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शमशेर बहादुर सिंह की कविताएँ : Shamsher Bahadur Singh Hindi Kavita

शमशेर बहादुर सिंह  :  Shamsher Bahadur Singh
 Shamsher Bahadur Singh 


परिचय

शमशेर बहादुर सिंह (1911–1993) हिंदी के प्रमुख आधुनिक कवि और साहित्यकार थे। वे नई कविता के महत्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति, मानवीय संवेदना और सामाजिक यथार्थ का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। शमशेर की भाषा में हिंदी और उर्दू का सुंदर मेल मिलता है, जिससे उनकी काव्य-शैली को विशेष पहचान मिली। उनकी कविता में चित्रकार जैसी सूक्ष्म दृष्टि और बिंबों की सुंदरता दिखाई देती है। ‘कुछ कविताएँ’, ‘कुछ और कविताएँ’ और ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं। आधुनिक हिंदी कविता में शमशेर बहादुर सिंह का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।

टूटी हुई, बिखरी हुई

शमशेर बहादुर सिंह

टूटी हुई बिखरी हुई चाय
की दली हुई पाँव के नीचे
पत्तियाँ
मेरी कविता
बाल, झड़े हुए, मैले से रूखे, गिरे हुए, गर्दन से फिर भी
चिपके
...कुछ ऐसी मेरी खाल,
मुझसे अलग-सी, मिट्टी में
मिली-सी
दोपहर बाद की धूप-छाँह में खड़ी इंतज़ार की ठेलेगाड़ियाँ
जैसे मेरी पसलियाँ...
ख़ाली मेरी पसलियाँ...
ख़ाली बोरे सूजों से रफ़ू किए जा रहे हैं... जो
मेरी आँखों का सूनापन हैं
ठंड भी एक मुसकराहट लिए हुए है
जो कि मेरी दोस्त है।
कबूतरों ने एक ग़ज़ल गुनगुनाई...
मैं समझ न सका, रदीफ़-क़ाफ़िए क्या थे,
इतना ख़फ़ीफ़, इतना हलका, इतना मीठा
उनका दर्द था।
आसमान में गंगा की रेत आईने की तरह हिल रही है।
मैं उसी में कीचड़ की तरह सो रहा हूँ
और चमक रहा हूँ कहीं...
न जाने कहाँ।
मेरी बाँसुरी है एक नाव की पतवार—
जिसके स्वर गीले हो गए हैं,
छप्-छप्-छप् मेरा हृदय कर रहा है...
छप् छप् छप्।
वह पैदा हुआ है जो मेरी मृत्यु को सँवारने वाला है।
वह दुकान मैंने खोली है जहाँ ‘प्वाइज़न’ का लेबुल लिए हुए
दवाइयाँ हँसती हैं—
उनके इंजेक्शन की चिकोटियों में बड़ा प्रेम है।
वह मुझ पर हँस रही है, जो मेरे होंठों पर एक तलुए
के बल खड़ी है
मगर उसके बाल मेरी पीठ के नीचे दबे हुए हैं
और मेरी पीठ को समय के बारीक तारों की तरह
खुरच रहे हैं
उसके एक चुंबन की स्पष्ट परछाईं मुहर बनकर उसके
तलुओं के ठप्पे से मेरे मुँह को कुचल चुकी है
उसका सीना मुझको पीसकर बराबर कर चुका है।
मुझको प्यास के पहाड़ों पर लिटा दो जहाँ मैं
एक झरने की तरह तड़प रहा हूँ।
मुझको सूरज की किरनों में जलने दो—
ताकि उसकी आँच और लपट में तुम
फ़ौवारे की तरह नाचो।
मुझको जंगली फूलों की तरह ओस से टपकने दो,
ताकि उसकी दबी हुई ख़ुशबू से अपने पलकों की
उनींदी जलन को तुम भिंगो सको, मुमकिन है तो।
हाँ, तुम मुझसे बोलो, जैसे मेरे दरवाज़े की शर्माती चूलें
सवाल करतीं हैं बार-बार... मेरे दिल के
अनगिनती कमरों से।
हाँ, तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मछलियाँ लहरों से करती हैं
...जिनमें वह फँसने नहीं आतीं,
जैसे हवाएँ मेरे सीने से करती हैं
जिसको वह गहराई तक दबा नहीं पातीं,
तुम मुझसे प्रेम करो जैसे मैं तुमसे करता हूँ।
आईनो, रोशनाई में घुल जाओ और आसमान में
मुझे लिखो और मुझे पढ़ो।
आईनो, मुसकराओ और मुझे मार डालो।
आईनो, मैं तुम्हारी ज़िंदगी हूँ।
एक फूल ऊषा की खिलखिलाहट पहनकर
रात का गड़ता हुआ काला कंबल उतारता हुआ
मुझसे लिपट गया।
उसमें काँटे नहीं थे—सिर्फ़ एक बहुत
काली, बहुत लंबी ज़ुल्फ़ थी जो ज़मीन तक
साया किए हुए थी... जहाँ मेरे पाँव
खो गए थे।
वह गुल मोतियों को चबाता हुआ सितारों को
अपनी कनखियों में घुलाता हुआ, मुझ पर
एक ज़िंदा इत्रपाश बनकर बरस पड़ा—
और तब मैंने देखा कि सिर्फ़ एक साँस हूँ जो उसकी
बूँदों में बस गई है।
जो तुम्हारे सीनों में फाँस की तरह ख़ाब में
अटकती होगी, बुरी तरह खटकती होगी।
मैं उसके पाँवों पर कोई सिजदा न बन सका,
क्योंकि मेरे झुकते न झुकते
उसके पाँवों की दिशा मेरी आँखों को लेकर
खो गई थी।
जब तुम मुझे मिले, एक खुला फटा हुआ लिफ़ाफ़ा
तुम्हारे हाथ आया।
बहुत उसे उलटा-पलटा—उसमें कुछ न था—
तुमने उसे फेंक दिया ׃ तभी जाकर मैं नीचे
पड़ा हुआ तुम्हें ‘मैं’ लगा। तुम उसे
उठाने के लिए झुके भी, पर फिर कुछ सोचकर
मुझे वहीं छोड़ दिया। मैं तुमसे
यों ही मिल लिया था।
मेरी याददाश्त को तुमने गुनाहगार बनाया—और उसका
सूद बहुत बढ़ाकर मुझसे वसूल किया। और तब
मैंने कहा—अगले जनम में। मैं इस
तरह मुसकराया जैसे शाम के पानी में
डूबते पहाड़ ग़मगीन मुसकराते हैं।
मेरी कविता की तुमने ख़ूब दाद दी—मैंने समझा
तुम अपनी ही बातें सुना रहे हो। तुमने मेरी
कविता की ख़ूब दाद दी।
तुमने मुझे जिस रंग में लपेटा, मैं लिपटता गया ׃
और जब लपेट न खुले—तुमने मुझे जला दिया।
मुझे, जलते हुए को भी तुम देखते रहे ׃ और वह
मुझे अच्छा लगता रहा।
एक ख़ुशबू जो मेरी पलकों में इशारों की तरह
बस गई है, जैसे तुम्हारे नाम की नन्हीं-सी
स्पेलिंग हो, छोटी-सी प्यारी-सी, तिरछी स्पेलिंग।
आह, तुम्हारे दाँतों से जो दूब के तिनके की नोक
उस पिकनिक में चिपकी रह गई थी,
आज तक मेरी नींद में गड़ती है।
अगर मुझे किसी से ईर्ष्या होती तो मैं
दूसरा जन्म बार-बार हर घंटे लेता जाता ׃
पर मैं तो जैसे इसी शरीर से अमर हूँ—
तुम्हारी बरकत!
बहुत-से तीर बहुत-सी नावें, बहुत-से पर इधर
उड़ते हुए आए, घूमते हुए गुज़र गए
मुझको लिए, सबके सब। तुमने समझा
कि उनमें तुम थे। नहीं, नहीं, नहीं।
उनमें कोई न था। सिर्फ़ बीती हुई
अनहोनी और होनी की उदास
रंगीनियाँ थीं। फ़क़त।

