रेवतदान चारण ‘कल्पित’ की रचनाएँ : Revatdan Charan Ki Kavita Geet Dohe
रेवतदान चारण ‘कल्पित’ (1924–1997) जोधपुर के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि और साहित्यकार थे। वे चारण काव्य-परंपरा से जुड़े हुए थे और राजस्थानी भाषा में काव्य-सृजन के लिए जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में राजस्थान की संस्कृति, लोकजीवन, इतिहास और सामाजिक चेतना के विविध स्वर दिखाई देते हैं। आधुनिक राजस्थानी साहित्य में उनका उल्लेख एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में किया जाता है।
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| Revatdan Charan |
रेवतदान चारण की कविता : Revatdan Charan Ki Kavita
बरसगांठ
इंकलाब रै आंगणियै बिखर्योड़ी लोही री बूंदांकोरौ कूं-कूं जांण कदै मत तिलक लगाजो
भूखा नागा मिनखां रौ भख लेवण वाळां
आजादी री बरसगांठ तौ पछै मनाजो।
आज अलेखूं बातां पूछण आयौ थांसू
जे दाय पड़ै तौ आंरौ पुख्ता म्यांनौ दीजौ
काया रा पसरायोड़ा सै काचा तांतण
ऊंचै माळै पूग्यां मत मोद भरीजौ
घर में ई बनवास भोगतां बरस बीतिया
पासां री आसा में कद तक धारां धीजौ
म्हांनै जग में जूंण बाळतां बरस बीतिया
एकर तौ आ झाळ झेललौ थें ई सीजौ
आडंबर रा ऊंचा महल झुकावण वाळां
खरै मोल री झूंपड़ियां सूं मत टकरीजौ
इंकबाल रै आंगणियै बिखर् योड़ी लोही री बूंदां
कोरौ कूंकूं जांण कदै मत तिलक लगाजो
भूखा नागा मिनखां रौ भख लेवण वाळां
आजादी री बरसगांठ तौ पछै मनाजो।
नुंवौ चांनणौ व्हियौ बींनणी आई घर में
सीख बडेरां दीनी इण नै सावळ बरतौ
आप आप रौ खुणौ दबावण खेंचातांणी
बैठौ बापड़ौ घर रौ टाबर भूखां मरतौ
सगळा मोटा राखै सोटा दाकल धमकी
कायौ व्हैग्यौ दंड झेलतां पेटौ भरतौ
जाचक निजरां आस विहूणौ आभौ निरखै
इण धरती रौ अंदाता तौ जीवै डरतौ
औ रांमराज री थोथी बातां भाखण वाळां
हियै रांम नै धारौ इणरी साख बचाजो
इंकलाब रै आंगणियै बिखर्योड़ी लोही री बूंदां
कोरौ कूं कूं जांण कदै मत तिलक लगाजो
भूखा नागा मिनखां रौ भख लेवण वाळां
आजादी री बरसगांठ तौ पछै मनाजो।
थोथी बातां दही बिलोवौ खाली हांडी
करौ बरस में दो-दो उच्छब सांग सजावौ
हाथ जोड़ सब ऊभा रैवै तौ थे राजी
हक मांगण नै आवै उणरै गोळी बावौ
कागद माथै घोड़ा दौड़े कदै न थाकै
मोटा-मोटा सबदां रा मत तोतक ठावौ
पीढ़ी-पीढ़ी बाड़ खींच दी खार बीजियौ
चौकूंटां पांगरिया बूंटा घरै लिजावौ
भरी भीड़ में वो देखौ टाबर ऊभौ है
सोच समझनै हमकै नागा बारै आजो
आजादी रै आंगणियै बिखरी है लोही री बूंदां
कोरौ कूंकूं जांण कदै मत तिलक लगाजो
भूखा नागा मिनखां रौ भख लेवण वाळां
इंकलाब री बरसगांठ तौ पछै मनाजो।
अडोळौ उच्छब
आजादी रौ उछब अडोळौजग झूठी झणकारां सूं
आज नुंवै दिन बिलखी लागै
धरती वार तिंवारां सूं।
कूड़ा कोड करै कितरा दिन
कद तक झूठा मन बिलमावै
नैणां नीर बिखै रा बरसै
गीत खुसी रा कीकर गावै
दिन दूणा नै रात चौगणा
भाव धड़ाधड़ बधता जावै
ऊभौ धरती मिनख बापड़ौ
आभै कीकर हाथ लगावै
माथौ दियां मिळै नीं चीजां
हुयगी लोप बजारां सूं।
आजादी रौ उछब अडोळौ
जग झूठी झणकारां सूं
