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साहिर लुधियानवी की नज़्में : Sahhir Ludhianvi Nazm Hindi

कभी कभी : साहिर लुधियानवी

कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तिरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छाँव में
गुज़रने पाती तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरगी जो मिरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तिरी नज़र की शुआ'ओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम हो कर
तिरे जमाल की रानाइयों में खो रहता
तिरा गुदाज़-बदन तेरी नीम-बाज़ आँखें
इन्ही हसीन फ़सानों में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियाँ ज़माने की
तिरे लबों से हलावत के घूँट पी लेता
हयात चीख़ती फिरती बरहना सर और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साए में छुप के जी लेता
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं तिरा ग़म तेरी जुस्तुजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
गुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों से
मुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैं
हयात ओ मौत के पुर-हौल ख़ारज़ारों से
न कोई जादा-ए-मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्ही ख़लाओं में रह जाऊँगा कभी खो कर
मैं जानता हूँ मिरी हम-नफ़स मगर यूँही
कभी कभी मिरे दिल में ख़याल आता है

ख़ूब-सूरत मोड़ : साहिर लुधियानवी

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से
न ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
तुम्हें भी कोई उलझन रोकती है पेश-क़दमी से
मुझे भी लोग कहते हैं कि ये जल्वे पराए हैं
मिरे हमराह भी रुस्वाइयाँ हैं मेरे माज़ी की
तुम्हारे साथ भी गुज़री हुई रातों के साए हैं
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर
त'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा
वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूब-सूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

ताज-महल : साहिर लुधियानवी

ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उल्फ़त ही सही
तुझ को इस वादी-ए-रंगीं से अक़ीदत ही सही
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से
बज़्म-ए-शाही में ग़रीबों का गुज़र क्या मअ'नी
सब्त जिस राह में हों सतवत-ए-शाही के निशाँ
उस पे उल्फ़त भरी रूहों का सफ़र क्या मअ'नी
मेरी महबूब पस-ए-पर्दा-ए-तश्हीर-ए-वफ़ा
तू ने सतवत के निशानों को तो देखा होता
मुर्दा-शाहों के मक़ाबिर से बहलने वाली
अपने तारीक मकानों को तो देखा होता
अन-गिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है
कौन कहता है कि सादिक़ न थे जज़्बे उन के
लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे
ये इमारात ओ मक़ाबिर ये फ़सीलें ये हिसार
मुतलक़-उल-हुक्म शहंशाहों की अज़्मत के सुतूँ
सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर
जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ
मेरी महबूब उन्हें भी तो मोहब्बत होगी
जिन की सन्नाई ने बख़्शी है उसे शक्ल-ए-जमील
उन के प्यारों के मक़ाबिर रहे बेनाम-ओ-नुमूद
आज तक उन पे जलाई न किसी ने क़िंदील
ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़
इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर
हम ग़रीबों की मोहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया : साहिर लुधियानवी

ये महलों ये तख़्तों ये ताजों की दुनिया
ये इंसाँ के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूके रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
हर इक जिस्म घायल हर इक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन दिलों में उदासी
ये दुनिया है या 'आलम-ए-बद-हवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
यहाँ इक खिलौना है इंसाँ की हस्ती
ये बस्ती है मुर्दा-परस्तों की बस्ती
यहाँ पर तो जीवन से है मौत सस्ती
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
जवानी भटकती है बद-कार बन कर
जवाँ जिस्म सजते हैं बाज़ार बन कर
यहाँ प्यार होता है बेव्पार बन कर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं है
वफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं है
जहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं है
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
जला दो इसे फूँक डालो ये दुनिया
मिरे सामने से हटा लो ये दुनिया
तुम्हारी है तुम ही सँभालो ये दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

मैं पल दो पल का शा'इर हूँ : साहिर लुधियानवी

मैं पल दो पल का शा'इर हूँ पल दो पल मिरी कहानी है
पल दो पल मेरी हस्ती है पल दो पल मिरी जवानी है
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
वो भी इक पल का क़िस्सा थे मैं भी इक पल का क़िस्सा हूँ
कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ
पल दो पल में कुछ कह पाया इतनी ही स'आदत काफ़ी है
पल दो पल तुम ने मुझ को सुना इतनी ही ‘इनायत काफ़ी है
कल और आएँगे नग़्मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले
मुझ से बेहतर कहने वाले तुम से बेहतर सुनने वाले
हर नस्ल इक फ़स्ल है धरती की आज उगती है कल कटती है
जीवन वो महँगी मदिरा है जो क़तरा क़तरा बटती है
सागर से उभरी लहर हूँ मैं सागर में फिर खो जाऊँगा
मिट्टी की रूह का सपना हूँ मिट्टी में फिर सो जाऊँगा
कल कोई मुझ को याद करे क्यूँ कोई मुझ को याद करे
मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे

मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़ : साहिर लुधियानवी

हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में
क़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ है
हम सर-ब-कफ़ उठे हैं कि हक़ फ़तह-याब हो
कह दो उसे जो लश्कर-ए-बातिल के साथ है
इस ढंग पर है ज़ोर तो ये ढंग ही सही
ज़ालिम की कोई ज़ात न मज़हब न कोई क़ौम
ज़ालिम के लब पे ज़िक्र भी इन का गुनाह है
फलती नहीं है शाख़-ए-सितम इस ज़मीन पर
तारीख़ जानती है ज़माना गवाह है
कुछ कोर-बातिनों की नज़र तंग ही सही
ये ज़र की जंग है न ज़मीनों की जंग है
ये जंग है बक़ा के उसूलों के वास्ते
जो ख़ून हम ने नज़्र दिया है ज़मीन को
वो ख़ून है गुलाब के फूलों के वास्ते
फूटेगी सुब्ह-ए-अम्न लहू-रंग ही सही