हमारे सिवा इनका रस कौन जाने!

शमशेर बहादुर सिंह

वो अपनों की बातें, वो अपनों की ख़ू—बू
हमारी ही हिंदी, हमारी ही उर्दू!
ये कोयल्-ओ-बुलबुल के मीठे तराने :
हमारे सिवा इनका रस कौन जाने!

प्रेम

शमशेर बहादुर सिंह

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
रूप नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
सांसारिक व्यवहार न ज्ञान
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
शक्ति न यौवन पर अभिमान
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
कुशल कलाविद् हूँ न प्रवीण
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
केवल भावुक दीन मलीन
फिर भी मैं करता हूँ प्यार।
मैंने कितने किए उपाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब विधि था जीवन असहाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब कुछ साधा, जप, तप, मौन,
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
कितना घूमा देश-विदेश
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
तरह-तरह के बदले वेष
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम।
उसकी बात-बात में छल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
माया ही उसका संबल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह वियोग का बादल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
छाया जीवन आकुल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
केवल कोमल, अस्थिर नभ-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह अंतिम भय-सी, विस्मय-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर।

प्रेम

शमशेर बहादुर सिंह

द्रव्य नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
रूप नहीं कुछ मेरे पास
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
सांसारिक व्यवहार न ज्ञान
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
शक्ति न यौवन पर अभिमान
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
कुशल कलाविद् हूँ न प्रवीण
फिर भी मैं करता हूँ प्यार
केवल भावुक दीन मलीन
फिर भी मैं करता हूँ प्यार।
मैंने कितने किए उपाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब विधि था जीवन असहाय
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
सब कुछ साधा, जप, तप, मौन,
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
कितना घूमा देश-विदेश
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम
तरह-तरह के बदले वेष
किंतु न मुझसे छूटा प्रेम।
उसकी बात-बात में छल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
माया ही उसका संबल है
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह वियोग का बादल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
छाया जीवन आकुल मेरा
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
केवल कोमल, अस्थिर नभ-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर
वह अंतिम भय-सी, विस्मय-सी
फिर भी है वह अनुपम सुंदर।

रात्रि

शमशेर बहादुर सिंह

एकमैं मींच कर आँखेंकि जैसे क्षितिजतुमको खोजता हूँ।दोओ हमारे साँस के सूर्य!साँस की गंगाअनवरत बह रही है।तुम कहाँ डूबे हुए हो?

लौट आ, ओ धार

शमशेर बहादुर सिंह

लौट आ ओ धार
टूट मत ओ साँझ के पत्थर
हृदय पर
(मैं समय की एक लंबी आह
मौन लंबी आह)
लौट आ; ओ फूल की पंखड़ी
फिर
फूल में लग जा
चूमता है धूल का फूल
कोई, हाय।

उषा

शमशेर बहादुर सिंह

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
[अभी गीला पड़ा है]
बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
और...
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।

उषा

शमशेर बहादुर सिंह

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
[अभी गीला पड़ा है]
बहुत काली सिल ज़रा-से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने
नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
और...
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।

चुका भी हूँ मैं नहीं!

शमशेर बहादुर सिंह

चुका भी हूँ मैं नहीं
कहाँ किया मैंने प्रेम
अभी।
जब करूँगा प्रेम
पिघल उठेंगे
युगों के भूधर
उफन उठेंगे
सात सागर।
किंतु मैं हूँ मौन आज
कहाँ सजे मैंने साज
अभी।
सरल से भी गूढ़, गूढ़तर
तत्तव निकलेंगे
अमित विषमय
जब मथेगा प्रेम सागर
हृदय।
निकटतम सबकी
अपर शौर्य्यों की
तुम
तब बनोगी एक
गहन मायामय
प्राप्त सुख
तुम बनोगी
तब
प्राप्त जय!

