट्यो सीस गळ में धार्‌यो, बेणी री दो लट बांट बळी।

उन्मत्त बण्यो पुणि करद धार, असपत्त फौज ने खूब दळी॥

सरदार विजय पाई रण में, सारी जगती बोली, जय हो!!

रणदेवी हाड़ी राणी री, माँ-भारत री जय हो! जय हो!!


आज सांच नै आंच दाझगी

आज सांच नै आंच दाझगी,

मिनखां नै अब खावै धांन।

झूठ म्हैल-माळियां पोढ़ै,

झूंपड़ियां में जगै मसांण॥

इसी घड़ी में अंधकार नै,

मतद्यौ आंख्यां रौ वरदांन॥

जच्चा बच्चा मारण लागी,

दूध सूकग्यौ, आवै खूंन।

कीड़ी छोड़ बारणौ चाली,

घर में कोनी चुगटी चून॥

आज आबरू कूंण रुखाळै,

भूख दिखावै नंगा नाच।

अब फरियाद पड़ी खाडै में,

पड़ै कागला मारै चांच॥

इसी घड़ी में अंधकार नै,

मतद्यो आंख्यां रौ वरदांन॥


चंवरी

मन में आसा री जोत जगी, नैणां में रूप कंवारो हो

हिवड़ै में सुपनो मुळकै हो, सुपनै में प्रीतम प्यारो हो

सुध-बुध खो बैठी रातड़ली, तारां नैं नींद न आवै ही

जद चांद बादळी में रमग्यो, तो प्रीत मगन मन गावै ही।

चंचळ चित धीरज रै पग सूं, मैंदी उतार के चाल पड़्यो

बिछिया बांध्या पैली पिछाण, जद मिलण रात से चाव चढ्यो

हिंगळू में लाज लिपट बैठी, नैणां में काजळ सरमायो

बैणां में घुळग्या मधुर गीत, जद पाबू तोरण पर आयो

केसर घोड़ी रै पग नीचे, बिजळी पळका मारण लागी

जद नैण मिल्या मुळक्या छिण भर, तो लाज घूंघटै में आगी

चंवरी में सजग्या दीप-कळस, हथळेवो सजग्यो बांध प्रीत

जुग-जुग तक बंधग्या बांध प्रीत, कंठां में उतर्‌या मिलण गीत

तन सूं, मन सूं, बचनां सूं, जद दो प्राण अेक होवण लाग्या

अगनी री जोत जगी ऊंची, दो मन मोती पोवण लाग्या

आधै अंग री धीराणी जद, ले लियो प्रथम पावन फेरो

तो मन में बोली परणीता, अब साजन तूं होग्यो मेरो

जद दूजो फेरो लियो नार, आभो धरणी मिलग्या सागै

जद तीजो फेरो लियो नार, तो अमर प्रीत आई आगे

दो पळ में दुनिया बस जाती, दो पळ में जग जाती बाती

दो पळ में बिना लिखी पाती, मन कै चानणै पढी जाती

पण उठ्यो भतूळो अेक साथ, आंधी-सी भभकी चंवरी में

कुण जाणै हो दुखड़ो पड़सी, कूंपळ-सी कंवळी कंवरी में

गरजी घनघोर चारणी मा, भर ल्याई आंसू नैणां में

सुबकी मेली बुसक्यां फाटी, कुरळाई दुख नै बैणां में

धिक्कार और पाबू कायर, क्यूं छतरी कुळ में तूं जायो

क्यूं वचन दिया देवळदे नैं, क्यूं केसर घोड़ी नैं ल्यायो

जे माथे पर है आंख देख, देवळ पर मौत सवार हुई

गउआ खोई, मरजाद गई, धिक्कार, देख मैं हार गई'

'तेरे सिरखा जद पूत जण्या, तो जणणी मन में लाज मरी

तेरै सिरखा कायर कपूत, पैदा कर धरती भार मरी

तू कुळ में काळो दाग हुयो, रजपूती रमणी फेरां में

अब सेजां में छिपकै सोज्या, बाजण दे पायल डेरां में'