परछाइयाँ : साहिर लुधियानवी

जवान रात के सीने पे दूधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख़ाब-ए-मर्मरीं की तरह
हसीन फूल हसीं पतियाँ हसीं शाख़ें
लचक रही हैं किसी जिस्म-ए-नाज़नीं की तरह
फ़ज़ा में घुल से गए हैं उफ़ुक़ के नर्म ख़ुतूत
ज़मीं हसीन है ख़्वाबों की सरज़मीं की तरह
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
कभी गुमान की सूरत कभी यक़ीं की तरह
वो पेड़ जिन के तले हम पनाह लेते थे
खड़े हैं आज भी साकित किसी अमीं की तरह
उन्ही के साए में फिर आज दो धड़कते दिल
ख़मोश होंटों से कुछ कहने सुनने आए हैं
न जाने कितनी कशाकश से कितनी काविश से
ये सोते जागते लम्हे चुरा के लाए हैं
यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना था
यहीं से हम ने मोहब्बत की इब्तिदा की थी
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी
कि आरज़ू के कँवल खिल के फूल हो जाएँ
दिल-ओ-नज़र की दुआएँ क़ुबूल हो जाएँ
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो ज़माने की आँख से बच कर
नज़र झुकाए हुए और बदन चुराए हुए
ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेंपती डरती
ख़ुद अपने साए की जुम्बिश से ख़ौफ़ खाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
रवाँ है छोटी सी कश्ती हवाओं के रुख़ पर
नदी के साज़ पे मल्लाह गीत गाता है
तुम्हारा जिस्म हर इक लहर के झकोले से
मिरी खुली हुई बाहोँ में झूल जाता है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं फूल टाँक रहा हूँ तुम्हारे जोड़े में
तुम्हारी आँख मसर्रत से झुकती जाती है
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
ज़बान ख़ुश्क है आवाज़ रुकती जाती है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मिरे गले में तुम्हारी गुदाज़ बाहें हैं
तुम्हारे होंटों पे मेरे लबों के साए हैं
मुझे यक़ीं है कि हम अब कभी न बिछड़ेंगे
तुम्हें गुमान कि हम मिल के भी पराए हैं
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मिरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को
अदा-ए-इज्ज़-ओ-करम से उठा रही हो तुम
सुहाग-रात जो ढोलक पे गाए जाते हैं
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वो लम्हे कितने दिलकश थे वो घड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
वो सेहरे कितने नाज़ुक थे वो लड़ियाँ कितनी प्यारी थीं
बस्ती की हर इक शादाब गली ख़्वाबों का जज़ीरा थी गोया
हर मौज-ए-नफ़स हर मौज-ए-सबा नग़्मों का ज़ख़ीरा थी गोया
नागाह लहकते खेतों से टापों की सदाएँ आने लगीं
बारूद की बोझल बू ले कर पच्छिम से हवाएँ आने लगीं
ता'मीर के रौशन चेहरे पर तख़रीब का बादल फैल गया
हर गाँव में वहशत नाच उठी हर शहर में जंगल फैल गया
मग़रिब के मोहज़्ज़ब मुल्कों से कुछ ख़ाकी-वर्दी-पोश आए
इठलाते हुए मग़रूर आए लहराते हुए मदहोश आए
ख़ामोश ज़मीं के सीने में ख़ेमों की तनाबें गड़ने लगीं
मक्खन सी मुलाएम राहों पर बूटों की ख़राशें पड़ने लगीं
फ़ौजों के भयानक बैंड तले चर्खों की सदाएँ डूब गईं
जीपों की सुलगती धूल तले फूलों की क़बाएँ डूब गईं
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक़ घुटने लगी भरती के दफ़ातिर बढ़ने लगे
बस्ती के सजीले शोख़ जवाँ बन बन के सिपाही जाने लगे
जिस राह से कम ही लौट सके उस राह पे राही जाने लगे
उन जाने वाले दस्तों में ग़ैरत भी गई बरनाई भी
माओं के जवाँ बेटे भी गए बहनों के चहेते भाई भी
बस्ती पे उदासी छाने लगी मेलों की बहारें ख़त्म हुईं
आमों की लचकती शाख़ों से झूलों की क़तारें ख़त्म हुईं
धूल उड़ने लगी बाज़ारों में भूक उगने लगी खलियानों में
हर चीज़ दुकानों से उठ कर रू-पोश हुई तह-ख़ानों में
बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी
चरवाहियाँ रस्ता भूल गईं पनहारियाँ पनघट छोड़ गईं
कितनी ही कुँवारी अबलाएँ माँ बाप की चौखट छोड़ गईं
अफ़्लास-ज़दा दहक़ानों के हल बैल बिके खलियान बिके
जीने की तमन्ना के हाथों जीने के सब सामान बिके
कुछ भी न रहा जब बिकने को जिस्मों की तिजारत होने लगी
ख़ल्वत में भी जो ममनूअ' थी वो जल्वत में जसारत होने लगी
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम आ रही हो सर-ए-शाम बाल बिखराए
हज़ार-गूना मलामत का बार उठाए हुए
हवस-परस्त निगाहों की चीरा-दस्ती से
बदन की झेंपती उर्यानियाँ छुपाए हुए
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
मैं शहर जा के हर इक दर पे झाँक आया हूँ
किसी जगह मिरी मेहनत का मोल मिल न सका
सितमगरों के सियासी क़िमार-ख़ाने में
अलम-नसीब फ़रासत का मोल मिल न सका
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
तुम्हारे घर में क़यामत का शोर बरपा है
महाज़-ए-जंग से हरकारा तार लाया है
कि जिस का ज़िक्र तुम्हें ज़िंदगी से प्यारा था
वो भाई नर्ग़ा-ए-दुश्मन में काम आया है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
हर एक गाम पे बद-नामियों का जमघट है
हर एक मोड़ पे रुस्वाइयों के मेले हैं
न दोस्ती न तकल्लुफ़ न दिलबरी न ख़ुलूस
किसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
वो रहगुज़र जो मिरे दिल की तरह सूनी है
न जाने तुम को कहाँ ले के जाने वाली है
तुम्हें ख़रीद रहे हैं ज़मीर के क़ातिल
उफ़ुक़ पे ख़ून-ए-तमन्ना-ए-दिल की लाली है
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
उस शाम मुझे मालूम हुआ खेतों की तरह इस दुनिया में
सहमी हुई दो-शीज़ाओं की मुस्कान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ इस कार-गह-ए-ज़र्दारी में
दो भोली-भाली रूहों की पहचान भी बेची जाती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब बाप की खेती छिन जाए
ममता के सुनहरे ख़्वाबों की अनमोल निशानी बिकती है
उस शाम मुझे मालूम हुआ जब भाई जंग में काम आएँ
सरमाए के क़हबा-ख़ाने में बहनों की जवानी बिकती है
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
तुम आज हज़ारों मील यहाँ से दूर कहीं तन्हाई में
या बज़्म-ए-तरब-आराई में
मेरे सपने बुनती होंगी बैठी आग़ोश पराई में
और मैं सीने में ग़म ले कर दिन-रात मशक़्क़त करता हूँ
जीने की ख़ातिर मरता हूँ
अपने फ़न को रुस्वा कर के अग़्यार का दामन भरता हूँ
मजबूर हूँ मैं मजबूर हो तुम मजबूर ये दुनिया सारी है
तन का दुख मन पर भारी है
इस दौर में जीने की क़ीमत या दार-ओ-रसन या ख़्वारी है
मैं दार-ओ-रसन तक जा न सका तुम जेहद की हद तक आ न सकीं
चाहा तो मगर अपना न सकीं
हम तो दो ऐसी रूहें हैं जो मंज़िल-ए-तस्कीं पा न सकें
जीने को जिए जाते हैं मगर साँसों में चिताएँ जलती हैं
ख़ामोश वफ़ाएँ जलती हैं
संगीन हक़ाइक़-ज़ारों में ख़्वाबों की रिदाएँ जलती हैं
और आज जब इन पेड़ों के तले फिर दो साए लहराए हैं
फिर दो दिल मिलने आए हैं
फिर मौत की आँधी उट्ठी है फिर जंग के बादल छाए हैं
मैं सोच रहा हूँ इन का भी अपनी ही तरह अंजाम न हो
इन का भी जुनूँ नाकाम न हो
इन के भी मुक़द्दर में लिखी इक ख़ून में लिथड़ी शाम न हो
सूरज के लहू में लिथड़ी हुई वो शाम है अब तक याद मुझे
चाहत के सुनहरे ख़्वाबों का अंजाम है अब तक याद मुझे
हमारा प्यार हवादिस की ताब ला न सका
मगर उन्हें तो मुरादों की रात मिल जाए
हमें तो कश्मकश-ए-मर्ग-ए-बे-अमाँ ही मिली
उन्हें तो झूमती गाती हयात मिल जाए
बहुत दिनों से है ये मश्ग़ला सियासत का
कि जब जवान हों बच्चे तो क़त्ल हो जाएँ
बहुत दिनों से ये है ख़ब्त हुक्मरानों का
कि दूर दूर के मुल्कों में क़हत बो जाएँ
बहुत दिनों से जवानी के ख़्वाब वीराँ हैं
बहुत दिनों से सितम-दीदा शाह-राहों में
निगार-ए-ज़ीस्त की इस्मत पनाह ढूँढती है
चलो कि आज सभी पाएमाल रूहों से
कहें कि अपने हर इक ज़ख़्म को ज़बाँ कर लें
हमारा राज़ हमारा नहीं सभी का है
चलो कि सारे ज़माने को राज़-दाँ कर लें
चलो कि चल के सियासी मुक़ामिरों से कहें
कि हम को जंग-ओ-जदल के चलन से नफ़रत है
जिसे लहू के सिवा कोई रंग रास न आए
हमें हयात के उस पैरहन से नफ़रत है
कहो कि अब कोई क़ातिल अगर इधर आया
तो हर क़दम पे ज़मीं तंग होती जाएगी
हर एक मौज-ए-हवा रुख़ बदल के झपटेगी
हर एक शाख़ रग-ए-संग होती जाएगी
उठो कि आज हर इक जंग-जू से ये कह दें
कि हम को काम की ख़ातिर कलों की हाजत है
हमें किसी की ज़मीं छीनने का शौक़ नहीं
हमें तो अपनी ज़मीं पर हलों की हाजत है
कहो कि अब कोई ताजिर इधर का रुख़ न करे
अब इस जगह कोई कुँवारी न बेची जाएगी
ये खेत जाग पड़े उठ खड़ी हुईं फ़स्लें
अब इस जगह कोई क्यारी न बेची जाएगी
ये सर-ज़मीन है गौतम की और नानक की
इस अर्ज़-ए-पाक पे वहशी न चल सकेंगे कभी
हमारा ख़ून अमानत है नस्ल-ए-नौ के लिए
हमारे ख़ून पे लश्कर न पल सकेंगे कभी
कहो कि आज भी हम सब अगर ख़मोश रहे
तो इस दमकते हुए ख़ाक-दाँ की ख़ैर नहीं
जुनूँ की ढाली हुई एटमी बलाओं से
ज़मीं की ख़ैर नहीं आसमाँ की ख़ैर नहीं
गुज़िश्ता जंग में घर ही जले मगर इस बार
अजब नहीं कि ये तन्हाइयाँ भी जल जाएँ
गुज़िश्ता जंग में पैकर जले मगर इस बार
अजब नहीं कि ये परछाइयाँ भी जल जाएँ
तसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं

ऐ शरीफ़ इंसानो : साहिर लुधियानवी

ख़ून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर
जंग मशरिक़ में हो कि मग़रिब में
अम्न-ए-आलम का ख़ून है आख़िर
बम घरों पर गिरें कि सरहद पर
रूह-ए-ता'मीर ज़ख़्म खाती है
खेत अपने जलें कि औरों के
ज़ीस्त फ़ाक़ों से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें कि पिछे हटें
कोख धरती की बाँझ होती है
फ़त्ह का जश्न हो कि हार का सोग
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है
जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी
आग और ख़ून आज बख़्शेगी
भूक और एहतियाज कल देगी
इस लिए ऐ शरीफ़ इंसानो
जंग टलती रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आँगन में
शम' जलती रहे तो बेहतर है
२
बरतरी के सुबूत की ख़ातिर
ख़ूँ बहाना ही क्या ज़रूरी है
घर की तारीकियाँ मिटाने को
घर जलाना ही क्या ज़रूरी है
जंग के और भी तो मैदाँ हैं
सिर्फ़ मैदान-ए-किश्त-ओ-ख़ूँ ही नहीं
हासिल-ए-ज़िंदगी ख़िरद भी है
हासिल-ए-ज़िंदगी जुनूँ ही नहीं
आओ इस तीरा-बख़्त दुनिया में
फ़िक्र की रौशनी को 'आम करें
अम्न को जिन से तक़्वियत पहुँचे
ऐसी जंगों का एहतिमाम करें
जंग वहशत से बरबरिय्यत से
अम्न तहज़ीब-ओ-इर्तिक़ा के लिए
जंग मर्ग-आफ़रीं सियासत से
अम्न इंसान की बक़ा के लिए
जंग इफ़्लास और ग़ुलामी से
अम्न बेहतर निज़ाम की ख़ातिर
जंग भटकी हुई क़यादत से
अम्न बे-बस 'अवाम की ख़ातिर
जंग सरमाए के तसल्लुत से
अम्न जम्हूर की ख़ुशी के लिए
जंग जंगों के फ़लसफ़े के ख़िलाफ़
अम्न पुर-अम्न ज़िंदगी के लिए