बात बोलेगी

शमशेर बहादुर सिंह

बात बोलेगी,
हम नहीं।
भेद खोलेगी
बात ही।
सत्य का मुख
झूठ की आँखें
क्या— —देखें!
सत्य का रुख़
समय का रुख़ है ׃
अभय जनता को
सत्य ही सुख है,
सत्य ही सुख।
दैन्य दानव; काल
भीषण; क्रूर
स्थिति ; कंगाल
बुद्धि; घर मजूर।
सत्य का
क्या रंग?—
पूछो
एक संग।
एक—जनता का
दुःख ׃ एक।
हवा में उड़ती पताकाएँ
अनेक।
दैन्य दानव। क्रूर स्थिति।
कंगाल बुद्धि ׃ मजूर घर-भर।
एक जनता का—अमर वर :
एकता का स्वर।
अन्यथा स्वातंत्र्य-इति।

बाबा हमारे, नागार्जुन बाबा

शमशेर बहादुर सिंह

बाबा हमारे, अली बाबा
नागार्जुन बाबा!!
‘खुल सीसेम!’ सबों के सामने—
कहते—सबों के सामने—
ख़ज़ानों की गुफाएँ
सबों के लिए खुल पड़तीं,
क्लासिक क्रांतिकारी ख़ज़ाने
बाहदुर कविता के जीते-जागते,
कभी न हार मानने वाली जनता के
बहादुर तराने
और ज़िंदा फ़साने
आँखों को चमकाने वाले,
दिलों को गरमाने वाले,
आज के इतिहास को
छंद में समझाने वाले :
—कभी धीमी गुनगुनाहटों में,
कभी थिरकते व्यंग्य में,
कभी करुण सन्नाटे में,
तो कभी बिगुल बजाते
और कभी चिमटा;
कभी बच्चों को हँसाते,
तो कभी जवानों को रिझाते,
और बूढ़ों की आँखों में
मस्ती लाते,
—ऐसे ख़ज़ाने कविता की
झोली में बरसाते
हमारे बाबा अली बाबा
नागार्जुन बाबा!!
***
“काहे घबराऽऽएऽ!!”
इस फ़िल्मी गीत के बोल
अपने बेटे के साथ
मिलकर गाते हुए
जब मैंने सुना था
—वह समाँ मुझे याद है!
चुटकी बजा-बजाकर,
मौज से भूख और अभाव को
बहलाते हुए,
मेरे अली बाबा,
गीतों के दस्तरख़ान बिछाए,
कविताओं के जाम चढ़ाए,
अभावों की गहरी छाने,
बेफ़िक्र, मस्त;
इसी मस्ती से क्रोध और आवेश के
कड़ुए घूँट को
किसी तरह मीठा-सा कुछ बनाए,
जनता के, जलते हुए अभावों की
आग में
नाचते हुए
अजब अमृत बरसाते
अनोखे ख़ज़ाने लुटाते,
आत्मा को तृप्त करते,
युग की गंगा में ग़ोते लगाते
अद्भुत स्वाँग बनाए,
आए मेरे बाबा अली बाबा
नागार्जुन!!

ईश्वर अगर मैंने अरबी में प्रार्थना की

शमशेर बहादुर सिंह

ईश्वर अगर मैंने अरबी में
प्रार्थना की तू मुझसे
नाराज़ हो जाएगा?
अल्लमह यदि मैंने संस्कृत में
संध्या कर ली तो तू
मुझे दोज़ख़ में डालेगा?
लोग तो यही कहते घूम रहे हैं।
तू बता, ईश्वर!
तू ही समझा, मेरे अल्लाह!
बहुत-सी प्रार्थनाएँ हैं
मुझे बहुत-बहुत
मोहती हैं।
ऐसा क्यों नहीं है कि
एक ही प्रार्थना मैं
दिल से क़ुबूल कर लूँ
और अन्य प्रार्थनाओं को
करने पर प्रायश्चित
करने का संकल्प करूँ!
क्योंकि तब मैं अधिक
धार्मिक अपने को महसूस
करूँगा, इसमें कोई संदेह
नहीं है।
सब यही कहते हैं
(मुझसे नहीं... उससे
भी अधिक उच्च घोषणा में
जो कि उनके कर्मों में
प्रसारित होती है।)
मैं चाहता हूँ उनके प्रचार
प्रसार से अभिभूत होना
क्योंकि अन्यथा मैं अपने को
अति ही अति ही
अति ही प्राचीन और
दक़ियानूसी महसूस करता
हूँ मानो मैं धर्म
और ईश्वर का
प्रारंभिक अर्थ नहीं
जानता।
हे मेरे ईश्वर, हे मेरे
अल्ला, मुझे
क्षमा करना! अफ़्व!
अफ़्व!
तुम दोनों ही मिल कर
मेरा अंत कर दो
बेहतर है। वह
शांति जो आज
न होने में है—
''न होता मैं तो क्या होता...!
न था मैं तो ख़ुदा था
कुछ न होता तो ख़ुदा होता!
डुबोया मुझको होने ने
न होता मैं तो क्या होता!''
x x x
x x x
आज वो नहीं है जो सुना
और कंठस्थ किया जाता है!
छपे काव्य में। लिपि संबंधी
दंगे
संस्कृति
बनने लगते हैं
जिसका शोध मेरे लिए दुरूहतम
साहित्य है
जन्म भर की आस्था के
बावजूद।
यह कविता नहीं मात्र
मेरी डायरी है
(अपनी मौलिक स्थिति में
छपाने की चीज़ नहीं
अपने से बातचीत है मात्र...
अपने मन के होंठों के स्वर
मन के कानों के लिए
अपने केवल मात्र...)
मनीषियो आलिमो
आचार्यो प्राचार्यो
अपना गहन अमूल्य समय
इन पंक्तियों को न देना यदि भूले से
इन्हें पढ़ने लगे हो
यहीं से इन्हें छोड़ देना।
...तो मैं कह रहा था

नेरूदा

शमशेर बहादुर सिंह

तुम्हारे साथ
विश्वव्याप्ति बन जाने की
एक धड़कन यह... मेरी एकांत मानव
यह
कैसी है!
प्रेम और मनुष्य और पर्वत शृंखला
और सागर का
यह पार्थिव यथार्थ
टकराव तुमुल
संघर्ष... एक निरंतर आंतरिक
सम्मिलन की उपलब्धि।
सह व्याप्ति का यह क्षण
मेरे अंदर जो यह
अपनाव तनाव का
—वही तो तू है
ह मा रा ने रू दा!