आज नुंवै दिन बिलखी लागै
धरती वार तिवारां सूं।
बरसा बरसी बणै योजना
पूंजी रौ बंटवाड़ौ चावै
बात करै नित बरोबरी री
भोळी जनता नै बिलमावै
समाजवाद री जै बोलणिया
चारूं कांनी लूट मचावै
दूजा नै उपदेस देवता
धन धरती रौ खुद खा जावै
सावचेत हुय रैणौ पड़सी
यां नकली उणियारां सूं
आजादी रौ उछब अडोळौ
जग झूठी झणकारां सूं
आज नुंवै दिन बिलखी लागै
धरती वार तिंवारां सूं।
जेठ
बालम मिलबा बिलखती,लुआं लगाई लायजुलमी महीणौ जेठ रौ,तिरिया नै तरसाय ॥
कुबदी आवै काळ में,इधक महीणौ जेठ।
कीकर दिन दूणा कढै,थळ धरती में थेट॥
परदेसी री प्रीत रौ,वाल्हा नहँ विसवास।
परदेसी री प्रीत रौ,वाल्हा नहँ विसवास।
काळ बरस रै कारणै,अबखौ लगै अकास॥
सोरठौआयौ जेठ असाढ,बादल नहँ बीजळी।
गळग्यौ तन रौ गाढ,बाटां जो जो बालमा॥
परमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपळ कंवळी फूटियां पैला।
गूंगौ देस रौ गणतंत्र
जीभां लाग्योड़ा ताळा
बांगौ बापड़ौ हुयग्यौ
ऊंधी फेर नै माळा
बोळौ जांण नै बणग्यौ
अणूंता चेतग्या चाळा
आंख्यां फोड़ नीं लेवै
बिगड़ता देख नै ढाळा
तंत्र रै गण नै बचावण दोखियां रौ
पाप थूं कद तक भरैला
गांधी मातमा री आतमा
परमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपळ कंवली फूटियां पैला।
सिंघासण खोसणै खातर
रुखाळा मांडियौ रगड़ौ
प्रसासण लूट माचण नै
लगायौ मोरचौ तगड़ौ
अमोलक मांनखौ मरग्यौ
दबायां काळजै दुखड़ौ
अलेखूं झूंपड़ा बळग्या
बुझावण महल रौ झगड़ौ
आरती री जोत जगावण क्यूं
मांनखौ मसतक चढावैला
गांधी मातमा री आतमा
परमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपल कंवळी फूटियां पैला।
मंदौ मिगसर मास।
टंक टाळण टुकड़ा नहीं,
पसुआं रै नहीं घास॥
परण्या रौ पांणी मरै,
धण जद खोदै धूड़।
रंगत उडगी रेत सूं,
फबती लागै फूड़॥
माथै तगारी मेलियां,
थांभ पावड़ौ हाथ।
क्रूर काळ रै कारणै,
बाळक लीनौ बाथ॥
पसु अर मांणस पाळबा,
लेवण सार संभाळ।
धरमादौ दांनी करै,
काढण सारू काळ॥
तीखा हळ लै हालौ करसां, आई आखातीज रे
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रौ हेलौ साभळौ!
बांगो है ज्यूं आभौ देखै, विलखै आंख्यां फाड़ै
बोळौ बगनो हुयग्यौ कीकर, धरती हेलौ पाड़ै
सरवौ व्है तो कांन लगा सुण, माटी थनै बुलावै है
नैण हुवै तो देख रूंखड़ा, धरती हाथ हिलावै है
तन माटी रौ सोच न कीजै, बैठ घड़ै विधाता
रेत मुलक री घणी अमोलक, सुण रे जग रा अंदाता
माटी साटै मरणौ पड़सी, खांधै खांपण बांधलौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
जद थूं जाणै वाली माटी, चीर काळजौ सूंपै;
प्राण सजीवण करै मिनख रा, झुक-झुक पगल्या चूंपै
कण बीज्यां मण निपजै इण में, बेलां लाख मतीरा
अेक पूंख अलेखां दांणां, लाखां गुण माटी रा
जे थूं देवै कंवळा टाबर, धरती फूल हंसावै है
जे थूं तन री छाया करदै, माटी रूंख लगावै है
जे थूं इण में सींचै पाणी, धरती सींचै काया
जे थूं देवे खात धरा नै माटी अणगिण माया
चढ़ियौ फरज चुकावण सारू, दूध पियै री आंण लौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
ला जड़ामूल सूं इंकलाब, पाताळ फोड़ परळै करदै!