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया : साहिर लुधियानवी

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया
जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया
संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जन्नती है फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बद-क़िस्मत माँ है जो बेटों की सेज पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

वो सुब्ह कभी तो आएगी : साहिर लुधियानवी

1
वो सुब्ह कभी तो आएगी
इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर कर जीते हैं
जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तौली जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा
अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा
मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे
सीनों के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बनाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
2
वो सुब्ह हमीं से आएगी
जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे
जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे
उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी
वो सुब्ह हमीं से आएगी
मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे
जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी
वो सुब्ह हमीं से आएगी
संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे
बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे
दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी
वो सुब्ह हमीं से आएगी

ख़ून फिर ख़ून है : साहिर लुधियानवी

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे
तेग़-ए-बे-दाद पे या लाशा-ए-बिस्मिल पे जमे
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमीं-गाहों में
ख़ून ख़ुद देता है जल्लादों के मस्कन का सुराग़
साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाब
ले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़
ज़ुल्म की क़िस्मत-ए-नाकारा-ओ-रुस्वा से कहो
जब्र की हिकमत-ए-परकार के ईमा से कहो
महमिल-ए-मज्लिस-ए-अक़्वाम की लैला से कहो
ख़ून दीवाना है दामन पे लपक सकता है
शोला-ए-तुंद है ख़िर्मन पे लपक सकता है
तुम ने जिस ख़ून को मक़्तल में दबाना चाहा
आज वो कूचा ओ बाज़ार में आ निकला है
कहीं शोला कहीं नारा कहीं पत्थर बन कर
ख़ून चलता है तो रुकता नहीं संगीनों से
सर उठाता है तो दबता नहीं आईनों से
ज़ुल्म की बात ही क्या ज़ुल्म की औक़ात ही क्या
ज़ुल्म बस ज़ुल्म है आग़ाज़ से अंजाम तलक
ख़ून फिर ख़ून है सौ शक्ल बदल सकता है
ऐसी शक्लें कि मिटाओ तो मिटाए न बने
ऐसे शोले कि बुझाओ तो बुझाए न बने
ऐसे नारे कि दबाओ तो दबाए न बने

फ़रार : साहिर लुधियानवी

अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासाँ हूँ मैं
अपने गुज़रे हुए अय्याम से नफ़रत है मुझे
अपनी बे-कार तमन्नाओं पे शर्मिंदा हूँ
अपनी बे-सूद उमीदों पे नदामत है मुझे
मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो
मेरा माज़ी मिरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं
मेरी उम्मीदों का हासिल मिरी काविश का सिला
एक बे-नाम अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं
कितनी बे-कार उमीदों का सहारा ले कर
मैं ने ऐवान सजाए थे किसी की ख़ातिर
कितनी बे-रब्त तमन्नाओं के मुबहम ख़ाके
अपने ख़्वाबों में बसाए थे किसी की ख़ातिर
मुझ से अब मेरी मोहब्बत के फ़साने न कहो
मुझ को कहने दो कि मैं ने उन्हें चाहा ही नहीं
और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गईं
मैं ने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं
मुझ को कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ
इश्क़ नाकाम सही ज़िंदगी नाकाम नहीं
इन को अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब
शौक़-ए-बेकार सही सई-ए-ग़म-ए-अंजाम नहीं
वही गेसू वही नज़रें वही आरिज़ वही जिस्म
मैं जो चाहूँ तो मुझे और भी मिल सकते हैं
वो कँवल जिन को कभी उन के लिए खिलना था
उन की नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा : साहिर लुधियानवी

तू हिन्दू बनेगा न मुसलमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
अच्छा है अभी तक तेरा कुछ नाम नहीं है
तुझ को किसी मज़हब से कोई काम नहीं है
जिस इल्म ने इंसानों को तक़्सीम किया है
इस इल्म का तुझ पर कोई इल्ज़ाम नहीं है
तू बदले हुए वक़्त की पहचान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया
हम ने इसे हिन्दू या मुसलमान बनाया
क़ुदरत ने तो बख़्शी थी हमें एक ही धरती
हम ने कहीं भारत कहीं ईरान बनाया
जो तोड़ दे हर बंद वो तूफ़ान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा
नफ़रत जो सिखाए वो धरम तेरा नहीं है
इंसाँ को जो रौंदे वो क़दम तेरा नहीं है
क़ुरआन न हो जिस में वो मंदिर नहीं तेरा
गीता न हो जिस में वो हरम तेरा नहीं है
तू अम्न का और सुल्ह का अरमान बनेगा
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा

चकले : साहिर लुधियानवी

ये कूचे ये नीलाम घर दिलकशी के
ये लुटते हुए कारवाँ ज़िंदगी के
कहाँ हैं कहाँ हैं मुहाफ़िज़ ख़ुदी के
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
ये पुर-पेच गलियाँ ये बे-ख़्वाब बाज़ार
ये गुमनाम राही ये सिक्कों की झंकार
ये इस्मत के सौदे ये सौदों पे तकरार
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
तअफ़्फ़ुन से पुर नीम-रौशन ये गलियाँ
ये मसली हुई अध खिली ज़र्द कलियाँ
ये बिकती हुई खोखली रंग-रलियाँ
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
वो उजले दरीचों में पायल की छन छन
तनफ़्फ़ुस की उलझन पे तबले की धन धन
ये बे-रूह कमरों में खाँसी की ठन ठन
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
ये गूँजे हुए क़हक़हे रास्तों पर
ये चारों तरफ़ भीड़ सी खिड़कियों पर
ये आवाज़े खिंचते हुए आँचलों पर
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
ये फूलों के गजरे ये पीकों के छींटे
ये बेबाक नज़रें ये गुस्ताख़ फ़िक़रे
ये ढलके बदन और ये मदक़ूक़ चेहरे
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
ये भूकी निगाहें हसीनों की जानिब
ये बढ़ते हुए हाथ सीनों की जानिब
लपकते हुए पाँव ज़ीनों की जानिब
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
यहाँ पीर भी आ चुके हैं जवाँ भी
तनौ-मंद बेटे भी अब्बा मियाँ भी
ये बीवी भी है और बहन भी है माँ भी
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी
यशोधा की हम-जिंस राधा की बेटी
पयम्बर की उम्मत ज़ुलेख़ा की बेटी
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं
बुलाओ ख़ुदायान-ए-दीं को बुलाओ
ये कूचे ये गलियाँ ये मंज़र दिखाओ
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ को लाओ
सना-ख़्वान-ए-तक़्दीस-ए-मशरिक़ कहाँ हैं

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं : साहिर लुधियानवी

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं
रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं
रूह मर जाती है तो जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को समझते हैं न पहचानते हैं
कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज
लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज
जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं
हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं
इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढाँचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूँ
मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूँडूँ
और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूँ
कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ
ज़िंदगी क़हर के साँचों में ढलेगी कब तक
कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक

मता-ए-ग़ैर : साहिर लुधियानवी

मेरे ख़्वाबों के झरोकों को सजाने वाली
तेरे ख़्वाबों में कहीं मेरा गुज़र है कि नहीं
पूछ कर अपनी निगाहों से बता दे मुझ को
मेरी रातों के मुक़द्दर में सहर है कि नहीं
चार दिन की ये रिफ़ाक़त जो रिफ़ाक़त भी नहीं
उम्र भर के लिए आज़ार हुई जाती है
ज़िंदगी यूँ तो हमेशा से परेशान सी थी
अब तो हर साँस गिराँ-बार हुई जाती है
मेरी उजड़ी हुई नींदों के शबिस्तानों में
तू किसी ख़्वाब के पैकर की तरह आई है
कभी अपनी सी कभी ग़ैर नज़र आई है
कभी इख़्लास की मूरत कभी हरजाई है
प्यार पर बस तो नहीं है मिरा लेकिन फिर भी
तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँ
तू ने ख़ुद अपने तबस्सुम से जगाया है जिन्हें
उन तमन्नाओं का इज़हार करूँ या न करूँ
तू किसी और के दामन की कली है लेकिन
मेरी रातें तिरी ख़ुश्बू से बसी रहती हैं
तू कहीं भी हो तिरे फूल से आरिज़ की क़सम
तेरी पलकें मिरी आँखों पे झुकी रहती हैं
तेरे हाथों की हरारत तिरे साँसों की महक
तैरती रहती है एहसास की पहनाई में
ढूँडती रहती हैं तख़्ईल की बाँहें तुझ को
सर्द रातों की सुलगती हुई तन्हाई में
तेरा अल्ताफ़-ओ- करम एक हक़ीक़त है मगर
ये हक़ीक़त भी हक़ीक़त में फ़साना ही न हो
तेरी मानूस निगाहों का ये मोहतात पयाम
दिल के ख़ूँ करने का एक और बहाना ही न हो
कौन जाने मिरे इमरोज़ का फ़र्दा क्या है
क़ुर्बतें बढ़ के पशेमान भी हो जाती हैं
दिल के दामन से लिपटती हुई रंगीं नज़रें
देखते देखते अंजान भी हो जाती हैं
मेरी दरमांदा जवानी की तमन्नाओं के
मुज़्महिल ख़्वाब की ताबीर बता दे मुझ को
मेरा हासिल मेरी तक़दीर बता दे मुझ को