आओ

शमशेर बहादुर सिंह

एकक्यों यह धुकधुकी, डर,—दर्द की गर्दिश यकायक साँस तूफ़ान में गोया।छिपी हुई हाय-हाय मेंसुकूनकी तलाश।बर्फ़ के गालों में है खोया हुआया ठंडे पसीने में ख़ामोश हैशबाब।तैरती आती है बहारपाल गिराए हुएमीने गुलाब—पीले गुलाब के।तैरती आती है बहारख़ाब के दरिया मेंउफ़क़ सेजहाँ मौत के रंगीन पहाड़हैं।ज़ाफ़रानजो हवा में है मिला हुआसाँस में भी है।मुंँद गई पलकों में कोई सुबहजिसे ख़ून के आसार कहेंगे।—खो दिया है मैंने तुम्हें।दोकौन उधर है ये जिधर घाट की दीवार... है?वह जल में समाती हुई चली गई है;लहरों की बूँदों मेंकरोड़ों किरनोंकी ज़िंदगीका नाटक-सा : वहमैं तो नहीं हूँ।फिर क्यों मुझे (अंगों में सिमिट कर अपने)तुम भूल जाती होपल में ׃तुम कि हमेशा होगीमेरे साथ,तुम भूल न जाओ मुझे इस तरह।x x xएक गीत मुझे याद है।हर रोम के नन्हे-से कली-मुख पर कलसिहरन की कहानी मैं था;हर ज़र्रे में चुंबन के चमक की पहचान।पी जाता हूँ आँसू की कनी-सा वह पल।ओ मेरी बहार!तू मुझको समझती है बहुत-बहुत——तू जबयूँ ही मुझे बिसरा देती है।ख़ुश हूँ कि अकेला हूँ,कोई पास नहीं है—बजुज़ एक सूराही के,बजुज़ एक चटाई के,बजुज़ एक ज़रा-से आकाश के,जो मेरा पड़ोसी है मेरी छत पर(बजुज़ उसके, जो तुम होतीं—मगर हो फिर भीयहीं कहीं अजब तौर से।)तुम आओ, गर आना हैमेरे दीदों की वीरानी बसाओ;शे`र में ही तुमको समाना है अगरज़िंदगी में आओ मुजस्सिम...बहरतौर चली आओ।यहाँ और नहीं कोई, कहीं भी,तुम्हीं होगी, अगर आओ;तुम्हीं होगी अगर आओ, बहरतौर चली आओ अगर।(मैं तो हूँ साए में बँधा-सादामन में तुम्हारे ही कहीं, एक गिरह-सासाथ तुम्हारे।)तीन तुम आओ, तो ख़ुद घर मेरा आ जाएगाइस कोनो-मकाँ1 में,तुम जिसकी हया हो, लय हो।उस ऐन ख़मोशी की—हया-भरीइन सिम्तों की पहनाइयाँ 2मुझकोपहनाओ!तुम मुझकोइस अंदाज़ से अपनाओजिसे दर्द की बेगानारवी3 कहें,बादल की हँसी कहें,जिसे कोयल कीतूफ़ान-भरी सदियों कीचीख़ें,कि जिस ‘हम-तुम’ कहें।(वह गीत तुम्हें भी तो याद होगा?)