पाबू ऊकळ-चूकळ होग्यो, पण पलक मारतां समझ पड़ी

अंगारा-सी दीखण लागी, रतनाळी आंख्यां बड़ी-बड़ी

झटको दे गंठजोड़ो खोल्यो, हथळेवै रो प्रण तोड़ दियो

रो पड़ी जवानी फूट-फूट, जद हाथ हाथ नैं छोड दियो

कइयां बोलै कुळवधू आज, कइयां बोलै अणबसी नार

कइयां बोलै चुड़लो सुहाग, कइयां बोलै अधखिल्यो प्यार

आंसू में भीज्यो घूंघटियो, मैंदी फीकी दीखण लागी

चंवरी में धुंओं घुटण लाग्यो, जद आग काळजै तक आगी

घायल हिरणी-सी तड़फ उठी, अणजाण गऊ-सी डकराई

मन में बोली, 'भोळा बालम! क्यूं लगी प्रीत नैं बिसराई,

यूं कहके ऊंचा हाथ कर्‌या, पाबू रो हिवड़ो भर आयो

चांदणी अंधेरी बण छागी, पण फरज सामणै घिर आयो

सब नैण फाड़ देखण लाग्या, केसर घोड़ी हींसण लागी

जद अेड लगाई रास पकड़, तो सरपट बिजळी-सी भागी

सखियां रा आंचळ भीज गया, हिचकी बंधगी मायड़ रोई

बाबल री बूढी दुखी आंख, दीखण लागी खोई-खोई

जोड़ी बिछड़ी पण मिली नहीं, भावां में भीजी रही रात

परणी रै हिवड़ै हूक उठी, कर्तव्य सुणी पण नहीं बात

दिवलै री बाती घुळ रोई, सिंदूर मांग में मुरझायो

सुख-सेज पड़ी सिसकण लागी, नैणां में समदर घिर आयो

धरती पर प्रीत कंवारी हैं, फेरा भी पड़्या अधूरा है

पर अमर प्रीत रे नैणां में, चंवरी रा सुपना पूरा है।


देस री जवानी

इतिहासां में

एक बात

होवै नीं कदैं पुराणी।

जद हँस-हँस

धरती खातर

बळि देवै, देस-जवानी!

काची

कँवळी

सौरभ भीजी

लाड-प्यार सूं पाळी!

संवणै जीवण रै

फौलादी साँचै में ही ढाळी!

कदै न भूळांला म्हे

इसी जवानी री कुरबांणी!

मरै देस-हित

मिटै न वीं री

जुग-जुग तक सैनाणी!


धरती रो हेलो

सारो देश आज हेलो सुण,

जाग उठ्यो ले अंगड़ाई।

कायर पग माण्डै अब कोनी,

जाणै मौत लार आई।

काळ सिराणै पर बैठ्यो है,

अरे बैरियो भागो रे।

पिलराई पीळी धरती पर,

कद सूं बोलै कागो रे।

अमन और आजादी री,

तकदीर बसै भेळै म्हारै।

करमठोक भींता नै फौड़ै,

लड़ै-भिड़ै पाछळ हारै।

आजादी री कीमत नै तो,

नहीं पिछाणी बैरी रे।

अपणै पगां कुँहाड़ी बाई,

कुबद गळै में पैरी रे।

चोरी-छानी हद में बड़के,

झूठो रौब जमावै रे।

चालै खुद साम्राजी चालां,

म्हानै बुरौ बतावै रे।

धौखै सूं अधिकार जमाके,

अपणी धरा बतावै रे।

देखो लोगो कोटवाळ नै,

उल्टो चोर दबावै रे।

जलम दियो आ धरती म्हानै,

पाळ-पोस के बडा कर्‌या,

इणी धरा पर खेल्या खाया—

सांस-सांस में गीत भर्‌या।

आज धरा री छाती ऊपर,

यो कुण पापी आयो रे।

हिमागिरि खड्यो रगत में भीज्यो,

यो कुण जाळ रचायो रे।

जिको गूमड़ो घणों पंपोळ्यो,

वो ही अब फोड़ा घालै।

अब खाग्यो विस्तार देखल्यो—

दर्द करै, अब दिन घालै।

नस्तर आज लगाणो पड़सी,

अणचाया करणां होसी।

हिंसा री हिंसा जद होसी,

मौत हिचकियां भर रोसी।

धरती माता, हेलो मारै

अब कुण रगत चढ़ावैलो।

माता री मरजाद पुकारै

कुण-कुण शीश कटावैलो।


मेघराज मुकुल के गीत : Meghraj Mukul Geet

भू-दान

रात अँधेरी कट के रहसी!