26 जनवरी : साहिर लुधियानवी

आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल पर
देखे थे हम ने जो वो हसीं ख़्वाब क्या हुए
दौलत बढ़ी तो मुल्क में इफ़्लास क्यूँ बढ़ा
ख़ुश-हाली-ए-अवाम के अस्बाब क्या हुए
जो अपने साथ साथ चले कू-ए-दार तक
वो दोस्त वो रफ़ीक़ वो अहबाब क्या हुए
क्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून का
मरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुए
बे-कस बरहनगी को कफ़न तक नहीं नसीब
वो व'अदा-हा-ए-अतलस-ओ-किम-ख़्वाब क्या हुए
जम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाह
ख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुए
मज़हब का रोग आज भी क्यूँ ला-'इलाज है
वो नुस्ख़ा-हा-ए-नादिर-ओ-नायाब क्या हुए
हर कूचा शो'ला-ज़ार है हर शहर क़त्ल-गाह
यक-जेहती-ए-हयात के आदाब क्या हुए
सहरा-ए-तीरगी में भटकती है ज़िंदगी
उभरे थे जो उफ़ुक़ पे वो महताब क्या हुए
मुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी हो
ऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो

किसी को उदास देख कर : साहिर लुधियानवी

तुम्हें उदास सा पाता हूँ मैं कई दिन से
न जाने कौन से सदमे उठा रही हो तुम
वो शोख़ियाँ वो तबस्सुम वो क़हक़हे न रहे
हर एक चीज़ को हसरत से देखती हो तुम
छुपा छुपा के ख़मोशी में अपनी बेचैनी
ख़ुद अपने राज़ की तशहीर बन गई हो तुम
मेरी उमीद अगर मिट गई तो मिटने दो
उमीद क्या है बस इक पेश-ओ-पस है कुछ भी नहीं
मिरी हयात की ग़मगीनियों का ग़म न करो
ग़म-ए-हयात ग़म-ए-यक-नफ़स है कुछ भी नहीं
तुम अपने हुस्न की रानाइयों पे रहम करो
वफ़ा फ़रेब है तूल-ए-हवस है कुछ भी नहीं
मुझे तुम्हारे तग़ाफ़ुल से क्यूँ शिकायत हो
मिरी फ़ना मिरे एहसास का तक़ाज़ा है
मैं जानता हूँ कि दुनिया का ख़ौफ़ है तुम को
मुझे ख़बर है ये दुनिया अजीब दुनिया है
यहाँ हयात के पर्दे में मौत पलती है
शिकस्त-ए-साज़ की आवाज़ रूह-ए-नग़्मा है
मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं
मिरे ख़याल की दुनिया में मेरे पास हो तुम
ये तुम ने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ
मगर मुझे ये बता दो कि क्यूँ उदास हो तुम
ख़फ़ा न होना मिरी जुरअत-ए-तख़ातुब पर
तुम्हें ख़बर है मिरी ज़िंदगी की आस हो तुम
मिरा तो कुछ भी नहीं है मैं रो के जी लूँगा
मगर ख़ुदा के लिए तुम असीर-ए-ग़म न रहो
हुआ ही क्या जो ज़माने ने तुम को छीन लिया
यहाँ पे कौन हुआ है किसी का सोचो तो
मुझे क़सम है मिरी दुख-भरी जवानी की
मैं ख़ुश हूँ मेरी मोहब्बत के फूल ठुकरा दो
मैं अपनी रूह की हर इक ख़ुशी मिटा लूँगा
मगर तुम्हारी मसर्रत मिटा नहीं सकता
मैं ख़ुद को मौत के हाथों में सौंप सकता हूँ
मगर ये बार-ए-मसाइब उठा नहीं सकता
तुम्हारे ग़म के सिवा और भी तो ग़म हैं मुझे
नजात जिन से मैं इक लहज़ा पा नहीं सकता
ये ऊँचे ऊँचे मकानों की डेवढ़ियों के तले
हर एक गाम पे भूके भिकारीयों की सदा
हर एक घर में है अफ़्लास और भूक का शोर
हर एक सम्त ये इंसानियत की आह-ओ-बुका
ये कार-ख़ानों में लोहे का शोर-ओ-ग़ुल जिस में
है दफ़्न लाखों ग़रीबों की रूह का नग़्मा
ये शाह-राहों पे रंगीन साड़ियों की झलक
ये झोंपड़ों में ग़रीबों के बे-कफ़न लाशे
ये माल-रोड पे कारों की रेल-पेल का शोर
ये पटरियों पे ग़रीबों के ज़र्द-रू बच्चे
गली गली में ये बिकते हुए जवाँ चेहरे
हुसैन आँखों में अफ़्सुर्दगी सी छाई हुई
ये जंग और ये मेरे वतन के शोख़ जवाँ
ख़रीदी जाती हैं उठती जवानियाँ जिन की
ये बात बात पे क़ानून ओ ज़ाब्ते की गिरफ़्त
ये ज़िल्लतें ये ग़ुलामी ये दौर-ए-मजबूरी
ये ग़म बहुत हैं मिरी ज़िंदगी मिटाने को
उदास रह के मिरे दिल को और रंज न दो

हिरास : साहिर लुधियानवी

तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर
मेरे तख़्ईल में रह रह के झलक उठती है
यूँ अचानक तिरे आरिज़ का ख़याल आता है
जैसे ज़ुल्मत में कोई शम्अ भड़क उठती है
तेरे पैराहन-ए-रंगीं की जुनूँ-ख़ेज़ महक
ख़्वाब बन बन के मिरे ज़ेहन में लहराती है
रात की सर्द ख़मोशी में हर इक झोंके से
तेरे अन्फ़ास तिरे जिस्म की आँच आती है
मैं सुलगते हुए राज़ों को अयाँ तो कर दूँ
लेकिन उन राज़ों की तशहीर से जी डरता है
रात के ख़्वाब उजाले में बयाँ तो कर दूँ
उन हसीं ख़्वाबों की ताबीर से जी डरता है
तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूत
दर-हक़ीक़त कोई रंगीन शरारत ही न हो
मैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँ
वो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो
सोचता हूँ कि तुझे मिल के मैं जिस सोच में हूँ
पहले उस सोच का मक़्सूम समझ लूँ तो कहूँ
मैं तिरे शहर में अंजान हूँ परदेसी हूँ
तेरे अल्ताफ़ का मफ़्हूम समझ लूँ तो कहूँ
कहीं ऐसा न हो पाँव मिरे थर्रा जाएँ
और तिरी मरमरीं बाँहों का सहारा न मिले
अश्क बहते रहें ख़ामोश सियह रातों में
और तिरे रेशमी आँचल का किनारा न मिले

मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी : साहिर लुधियानवी

मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मुझ को रातों की सियाही के सिवा कुछ न मिला
मैं वो नग़्मा हूँ जिसे प्यार की महफ़िल न मिली
वो मुसाफ़िर हूँ जिसे कोई भी मंज़िल न मिली
ज़ख़्म पाए हैं बहारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
किसी गेसू किसी आँचल का सहारा भी नहीं
रास्ते में कोई धुँदला सा सितारा भी नहीं
मेरी नज़रों ने नज़ारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
दिल में नाकाम उमीदों के बसेरे पाए
रौशनी लेने को निकला तो अँधेरे पाए
रंग और नूर के धारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
मेरी राहों से जुदा हो गईं राहें उन की
आज बदली नज़र आती हैं निगाहें उन की
जिन से इस दिल ने सहारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी
प्यार माँगा तो सिसकते हुए अरमान मिले
चैन चाहा तो उमडते हुए तूफ़ान मिले
डूबते दिल ने किनारों की तमन्ना की थी
मैं ने चाँद और सितारों की तमन्ना की थी

जश्न-ए-ग़ालिब : साहिर लुधियानवी

इक्कीस बरस गुज़रे आज़ादी-ए-कामिल को
तब जा के कहीं हम को 'ग़ालिब' का ख़याल आया
तुर्बत है कहाँ उस की मस्कन था कहाँ उस का
अब अपने सुख़न-परवर ज़ेहनों में सवाल आया
सौ साल से जो तुर्बत चादर को तरसती थी
अब उस पे अक़ीदत के फूलों की नुमाइश है
उर्दू के तअ'ल्लुक़ से कुछ भेद नहीं खुलता
ये जश्न ये हंगामा ख़िदमत है कि साज़िश है
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसों
उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी
आज़ादी-ए-कामिल का एलान हुआ जिस दिन
मा'तूब ज़बाँ ठहरी ग़द्दार ज़बाँ ठहरी
जिस अहद-ए-सियासत ने ये ज़िंदा ज़बाँ कुचली
उस अहद-ए-सियासत को मरहूम का ग़म क्यूँ है
'ग़ालिब' जिसे कहते हैं उर्दू ही का शाइर था
उर्दू पे सितम ढा कर 'ग़ालिब' पे करम क्यूँ है
ये जश्न ये हंगामे दिलचस्प खिलौने हैं
कुछ लोगों की कोशिश है कुछ लोग बहल जाएँ
जो वादा-ए-फ़र्दा पर अब टल नहीं सकते हैं
मुमकिन है कि कुछ अर्सा इस जश्न पे टल जाएँ
ये जश्न मुबारक हो पर ये भी सदाक़त है
हम लोग हक़ीक़त के एहसास से आरी हैं
'गाँधी' हो कि 'ग़ालिब' हो इंसाफ़ की नज़रों में
हम दोनों के क़ातिल हैं दोनों के पुजारी हैं

