कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

कन्हैया लाल सेठिया की रचनाएँ : Kanhaiyalal Sethia Kavita Geet

कन्हैयालाल सेठिया (11 सितंबर 1919–11 नवंबर 2008) राजस्थान के प्रसिद्ध राजस्थानी और हिंदी कवि एवं साहित्यकार थे। उनका जन्म सुजानगढ़, चूरू में हुआ था। आधुनिक राजस्थानी कविता को नई पहचान देने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में ‘धरती धोरां री’, ‘लीलटांस’, ‘सबद’ और ‘मायड़ रो हेलो’ प्रमुख हैं। उन्हें राजस्थानी साहित्य के लिए साहित्य अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

कन्हैया लाल सेठिया  : Kanhaiyalal Sethia
कन्हैया लाल सेठिया  : Kanhaiyalal Sethia 


कन्हैयालाल सेठिया की कविताएं : Kanhaiyalal Sethiya Ki Kavita

काळ

कोनी
चुरा सकै कोई
बगत री
आंख
बीं री निजर में
सगळा पग'र पांख,
बो ही बैठो गूंगै
बीज में
हंसतै फूल में
रूस्योड़ै कांटै में,
कोनी बीं रै वासतै
कोई डूंगर ऊंचो
कोई समदर गैरो
बीं रै ही
अलख हाथां में
सिस्टी री सांढ री मूरी
कोनी सुणीजै
बंतळ करता बटाऊड़ा नै
बीं री टिचकारी!

बगत

कोनी रैयो अबै
बगत इमानदार
कोनी बरसी रुत में बिरखा
सूखा पड़्या खेत
पड़्या खाली खलिहाण
बणग्यो बगत
मिनख जिस्यो बेईमान।

मतीरा

मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
मीठा गटक मतीरा।
सौनैं जिसड़ी रेतड़ली पर
जाणै पन्ना जड़िया,
चुरा सुरग स्यूं अठै मेलग्यो
कुण इमरत रा घड़िया?
आं अणमोलां आगै लुकग्या
लाजां मरता हीरा।
मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
मीठा गटक मतीरा।
कामधेणु रा थण ही धरती
आं में दूया जाणै,
कलप बिरख रै फल पर स्यावै
निलजो सुरग धिंगाणै।
लीलो कापो गिरी गुलाबी
इन्द्र धणख सा लीरा।
मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
मीठा गटक मतीरा।
कुचर कुचर नै खुपरी पीवो
गंगाजळ सो पांणी,
तिस तो कांई चीज भूख नै
ईं री घूंट भजाणी,
हरि-रस हूंतो फीको, ओ रस
जे पी लेती मीरा!
मरू मायड़ रा मिसरी मधरा
मीठा गटक मतीरा।

कविता

(अेक)

लुक्योड़ा है
रूंख रै
रूखै करूप कठोर तणैं में
अणगिणत कंवळा पानड़ा
फूठरा फूल, मीठा फळ
पण बै आसी बारै
जद बुलासी
रुत रौ बायरो
बिंयां ही
काढ्यां
सबदां रौ घूंघटियौ
बैठी अडीकै
कोई दीठवान नै
अनन्त अरथां री धिराणी
लजवन्ती कविता!


(दो)

मरगी
काल
भूख स्यूं बांथेड़ा
करती
बापड़ी कविता
लेगी उठा’र
लावारिस लाश नै
नगर निगम री
मुरदा गाडी
आज बांची
छापै में
राखी है
गांवधणी रै बडेरचारै में
विराट
शोक सभा!