धन-घरती अब बँट के रहसी!!

भूखी जनता चुप कद रहसी?

जोर जुलम अब घट के रहसी!!

मँहगाई अब मौत बराबर, मरै भूख सूं नाना टाबर,

चोरां रो दिल कदै न हालै, बात कराँ तो कंठो झालै!

ताळा कूंची भीतर काँई, जाणाँ प्राणाँ री परछाँई,

अै दिन भी अब राम दिखावै, मुरदां रा कुण दाम बणावै?

देखो हाथ, हाथ नै खावै,

हाँसे सेठ, मिनख मर जावै!

अब न गरीबी डट के रहसी!

धन-धरती अब बँट के रहसी!!

मजदूराँ पर गोळी चालै, मिल-मालिक छाती नै सालै,

चोर धान पूरो क्यूं तोलै, रखवाळा भी आज न बोलै!

घर में रोटी साग न भाजी, चूसा खावै कल्लाबाजी!!

तिरस्या डाँगर जान गँमावै, पाणी ने भी अै तरसावै!

चुगटी चून मिलै ना चारो,

अब तो मँडग्यो मरणो म्हारो!

आज अँधेरो छँट के रहसी!

धन-धरती अब बँट के रहसी!!

खेत सूखग्या, दाणा बळग्या, भूखाँ रा कागळिया गळग्या।

बादळ आता-आता टळग्या, विपदा में ठाकुरजी छळग्या।

अब तो हाथाँ में जेळी रे, मौत-क्रांति बैठी भेळी रे,

लोग चुणै ना सीधो गैलो, वार पड़ै ना, बळ रो पैलो!

बिना बात कीड़ी क्यूं मारै,

पण मरतो कद तईं बिचारै?

भेद-भाब अब हट के रहसी!

धन-धरती अब बॅंट के रहसी!!

भूख गरीबी अर बीमारी, मिलै ग़रीबां नै क्यूं सारी,

मोटा माणस मौज मनावै, मोटी-मोटी तनखा पावै!

छोटा नै हरदम घुड़कावै, कोठ्याँ में टाटा लगवावै,

पण बाबू जद घर नै आवै, पड़ै तावड़ो पग बळ जावै!

हाय गरीबी ग़जब दिखावै,

हाड-पाँसळा सै दुख पावै!

नींद घणी अब कट के रहसी!

धन-धरती अब बँट के रहसी!!

जुलमी जुलम घणो मत करिये, जनता सूं डरतो ही रहिये!

जनता जद तक भोळी-ढाळी, तू कूदै है डाळी-डाळी।

पण भोळाँ ने समझ पड़ैली, फिर तो थारी नहीं चलैली,

तू कुमौत ही मर जावैलो, टाबरियाँ नै बिलखावैलो!

क्यूं नी अब सूँ चादर ताणै,

बदल्यै जुग री बात पिछाणै!

जुग-जीवण अब सट के रहसी!

धन-धरती अब बँट के रहसी!!

चाहे कितणो जोर लगाले, धन पर कितणी म्होर लगाले!

ऊँचा-ऊँचा महल चिणाले, मरै जिकाँ ने खूब जिमाले!

लाँबी-लाँबी भींत उठाले, पहरै पर पहरो लगवाले,

चक्कू छरी तेज करवाले, दारू री बोतल गटकाले!

जुग पलट्यो या बात भुलाले,

चापळूस बण बात बणाले!

पण अै बेड़ी कटके रहसी!

धन-धरती अब बँट के रहसी!!


छियाँ- तावड़ो

गीत भीजग्या नये रंग में, मनड़ो चंग बजावै।

भजबळ सूं ही जिवड़ो मुळकै, धरती धन निपजावै॥

कोई धन-धरती बँटवावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!

बीज मुळकसी, कूँपळ गासी, खड़्या ठूंठ अब रोसी।

मुड़-मुड़ सोचूं एक बात पण, धरती नै सुख होसी॥

करसो हळ सूं हेत लगावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!

हीणी बात करें अलवाड़ा, निकमा ठाला खावै।

इसै देस में नई क्रांति क्यूं धीमी-धीमी आवै?

म्हानै सोच फिकर हो ज्यावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!

खुराफात भी थोड़ा दिन तक, आँख मीचणी खेली।

बज्जर छाती, भर्‌यो पसीनो, करम कुदाळी लेली॥

हेलो मार मजूरी खावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!