नूर-जहाँ के मज़ार पर : साहिर लुधियानवी

पहलू-ए-शाह में ये दुख़्तर-ए-जम्हूर की क़ब्र
कितने गुम-गश्ता फ़सानों का पता देती है
कितने ख़ूँ-रेज़ हक़ाएक़ से उठाती है नक़ाब
कितनी कुचली हुई जानों का पता देती है
कैसे मग़रूर शहंशाहों की तस्कीं के लिए
साल-हा-साल हसीनाओं के बाज़ार लगे
कैसे बहकी हुई नज़रों के तअय्युश के लिए
सुर्ख़ महलों में जवाँ जिस्मों के अम्बार लगे
कैसे हर शाख़ से मुँह-बंद महकती कलियाँ
नोच ली जाती थीं तज़ईन-ए-हरम की ख़ातिर
और मुरझा के भी आज़ाद न हो सकती थीं
ज़िल्ल-ए-सुबहान की उल्फ़त के भरम की ख़ातिर
कैसे इक फ़र्द के होंटों की ज़रा सी जुम्बिश
सर्द कर सकती थी बे-लौस वफ़ाओं के चराग़
लूट सकती थी दमकते हुए हाथों का सुहाग
तोड़ सकती थी मय-ए-इश्क़ से लबरेज़ अयाग़
सहमी सहमी सी फ़ज़ाओं में ये वीराँ मरक़द
इतना ख़ामोश है फ़रियाद-कुनाँ हो जैसे
सर्द शाख़ों में हवा चीख़ रही है ऐसे
रूह-ए-तक़्दीस-ओ-वफ़ा मर्सियाँ-ख़्वाँ हो जैसे
तू मिरी जान मुझे हैरत ओ हसरत से न देख
हम में कोई भी जहाँ-नूर ओ जहां-गीर नहीं
तू मुझे छोड़ के ठुकरा के भी जा सकती है
तेरे हाथों में मिरे हाथ हैं ज़ंजीर नहीं

बच्चे मन के सच्चे : साहिर लुधियानवी

बच्चे मन के सच्चे सारे जग की आँख के तारे
ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे
ख़ुद रूठें ख़ुद मन जाएँ फिर हम-जोली बन जाएँ
झगड़ा जिस के सात करें अगले ही पल फिर बात करें
इन को किसी से बैर नहीं इन के लिए कोई ग़ैर नहीं
इन का भोला-पन मिलता है सब को बाँह पसारे
इंसाँ जब तक बच्चा है तब तक समझो सच्चा है
जूँ-जूँ उस की उम्र बढ़े मन पर झूट का मेल चढ़े
क्रोध बढ़े नफ़रत घेरे लालच की आदत घेरे
बचपन इन पापों से हट कर अपनी उम्र गुज़ारे
तन कोमल मन सुंदर हैं बच्चे बड़ों से बेहतर हैं
इन में छूत और छात नहीं झूटी ज़ात और पात नहीं
भाषा की तकरार नहीं मज़हब की दीवार नहीं
इन की नज़रों में इक हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे

तेरी आवाज़ : साहिर लुधियानवी

रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें
रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए
दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने
मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए
देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमक
देर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई में
अपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिए
तो न आई मगर उस रात की पहनाई में
यूँ अचानक तिरी आवाज़ कहीं से आई
जैसे पर्बत का जिगर चीर के झरना फूटे
या ज़मीनों की मोहब्बत में तड़प कर नागाह
आसमानों से कोई शोख़ सितारा टूटे
शहद सा घुल गया तल्ख़ाबा-ए-तन्हाई में
रंग सा फैल गया दिल के सियह-ख़ाने में
देर तक यूँ तिरी मस्ताना सदाएँ गूँजीं
जिस तरह फूल चटकने लगें वीराने में
तू बहुत दूर किसी अंजुमन-ए-नाज़ में थी
फिर भी महसूस किया मैं ने कि तू आई है
और नग़्मों में छुपा कर मिरे खोए हुए ख़्वाब
मेरी रूठी हुई नींदों को मना लाई है
रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूश
वही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र
वही ढलका हुआ आँचल वही रफ़्तार का ख़म
वही रह रह के लचकता हुआ नाज़ुक पैकर
तू मिरे पास न थी फिर भी सहर होने तक
तेरा हर साँस मिरे जिस्म को छू कर गुज़रा
क़तरा क़तरा तिरे दीदार की शबनम टपकी
लम्हा लम्हा तिरी ख़ुश्बू से मोअत्तर गुज़रा
अब यही है तुझे मंज़ूर तो ऐ जान-ए-क़रार
मैं तिरी राह न देखूँगा सियह रातों में
ढूँढ लेंगी मिरी तरसी हुई नज़रें तुझ को
नग़्मा ओ शेर की उमडी हुई बरसातों में
अब तिरा प्यार सताएगा तो मेरी हस्ती
तिरी मस्ती भरी आवाज़ में ढल जाएगी
और ये रूह जो तेरे लिए बेचैन सी है
गीत बन कर तिरे होंटों पे मचल जाएगी
तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले कर
मेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगे
चंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिए
मिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें : साहिर लुधियानवी

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वर्ना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान ओ दिल को कुछ ऐसे कि जान ओ दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें
गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र
ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब होंटों के ख़्वाब और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब
तहज़ीब-ए-ज़िंदगी के फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िंदाँ के ख़्वाब कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब
ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल की असास थे
ये ख़्वाब मर गए हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-संग है हयात
आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वर्ना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान ओ दिल को कुछ ऐसे कि जान ओ दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकीं

इंतिज़ार : साहिर लुधियानवी

चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है
दूर वादी में दूधिया बादल
झुक के पर्बत को प्यार करते हैं
दिल में नाकाम हसरतें ले कर
हम तिरा इंतिज़ार करते हैं
इन बहारों के साए में आ जा
फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे
ज़िंदगी तेरे ना-मुरादों पर
कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे!
रोज़ की तरह आज भी तारे
सुब्ह की गर्द में न खो जाएँ
आ तिरे ग़म में जागती आँखें
कम से कम एक रात सो जाएँ
चाँद मद्धम है आसमाँ चुप है
नींद की गोद में जहाँ चुप है

मादाम : साहिर लुधियानवी

आप बे-वज्ह परेशान सी क्यूँ हैं मादाम
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
मेरे अहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इंसान न रहते होंगे
नूर-ए-सरमाया से है रू-ए-तमद्दुन की जिला
हम जहाँ हैं वहाँ तहज़ीब नहीं पल सकती
मुफ़्लिसी हिस्स-ए-लताफ़त को मिटा देती है
भूक आदाब के साँचों में नहीं ढल सकती
लोग कहते हैं तो लोगों पे तअ'ज्जुब कैसा
सच तो कहते हैं कि नादारों की इज़्ज़त कैसी
लोग कहते हैं मगर आप अभी तक चुप हैं
आप भी कहिए ग़रीबों में शराफ़त कैसी
नेक मादाम बहुत जल्द वो दौर आएगा
जब हमें ज़ीस्त के अदवार परखने होंगे
अपनी ज़िल्लत की क़सम आप की अज़्मत की क़सम
हम को ताज़ीम के मेआ'र परखने होंगे
हम ने हर दौर में तज़लील सही है लेकिन
हम ने हर दौर के चेहरे को ज़िया बख़्शी है
हम ने हर दौर में मेहनत के सितम झेले हैं
हम ने हर दौर के हाथों को हिना बख़्शी है
लेकिन इन तल्ख़ मबाहिस से भला क्या हासिल
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
मेरे अहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मैं जहाँ हूँ वहाँ इंसान न रहते होंगे
वज्ह-ए-बे-रंगी-ए-गुलज़ार कहूँ या न कहूँ
कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ

उमीद : साहिर लुधियानवी

वो सुब्ह कभी तो आएगी
उन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख सागर छलकेगा
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
जिस सुब्ह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मरमर के जीते हैं
जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं
इन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं
इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तोली जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा
अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाए जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा
मा'सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी
फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे
सीने के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बताई जाएगी
वो सुब्ह कभी तो आएगी

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो : साहिर लुधियानवी

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
ख़त्म करो तहज़ीब की बात
बंद करो कल्चर का शोर
सत्य अहिंसा सब बकवास
हम भी क़ातिल तुम भी चोर
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
वो बस्ती वो गाँव ही क्या
जिस में हरीजन हो आज़ाद
वो क़स्बा वो शहर ही क्या
जो न बने अहमदाबाद
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो
दोनों का क्या काम यहाँ
अब के बरस भी क़त्ल हुई
एक की शिकस्ता इक की ज़बाँ
ख़त्म हुआ दोनों का जश्न
आओ उन्हें अब कर दें दफ़्न

मिरे अहद के हसीनो : साहिर लुधियानवी

वो सितारे जिन की ख़ातिर कई बे-क़रार सदियाँ
मिरी तीरा-बख़्त दुनिया में सितारा-वार जागीं
कभी रिफ़अ'तों पे लपकीं कभी वुसअ'तों से उलझीं
कभी सोगवार सोएँ कभी नग़्मा-बार जागीं
वो बुलंद-बाम तारे वो फ़लक-मक़ाम तारे
वो निशान दे के अपना रहे बे-निशाँ हमेशा
वो हसीं वो नूर-ज़ादे वो ख़ला के शाहज़ादे
जो हमारी क़िस्मतों पर रहे हुक्मराँ हमेशा
जिन्हें मुज़्महिल दिलों ने अबदी पनाह जाना
थके-हारे क़ाफ़िलों ने जिन्हें ख़िज़्र-ए-राह जाना
जिन्हें कमसिनों ने चाहा कि लपक के प्यार कर लें
जिन्हें महवशों ने माँगा कि गले का हार कर लें
जिन्हें आशिक़ों ने चाहा कि फ़लक से तोड़ लाएँ
किसी राह में बिछाएँ किसी सेज पर सजाएँ
जिन्हें बुत-गरों ने चाहा कि सनम बना के पूजें
ये जो दूर के हसीं हैं उन्हें पास ला के पूजें
जिन्हें मुतरिबों ने चाहा कि सदाओं में पिरो लें
जिन्हें शाइ'रों ने चाहा कि ख़याल में समो लें
हो हज़ार कोशिशों पर भी शुमार में न आए
कभी ख़ाक-ए-बे-बिज़ाअत के दयार में न आए
जो हमारी दस्तरस से रहे दूर दूर अब तक
हमें देखते रहे हैं जो ब-सद ग़ुरूर अब तक
मिरे अहद के हसीनो वो नज़र-नवाज़ तारे
मिरा दौर-ए-इश्क़-परवर तुम्हें नज़्र दे रहा है
वो जुनूँ जो आब-ओ-आतिश को असीर कर चुका था
वो ख़ला की वुसअ'तों से भी ख़िराज ले रहा है
मिरे साथ रहने वालो मिरे बा'द आने वालो
मेरे दौर का ये तोहफ़ा तुम्हें साज़गार आए
कभी तुम ख़ला से गुज़रो किसी सीम-तन की ख़ातिर
कभी तुम को दिल में रख कर कोई गुल-अज़ार आए