करसौ मजदूर बणै करता, धर रो इतिहास नवौ लिखदै
रे अेक सीस रै बदळै धरती, जुग-जुग सीस उगावैला
मरण अकारथ कदै न जावै, माटी मोल चुकावैला
जे हाथ कट्यौ धड़ नीचै पड़गी, धरती धजा उठावैला
माटी थारौ लोई लेनै, मेंहदी हाथ रचावैला
सौगन है काचा पूंखां री, मरणै नै मंगळ मांनलौ
सौगन चंवरी रै फेरां रीं, मरणै नै मंगळ मांनलौ
सौगन सांवण रै हींडां री, मरणै नै मंगळ मांनलौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
धनिका रौ हियौ रिझाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा।
हळ बीज्यौ सींच्यौ लोई सूं, तिल-तिल करसौ छीज्यौ हो
ऊनै बळबळतै तावड़ियै, कळकळतौ ऊभौ सीझ्यौ हौ
कुण जाणै कितरा दुख झेल्या, मर-खपनै कीनी रखवाळी
कांटा-भुट्टा में दिन काढ्या, फूला ज्यूं लिछमी नै पाळी
पण बणठण चढगी गढ-कोटां, नखराळी छिण में छोड साथ
जद पूछ्यो कारण जावण रौ, हस मारी वैरण अेक लात
अधमरिया प्राण मती तड़फा, सूळी पर सेज चढाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
जे घड़ी विधाता रूपाळी, सिणगार दियौ है मजदूरां
रखड़ी बाजूबंद तीमणियो, गळहार दियौ है मजदूरां
लोई में बोटी बांट-बांट, जिण मेंहदी हाथ लगाई ही
फूलां ज्यूं कंवळा टाबरिया, चरणां में भेट चढाई ही
घर री बू-बेट्यां बिलखी, पण लिछमी थनै सजाई ही
इक थारी जोत जगावण नै, घर-घर री जोत बुझाई ही
पण अैन दिवाळी रै दिन वैरण, साम्ही छाती पग धरती
ठुमकै सूं चढी हवेली में, मन मरजी रा मटका करती,
जे लाज बेचणी तेवड़ली, तो पूरो मोल चुकाती जा
चूंदडी रो अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
इतरा दिन ठगती रैई है, थूं भोळी बण छळ जाती ही
खाती ही रोटी माटी री, पण गीत वींरै रा गाती ही
जे हमें जांण रौ नांम लियौ, तौ जीभ डांम दी जावैला
जे निजर उठी मैलां कानीं, तौ आंख फोड़ दी जावैला
जे हाथ उठायौ हाकै नै, नागोरी गहणौ जड़ दांला
जे पग धर दीनां सेठां घर, तौ पगां पांगळी कर दांला
महलां गढ़ कोटां बंगळां रा, वे सपना हमें भुलाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
म्हारौ आलीजौ भंवर व्है तौ जोय!
गोरी हे, गिगन में नवलख तारा
ज्यांमें आलीजौ भंवर म्हनै दीसै नहि कोय!
चंदा रे, तारां री टोळी में
म्हारौ आलीजौ भंवर व्है तो जोय!
हिरण्यां में हेर, थोड़ौ किरत्यां में जोय
चम-चम चांनणी रै चिळकै में जोय
इण खुणै जोय, थोड़ौ उण खुणै जोय
पूरब पिछम धुर दिखणादौ जोय
'आभै में धरा रौ बासी बसै नहिं कोय
सैयां हे, सैणां री बाड़ी में थारौ छैलभंवर व्है तो जोय!'
भंवरा रे, फूल-कळी में म्हारौ
मतवाळौ मारू व्है तो जोय!
सांईणौ साजन व्है तो जोय
हेली अे, बाडी में सुरंगा फूल, फूलां री सुगंध
छैल भंवर म्हनै दीसै नहिं कोय!
गजरा नै अंतर मोलावण गयौ मोय
जिण बिलमाय लियो कुण जांणै कोय
चम्पौ नै चमेली थोड़ौ केवड़ै में जोय
मेंहदी रै झाड़ बैरी महूड़ै में जोय
डाळ-डाळ जोय व्है तो पान-पान जोय!
नाजू हे, पांणीड़े री पाळ वादीलौ ढोलौ व्है तो जोय!'
हंसा रे, सरवर तीर म्हारौ सांईणौ साजन व्है तौ जोय!
पिणियारी है, सरवर नीर अथाग
तीर रे, रंगीलों राजा दीखै नहि कोय!'
तीर माथै जोय कोई अधबिच जोय
छोळां में, हिलोळां में, लहरां में जोय
इण छेड़ै जोय व्है तो उण छेड़े जोय
माछळी रै अेड़ै-छेड़ै ऊंडै जळ जोय!
लहरां बोली नाजू हे, इतरी भोळी मत होय!