अम्न का राग

शमशेर बहादुर सिंह

सच्चाइयाँ
जो गंगा के गोमुख से मोती की तरह बिखरती रहती हैं
हिमालय की बर्फ़ीली चोटी पर चाँदी के उन्मुक्त नाचते
परों में झिलमिलाती रहती हैं
जो एक हज़ार रंगों के मोतियों का खिलखिलाता समंदर है
उमंगों से भरी फूलों की जवान कश्तियाँ
कि वसंत के नए प्रभात सागर में छोड़ दी गई हैं।
ये पूरब पश्चिम मेरी आत्मा के ताने-बाने हैं
मैंने एशिया की सतरंगी किरनों को अपनी दिशाओं के गिर्द
लपेट लिया
और मैं यूरोप और अमरीका की नर्म आँच की धूप-छाँव
पर
बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूँ
बहुत आदिम, बहुत अभिनव।
हम एक साथ उषा के मधुर अधर बन उठे
सुलग उठे हैं
सब एक साथ ढाई अरब धड़कनों में बज उठे हैं
सिम्फ़ोनिक आनंद की तरह
यह हमारी गाती हुई एकता
संसार के पंच परमेश्वर का मुकुट पहन
अमरता के सिंहासन पर आज हमारा अखिल लोक-प्रेसिडेंट
बन उठी है।
देखो न हक़ीक़त हमारे समय की कि जिसमें
होमर एक हिंदी कवि सरदार जाफ़री को
इशारे से अपने क़रीब बुला रहा है
कि जिसमें
फ़ैयाज़ ख़ाँ बिटाफ़ेन के कान में कुछ कह रहा है
मैंने समझा कि संगीत की कोई अमर लता हिल उठी
मैं शेक्सपियर का ऊँचा माथा उज्जैन की घाटियों में
झलकता हुआ देख रहा हूँ
और कालिदास को वैमर के कुंजों में विहार करते
और आज तो मेरा टैगोर मेरा हाफ़िज़ मेरा तुलसी मेरा
ग़ालिब
एक-एक मेरे दिल के जगमग पावर हाउस का
कुशल आपरेटर है।
आज सब तुम्हारे ही लिए शांति का युग चाहते हैं
मेरी कुटूबुटू
तुम्हारे ही लिए मेरे प्रतिभाशाली भाई तेजबहादुर
मेरे गुलाब की कलियों से हँसते-खेलते बच्चों
तुम्हारे ही लिए, तुम्हारे ही लिए
मेरे दोस्तो, जिनसे ज़िंदगी में मानी पैदा होते हैं
और उस निश्छल प्रेम के लिए
जो माँ की मूर्ति है
और उस अमर परमशक्ति के लिए जो पिता का रूप है।
हर घर में सुख
शांति का युग
हर छोटा-बड़ा हर नया-पुराना आज-कल-परसों के
आगे और पीछे का युग
शांति की स्निग्ध कला में डूबा हुआ
क्योंकि इसी कला का नाम जीवन की भरी-पूरी गति है।
मुझे अमरीका का लिबर्टी स्टैचू उतना ही प्यारा है
जितना मास्को का लाल तारा
और मेरे दिल में पेकिंग का स्वर्गीय महल
मक्का मदीना से कम पिवत्र नहीं
मैं काशी में उन आर्यों का शंखनाद सुनता हूँ
जो वोल्गा से आए
मेरी देहली में प्रह्लाद की तपस्याएँ दोनों दुनियाओं की
चौखट पर
युद्ध के हिरण्यकश्यप को चीर रही हैं।
यह कौन मेरी धरती की शांति की आत्मा पर क़ुरबान हो गया है
अभी सत्य की खोज तो बाक़ी ही थी
यह एक विशाल अनुभव की चीनी दीवार
उठती ही बढ़ती आ रही है
उसकी ईंटें धड़कते हुए सुर्ख़ दिल हैं
यह सच्चाइयाँ बहुत गहरी नींवों में जाग रही हैं
वह इतिहास की अनुभूतियाँ हैं
मैंने सोवियत यूसुफ़ के सीने पर कान रखकर सुना है।
आज मैंने गोर्की को होरी के आँगन में देखा
और ताज के साए में राजर्षि कुंग को पाया
लिंकन के हाथ में हाथ दिए हुए
और तालस्ताय मेरे देहाती यूपियन होंठों से बोल उठा
और अरागों की आँखों में नया इतिहास
मेरे दिल की कहानी की सुर्ख़ी बन गया
मैं जोश की वह मस्ती हूँ जो नेरुदा की भवों से
जाम की तरह टकराती है
वह मेरा नेरुदा जो दुनिया के शांति पोस्ट आफ़िस का
प्यारा और सच्चा क़ासिद
वह मेरा जोश कि दुनिया का मस्त आशिक़
मैं पंत के कुमार छायावादी सावन-भादों की चोट हूँ
हिलोर लेते वर्ष पर
मैं निराला के राम का एक आँसू
जो तीसरे महायुद्ध के कठिन लौह पर्दों को
एटमी सुई-सा पार कर गया पाताल तक
और वहीं उसको रोक दिया
मैं सिर्फ़ एक महान विजय का इंदीवर जनता की आँख में
जो शांति की पवित्रतम आत्मा है।
पच्छिम में काले और सफ़ेद फूल हैं और पूरब में पीले
और लाल
उत्तर में नीले कई रंग के और हमारे यहाँ चंपई-साँवले
और दुनिया में हरियाली कहाँ नहीं
जहाँ भी आसमान बादलों से ज़रा भी पोंछे जाते हों
और आज गुलदस्तों में रंग-रंग के फूल सजे हुए हैं
और आसमान इन ख़ुशियों का आईना है।
आज न्यूयार्क के स्काईस्क्रेपरों पर
शांति के ‘डवों’ और उसके राजहंसों ने
एक मीठे उजले सुख का हलका-सा अँधेरा
और शोर पैदा कर दिया है।
और अब वो आर्जंटीना की सिम्त अतलांतिक को पार
कर
रहे हैं
पाल राब्सन ने नई दिल्ली से नए अमरीका की
एक विशाल सिम्फ़नी ब्राडकास्ट की है
और उदयशंकर ने दक्षिणी अफ़्रीका में नई अजंता को
स्टेज पर उतारा है
यह महान नृत्य वह महान स्वर कला और संगीत
मेरा है यानी हर अदना से अदना इंसान का
बिल्कुल अपना निजी।
युद्ध के नक़्शों को क़ैंची से काटकर कोरियाई बच्चों ने
झिलमिली फूलपत्तों की रौशन फ़ानूसें बना ली हैं
और हथियारों का स्टील और लोहा हज़ारों
देशों को एक-दूसरे से मिलाने वाली रेलों के जाल में बिछ
गया है
और ये बच्चे उन पर दौड़ती हुई रेलों के डिब्बों की
खिड़कियों से
हमारी ओर झाँक रहे हैं
यह फ़ौलाद और लोहा खिलौनों मिठाइयों और किताबों
से लदे स्टीमरों के रूप में
नदियों की सार्थक सजावट बन गया है
या विशाल ट्रैक्टर-कम्बाई और फ़ैक्टरी-मशीनों के
हृदय में
नवीन छंद और लय का प्रयोग कर रहा है।
यह सुख का भविष्य शांति की आँखों में ही वर्तमान है
इन आँखों से हम सब अपनी उम्मीदों की आँखें सेंक
रहे हैं
ये आँखें हमारे दिल में रौशन और हमारी पूजा का
फूल हैं
ये आँखें हमारे क़ानून का सही चमकता हुआ मतलब
और हमारे अधिकारों की ज्योति से भरी शक्ति हैं
ये आँखें हमारे माता-पिता की आत्मा और हमारे बच्चों
का दिल हैं
ये आँखें हमारे इतिहास की वाणी
और हमारी कला का सच्चा सपना हैं
ये आँखें हमारा अपना नूर और पवित्रता हैं
ये आँखें ही अमर सपनों की हक़ीक़त और
हक़ीक़त का अमर सपना हैं
इनको देख पाना ही अपने आपको देख पाना है, समझ
पाना है।
हम मनाते हैं कि हमारे नेता इनको देख रहे हों।

चाँद से थोड़ी-सी गप्पें

शमशेर बहादुर सिंह

(दस-ग्यारह साल की एक लड़की)
गोल हैं ख़ूब मगर
आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा।
आप पहने हुए हैं कुल आकाश
तारों-जड़ा;
सिर्फ़ मुँह खोले हुए हैं अपना
गोरा-चिट्टा
गोल-मटोल,
अपनी पोशाक को फैलाए हुए चारों सिम्त।
आप कुछ तिरछे नज़र आते हैं जाने कैसे
—ख़ूब हैं गोकि!
वाह जी, वाह!
हमको बुद्ध ही निरा समझा है!
हम समझते ही नहीं जैसे कि
आपको बीमारी है :
आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,
और बढ़ते हैं तो बस यानी कि
बढ़ते ही चले जाते हैं—
हम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही
गोल न हो जाएँ,
बिलकुल गोल।
यह मर्ज़ आपका अच्छा ही नहीं होने में...
आता है।