विर्सा : साहिर लुधियानवी

ये वतन तेरी मिरी नस्ल की जागीर नहीं
सैंकड़ों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे
कितने ज़ेहनों का लहू कितनी निगाहों का अरक़
कितने चेहरों की हया कितनी जबीनों की शफ़क़
ख़ाक की नज़्र हुई तब ये नज़ारे बिखरे
पत्थरों से ये तराशे हुए असनाम-ए-जवाँ
ये सदाओं के ख़म-ओ-पेच ये रंगों की ज़बाँ
चिमनियों से ये निकलता हुआ पुर-पेच धुआँ
तेरी तख़्लीक़ नहीं है मिरी तख़्लीक़ नहीं
हम अगर ज़िद भी करें उस पे तो तस्दीक़ नहीं
इल्म सूली पे चढ़ा तब कहीं तख़्मीना बना
ज़हर सदियों ने पिया तब कहीं नौशीना बना
सैंकड़ों पाँव कटे तब कहीं इक ज़ीना बना
तेरे क़दमों के तले या मिरे क़दमों के तले
नौ-ए-इंसाँ के शब-ओ-रोज़ की तक़दीर नहीं
ये वतन तेरी मिरी नस्ल की जागीर नहीं
सैंकड़ों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे
तेरा ग़म कुछ भी सही मेरा अलम कुछ भी सही
अहल-ए-सर्वत की सियासत का सितम कुछ भी सही
कल की नस्लें भी कोई चीज़ हैं हम कुछ भी सही
उन का विर्सा हूँ खंडर ये सितम ईजाद न कर
तेरी तख़्लीक़ नहीं तू इसे बरबाद न कर
जिस से दहक़ान को रोज़ी नहीं मिलने पाती
मैं न दूँगा तुझे वो खेत जलाने का सबक़
फ़स्ल बाक़ी है तो तक़्सीम बदल सकती है
फ़स्ल की ख़ाक से क्या माँगेगा जम्हूर का हक़
पल सलामत है तो तू पार उतर सकता है
चाहे तब्लीग़ बग़ावत के लिए ही उतरे
वर्ना 'ग़ालिब' की ज़बाँ में मिरे हमदम मिरे दोस्त
दाम हर मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
सोच ले फिर कोई ता'मीर गिराने जाना
तेरी ता'मीर से है जंग कि तख़रीब से जंग
अहल-ए-मंसब हैं ग़लत-कार तो उन के मंसब
तेरी ताईद से ढाले गए तो मुजरिम है
मेरी ताईद से ढाले गए मैं मुजरिम हूँ
पटरियाँ रेल की सड़कों की बसें फ़ोन के तार
तेरी और मेरी ख़ताओं की सज़ा क्यूँ भुगतें
उन पे क्यूँ ज़ुल्म हो जिन की कोई तक़्सीर नहीं
ये वतन तेरी मिरी नस्ल की जागीर नहीं
सैंकड़ों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे
तेरा शिकवा भी बजा मेरी शिकायत भी दुरुस्त
रंग-ए-माहौल बदलने की ज़रूरत भी दुरुस्त
कौन कहता है कि हालात पे तन्क़ीद न कर
हुक्मरानों के ग़लत दा'वों की तरदीद न कर
तुझ को इज़हार-ए-ख़यालात का हक़ हासिल है
और ये हक़ कोई तारीख़ की ख़ैरात नहीं
तेरे और मेरे रफ़ीक़ों ने लहू दे दे कर
ज़ुल्म की ख़ाक में इस हक़ का शजर बोया था
सालहा-साल में जो बर्ग-ओ-समर लाया है
अपना हक़ माँग मगर उन के तआ'वुन से न माँग
जो तिरे हक़ का तसव्वुर ही फ़ना कर डालें
हाथ उठा अपने मगर उन के जिलौ में न उठा
जो तिरे हाथ तिरे तन से जुदा कर डालें
ख़्वाब-ए-आज़ादी इंसाँ की ये ता'बीर नहीं
ये वतन तेरी मिरी नस्ल की जागीर नहीं
सैंकड़ों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है उसे

शिकस्त : साहिर लुधियानवी

अपने सीने से लगाए हुए उम्मीद की लाश
मुद्दतों ज़ीस्त को नाशाद किया है मैं ने
तू ने तो एक ही सदमे से क्या था दो-चार
दिल को हर तरह से बर्बाद किया है मैं ने
जब भी राहों में नज़र आए हरीरी मल्बूस
सर्द आहों में तुझे याद किया है मैं ने
और अब जब कि मिरी रूह की पहनाई में
एक सुनसान सी मग़्मूम घटा छाई है
तू दमकते हुए आरिज़ की शुआएँ ले कर
गुल-शुदा शमएँ जलाने को चली आई है
मेरी महबूब ये हंगामा-ए-तज्दीद-ए-वफ़ा
मेरी अफ़्सुर्दा जवानी के लिए रास नहीं
मैं ने जो फूल चुने थे तिरे क़दमों के लिए
उन का धुँदला सा तसव्वुर भी मिरे पास नहीं
एक यख़-बस्ता उदासी है दिल ओ जाँ पे मुहीत
अब मिरी रूह में बाक़ी है न उमीद न जोश
रह गया दब के गिराँ-बार सलासिल के तले
मेरी दरमांदा जवानी की उमंगों का ख़रोश
रेगज़ारों में बगूलों के सिवा कुछ भी नहीं
साया-ए-अब्र-ए-गुरेज़ाँ से मुझे क्या लेना
बुझ चुके हैं मिरे सीने में मोहब्बत के कँवल
अब तिरे हुस्न-ए-पशीमाँ से मुझे क्या लेना
तेरे आरिज़ पे ये ढलके हुए सीमीं आँसू
मेरी अफ़्सुर्दगी-ए-ग़म का मुदावा तो नहीं
तेरी महबूब निगाहों का पयाम-ए-तज्दीद
इक तलाफ़ी ही सही मेरी तमन्ना तो नहीं

आवाज़-ए-आदम : साहिर लुधियानवी

दबेगी कब तलक आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक जज़्बात-ए-बरहम हम भी देखेंगे
चलो यूँही सही ये जौर-ए-पैहम हम भी देखेंगे
दर-ए-ज़िंदाँ से देखें या उरूज-ए-दार से देखें
तुम्हें रुस्वा सर-ए-बाज़ार-ए-आलम हम भी देखेंगे
ज़रा दम लो मआल-ए-शौकत-ए-जम हम भी देखेंगे
ये ज़ोम-ए-क़ुव्वत-ए-फ़ौलाद-ओ-आहन देख लो तुम भी
ब-फ़ैज़-ए-जज़्बा-ए-ईमान-ए-मोहकम हम भी देखेंगे
जबीन-ए-कज-कुलाही ख़ाक पर ख़म हम भी देखेंगे
मुकाफ़ात-ए-अमल तारीख़-ए-इंसाँ की रिवायत है
करोगे कब तलक नावक फ़राहम हम भी देखेंगे
कहाँ तक है तुम्हारे ज़ुल्म में दम हम भी देखेंगे
ये हंगाम-ए-विदा-ए-शब है ऐ ज़ुल्मत के फ़रज़ंदो
सहर के दोश पर गुलनार परचम हम भी देखेंगे
तुम्हें भी देखना होगा ये आलम हम भी देखेंगे

यकसूई : साहिर लुधियानवी

अहद-ए-गुम-गश्ता की तस्वीर दिखाती क्यूँ हो
एक आवारा-ए-मंज़िल को सताती क्यूँ हो
वो हसीं अहद जो शर्मिंदा-ए-ईफ़ा न हुआ
उस हसीं अहद का मफ़्हूम जताती क्यूँ हो
ज़िंदगी शोला-ए-बे-बाक बना लो अपनी
ख़ुद को ख़ाकिस्तर-ए-ख़ामोश बनाती क्यूँ हो
मैं तसव्वुफ़ के मराहिल का नहीं हूँ क़ाइल
मेरी तस्वीर पे तुम फूल चढ़ाती क्यूँ हो
कौन कहता है कि आहें हैं मसाइब का इलाज
जान को अपनी अबस रोग लगाती क्यूँ हो
एक सरकश से मोहब्बत की तमन्ना रख कर
ख़ुद को आईन के फंदों में फंसाती क्यूँ हो
मैं समझता हूँ तक़द्दुस को तमद्दुन का फ़रेब
तुम रसूमात को ईमान बनाती क्यूँ हो
जब तुम्हें मुझ से ज़ियादा है ज़माने का ख़याल
फिर मिरी याद में यूँ अश्क बहाती क्यूँ हो
तुम में हिम्मत है तो दुनिया से बग़ावत कर दो
वर्ना माँ बाप जहाँ कहते हैं शादी कर लो

धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं : साहिर लुधियानवी

धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं
तुम लोग जिन्हें अपना न सके वो ख़ून के धारे पूछते हैं
सड़कों की ज़बाँ चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैं
ये किस का लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-क़ौम बता
ये जलते हुए घर किस के हैं ये कटते हुए तन किस के हैं
तक़्सीम के अंदर तूफ़ाँ में लुटते हुए गुलशन किस के हैं
बद-बख़्त फ़ज़ाएँ किस की हैं बर्बाद नशेमन किस के हैं
कुछ हम भी सुनें हम को भी सुना
किस काम के हैं ये दीन-धर्म जो शर्म का दामन चाक करें
किस तरह के हैं ये देश-भगत जो बस्ते घरों को ख़ाक करें
ये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करें
आँखें तो उठा नज़रें तो मिला
जिस राम के नाम पे ख़ून बहे उस राम की 'इज़्ज़त क्या होगी
जिस दीन के हाथों लाज लुटे इस दीन की क़ीमत क्या होगी
इंसान की इस ज़िल्लत से परे शैतान की ज़िल्लत क्या होगी
ये वेद हटा क़ुरआन उठा
ये किस का लहू है कौन मिरा
ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-क़ौम बता

एक मुलाक़ात : साहिर लुधियानवी

तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल लेकिन
तिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं
ये जान कर तुझे क्या जाने कितना ग़म पहुँचे
कि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं
किसी की हो के तू इस तरह मेरे घर आई
कि जैसे फिर कभी आए तो घर मिले न मिले
नज़र उठाई मगर ऐसी बे-यक़ीनी से
कि जिस तरह कोई पेश-ए-नज़र मिले न मिले
तू मुस्कुराई मगर मुस्कुरा के रुक सी गई
कि मुस्कुराने से ग़म की ख़बर मिले न मिले
रुकी तो ऐसे कि जैसे तिरी रियाज़त को
अब इस समर से ज़ियादा समर मिले न मिले
गई तो सोग में डूबे क़दम ये कह के गए
सफ़र है शर्त शरीक-ए-सफ़र मिले न मिले
तिरी तड़प से न तड़पा था मेरा दिल लेकिन
तिरे सुकून से बेचैन हो गया हूँ मैं
ये जान कर तुझे किया जाने कितना ग़म पहुँचे
कि आज तेरे ख़यालों में खो गया हूँ मैं

आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है : साहिर लुधियानवी

आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है
भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है
जब तुझ से न सुलझें तिरे उलझे हुए धंदे
भगवान के इंसाफ़ पे सब छोड़ दे बंदे
ख़ुद ही तिरी मुश्किल को वो आसान करेगा
जो तू नहीं कर पाया वो भगवान करेगा
कहने की ज़रूरत नहीं आना ही बहुत है
इस दर पे तिरा सीस झुकाना ही बहुत है
जो कुछ है तिरे दिल में सभी उस को ख़बर है
बंदे तिरे हर हाल पे मालिक की नज़र है
बिन माँगे ही मिलती हैं यहाँ मन की मुरादें
दिल साफ़ हो जिन का वो यहाँ आ के सदा दें
मिलता है जहाँ न्याय वो दरबार यही है
संसार की सब से बड़ी सरकार यही है

ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है : साहिर लुधियानवी

ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
हर एक फ़त्ह-ओ-ज़फ़र के दामन पे ख़ून-ए-इंसान का रंग क्यूँ है
ज़मीं भी तेरी है हम भी तेरे ये मिलकियत का सवाल क्या है
ये क़त्ल-ओ-ख़ूँ का रिवाज क्यूँ है ये रस्म-ए-जंग-ओ-जिदाल क्या है
जिन्हें तलब है जहान भर की उन्हीं का दिल इतना तंग क्यूँ है
ख़ुदा-ए-बर्तर तेरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है
ग़रीब माओं शरीफ़ बहनों को अम्न-ओ-इज़्ज़त की ज़िंदगी दे
जिन्हें अता की है तू ने ताक़त उन्हें हिदायत की रौशनी दे
सुरों में किब्र-ओ-ग़ुरूर क्यूँ है दिलों के शीशे ये रंग क्यूँ है
ख़ुदा-ए-बर्तर तिरी ज़मीं पर ज़मीं की ख़ातिर ये जंग क्यूँ है

फ़नकार : साहिर लुधियानवी

मैं ने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
आज दुक्कान पे नीलाम उठेगा उन का
तू ने जिन गीतों पे रखी थी मोहब्बत की असास
आज चाँदी के तराज़ू में तुलेगी हर चीज़
मेरे अफ़्कार मिरी शाइरी मेरा एहसास
जो तिरी ज़ात से मंसूब थे उन गीतों को
मुफ़लिसी जिंस बनाने पे उतर आई है
भूक तेरे रुख़-ए-रनगीं के फ़सानों के एवज़
चंद अशिया-ए-ज़रूरत की तमन्नाई है
देख इस अरसा-ए-गह-ए-मेहनत-ओ-सरमाया में
मेरे नग़्मे भी मिरे पास नहीं रह सकते
तेरे जल्वे किसी ज़रदार की मीरास सही
तेरे ख़ाके भी मिरे पास नहीं रह सकते
आज उन गीतों को बाज़ार में ले आया हूँ
मैं ने जो गीत तिरे प्यार की ख़ातिर लिक्खे

मुझे सोचने दे : साहिर लुधियानवी

मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना
ज़िंदगी तल्ख़ सही ज़हर सही सम ही सही
दर्द ओ आज़ार सही जब्र सही ग़म ही सही
लेकिन इस दर्द-ओ-ग़म ओ जब्र की वुसअत को तो देख
ज़ुल्म की छाँव में दम तोड़ती ख़िल्क़त को तो देख
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना
मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़
जल्सा-गाहों में ये दहशत-ज़दा सहमे अम्बोह
रहगुज़ारों पे फ़लाकत-ज़दा लोगों के गिरोह
भूक और प्यास से पज़-मुर्दा सियह-फ़ाम ज़मीं
तीरा-ओ-तार मकाँ मुफ़लिस ओ बीमार मकीं
नौ-ए-इंसाँ में ये सरमाया ओ मेहनत का तज़ाद
अम्न ओ तहज़ीब के परचम तले क़ौमों का फ़साद
हर तरफ़ आतिश ओ आहन का ये सैलाब-ए-आज़ीम
नित-नए तर्ज़ पे होती हुई दुनिया तक़्सीम
लहलहाते हुए खेतों पे जवानी का समाँ
और दहक़ान के छप्पर में न बत्ती न धुआँ
ये फ़लक-बोस मिलें दिलकश ओ सीमीं बाज़ार
ये ग़लाज़त पे झपटते हुए भूके नादार
दूर साहिल पे वो शफ़्फ़ाफ़ मकानों की क़तार
सरसराते हुए पर्दों में सिमटते गुलज़ार
दर-ओ-दीवार पे अनवार का सैलाब-ए-रवाँ
जैसे इक शायर-ए-मदहोश के ख़्वाबों का जहाँ
ये सभी क्यूँ है ये क्या है मुझे कुछ सोचने दे
कौन इंसाँ का ख़ुदा है मुझे कुछ सोचने दे
अपनी मायूस उमंगों का फ़साना न सुना
मेरी नाकाम मोहब्बत की कहानी मत छेड़

जवाहर-लाल नेहरू : साहिर लुधियानवी

जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते
धड़कनें रुकने से अरमान नहीं मर जाते
साँस थम जाने से एलान नहीं मर जाते
होंट जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है
वो जो हर दीन से मुंकिर था हर इक धर्म से दूर
फिर भी हर दीन हर इक धर्म का ग़म-ख़्वार रहा
सारी क़ौमों के गुनाहों का कड़ा बोझ लिए
उम्र-भर सूरत-ए-ईसा जो सर-ए-दार रहा
जिस ने इंसानों की तक़्सीम के सदमे झेले
फिर भी इंसाँ की उख़ुव्वत का परस्तार रहा
जिस की नज़रों में था इक आलमी तहज़ीब का ख़्वाब
जिस का हर साँस नए अहद का मे'मार रहा
जिस ने ज़रदार-ए-मईशत को गवारा न किया
जिस को आईन-ए-मुसावात पे इसरार रहा
उस के फरमानों की एलानों की ताज़ीम करो
राख तक़्सीम की अरमान भी तक़्सीम करो
मौत और ज़ीस्त के संगम पे परेशाँ क्यूँ हो
उस का बख़्शा हुआ सह-रंग-ए-अलम ले के चलो
जो तुम्हें जादा-ए-मंज़िल का पता देता है
अपनी पेशानी पर वो नक़्श-ए-क़दम ले के चलो
दामन-ए-वक़्त पे अब ख़ून के छींटे न पड़ें
एक मरकज़ की तरफ़ दैर-ओ-हरम ले के चलो
हम मिटा डालेंगे सरमाया-ओ-मेहनत का तज़ाद
ये अक़ीदा ये इरादा ये क़सम ले के चलो
वो जो हमराज़ रहा हाज़िर-ओ-मुस्तक़बिल का
उस के ख़्वाबों की ख़ुशी रूह का ग़म ले के चलो
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है
जिस्म मिट जाने से इंसान नहीं मर जाते
धड़कनें रुकने से अरमान नहीं मर जाते
साँस थम जाने से एलान नहीं मर जाते
होंट जम जाने से फ़रमान नहीं मर जाते
जिस्म की मौत कोई मौत नहीं होती है