नैणां में काजळ री कोर पलकां में जोय
मेंहदी रै सुरंगे रंग, हींगळू में जोय
रग-रग मनरी लगन व्है तो जोय!
चंदा रे, तारां री टोळी में
म्हारौ आलीजौ भंवर व्है तो जोय!
गोरी हे, गिगन में नवलख तारा
ज्यांमें आलीजौ भंवर दीसै नहिं कोय!'
सागर लेखौ लेवतौ नै नागण गिणती छौळां रै
लैर-लैर में धमचक लागी, पांणी जाय पाळ नै लड़ियौ
काछव पूछ्यौ माछळी, कांई चूक पड़ी के घाटौ पड्यौ?
समदर देख्यौ सूरज कांनी, गरज्यौ तीर उछाळौ दै
के दै चंदा गिगन बीचलौ, के परभाती तारौ दै
भरी कचेड़ी भूंडौ लागै, पत राखण पतियारौ दै
लियां-दियां सूं कांम सरै है, पाछौ नीर उधारौ दै
सूंप्यौ माल सरप नीं खावै, तोप गिटै नीं गौळा रै
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रै।
लेण-देण री बातां मत कर, दुनियां सुणती करै तमासौ
थारी नींव पताळां नीचै, म्हारौ थेट गिगन में बासौ
लहरां लेती हियै हिलोळा, चलती चाल पलट्यौ पासौ
प्रीत डोर में बंधगी किरणां, मोत भरोसै दियौ दिलासौ
आयौ मेघ मांगनै लेग्यो, प्रीत करै सो भोळा रै
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतो नीर हिबोळा रै।
धूम तावड़ै कळझळ करती, तपती देखी धरती
पांन-पांन रूंखां रा झड़ग्या, बेलड़ियां बळबळती
पिणघट री पिणियारयां बिलखी, देखी हिवड़ौ भरती
सुण रे सरवर पांणी लेगी, माटी तिरसां मरती
मोत्यां री झड़ बिरखा बरसी, भरग्या ताल पिछौला रे
भावौ-भाव लियां जा पाछौ, किसी ताकड़ी तोळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रे।
धरती बोली म्हैं करसां नै, हळ ले खेत खड़ाया
चीर काळजौ काया सूंपी, कण-कण बीज बवाया
लोही सींच्यौ लीली राखी, म्हैं मोती निपजाया
पाक्या जद तक की रखवाळी, करसां नै संभळाया
पूंख-पूंख बोहराजी लेग्या, ठाकर लेग्या होळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रै।
सूरज मेघ समंदर माटी, बोली मौसा देती
लांणत रे धरती रा करसा, लोग लूटग्या खेती
देख रती भर रह नीं जावै, मिनख-मिनख में छेती
चेत-चेत माटी रा मांणस, दुनियां जागी चेती
भूखा मरता लुकता-झुकता, लाजै मिनख अडोळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रे।
भीजै बळद किलोड़िया, आ चवै जूनकी ढांणी
हळिया जोतौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
कूमठ रौ हळ, चऊ सुरंगी, नाई बीजणी सोवै
काढ़ ऊमरा धरती थारी आभै ने कांई जोवै
माटी कण रौ मण निपजावै, बेलड़ियां फूलांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया जोतौ रै हाळैती
खेती निपजै धणिया हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
काळ बरस रै पड़ी बीजळी, गैरौ इन्दर गाजै
भातौ लै भतवार खेत में, मझ दोफारां आजै
खाटौ-खीच सोगरा लाजै, मीठोडी गळवांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया खड़लौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
ज्यूं जळ बूठौ थल में रळियौ, ऊगी कूंपळ काची
पीळौ कीकर पड़ग्यौ करसा, थें धरती नै राची
ऊंचा मैल झुकै है, ज्यांरी झुपड़ियां सैनांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया जोतौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज री हळोतियौ!