चाँद से थोड़ी-सी गप्पें

शमशेर बहादुर सिंह

(दस-ग्यारह साल की एक लड़की)
गोल हैं ख़ूब मगर
आप तिरछे नज़र आते हैं ज़रा।
आप पहने हुए हैं कुल आकाश
तारों-जड़ा;
सिर्फ़ मुँह खोले हुए हैं अपना
गोरा-चिट्टा
गोल-मटोल,
अपनी पोशाक को फैलाए हुए चारों सिम्त।
आप कुछ तिरछे नज़र आते हैं जाने कैसे
—ख़ूब हैं गोकि!
वाह जी, वाह!
हमको बुद्ध ही निरा समझा है!
हम समझते ही नहीं जैसे कि
आपको बीमारी है :
आप घटते हैं तो घटते ही चले जाते हैं,
और बढ़ते हैं तो बस यानी कि
बढ़ते ही चले जाते हैं—
हम नहीं लेते हैं जब तक बि ल कु ल ही
गोल न हो जाएँ,
बिलकुल गोल।
यह मर्ज़ आपका अच्छा ही नहीं होने में...
आता है।

कत्थई गुलाब

शमशेर बहादुर सिंह

कत्थई गुलाब
दबाए हुए हैं
नर्म नर्म
केसरिया साँवलापन मानो
शाम की
अंगूरी रेशम की झलक,
कोमल
कोहरिल
बिजलियाँ-सी
लहराए हुए हैं
आकाशीय
गंगा की
झिलमिली ओढ़े
तुम्हारे
तन का छंद
गतस्पर्श
अति अति अति नवीन आशाओं भरा
तुम्हारा
बंद बंद
“ये लहरें घेर लेती हैं
ये लहरें...
उभरकर अर्द्धद्वितीया
टूट जाता है...”
किसका होगा यह पद
किस कवि-मन का
किस सरि-तट पर सुना?
ओ प्रेम की
असंभव सरलते
सदैव सदैव!

ओ मेरे घर

शमशेर बहादुर सिंह

ओ मेरे घर
ओ हे मेरी पृथ्वी
साँस के एवज़ तूने क्या दिया मुझे
—ओ मेरी माँ?
तूने युद्ध ही मुझे दिया
प्रेम ही मुझे दिया क्रूरतम कटुतम
और क्या दिया
मुझे भगवान दिए कई-कई
मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह!
और अद्भुत शक्तिशाली मकानीकी प्रतिमाएँ!
ऐसी मुझे ज़िंदगी दी
ओह
आँखें दीं जो गीली मिट्टी का बुदबुद-सी हैं
और तारे दिए मुझे अनगिनती
साँसों की तरह
अनगिनती इकाइयों में
मुझसे लगातार दूर जाते
मौत की व्यर्थ प्रतीक्षाओं-से!
और दी मुझे एक लंबे नाटक की
हँसी
फैली हुई
दर्शकशाला के इस छोर से उस छोर तक
लहराती कटु-क्रूर।
फिर मुझे जागना दिया, यह कहकर कि
लो और सोओ!
और वही तलवारें अँधेरे की
अंतिम लोरियों के बजाय!
इंसान के अँखौटे में डालकर मुझे
सब कुछ तो दे दिया :
जब मुझे मेरे कवि का बीज दिया कटु-तिक्त।
फिर एक ही जन्म में और क्या-क्या
चाहिए!


एक पीली शाम

शमशेर बहादुर सिंह

एक पीली शाम
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्ता
शांत
मेरी भावनाओं में तुम्हारा मुखकमल
कृश म्लान हारा-सा
(कि मैं हूँ वह
मौन दर्पण में तुम्हारे कहीं?)
वासना डूबी
शिथिल पल में
स्नेह काजल में
लिए अद्भुत रूप-कोमलता
अब गिरा अब गिरा वह अटका हुआ आँसू
सांध्य तारक-सा
अतल में।

चिकनी चाँदी-सी माटी

शमशेर बहादुर सिंह

चिकनी चाँदी-सी माटी
वह देह धूप में गीली
लेटी है हँसती-सी।

वह सलोना जिस्म

शमशेर बहादुर सिंह

शाम का बहुता हुआ दरिया कहाँ ठहरा!
साँवली पलकें नशीली नींद में जैसे झुकें
चाँदनी से भरी भारी बदलियाँ हैं,
ख़ाब में गीत पेंग लेते हैं
प्रेम की गुइयाँ झुलाती हैं उन्हें ׃
—उस तरह का गीत, वैसी, नींद, वैसी शाम-सा है
वह सलोना जिस्म।
उसकी अधखुली अँगड़ाइयाँ हैं
कमल के लिपटे हुए दल
कसे भीनी गंध में बेहोश भौंरे को
वह सुबह की चोट है हर पंखुड़ी पर।
रात की तारों-भरी शबनम
कहाँ डूबी है!
नर्म कलियों के
पर झटकते हैं हवा की ठंड को।
तितलियाँ गोया चमन की फ़िज़ा में नश्तर लगाती हैं।
—एक पल है यह समाँ
जागे हुए उस जिस्म का!
जहाँ शामें डूब कर फिर सुबह बनती हैं
एक-एक,—
और दरिया राग बनते हैं—कमल
फ़ानूस—रातें मोतियों की डाल—
दिन में
साड़ियों के-से नमूने चमन में उड़ते छबीले; वहाँ
गुनगुनाता भी सजीला जिस्म वह—
जागता भी
मौन सोता भी, न जाने
एक दुनिया की
उमीद-सा,
किस तरह!