एक तस्वीर-ए-रंग : साहिर लुधियानवी

मैं ने जिस वक़्त तुझे पहले-पहल देखा था
तू जवानी का कोई ख़्वाब नज़र आई थी
हुस्न का नग़्म-ए-जावेद हुई थी मालूम
इश्क़ का जज़्बा-ए-बेताब नज़र आई थी
ऐ तरब-ज़ार जवानी की परेशाँ तितली
तू भी इक बू-ए-गिरफ़्तार है मालूम न था
तेरे जल्वों में बहारें नज़र आती थीं मुझे
तू सितम-ख़ुर्दा-ए-इदबार है मालूम न था
तेरे नाज़ुक से परों पर ये ज़र-ओ-सीम का बोझ
तेरी परवाज़ को आज़ाद न होने देगा
तू ने राहत की तमन्ना में जो ग़म पाला है
वो तिरी रूह को आबाद न होने देगा
तू ने सरमाए की छाँव में पनपने के लिए
अपने दिल अपनी मोहब्बत का लहू बेचा है
दिन की तज़ईन-ए-फ़सुर्दा का असासा ले कर
शोख़ रातों की मसर्रत का लहू बेचा है
ज़ख़्म-ख़ुर्दा हैं तख़य्युल की उड़ानें तेरी
तेरे गीतों में तिरी रूह के ग़म पलते हैं
सुर्मगीं आँखों में यूँ हसरतें लौ देती हैं
जैसे वीरान मज़ारों पे दिए जुलते हैं
इस से क्या फ़ाएदा रंगीन लिबादों के तले
रूह जलती रहे घुलती रहे पज़मुर्दा रहे
होंट हँसते हों दिखावे के तबस्सुम के लिए
दिल ग़म-ए-ज़ीस्त से बोझल रहे आज़ुर्दा रहे
दिल की तस्कीं भी है आसाइश-ए-हस्ती की दलील
ज़िंदगी सिर्फ़ ज़र-ओ-सीम का पैमाना नहीं
ज़ीस्त एहसास भी है शौक़ भी है दर्द भी है
सिर्फ़ अन्फ़ास की तरतीब का अफ़्साना नहीं
उम्र भर रेंगते रहने से कहीं बेहतर है
एक लम्हा जो तिरी रूह में वुसअत भर दे
एक लम्हा जो तिरे गीत को शोख़ी दे दे
एक लम्हा जो तिरी लय में मसर्रत भर दे

दिल अभी : साहिर लुधियानवी

ज़िंदगी से उन्स है
हुस्न से लगाव है
धड़कनों में आज भी
इश्क़ का अलाव है
दिल अभी बुझा नहीं
रंग भर रहा हूँ मैं
खाका-ए-हयात में
आज भी हूँ मुंहमिक
फ़िक्र-ए-काएनात में
ग़म अभी लुटा नहीं
हर्फ़-ए-हक़ अज़ीज़ है
ज़ुल्म नागवार है
अहद-ए-नौ से आज भी
अहद-ए-उस्तुवार है
मैं अभी मरा नहीं

रद्द-ए-अमल : साहिर लुधियानवी

चंद कलियाँ नशात की चुन कर
मुद्दतों महव-ए-यास रहता हूँ
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ

मिरे गीत : साहिर लुधियानवी

मिरे सरकश तराने सुन के दुनिया ये समझती है
कि शायद मेरे दिल को इश्क़ के नग़्मों से नफ़रत है
मुझे हंगामा-ए-जंग-ओ-जदल में कैफ़ मिलता है
मिरी फ़ितरत को ख़ूँ-रेज़ी के अफ़्साने से रग़बत है
मिरी दुनिया में कुछ वक़अत नहीं है रक़्स ओ नग़्मा की
मिरा महबूब नग़्मा शोर-ए-आहंग-ए-बग़ावत है
मगर ऐ काश देखें वो मिरी पुर-सोज़ रातों को
मैं जब तारों पे नज़रें गाड़ कर आँसू बहाता हूँ
तसव्वुर बन के भूली वारदातें याद आती हैं
तो सोज़-ओ-दर्द की शिद्दत से पहरों तिलमिलाता हूँ
कोई ख़्वाबों में ख़्वाबीदा उमंगों को जगाती है
तो अपनी ज़िंदगी को मौत के पहलू में पाता हूँ
मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है
मिरा दिल दुश्मन-ए-नग़्मा-सराई हो नहीं सकता
मुझे इंसानियत का दर्द भी बख़्शा है क़ुदरत ने
मिरा मक़्सद फ़क़त शोला-नवाई हो नहीं सकता
जवाँ हूँ मैं जवानी लग़्ज़िशों का एक तूफ़ाँ है
मिरी बातों में रंग-ए-पारसाई हो नहीं सकता
मिरी सरकश तरानों की हक़ीक़त है तो इतनी है
कि जब मैं देखता हूँ भूक के मारे किसानों को
ग़रीबों मुफ़लिसों को बे-कसों को बे-सहारों को
सिसकती नाज़नीनों को तड़पते नौ-जवानों को
हुकूमत के तशद्दुद को इमारत के तकब्बुर को
किसी के चीथडों को और शहंशाही ख़ज़ानों को
तो दिल ताब-ए-नशात-ए-बज़्म-ए-इशरत ला नहीं सकता
मैं चाहूँ भी तो ख़्वाब-आवर तराने गा नहीं सकता

अहल-ए-दिल और भी हैं : साहिर लुधियानवी

क्या हुआ गर मिरे यारों की ज़बानें चुप हैं
मेरे शाहिद मिरे यारों के सिवा और भी हैं
अहल-ए-दिल और भी हैं अहल-ए-वफ़ा और भी हैं
एक हम ही नहीं दुनिया से ख़फ़ा और भी हैं
हम पे ही ख़त्म नहीं मस्लक-ए-शोरीदा-सिरी
चाक-दिल और भी हैं चाक-क़बा और भी हैं
सर सलामत है तो क्या संग-ए-मलामत की कमी
जान बाक़ी है तो पैकान-ए-क़ज़ा और भी हैं
मुंसिफ़-ए-शहर की वहदत पे न हर्फ़ आ जाए
लोग कहते हैं कि अर्बाब-ए-जफ़ा और भी हैं

बहुत घुटन है : साहिर लुधियानवी

बहुत घुटन है कोई सूरत-ए-बयाँ निकले
अगर सदा न उठे कम से कम फ़ुग़ाँ निकले
फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है
अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले
हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे
उदास क्यूँ हो जो कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले
वो फ़लसफ़े जो हर इक आस्ताँ के दुश्मन थे
अमल में आए तो ख़ुद वक़्फ़-ए-आस्ताँ निकले
इधर भी ख़ाक उड़ी है उधर भी ज़ख़्म पड़े
जिधर से हो के बहारों के कारवाँ निकले
सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए
ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले

मायूस तो हूँ वा'दे से तिरे : साहिर लुधियानवी

मायूस तो हूँ वा'दे से तिरे
कुछ आस नहीं कुछ आस भी है
मैं अपने ख़यालों के सदक़े
तू पास नहीं और पास भी है
हम ने तो ख़ुशी माँगी थी मगर
जो तू ने दिया अच्छा ही दिया
जिस ग़म का तअ'ल्लुक़ हो तुझ से
वो रास नहीं और रास भी है
पलकों पे लरज़ते अश्कों में
तस्वीर झलकती है तेरी
दीदार की प्यासी आँखों में
अब प्यास नहीं और प्यास भी है

कोई दिल की चाहत से मजबूर है : साहिर लुधियानवी

कोई दिल की चाहत से मजबूर है
जो भी है वो ज़रूरत से मजबूर है
कोई माने न माने मगर जान-ए-मन
कुछ तुम्हें चाहिए कुछ हमें चाहिए
छुप के तकते हो क्यूँ सामने आओ जी
हम तुम्हारे हैं हम से न शरमाओ जी
ये न समझो कि हम को ख़बर कुछ नहीं
सब उधर ही उधर है इधर कुछ नहीं
तुम भी बेचैन हो हम भी बेताब हैं
जब से आँखें मिलीं दोनों बे-ख़्वाब हैं
इश्क़ और मुश्क छुपते नहीं हैं कभी
इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हैं हम तुम सभी
अपने दिल की लगी को छुपाते हो क्यूँ
ये मोहब्बत की घड़ियाँ गँवाते हो क्यूँ
प्यास बुझती नहीं है नज़ारे बिना
उम्र कटती नहीं है सहारे बिना
कोई माने न माने मगर जान-ए-मन
कुछ तुम्हें चाहिए कुछ हमें चाहिए

अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन : साहिर लुधियानवी

अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन
अपने ऐबों को मत ढाँक मेरे वतन
तेरा इतिहास है ख़ूँ में लुथड़ा हुआ
तू अभी तक है दुनिया में बिछड़ा हुआ
तू ने अपनों को अपना न माना कभी
तू ने इंसाँ को इंसाँ न जाना कभी
तेरे धर्मों ने ज़ातों की तक़्सीम की
तिरी रस्मों ने नफ़रत की ता'लीम दी
वहशतों का चलन तुझ में जारी रहा
क़त्ल-ओ-ख़ूँ का जुनूँ तुझ पे तारी रहा
अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन
तू द्राविड़ है या आरिया नस्ल है
जो भी है अब इसी ख़ाक की फ़स्ल है
रंग और नस्ल के दाएरे से निकल
गिर चुका है बहुत देर अब तो सँभल
तेरे दिल से जो नफ़रत न मिट पाएगी
तेरे घर में ग़ुलामी पलट आएगी
तेरी बर्बादियों का तुझे वास्ता
ढूँड अपने लिए अब नया रास्ता
अपने अंदर ज़रा झाँक मेरे वतन
अपने ऐबों को मत ढाँक मेरे वतन

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