नवल नवोढा नार।
काळ सिखायै लागग्यौ,
भादरवै भरतार॥
भादरवै बिलमावती,
धरती लीली चैर।
पीक पपैया बोलता,
मेहां हुवती मैर॥
पांणी भरतौ पाळ तक,
लेतौ लहरां लैर।
काळ कुलंगी काढग्यौ,
बादीलौ तौ ई बैर॥
भणतां हुवती भादवै,
मंड जातौ घमसांण।
कसियां घास अर फूस में,
नित री करत निनांण॥
काळ हुवण दै नहँ कदै,
हाळी सूं कोई हेत।
बरसण दै छांट न बादळी,
सूखै ऊभा खैत॥
जीवण नै इक जीव।
बरसी असाढ न बादली,
प्रिया पांतरी पीव॥
झींणी-झींणी बादळी,
बायरियौ झींणौह।
कळपावै नित काळ में,
होवै दिन हींणौह॥
बादळ कदैक बरसता,
असाढ महीणै आय।
पण काळ रोप पग ऊभियौ,
बिरखा नहँ बरसाय॥
आभै में चढ बादळी,
ज्यूं त्यूं कियौ जुगाड़।
काळ हाथ आडा किया,
औसरियौ न असाढ॥
बाजरियां बळ जाय।
काचर रह्या अधपाकिया,
बेलड़ियां कुम्हळाय॥
तांता बळग्या तांतिया,
हुयौ घास रौ होम।
पड़ी छिंयाड़ी काळ री,
भुरट ढकीजी भोम॥
तूंबां री बेलां बधै,
उपजै नित अणमाप।
कुण जांणै इण मिस कटै,
प्रिथमी हंदौ पाप॥
बात बडेरा कैवता,
मन में धीरज राख।
एक मेह आसी भळै,
सौळै आंना साख॥
आद जुगां सूं आज तक,
तन री मिटी न त्रास।
मांणस तौ ई मन में करै,
आसोजां री आस॥
नाचै घूमर नार।
चैत मास चिलकौ करै,
हुयौ काळ हुसियार॥
चारूं कांनी चैत में,
झींणै बायरियेह।
काळ रमावै कोड सूं,
परणी पीहरियेह॥
नवौ बरस पलटै परौ,
बीत्यां आधै चैत।
काळ कुलंगी कपट कर,
निरभै घालै नैत॥
चिलक्यौ जबरौ चेत में,
तावड़ तड़तड़तोह।
पांणी सरवर पाखरां,
बैरी बळबळतोह॥
काळ जद कटकाय।
मारग चलतौ मांनखौ,
भव-भव में भटकाय॥
माटी सूं सनमुख हुवै,
कोपै सूरज कुद्ध।
झाळां सूं जगती जमीं,
जांणै छिड़ग्यौ जुद्ध॥
तावड़ तड़तड़तौह,
बरसातौ अगन भळैह।
मुरझावण धर मुरधरा,
काळ’ज करै कळैह॥
सूरज नै समझावती,
धोरां री धरतीह।
कह दै बोली काळ नै,
म्हासूं ना उलझीह॥
बापू रौ बिलम
गांधी मातमा री आतमापरमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपळ कंवळी फूटियां पैला।
गूंगौ देस रौ गणतंत्र
जीभां लाग्योड़ा ताळा
बांगौ बापड़ौ हुयग्यौ
ऊंधी फेर नै माळा
बोळौ जांण नै बणग्यौ
अणूंता चेतग्या चाळा
आंख्यां फोड़ नीं लेवै
बिगड़ता देख नै ढाळा
तंत्र रै गण नै बचावण दोखियां रौ
पाप थूं कद तक भरैला
गांधी मातमा री आतमा
परमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपळ कंवली फूटियां पैला।
सिंघासण खोसणै खातर
रुखाळा मांडियौ रगड़ौ
प्रसासण लूट माचण नै
लगायौ मोरचौ तगड़ौ
अमोलक मांनखौ मरग्यौ
दबायां काळजै दुखड़ौ
अलेखूं झूंपड़ा बळग्या
बुझावण महल रौ झगड़ौ
आरती री जोत जगावण क्यूं
मांनखौ मसतक चढावैला
गांधी मातमा री आतमा
परमातमा नै पूछती व्हैला
रूंख औ कुम्हळायौ कीकर
कूंपल कंवळी फूटियां पैला।
मिगसर
धंधा बिन कीकर धकै।मंदौ मिगसर मास।
टंक टाळण टुकड़ा नहीं,
पसुआं रै नहीं घास॥
परण्या रौ पांणी मरै,
धण जद खोदै धूड़।
रंगत उडगी रेत सूं,
फबती लागै फूड़॥
माथै तगारी मेलियां,
थांभ पावड़ौ हाथ।
क्रूर काळ रै कारणै,
बाळक लीनौ बाथ॥
पसु अर मांणस पाळबा,
लेवण सार संभाळ।
धरमादौ दांनी करै,
काढण सारू काळ॥
रेवतदान चारण के गीत : Revatdan Charan Ke Geet
माटी रौ हेलौ
पग-पग माटी लोई मांगे, सूखी हाळी बीज रेतीखा हळ लै हालौ करसां, आई आखातीज रे
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रौ हेलौ साभळौ!