तुमने मुझे

शमशेर बहादुर सिंह

तुमने मुझे और गूँगा बना दिया
एक ही सुनहरी आभा-सी
सब चीज़ों पर छा गई
मै और भी अकेला हो गया
तुम्हारे साथ गहरे उतरने के बाद
मैं एक ग़ार से निकला
अकेला, खोया हुआ और गूँगा
अपनी भाषा तो भूल ही गया जैसे
चारों तरफ़ की भाषा ऐसी हो गई
जैसे पेड़-पौधों की होती है
नदियों में लहरों की होती है
हज़रत आदम के यौवन का बचपना
हज़रत हौवा की युवा मासूमियत
कैसी भी! कैसी भी!
ऐसा लगता है जैसे
तुम चारों तरफ़ से मुझसे लिपटी हुई हो
मैं तुम्हारे व्यक्तित्व के मुख में
आनंद का स्थायी ग्रास... हूँ
मूक।

निराला के प्रति

शमशेर बहादुर सिंह

भूल कर जब राह—जब जब राह... भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम की आँख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन मेरे लिए—
जगत के उन्माद का
परिचय लिए,—
ओर आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए—
प्राणमय संचार करते शक्ति औ’ छवि के मिलन का हास मंगलमय;
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कंठस्वर से तुम्हारे, कवि,
एक—ऋतुओं के विहँसते सूर्य!
काल में (तम घोर)—
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह!
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
साधना स्वर से
शांत-शीतलतम।
हाँ, तुम्ही हो, एक मेरे कवि :
जानता क्या मैं—
हृदय में भर कर तुम्हारी साँस—
किस तरह गाता,
(ओ विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे!

काल, तुझसे होड़ है मेरी

शमशेर बहादुर सिंह

काल,
तुझसे होड़ है मेरी ׃ अपराजित तू—
तुझमें अपराजित मैं वास करूँ।
इसीलिए तेरे हृदय में समा रहा हूँ
सीधा तीर-सा, जो रुका हुआ लगता हो—
कि जैसा ध्रुव नक्षत्र भी न लगे,
एक एकनिष्ठ, स्थिर, कालोपरि
भाव, भावोपरि
सुख, आनंदोपरि
सत्य, सत्यासत्योपरि
मैं—तेरे भी, ओ ‘काल’ ऊपर!
सौंदर्य यही तो है, जो तू नहीं है, ओ काल!
जो मैं हूँ—
मैं कि जिसमें सब कुछ है...
क्रांतियाँ, कम्यून,
कम्युनिस्ट समाज के
नाना कला विज्ञान और दर्शन के
जीवंत वैभव से समन्वित
व्यक्ति मैं।
मैं, जो वह हरेक हूँ
जो, तुझसे, ओ काल, परे है।

लेकर सीधा नारा

शमशेर बहादुर सिंह

लेकर सीधा नारा
कौन पुकारा
अंतिम आशाओं की संध्याओं से?
पलकें डूबी ही-सी थीं—
पर अभी नहीं;
कोई सुनता-सा था मुझे
कहीं;
फिर किसने यह, सातों सागर के पार
एकाकीपन से ही, मानो—हार,
एकाकी उठ मुझे पुकारा
कई बार?
मैं समाज तो नहीं; न मैं कुल
जीवन;
कण-समूह में हूँ मैं केवल
एक कण।
—कौन सहारा!
मेरा कौन सहारा!

अज्ञेय से

शमशेर बहादुर सिंह

जो नहीं है
जैसे कि ‘सुरुचि’
उसका ग़म क्या?
वह नहीं है।
किससे लड़ना?
रुचि तो है शांति,
स्थिरता,
काल-क्षण में
एक सौंदर्य की
मौन अमरता।
अस्थिर क्यों होना
फिर?
जो है
उसे ही क्यों न सँजोना?
उसी के क्यों न होना?—
जो कि है।
जो नहीं है
जैसे कि सुरुचि
उसका ग़म क्या?
वह नहीं है।

तुमको पाना है अविराम

शमशेर बहादुर सिंह

तुमको पाना है, अविराम
सब मिथ्याओं में,
ओ मेरी सत्य!
मुझसे दूर अलग न जाओ।
मुझको छोड़ न दो
कहीं मुझको छोड़ न दो
तुम्हें मेरे प्राणों की सौगंध।
जाओ
किंतु मुझसे बसकर
सुगंध की तरह
मेरे साथ
मैं हवा की तरह अदृश्य ही जब हो जाऊँ
जहाँ कहीं जाओ।
तुम मुझको दो
अपना रूप
अपना मद
अपना यौवन
अपनी शक्ति
अपनी माया
अपना प्रेम छल
अपना सत्य—मेरा!
ओ मेरी ही केवल तुम
मेरे साथ रहो
मुझको छोड़ो नहीं
स्वप्न में भी,
तुमको
मेरे प्राणों की शपथ
मलूँगा मैं वक्ष से तुम्हारे
अपने जीवन का समस्त वक्षस्थल
लिपटूँगा मैं अंग-अंग से तुम्हारे
मधुरतम सुवास बन
उच्च से उच्चतर मैं हूँगा तुम्हारे ब्रह्मांड में—
तुम्हारे हृदय में—
तुम्हारा ही बनूँगा मैं, केवल तुम्हारा।
हूँ मैं तुम्हारा उपेक्षित भाव
सुधर-सा रहा हूँ पर धीरे-धीरे
अंगीकृत होने।
ओ मेरी सुख,
मेरी समस्त कल्पना के पीछे एक सत्य
मुझ उपेक्षित को स्नेह स्वीकृत करो
मेरे जीवन की सुख
सरल सहवास का सौंदर्य
मधुर ऐक्य सुख।

सूना-सूना पथ है, उदास झरना

शमशेर बहादुर सिंह

सूना-सूना पथ है, उदास झरना
एक धुँधली बादल-रेखा पर टिका हुआ
आसमान
जहाँ वह काली युवती
हँसी थी।

ये लहरें घेर लेती हैं

शमशेर बहादुर सिंह

ये लहरें घेर लेती हैं
ये लहरें...
उभर कर अर्द्ध द्वितीया
टूट जाता है...
अंतरिक्ष में
ठहरा एक
दीर्घ रहेगा समतल—मौन
दूर... उत्तर पूर्व तक
तीन
ब्रह्मांड
टूटे हुए मिले चले गए हैं
अगिन व्यथा भर सहसा
कौन भाव
बिखर गया इन सब पर?