पिसतावो

क्यूं मिली मनैं
मिनखा देही?
कांई ईं रो कारण
कोई पुरबलै जलमां में
कर्‌योड़ा म्हारा पुन्न,
तो मैं पिसताऊं
क्यूं कर्‌या इस्या पुन्न,
जे मनैं मिलती पंखेरू री जूण
हुती म्हारी किरिया मूळ विरत्यां रै अनुसार
कोनी करतो जिंया करै मिनख विकारां रै वस अनाचार
कोनी बंधता म्हारै कोई पाप’र पुन्न
कोनी हुंतो कोई भेखधारी म्हारो धरम गुरु
जको देवै परवचन जकै नै बो निज में कोनी आचरै
कोनी हुंतो मैं कोई राजनेता रो पिछलग्गू
जको करावै मिंदर’र मसीत रै नांव पर टंटा
लफणै तांई सत्ता,
कोनी हुंतो कोई इस्यो धन्नू सेठ
जको बणा सकतो मनैं आप रो चमचो
कोनी बणा सकतो मिनख कोई इस्यो कानून
जको कर सकतो मनैं कोई जुरम में कचेड़ी में हाजर
मनैं स्यात मारतो कोई
ग्यान रो ठेकेदार मिनख
मांस रै सुवाद खातर
का स्यात करतो म्हारी हिंस्या फूठरी पांखां खातर
जकी नै बैच’र बो कमातो दमड़ा
मनैं हुवै घणो पिसतावो
मैं क्यूं हुयो मिनख
कोनी जकैरी तिसणा रो कोई पार
हुवै करोड़ां में कोईसो’क संत
नहीं’स घणकरा तो मिनखा देही में
परतख राकस!

कन्हैयालाल सेठिया के गीत : Geet Kanhaiyalal Sethiya ke Geet

बैरण बांसलड़ी

बैरण बांसलड़ी रा बोल!
गया मरम में म्हारै उंडा
रस-विस दोन्यूं घोळ,
बैरण बांसलड़ी रा बोल!
अेक फूंक दी गयी भायली
मन बिनरावन डोल,
उफण बही जमना नैणा सूं
भीज्या कूल कपोल,
बैरण बांसलड़ी रा बोल!
खावै हेत हबोळा जाणै–
समदरियै री छोळ,
मोबी, किंयां सनेसो भेजूं
मैं तो हुई अबोल,
बैरण बांसलड़ी रा बोल!
सुध-बुध साव बिसरगी, लागी–
सहज समाधि अमोल,
मिली चेतणा चेतण स्यूं जा
द्वैत किंवाड़ी खोल,
बैरण बांसलड़ी रा बोल!

बापू

आभै में उड़ता खग थमग्या,
गेलै में बैंता पग ठमग्या
हाको सो फूट्यो धरती पर,
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
ओ मिनख मर्‌यो'क मर्‌यो पांखी?
सै साथै नाड़ कियां नांखी?
बा सिर कूटै है हिंदुआणी
बा झुर-झुर रोवै तुरकाणी!
इसड़ो कुण सजन सनेही हो
सगळां रा हिवड़ा डगमगग्या!
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
मिनखां रो रुळग्यो मिनख पणो
देवां री मिटगी संकळाई,
बापूजी सुरग सिधार गया
हूणी रै आडी के आई?
जीऊंला सौ’र पचीस बरस
बिसवास दिरा’र किंया ठगग्या?
गिगनार पड़ै लो अब नीचै,
सतवादी वचनां स्यूं डिगग्या।
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?
बापू सा मिनखा देही में,
धरती पर मिनख नहीं आया
आगै री पीढ्यां पूछै ली –
के इस्या नखतरी जुग जाया?
ईं अेक जोत रै पळकै सूं,
इतिहास सदा नै जगमगग्या
ईं अेक मौत रै मौकै पर,
सगळां रा आंसू रळ मिळग्या,
बै कुण गमग्या, बै कुण गमग्या?

बटाऊ रो गीत

धर कूंचां भई धर मजळां
बंजर धरती पगां हळां!
क्यूं बिड़दावां फूलां नै?
क्यूं बिसरावां सूळां नै?
सगळां सागै मिलां रळां,
मारग बगता किंयां टळा?
बैठा मन स्यूं करै धड़ा,
बां नै कोस घणां करड़ा,
निरथक सोच कद निकळा?
रै’सी लागी झड़ां झळां,
चालणियै नै बार कती?
लागै, खाथी पून जती,
सुपना नणां गीत गळां
डूंगर लांघां समद दळां,
धर कूंचां भई धर मजळां
बंजर धरती पगां हळां!