बांगो है ज्यूं आभौ देखै, विलखै आंख्यां फाड़ै
बोळौ बगनो हुयग्यौ कीकर, धरती हेलौ पाड़ै
सरवौ व्है तो कांन लगा सुण, माटी थनै बुलावै है
नैण हुवै तो देख रूंखड़ा, धरती हाथ हिलावै है
तन माटी रौ सोच न कीजै, बैठ घड़ै विधाता
रेत मुलक री घणी अमोलक, सुण रे जग रा अंदाता
माटी साटै मरणौ पड़सी, खांधै खांपण बांधलौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
जद थूं जाणै वाली माटी, चीर काळजौ सूंपै;
प्राण सजीवण करै मिनख रा, झुक-झुक पगल्या चूंपै
कण बीज्यां मण निपजै इण में, बेलां लाख मतीरा
अेक पूंख अलेखां दांणां, लाखां गुण माटी रा
जे थूं देवै कंवळा टाबर, धरती फूल हंसावै है
जे थूं तन री छाया करदै, माटी रूंख लगावै है
जे थूं इण में सींचै पाणी, धरती सींचै काया
जे थूं देवे खात धरा नै माटी अणगिण माया
चढ़ियौ फरज चुकावण सारू, दूध पियै री आंण लौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
ला जड़ामूल सूं इंकलाब, पाताळ फोड़ परळै करदै!
करसौ मजदूर बणै करता, धर रो इतिहास नवौ लिखदै
रे अेक सीस रै बदळै धरती, जुग-जुग सीस उगावैला
मरण अकारथ कदै न जावै, माटी मोल चुकावैला
जे हाथ कट्यौ धड़ नीचै पड़गी, धरती धजा उठावैला
माटी थारौ लोई लेनै, मेंहदी हाथ रचावैला
सौगन है काचा पूंखां री, मरणै नै मंगळ मांनलौ
सौगन चंवरी रै फेरां रीं, मरणै नै मंगळ मांनलौ
सौगन सांवण रै हींडां री, मरणै नै मंगळ मांनलौ
माटी रौ हेलौ सांभळौ!
धरती रो हेलौ सांभळौ!
लिछमी
ओढ्यां जा चीर गरीबां राधनिका रौ हियौ रिझाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा।
हळ बीज्यौ सींच्यौ लोई सूं, तिल-तिल करसौ छीज्यौ हो
ऊनै बळबळतै तावड़ियै, कळकळतौ ऊभौ सीझ्यौ हौ
कुण जाणै कितरा दुख झेल्या, मर-खपनै कीनी रखवाळी
कांटा-भुट्टा में दिन काढ्या, फूला ज्यूं लिछमी नै पाळी
पण बणठण चढगी गढ-कोटां, नखराळी छिण में छोड साथ
जद पूछ्यो कारण जावण रौ, हस मारी वैरण अेक लात
अधमरिया प्राण मती तड़फा, सूळी पर सेज चढाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
जे घड़ी विधाता रूपाळी, सिणगार दियौ है मजदूरां
रखड़ी बाजूबंद तीमणियो, गळहार दियौ है मजदूरां
लोई में बोटी बांट-बांट, जिण मेंहदी हाथ लगाई ही
फूलां ज्यूं कंवळा टाबरिया, चरणां में भेट चढाई ही
घर री बू-बेट्यां बिलखी, पण लिछमी थनै सजाई ही
इक थारी जोत जगावण नै, घर-घर री जोत बुझाई ही
पण अैन दिवाळी रै दिन वैरण, साम्ही छाती पग धरती
ठुमकै सूं चढी हवेली में, मन मरजी रा मटका करती,
जे लाज बेचणी तेवड़ली, तो पूरो मोल चुकाती जा
चूंदडी रो अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
इतरा दिन ठगती रैई है, थूं भोळी बण छळ जाती ही
खाती ही रोटी माटी री, पण गीत वींरै रा गाती ही
जे हमें जांण रौ नांम लियौ, तौ जीभ डांम दी जावैला
जे निजर उठी मैलां कानीं, तौ आंख फोड़ दी जावैला
जे हाथ उठायौ हाकै नै, नागोरी गहणौ जड़ दांला
जे पग धर दीनां सेठां घर, तौ पगां पांगळी कर दांला
महलां गढ़ कोटां बंगळां रा, वे सपना हमें भुलाती जा
चूंदड़ी रौ अेक झपेटौ दै, अै लिछमी दीप बुझाती जा!
आलीजौ भंवर
चंदा रे, तारां री टोळी मेंम्हारौ आलीजौ भंवर व्है तौ जोय!
गोरी हे, गिगन में नवलख तारा
ज्यांमें आलीजौ भंवर म्हनै दीसै नहि कोय!
चंदा रे, तारां री टोळी में
म्हारौ आलीजौ भंवर व्है तो जोय!