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता

शमशेर बहादुर सिंह

एक आदमी दो पहाड़ों को कुहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक क़दम से नापता
बढ़ रहा है
कितनी ऊँची घासें चाँद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ
फिर क्यों
दो बादलों के तार
उसे महज़ उलझा रहे हैं?

सुबह

शमशेर बहादुर सिंह

जो कि सिकुड़ा हुआ बैठा था, वो पत्थर
सजग-सा होकर पसरने लगा
आप से आप।

एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा

शमशेर बहादुर सिंह

एक ठोस बदन अष्टधातु का-सा
सचमुच?
जंघाएँ दो ठोस दरिया
ठै रे हुए-से
मगर जानता हूँ कि वो
बराबर-बराबर बहुत तेज़
रौ में हैं
ठै रा हुआ-सा मैं हूँ मेरी
दृष्टि एकटक्
ठोस वक्ष कपोल उभरे हुए चारों
निमंत्रण देते चैलेंज-सा
चारों एक साथ
अपनी स्थिरता में, चल
काल की तरह
चरण
हैं वहीं मगर दर अस्ल हैं नहीं वहाँ
वो उस अष्टधातु की मूर्ति को
कहीं लिए जा रहे हैं
शायद
मेरे व्यक्तित्व के अदृश्य सागर की ओर।

स्थिर है शव-सी बात

शमशेर बहादुर सिंह

स्थिर है शव-सी बात।
लटका है पश्चिम के घर में
आधा चाँद कटोरा काँसे का-सा।
सीसे की-सी नीली रात।
वह स्वप्नों की ओट
निश्चल आँखें देख रही हैं।
ठिठुरे काले पेड़ खड़े हैं मिल कर।
सूख रहे हैं मेरे होंट।
नत जीवन का भाल।
प्रेम पड़ा है ठंडा मानव-उर का।
निद्रा तम के शून्य शिविर में
अँधा पंगु बँधा है काल।


मुझको मिलते हैं अदीब और कलाकार बहुत

शमशेर बहादुर सिंह

मुझको मिलते हैं अदीब और कलाकार बहुत
लेकिन इंसान के दर्शन हैं मुहाल।
दर्द की एक तड़प—
हल्के-से दर्द की एक तड़प,
सच्ची तड़प
मैंने अगलों के यहाँ देखी है;—
या तो वह आज है ख़ामोश तबस्सुम में ज़लील
या वो है कफ़-आलूद;
या वो दहशत का पता देती है;
या हिरासाँ है;
या फिर इस दौर के ख़ाको-ख़ूँ में
गुमगश्ता है।

वाम वाम वाम दिशा

शमशेर बहादुर सिंह

वाम वाम वाम दिशा,
समय साम्यवादी।
पृष्ठभूमि का विरोध अंधकार-लीन। व्यक्त...
कुहाऽस्पष्ट हृदय-भार, आज हीन।
हीनभाव, हीनभाव
मध्यवर्ग का समाज, दीन।
किंतु उधर
पथ-प्रदर्शिका मशाल
कमकर की मुट्ठी में—किंतु उधर :
आगे-आगे जलती चलती है
लाल-लाल
वज्र-कठिन कमकर की मुट्ठी में
पथ-प्रदर्शिका मशाल।
भारत का
भूत-वर्तमान औ’ भविष्य का वितान लिए
काल-मान-विज्ञ मार्क्स-मान में तुला हुआ
वाम वाम वाम दिशा,
समय ׃ साम्यवादी।
अंग-अंग एकनिष्ठ
ध्येय-धीर
सेनानी
वीर युवक
अति बलिष्ठ
वामपंथगामी वह...
समय ׃ साम्यवादी।
लोकतंत्र-पूत वह
दूत, मौन, कर्मनिष्ठ
जनता का ׃
एकता-समन्वय वह...
मुक्ति का धनंजय वह
चिरविजयी वय में वह
ध्येय-धीर
सेनानी
अविराम
वाम-पक्षवादी है...
समय ׃ साम्यवादी।

‘निशा निमंत्रण’ के कवि से

शमशेर बहादुर सिंह

यह खँडहर की साँस
तुम जिसे भर रहे हो वंशी में—
है तंग घुटी-सी सुबह
लाल सफ़ेद सियाह!
कठिन राग है जिसे
तुम फिर-फिर भूल रहे हो, देखो—
जो तख़्ते से लिपटी है,
यह मरने की वह ख़ुशी!
मत गाओ यह गीत!
मैं बिखर पड़ूँगा पागलपन में।
ओ दूर अजान मुसाफ़िर,
यह हँसी मरुस्थल की है!

सींग और नाख़ून

शमशेर बहादुर सिंह

सींग और नाख़ून
लोहे के बक्तर कंधों पर।
सीने में सूराख़ हड्डी का।
आँखों में ׃ घास-काई की नमी।
एक मुर्दा हाथ
पाँव पर टिका
उलटी क़लम थामे।
तीन तसलों में कमर का घाव सड़ चुका है।
जड़ों का भी कड़ा जाल
हो चुका पत्थर।

एक नीला आईना बेठोस

शमशेर बहादुर सिंह

एक नीला आईना
बेठोस-सी यह चाँदनी
और अंदर चल रहा हूँ मैं
उसी के महातल के मौन में।
मौन मैं इतिहास का
कन किरन जीवित, एक, बस।
एक पल के ओट में है कुल जहान।
आत्मा है
अखिल की हठ-सी।
चाँदनी में घुल गए हैं
बहुत-से तारे बहुत कुछ
घुल गया हूँ मैं
बहुत कुछ अब।
रह गया सा एक सीधा बिंब
चल रहा है जो
शांत इंगित-सा
न जाने किधर।

शिला का ख़ून पीती थी

शमशेर बहादुर सिंह

शिला का ख़ून पीती थी
वह जड़
जो कि पत्थर थी स्वयं।
सीढ़ियाँ थीं बादलों की झूलतीं,
टहनियों-सी।
और वह पक्का चबूतरा,
ढाल में चिकना ׃
सुतल था
आत्मा के कल्पतरु का?

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