धरती धोरां री

धरती धोरां री,
आ तो सुरगां नै सरमावै,
ईं पर देव रमण नै आवै,
ईं रो जस नर नारी गावै,
धरती धोरां री।
सूरज कण-कण नै चमकावै,
चन्दो इमरत रस बरसावै,
तारा निछरावळ कर ज्यावै,
धरती धोरां री।
काळा बादळिया घहरावै,
बिरखा घूघरिया घमकावै,
बिजळी डरती ओला खावै,
धरती धोरां री।
लुळ-लुळ बाजरियो लैरावै,
मक्की झालो दे’र बुलावै,
कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,
धरती धोरां री।
पंछी मधरा-मधरा बोलै,
मिसरी मीठै सुर स्यूं घोळै,
झीणूं बायरियो पंपोळै,
धरती धोरां री।
नारा नागौरी हिद ताता,
मदुआ ऊंट अणूंता खाथा।
ईं रै घोड़ां री के बातां?
धरती धोरां री।
ईं रा फळ फुलड़ा मन भावण,
ईं रै धीणो आंगण-आंगण,
बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,
धरती धोरां री।
ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,
ओ तो रण वीरां रो खूंटो,
ईं रो जोधाणूं नौ कूंटो,
धरती धोरां री।
आबू आभै रै परवाणैं,
लूणी गंगाजी ही जाणै,
ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,
धरती धोरां री।
ईं रो बीकाणूं गरबीलो,
ईं रो अलवर जबर हठीलो,
ईं रो अजयमेर भड़कीलो,
धरती धोरां री।
जैपर नगर्‌यां में पटराणी,
कोटा बूंदी कद अणजाणी?
चम्बल कैवै आं री का’णी,
धरती धोरां री।
कोनी नांव भरतपुर छोटो,
घूम्यो सूरजमल रो घोटो,
खाई मात फिरंगी मोटो,
धरती धोरां री।
ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,
मोबी हरियाणो है प्यारो,
मिलतो तीन्यां रो उणियारो,
धरती धोरां री।
ईडर पालनपुर है ईं रा,
सागी जामण जाया बीरा,
अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,
धरती धोरां री।
सोरठ बंध्यो सारेठां लारै,
भेळप सिंध आप हंकारै
मूमल बिसर्‌यो हेत चितारै,
धरती धोरां री।
ईं पर तनड़ो-मनड़ो वारां,
ईं पर जीवण प्राण उंवारां,
ईं री धजा उड़ै गिगनारां,
मायड़ कोड़ां री।
ईं नै मोत्यां थाळ बधावां,
ईं री धूळ लिलाड़ लगावां,
ईं रो मोटो भाग सरावां,
धरती धोरां री।
ईं रै सत री आण निभावां,
ईं रै पत नै नहीं लजावां,
ईं नै माथो भेंट चढ़ावां
मायड़ कोड़ां री,
धरती धोरां री।

गोरै दिन रै लारै सिंझ्या बहू सांवळी आई

गोरै दिन रै लारै सिंझ्या
बहू सांवळी आई
माथै बांध्यो चांद-बोरलो
पग पाजेबां-तारा
सुपना बाजूबंध जड़ाऊ
सोवै कामणगारा
सागै पेई भर नींदड़ली
नैण मोवणी ल्याई
गोरै दिन रै लारै सिंझ्या
बहू सांवळी आई!
बादळिया दो च्यार कुंआरा
देवरिया मटबोला
भौजाई कोयल री जाई
करै किलोळां रोळा
पकड़ कानड़ा पून दकाल्या
स्याणी नणदल बाई
गोरै दिन रै लारै सिंझ्या
बहू सांवळी आई!
दिन दिवलै री लौ में धण सूं
मिलियो लाजां मरतो
पड़्या रात रै खोजां नैं ओ
काजळ कैवै डरतो
घाल मिलण सैनाण पलक जग
नीजर करै सुवाई
गोरै दिन रै लारै सिंझ्या
बहू सांवळी आई…!