हिरण्यां में हेर, थोड़ौ किरत्यां में जोय
चम-चम चांनणी रै चिळकै में जोय
इण खुणै जोय, थोड़ौ उण खुणै जोय
पूरब पिछम धुर दिखणादौ जोय
'आभै में धरा रौ बासी बसै नहिं कोय
सैयां हे, सैणां री बाड़ी में थारौ छैलभंवर व्है तो जोय!'
भंवरा रे, फूल-कळी में म्हारौ
मतवाळौ मारू व्है तो जोय!
सांईणौ साजन व्है तो जोय
हेली अे, बाडी में सुरंगा फूल, फूलां री सुगंध
छैल भंवर म्हनै दीसै नहिं कोय!
गजरा नै अंतर मोलावण गयौ मोय
जिण बिलमाय लियो कुण जांणै कोय
चम्पौ नै चमेली थोड़ौ केवड़ै में जोय
मेंहदी रै झाड़ बैरी महूड़ै में जोय
डाळ-डाळ जोय व्है तो पान-पान जोय!
नाजू हे, पांणीड़े री पाळ वादीलौ ढोलौ व्है तो जोय!'
हंसा रे, सरवर तीर म्हारौ सांईणौ साजन व्है तौ जोय!
पिणियारी है, सरवर नीर अथाग
तीर रे, रंगीलों राजा दीखै नहि कोय!'
तीर माथै जोय कोई अधबिच जोय
छोळां में, हिलोळां में, लहरां में जोय
इण छेड़ै जोय व्है तो उण छेड़े जोय
माछळी रै अेड़ै-छेड़ै ऊंडै जळ जोय!
लहरां बोली नाजू हे, इतरी भोळी मत होय!
नैणां में काजळ री कोर पलकां में जोय
मेंहदी रै सुरंगे रंग, हींगळू में जोय
रग-रग मनरी लगन व्है तो जोय!
चंदा रे, तारां री टोळी में
म्हारौ आलीजौ भंवर व्है तो जोय!
गोरी हे, गिगन में नवलख तारा
ज्यांमें आलीजौ भंवर दीसै नहिं कोय!'
सात जुगां रौ लेखौ
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हीबोळा रैसागर लेखौ लेवतौ नै नागण गिणती छौळां रै
लैर-लैर में धमचक लागी, पांणी जाय पाळ नै लड़ियौ
काछव पूछ्यौ माछळी, कांई चूक पड़ी के घाटौ पड्यौ?
समदर देख्यौ सूरज कांनी, गरज्यौ तीर उछाळौ दै
के दै चंदा गिगन बीचलौ, के परभाती तारौ दै
भरी कचेड़ी भूंडौ लागै, पत राखण पतियारौ दै
लियां-दियां सूं कांम सरै है, पाछौ नीर उधारौ दै
सूंप्यौ माल सरप नीं खावै, तोप गिटै नीं गौळा रै
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रै।
लेण-देण री बातां मत कर, दुनियां सुणती करै तमासौ
थारी नींव पताळां नीचै, म्हारौ थेट गिगन में बासौ
लहरां लेती हियै हिलोळा, चलती चाल पलट्यौ पासौ
प्रीत डोर में बंधगी किरणां, मोत भरोसै दियौ दिलासौ
आयौ मेघ मांगनै लेग्यो, प्रीत करै सो भोळा रै
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतो नीर हिबोळा रै।
धूम तावड़ै कळझळ करती, तपती देखी धरती
पांन-पांन रूंखां रा झड़ग्या, बेलड़ियां बळबळती
पिणघट री पिणियारयां बिलखी, देखी हिवड़ौ भरती
सुण रे सरवर पांणी लेगी, माटी तिरसां मरती
मोत्यां री झड़ बिरखा बरसी, भरग्या ताल पिछौला रे
भावौ-भाव लियां जा पाछौ, किसी ताकड़ी तोळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रे।
धरती बोली म्हैं करसां नै, हळ ले खेत खड़ाया
चीर काळजौ काया सूंपी, कण-कण बीज बवाया
लोही सींच्यौ लीली राखी, म्हैं मोती निपजाया
पाक्या जद तक की रखवाळी, करसां नै संभळाया
पूंख-पूंख बोहराजी लेग्या, ठाकर लेग्या होळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रै।
सूरज मेघ समंदर माटी, बोली मौसा देती
लांणत रे धरती रा करसा, लोग लूटग्या खेती
देख रती भर रह नीं जावै, मिनख-मिनख में छेती
चेत-चेत माटी रा मांणस, दुनियां जागी चेती
भूखा मरता लुकता-झुकता, लाजै मिनख अडोळा रे
सेसनाग समदर में सूतौ, लेतौ नीर हिबोळा रे।
हळोतियौ
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणीभीजै बळद किलोड़िया, आ चवै जूनकी ढांणी
हळिया जोतौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
कूमठ रौ हळ, चऊ सुरंगी, नाई बीजणी सोवै
काढ़ ऊमरा धरती थारी आभै ने कांई जोवै
माटी कण रौ मण निपजावै, बेलड़ियां फूलांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया जोतौ रै हाळैती
खेती निपजै धणिया हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
काळ बरस रै पड़ी बीजळी, गैरौ इन्दर गाजै
भातौ लै भतवार खेत में, मझ दोफारां आजै
खाटौ-खीच सोगरा लाजै, मीठोडी गळवांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया खड़लौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज रौ हळोतियौ!