भीतर बैठी नई जोत नै, फूंक मती बुझ जासी।

आस ऊजळी मारग जोवै, पीळो सूरज आसी॥

झिल-मिल किरणां हँस-हँस गावै

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पग उभाणो आवै!!

पड़्या धींगड़ा खुल्ला खावै, चुगल चिलम में हाँसे।

छण-छण धुँओं मिलावै साफी, पीले वो ही खाँसे॥

बचके नयो मिनख पण जावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!

आगळ खुली किंवाड़ उघाड़ा, भीतर पड़ग्या धाड़ा।

ब्याई फाटै, वो पग रोवै, हाँसै पण अलवाड़ा॥

पीड़ा आँसू भर-भर ल्यावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!!

टँट भिड़ावै लँगड़ी चालां, सीधो पग बढ़ जावै।

हिम्मत बाँधै, हूँस मोकळी, निमळो नीचो आवै॥

जुलमी जोर गुचळकी खावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!!

माटी बिछगी, दियो राखद्यो, नीचै धान धराद्यो।

घी में भीजी जुग बाती नै, जन-मन माँय जगाद्यो॥

कोई आँगण काँच ढुळावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!!

उजमण करै गरीबी धन को, आस सास पग लागी।

धरती पाँचो माँडण लागी, पीड़ देस री भागी॥

ऊजळ जळ पीवै, फळ खावै,

छियाँ छोड़ के आज तावड़ो,

पगाँ उभाणो आवै!!

कोट कंगूरा चढ़ी जिन्दगी, झळ दीखै मतवाळी।

धन-लिछमी अब भीखो काटै, मिणत हाथ ली ताळी॥

कोई थर-थर दियो जगावै,

अँधकार नै छोड़ चानणो,

पगाँ उभाणो आवै!!


धरती री पहली बेटी

हळवां-हळवां पूरब में यो, सूरज उगतो आवै जी।

काची कंवळी कूंपळ थिरकै, धरती मौज मनावै जी।

मीठी-मीठी सौरम आवै, बेल उगे मतवाळी जी।

बोझां ऊपर भंवरा भिणकै, झूमै डाळी-डाळी जी।

अरावली सूं फलर-फलर या, पवन झकोरा ल्यावै जी।

नदियां रस भरपूर जोश में, धरती झोला खावै जी।

राणोजी चेतक पर चढ़के, आवैला अब घाटी में।

कट-कटके सिर धड़ सूं न्यारा, मिल ज्यावैला माटी में॥

आज मरण री बेळा आई, धरती रगत सुहावैली।

आज वीर माँ-बहन मांग में, रक्त-सिन्दूर चढ़ावैली।

जाणै कितणा घाव लागसी, रण-धरती गरणावैली।

जाणै कितणी सरब-सुहागण, देवी-देव मनावैली।

हर हर हर हर महादेव सुण, बैर्‌यां री काया डोली।

बाँध कमर तलवार पती नै, वीर भीलणी यूं बोली।

जावो म्हारा धरती रा सुख, वीर पती रण में जाओ।

जाओ देश बुलावे थानै, आज़ादी नै घर ल्याओ

जाओ हे रणधीर पिया! पण, पाछो पग मत मेलीज्यो।

धन धरती रा वीर लाडला, वार मोकळा झेलीज्यो।

भालाँ री थे नोक सामनै, छाती बजर अड़ा लीज्यो।

तलवाराँ री धाराँ नीचै, रमता-रमता न्हालीज्यो।

अंग-अंग सूं खून पड़ैलो, हियो चालणी हो ज्यासी।

हेलो फिरसी मेवाड़ै में, जद म्हारो मन हरखासी।

साथ म्हनै भी ले चालो थे, हूँ तलवार चलाऊँली।

बैर्‌यां रा सिर काट-काट मैं, रणचण्डी बण जाऊँली॥

साथ-साथ रण-शैया ऊपर, साजन सजनी जावाँला।

आज़ादी हित मर ज्याँवाला, धरती स्वर्ग बणावाँला।

थारै बिना भँवर जी म्हारो, हिवड़ो मुँह नै आवैलो।

जे थे जाओ बीर एकला, म्हारो मन मर जावैलो।

छत्री तो अब जौहर करसी, नार सत्याँ हो जावैली।

पण मरजाद निभाणी भीलणी, घुट-घुट के मर जावैली।

म्हँनै पिया कुण बळबा देसी, कुण सती होवण देसी।

कुण म्हारो दुखड़ो जाणैलो, सुबक-सुबक रोवण देसी॥

कुण छाती सूं लगा भँवरजी, नींद म्हनै लेवण देसी।

चुड़लै रो सिणगार कर्‌यां कुण, बण-ठणकै रहवण देसी।

सतियाँ तो सत उजळो करसी, कद म्हारो मरणो होसी।

चढ़ती उमर दुहाग मिलैलो, अणचाह्या करणा होसी।

रात्यूं झुर-झुर मर जाऊँली, थारी याद सतावैली।

बैरण आभै बिजळी ढोला, सारी रात डरावैली।

वीर भील सुण सक्यो न आगै, डब डब आँख्याँ भर आई।

पण जनणी सी जन्म भूमि री, प्रीत हियै में घिर आई॥

अंग-अंग में बिजळी चमकी, नैण तण्या दो रतनारा।

रण में चाली रक्त-नदी सी, मन में उजळी सी धारा।

मुट्ठी में तलवार चमकती, आँख नहीं थिर रहवण दी।

होठ कट्या लोही सूं भरिया, बात नहीं कुछ कहवण दी।

थर थर थर थर धूजण लाग्यो, वीर-भुजा फड़कण लागी।

लोही भरी आँख सूं जाणे, लाल लपट लपकण लागी।

बोल्यो भील, सुरंगी गोरी! क्यूं अै बोल सुणावै तू।

पत्थर सी करड़ी छाती नै, क्यूं अब मोम बणावै तू॥

मरणो आज देश री खातर, राणै पर अहसान नहीं।

सोरै साँस प्राण देद्यूंला, इतणो निमळो जाण नहीं।

तू चाली तो पग में म्हारै, घट्टी सी बँध जावैली।

मौत शीश पर आती आती, दूर घणी बस जावैली।

माँ माँगेली शीशदान तो, हूँ बचणो ही चाऊँला,

प्रिया हेत मैं बण्यो बावळो, बार-बार मुड़ आऊँला।

डर है, म्हानैं, चूक न जाऊँ, शीश कटण री बेळा में।

जावण दे धण आज एकलो, काल सुणी रण-हेला में॥

सतियाँ री तू बात जाण दे, वे कद थारै पासँग में।

धरती री ए पहली बेटी, जीत सदा थारै सँग में।

वीर सत्याँ जद कूद आग में, राख राख हो जावैली,

कई नवेली नार सुहागण, बैर्‌यां में पड़ जावैली।

कितणा रो सत डिग जावैलो, कितणी लाज लुटावैली।

कितणी धाड़ां मार-मार यूं, अपणो आप मिटावैली।

कितणी मार कटारी मरसी, गउआँ सी डकरावैली।

तड़प-तड़प के कई भूख सूं, बिना मौत मर जावैली॥

नान्हा टाबर बिलख-बिलख के, 'माँ-माँ' कह रूळ जावैला।

सेलाँ री तीखी नोकाँ पर, कई उछाळ्या जावैला।

महलां सूं सिसकार सुणैली, लपटां लाज उठावैली।

माँ-बापां री बूढ़ी आँख्यां, बार-बार भर आवैली।

कितणी गर्भवती मातावाँ, माँ कहतां शरमावैली।

कितनी बहणां भाई कहती, बैरी सूं डर जावैली।

गळी-गळी में रज-रज भीतर, लाल-लाल लोही पड़सी।

आजादी हिचक्याँ भर रोसी, पग-पग पर ल्हासाँ सड़सी॥

पण तू अपणो आप बचायाँ, घाटी-घाटी में फिरिए।

आजादी री लाज राखजे, कदै न बैरी सूं घिरिए।

थारा गीत मरण वेळा में, गूंजैला जद घाटी में।

हार्‌या-थक्या वीर गति पाता, म्हे भी सुणस्याँ माटी में।

कण-कण नै हे गोरी थारी, बाताँ कदै न भूलै ली।

चाहे यो इतिहास भूलजा, जनता कदै न भूले ली।

इतणो कह झट एड लगाई, घोड़ी ठक-ठक चाल पड़ी।

झिर-मिर झिर-मिर बरसण लागी, धण री आँख्यां बड़ी-बड़ी॥



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