माळीड़ा, मत चूंट फूल तो

माळीड़ा, मत चूंट फूल तो
आपै ही कुमळासी
घड़ी स्यात अै और मुळकल्यै
फेर कदे ना आसी
लेज्या पूजा थाळ आज तो
खाली ही निरमोही
सुण ले साची बात बताई
आगै तनैं न कोई
झरै जठै ही प्रभू रा पग है
तपै बठै ही कासी
नास कर्‌यां स्यूं हुवै बावळा
कद राजी अविनासी
माळीड़ा, मत चूंट फूल तो
आपै ही कुमळासी
घड़ी स्यात अै और मुळकल्यै
फेर कदे ना आसी
मर्‌यां निरदई सगळा पाछा
कांटा बण-बण आवै
झर न सकै बै साथ फूल रै
कर्‌या पाप भुगतावै
फेर कर्‌यां पिसतावो गूंगा
कद छूटै चौरासी
चेत मानखा जोत जगा ले
रातड़ली घुळ जासी
माळीड़ा, मत चूंट फूल तो
आपै ही कुमळासी
घड़ी स्यात अै और मुळकल्यै
फेर कदे ना आसी।

सीपी, पाळ पेट में मोती

सीपी, पाळ पेट में मोती
गूंगी मरण बुलावैं क्यूं
रैवै जीवती परख जगत री
तो ओ मरणूं जीणूं है
बिंधा काळजो कंठां बंधसी
जद मोती लाखीणूं है
कुळ उजाळूंली मैं थारो
समदर तूं अकुळावै क्यूं?
चन्नण सौरम बसा प्राण में
सूखा हाड घसावै क्यूं
रगड़ धापज्या गुण न नीवड़ै
तो ओ पिसणूं हंसणूं है
कंचन काया घसा मनै तो
प्रभू लिलाड़ पर बसणूं है
जस फैलास्यूं जामण थारो
धरती तूं पिसतावै क्यूं?
दिवला ले'र पराई चिन्ता
हिवड़ो रोज दझावै क्यूं
नहीं निछतरी भौम, अन्धेरो
जाणै तो के बळणूं है
नेह पियो तो जोत नैण री
बण कर मनै उपड़णूं है!
कारज सारूं जलम सुधारूं
बाती तूं घबरावै क्यूं
सीपी, पाळ पेट में मोती
गूंगी मरण बुलावै क्यूं?