ज्यूं जळ बूठौ थल में रळियौ, ऊगी कूंपळ काची
पीळौ कीकर पड़ग्यौ करसा, थें धरती नै राची
ऊंचा मैल झुकै है, ज्यांरी झुपड़ियां सैनांणी
चौमासै रा गुडळा बादळ, पालर बूठा पांणी
हळिया जोतौ रै कांमेती
खेती निपजै धणियां हेती
हाळी बीज री हळोतियौ!
रेवतदान चारण के दोहे : Revatdan Charan Ke Dohe
भादरवौ
भल भल नहँ लागै भलौ,नवल नवोढा नार।
काळ सिखायै लागग्यौ,
भादरवै भरतार॥
भादरवै बिलमावती,
धरती लीली चैर।
पीक पपैया बोलता,
मेहां हुवती मैर॥
पांणी भरतौ पाळ तक,
लेतौ लहरां लैर।
काळ कुलंगी काढग्यौ,
बादीलौ तौ ई बैर॥
भणतां हुवती भादवै,
मंड जातौ घमसांण।
कसियां घास अर फूस में,
नित री करत निनांण॥
काळ हुवण दै नहँ कदै,
हाळी सूं कोई हेत।
बरसण दै छांट न बादळी,
सूखै ऊभा खैत॥
असाढ
कैवण काया दोय ही,जीवण नै इक जीव।
बरसी असाढ न बादली,
प्रिया पांतरी पीव॥
झींणी-झींणी बादळी,
बायरियौ झींणौह।
कळपावै नित काळ में,
होवै दिन हींणौह॥
बादळ कदैक बरसता,
असाढ महीणै आय।
पण काळ रोप पग ऊभियौ,
बिरखा नहँ बरसाय॥
आभै में चढ बादळी,
ज्यूं त्यूं कियौ जुगाड़।
काळ हाथ आडा किया,
औसरियौ न असाढ॥
आसोज
तपै आसोजी तावड़ौ,बाजरियां बळ जाय।
काचर रह्या अधपाकिया,
बेलड़ियां कुम्हळाय॥
तांता बळग्या तांतिया,
हुयौ घास रौ होम।
पड़ी छिंयाड़ी काळ री,
भुरट ढकीजी भोम॥
तूंबां री बेलां बधै,
उपजै नित अणमाप।
कुण जांणै इण मिस कटै,
प्रिथमी हंदौ पाप॥
बात बडेरा कैवता,
मन में धीरज राख।
एक मेह आसी भळै,
सौळै आंना साख॥
आद जुगां सूं आज तक,
तन री मिटी न त्रास।
मांणस तौ ई मन में करै,
आसोजां री आस॥
चैत
गवरां नै गिणगोरियां,नाचै घूमर नार।
चैत मास चिलकौ करै,
हुयौ काळ हुसियार॥
चारूं कांनी चैत में,
झींणै बायरियेह।
काळ रमावै कोड सूं,
परणी पीहरियेह॥
नवौ बरस पलटै परौ,
बीत्यां आधै चैत।
काळ कुलंगी कपट कर,
निरभै घालै नैत॥
चिलक्यौ जबरौ चेत में,
तावड़ तड़तड़तोह।
पांणी सरवर पाखरां,
बैरी बळबळतोह॥
बैसाख
बैसाखां तावड़ ब्रिथा,काळ जद कटकाय।
मारग चलतौ मांनखौ,
भव-भव में भटकाय॥
माटी सूं सनमुख हुवै,
कोपै सूरज कुद्ध।
झाळां सूं जगती जमीं,
जांणै छिड़ग्यौ जुद्ध॥
तावड़ तड़तड़तौह,
बरसातौ अगन भळैह।
मुरझावण धर मुरधरा,
काळ’ज करै कळैह॥
सूरज नै समझावती,
धोरां री धरतीह।
कह दै बोली काळ नै,
म्हासूं ना उलझीह॥

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