कन्हैयालाल सेठिया सूं पदम मेहता री बंतळ

राजस्थांनी रा जांणीता अर मानीता कवि कन्हैयालालजी सेठिया नै कुण नीं जांणै? ‘आ धरती गोरा धोरां री’, ‘औ जमीन रौ धणी के वौ जमीन रौ धणी’, ‘अरे घास री रोटी ई जद बन बिलावड़ौ ले भाग्यौ’ इत्याद अलेखूं कवितावां राजस्थांन री धरती अर संस्क्रती सूं तौ ओळखांण करावै ई करावै, साथै ई मूळ भारतीय संस्क्रती सूं ईं जोड़ै।
केन्द्रीय सूचना अर प्रसारण मंत्री वसंत साठै रै सबदां में कन्हैयालाल सेठिया जैड़ा कवि ई आपरी रचनावां री मारफत आपां री संस्क्रती, दरसण अर अध्यातम रा मूळ आधारां नै सांमी लावता थकां कायदै री समाज व्यवस्था में जीवण सारू प्रेरित कर सकै।
पदम मेहता : कविता किणनै कहस्यां, कविता री कांईं जरुत, मतलब के कविता रै बाबत आपरा विचार?
कन्हैयालाल : म्हैं तौ कविता नै अेक बौत ई गंभीर विधा मानूं। इणरी मारफत जनमानस में जीवण रा सांच थरपिया अर जगाया जाय सकै। कविता जीवण नै समग्र-रूप सूं समझवा री प्रेरणा देवै। औ ई कविता रौ कांम अर आ ई कविता री जरुत। सै'ज रूप सूं हरेक ई आदमी रै हिरदै में भावनावां होवै, जिकौ वांनै ‘सै क्यूं’ रै साथै जोड़’र देख सकै, वौ ई कवि।
पदम मेहता : आप कद सूं कवितावां लिखौ अर आपनै कवितावां रचवां री प्रेरणा क्यां सूं मिळी?
कन्हैयालाल : म्हैं सौळाक बरस री ऊमर सूं कवितावां लिखबौ सरू कीधौ, अर प्रेरणा म्हारी जलमजात ही, किणी दूजै सूं कोनी मिळी।
पदम मेहता : सुणियौ के पैला राजनीती सूं ईं आपरौ लाग-लगाव हौ? राजनीती में कुणसा दरसण आपनै प्रभावित करिया अर क्यूं?
कन्हैयालाल : म्हैं राजनीति सूं सीधौ-सीधौ प्रभावित तौ कदैई कोनी व्हियौ, पण कीं खास बातां अर कीं खास सवालां रै वास्तै म्हैं राजनीति सूं जुड़ियौ। अेक तौ राजस्थांनी भासा नै राजस्थांन री भासा बणावा री बात ही, दूजौ आबू रौ विलै पाछौ राजस्थांन में करावणौ हौ, अर तीजौ राजस्थांन रा लोगां री सेवा रै वास्तै खासकर राजस्थांन में जिकी जळ री खांमी है, उणरै अभाव री पूरत सारू म्हैं राजनीति सूं जुड़ियौ। बाकी म्हारी दिलचस्पी राजनीति में कदैई कोनी ही।
पदम मेहता : आप जिकी अबखायां अर सवालां सारू राजनीति सूं जुड़िया, वै तौ हाल ई कोनी सुळझी। हां, अेक आबू रौ विलै तौ जरूर राजस्थांन में व्हैगौ, तौ फेर राजनीति सूं हटवा रौ कांईं कारण होयौ?
कन्हैयालाल : जद राजनीतिक दळां अर गुटां रै आधार माथै लोग अेक दूजै सूं अळूझवा लागगा, तौ देस री राजनीति रौ दरसाव म्हारी निजरां में सूगलौ व्हैगौ, अर म्हैं राजनीति नै छोड-छिटकाय दीन्ही। वीयां ईं राजनीति म्हारौ असली मारग तौ हौ आथ कोनी।
पदम मेहता : आप राजस्थांनी अर हिन्दी दोनूं भासावां में लिखौ। आं में सूं कुणसी भासा नै खुद रै ज्यादा नज़दीक मांनौ। अर कांईं दोनूं भासावां में साथै-साथै लिखतां, किणीं भांत री दोराई कोनी व्है?
कन्हैयालाल : वीयां राजस्थांनी म्हारै हिरदै रै बौत समीप है। पर क्यूं के राजस्थांनी रौ छेत्र, राजस्थांन ई है अर म्हनै म्हारा विचार सारै संसार में पुगाणा है, खाली हुन्दुस्तांन में ईं नीं। इण वास्तै म्है हिंदी रौ जरियौ ई पकड़्यौ, उरदू रौ जरियौ ई पकड़्यौ अर थोड़ौ-बौत अंगरेजी रै मांय ई लिख्यौ। हाल वौ प्रकासित कोनी व्हियौ, जिकौ म्हैं अंगरेजी रै मांय लिखियौ।
पदम मेहता : दूजा ई केई कवियां दो-दो भासावां में लिखियौ, पण वै ई इण बात नै मांनी के कवि री संवेदना री मूळभासा तौ अेक ई होय सकै। ज्यूं रवीन्दर नाथ टैगोर कवि तौ बंगाली रा हां; पण कदै-कदास अंगरेजी में ईं कवितावां लिख लेता। आप कांईं सोचौ?
कन्हैयाला : म्हैं राजस्थांनी भासा नै म्हारी संवेदना रै ज्यादा नजीक देखूं। राजस्थांन रौ जिकौ अेक खास वातावरण है, उणरी वजै सूं राजस्थांनी में लिखणौ म्हनै ज्यादा प्यारौ लागै, क्यूंके म्हैं आप उण वातावरण में ई पळ’र मोटौ व्हियौ। पण म्हनै राष्ट्रभासा री सिमरिधी ई घणी आछी लागी, अर इण वास्तै म्हैं म्हारा विचार रास्टभासा में ईं लिखूं। अर म्हनै वीं लिखाई में किणीं भांत री कमी मैसूस कोनी होवै।
पदम मेहता : कांईं कविता रै अलावा किणीं दूजी विधा में लिखवा रौ ई कदै कांम पड़ियौ?
कन्हैयालाल : म्हैं राजस्थांनी रै मांय गद्य में ईं लिखियौ। ‘गळगचिया’ म्हारी गद्य री पोथी। राजनीतिक लेख ई पैला म्हैं, म्हारै राजनीतिक जीवण रै दिनां लिखिया करतौ, जिका ‘नवभारत टाइम्स’ अर ‘अमर भारत’ जैड़ा पत्रां में छपिया करता।
पदम मेहता : कांईं ‘लीलटांस’ रे पछै कोई दूजी कविता-पोथी त्यार कीवी?
कन्हैयालाल : आंईं दिनां ‘धर कूंचां धर मजलां’ रै नांव सूं म्हारी नवी पोथी छपी। इणरै मांय म्हैं दूहा छंद रौ इस्तेमाल करियौ। सब भांत री सैलियां अर छंदां में लिखवा रै पछै म्हैं इण नतीजै माथै पूगौ के कम सूं कम सबदां में गहरी सूं गहरी बात कहबा रै नातै ‘दूहै’ रौ मुकाबलौ कोनी।
पदम मेहता : आप राजस्थांनी रौ जूनौ साहित ई बांच्यौ होसी। कीं टाळवी पोथ्यां रा नांव लेणा होवै, तौ कुण सी पोथ्यां लेस्यौ, अर क्यूं?
कन्हैयालाल : म्हैं राजस्थांनी रौ जूनौ साहित बेजां कमती बांच्यौ। अर जितरौ बांच्यौ, उणमें ‘बेलिकिसण रुकमणी री’ पुस्तक म्हनै सबसूं आछी लागी। इणमें कविता री गहराई अर भावां रौ फूठरापौ नांमी है।
पदम मेहता : राजस्थांनी री नुवीं कविता अर नुवां कवियां रै बाबत आप कांईं सोचौ?
कन्हैयालाल : म्हनै आ ई लागै के वै लोग अेक राजनीतिकवाद सूं प्रतिबद्ध होय’र लिखै, इण वास्तै वांरौ लेखण समग्र कोनी। वै समस्यावां उठावै, पण वां कनै समाधांन कोनी। तौ जिकौ साहित समाधांन नीं देय सकै, म्हैं उणनै जनहितकारी अर कल्यांणकारी कोनी मानूं।
पदम मेहता : राजस्थांनी भासा रै विकास सारू आज री हालतां में आप किण-किण भांत रा मारग सुझास्यौ?
कन्हैयालाल : जीयां के ‘माणक’ रौ प्रकासण व्हियौ, तौ म्हैं इणनै राजस्थांनी भासा रै वास्तै अेक महताऊ घटना मानूं। वीयां म्हैं चाऊं के राजस्थांनी रौ पाठ्यक्रम होवै; अर राजस्थांन रा लोग-बाग ज्यादा सूं ज्यादा आपरी भासा में पत्र व्यवहार करै अर जठै-कठै ई होवै, राजस्थांनी भासा में ईं बातचीत करै, अर राजस्थांनी भासा में जिकी पत्र-पत्रिकावां छपै वांनै लेखण अर आरथिक रूप सूं पूरी मदद देवै।
पदम मेहता : कांईं आपां राजस्थांनी समाज नै अेक साबतौ अर संगठित समाज कैय सकां?
कन्हैयालाल : भाई, म्हैं तौ समझूं राजस्थान रा जिका लोगा है, वै बौत ई असाधारणता सूं भरियोड़ा लोग है, अर वांरी संस्क्रती, वांरी परम्परा अर वांरौ जीवण प्रेरित कर सकै हरेक समाज नै। अर आज राजस्थांन रा लोग सब प्रांतां में बिखरियोड़ा होवण रै बावजूद ई राजस्थांन रै नांव माथै वांरौ मानसिक संगठण है। वै कठै न कठै, दिमागी रूप सूं जरूर ई राजस्थांन सूं जुड़ियोड़ा है।
पदम मेहता : पण फेरूं ईं म्हनै तौ राजस्थांनी समाज रै संगठण अर जुड़वा में ढील-पोल लागै। आप देखौ, इंगलैंड में पंजाबियां री पागड़ी माथै नांवेक पाबंदी लागी, तौ आखै पंजाब में रौळौ माचगौ, अर अठी उड़ीसा, बिहार अर कांईं ठा कितरा प्रांतां में राजस्थांनियां माथै अनाप-सनाप जुलम होयौ, तौ ई राजस्थांन रा लोगां में दावै ई जाग कोनी आई, क्यूं? वा कुणसी मजबूत कड़ी होय सकै, जिकी इण समाज नै जोड़ै?
कन्हैयालाल : इण समाज नै जोड़बा रै वास्तै सबसूं पैला तौ राजस्थांनी भासा ई अेक मजबूत जरियौ होय सकै। राजस्थांनी भासा रौ प्रचार करणौ पड़सी। वा ई समूचै राजस्थांन रा वासियां नै जोड़सी, दूजौ कोई साधन कोनी।
पदम मेहता : कांईं ‘माणक’ रै बाबत, के ‘माणक’ री मारफत, आप कोई खास बात कहबौ चास्यौ?
कन्हैयालाल : भाई म्हैं तौ चाऊं के ‘माणक’ आखै राजस्थांन में पढीजै। राजस्थांनी भासा रे वास्तै ‘माणक’ रौ प्रकासण घणी मोटी बात व्ही। राजस्थांन रा लोगां नै चाहिजै के वै इण पत्र नै अपणावै। इणी बात में आखै राजस्थांनी समाज अर राजस्थांनी भासा रौ भविस है।
असल में आपां, आपां री सांस्क्रतिक चेतणा गमाय दी। इणी वजै सूं आं 400 बरसां में आपां अेक ई जुगपुरुस कोनी देय सक्या। अर जिका प्रांत आपरी सांस्क्रतिक चेतणां रै समचै सावचेत रह्या; ज्यूं गुजरात, वै महात्मा गांधी दियौ, दयानन्द दियौ, पटेल दियौ। उत्तर प्रदेस अर बंगाल में ईं अेक सूं अेक टाळका आगीवांण अर जुग-पुरुस व्हिया। पण आपां रै कनै म्हारांणा प्रताप अर दुरगादास रै पछै कुण, जिणनै आपां अखिल भारत स्तर रौ व्यक्तित्व बताय सकां? कारण औ ई व्हैगौ के आपां आपांरी सांस्कतिक चेतणा सूं कटगा। इणी वास्तै आपां रै समाज अर आपां रै प्रांत में मोटा मांनवियां रौ काल पड़गौ।

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *