Nazeer Akbarabadi Ghazal : नज़ीर अकबराबादी की ग़ज़लें
नज़ीर अकबराबादी उर्दू शायरी के ऐसे अनोखे कवि थे जिन्होंने कविता को राजदरबारों और अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर आम लोगों के जीवन से जोड़ा। उनका वास्तविक नाम वली मुहम्मद था और ‘नज़ीर’ उनका तख़ल्लुस था। उनका जन्म 1735 के आसपास दिल्ली में हुआ था, जबकि जीवन का बड़ा हिस्सा आगरा में बीता।
दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हम : नज़ीर अकबराबादी
दूर से आए थे साक़ी सुन के मय-ख़ाने को हमबस तरसते ही चले अफ़्सोस पैमाने को हम
मय भी है मीना भी है साग़र भी है साक़ी नहीं
दिल में आता है लगा दें आग मय-ख़ाने को हम
क्यूँ नहीं लेता हमारी तू ख़बर ऐ बे-ख़बर
क्या तिरे आशिक़ हुए थे दर्द-ओ-ग़म खाने को हम
हम को फँसना था क़फ़स में क्या गिला सय्याद का
बस तरसते ही रहे हैं आब और दाने को हम
ताक़-ए-अबरू में सनम के क्या ख़ुदाई रह गई
अब तो पूजेंगे उसी काफ़िर के बुत-ख़ाने को हम
बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम
क्या हुई तक़्सीर हम से तू बता दे ऐ 'नज़ीर'
ताकि शादी-मर्ग समझें ऐसे मर जाने को हम
कहा जो हम ने हमें दर से क्यूँ उठाते हो : नज़ीर अकबराबादी
कहा जो हम ने हमें दर से क्यूँ उठाते होकहा कि इस लिए तुम याँ जो ग़ुल मचाते हो
कहा लड़ाते हो क्यूँ हम से ग़ैर को हमदम
कहा कि तुम भी तो हम से निगह लड़ाते हो
कहा जो हाल-ए-दिल अपना तो उस ने हँस हँस कर
कहा ग़लत है ये बातें जो तुम बनाते हो''
कहा जताते हो क्यूँ हम से रोज़ नाज़-ओ-अदा
कहा कि तुम भी तो चाहत हमें जताते हो
कहा कि 'अर्ज़ करें हम पे जो गुज़रता है
कहा ख़बर है हमें क्यूँ ज़बाँ पे लाते हो
कहा कि रूठे हो क्यूँ हम से क्या सबब इस का
कहा सबब है यही तुम जो दिल छुपाते हो''
कहा कि हम नहीं आने के याँ तो उस ने 'नज़ीर'
कहा कि सोचो तो क्या आप से तुम आते हो
हम अश्क-ए-ग़म हैं अगर थम रहे रहे न रहे : नज़ीर अकबराबादी
हम अश्क-ए-ग़म हैं अगर थम रहे रहे न रहेमिज़ा पे आन के टुक जम रहे रहे न रहे
रहें वो शख़्स जो बज़्म-ए-जहाँ की रौनक़ हैं
हमारी क्या है अगर हम रहे रहे न रहे
मुझे है नज़्अ' वो आता है देखने अब आह
कि उस के आने तलक दम रहे रहे न रहे
बक़ा हमारी जो पूछो तो जूँ चराग़-ए-मज़ार
हवा के बीच कोई दम रहे रहे न रहे
मिलो जो हम से तो मिल लो कि हम ब-नोक-ए-गियाह
मिसाल-ए-क़तरा-ए-शबनम रहे रहे न रहे
यही है अज़्म कि दिल भर के आज रो लीजे
कि कल ये दीदा-ए-पुर-नम रहे रहे न रहे
तुम्हारे ग़म में ग़रज़ हम तो दे चुके हैं जी
बला से तुम को भी अब ग़म रहे रहे न रहे
यही समझ लो हमें तुम कि इक मुसाफ़िर हैं
जो चलते चलते कहीं थम रहे रहे न रहे
'नज़ीर' आज ही चल कर बुतों से मिल लीजे
फिर इश्तियाक़ का आलम रहे रहे न रहे
लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता था : नज़ीर अकबराबादी
लिपट लिपट के मैं उस गुल के साथ सोता थारक़ीब सुब्ह को मुँह आँसुओं से धोता था
तमाम रात थी और कुहनीयाँ ओ लातें थीं
न सोने देता था मुझ को न आप सोता था
जो बात हिज्र की आती तो अपने दामन से
वो आँसू पोंछता जाता था और मैं रोता था
मसक्ती चोली तो लोगों से छुप के सीने को
वो तागे बटता था और मैं सूई पिरोता था
ग़रज़ दिखाने को आन ओ अदा के सौ आलम
वो मुझ से पाँव धुलाता था और मैं धोता था
लिटा के सीने पे चंचल को प्यार से हर-दम
मैं गुदगुदाता था हँस हँस वो ज़ोफ़ खोता था
वो मुझ पे फेंकता पानी की कुल्लियाँ भर भर
मैं उस के छींटों से तो पैरहन भिगोता था
नहाने जाते तो फिर आह करती छींटों से
वो ग़ोते देता था और मैं उसे डुबोता था
हुआ न मुझ को ख़ुमार आख़िर उन शराबों का
'नज़ीर' आह इसी रोज़ को मैं रोता था
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न हो : नज़ीर अकबराबादी
जुदा किसी से किसी का ग़रज़ हबीब न होये दाग़ वो है कि दुश्मन को भी नसीब न हो
जुदा जो हम को करे उस सनम के कूचे से
इलाही राह में ऐसा कोई रक़ीब न हो
इलाज क्या करें हुकमा तप-ए-जुदाई का
सिवाए वस्ल के इस का कोई तबीब न हो
'नज़ीर' अपना तो मा'शूक़ ख़ूबसूरत है
जो हुस्न उस में है ऐसा कोई अजीब न हो
जब मैं सुना कि यार का दिल मुझ से हट गया : नज़ीर अकबराबादी
जब मैं सुना कि यार का दिल मुझ से हट गयासुनते ही इस के मेरा कलेजा उलट गया
फ़रहाद था तो शीरीं के ग़म में मुआ ग़रीब
लैला के ग़म में आन के मजनूँ भी लट गया
मैं इश्क़ का जला हूँ मिरा कुछ नहीं इलाज
वो पेड़ क्या हरा हो जो जड़ से उखट गया
इतना कोई कहे कि दिवाने पड़ा है क्या
जा देख अभी उधर कोई परियों का ग़ट गया
छीना था दिल को चश्म ने लेकिन मैं क्या करूँ
ऊपर ही ऊपर उस सफ़-ए-मिज़्गाँ में पट गया
क्या खेलता है नट की कला आँखों आँखों में
दिल साफ़ ले लिया है जो पूछा तो नट गया
आँखों में मेरी सुब्ह-ए-क़यामत गई झमक
सीने से उस परी के जो पर्दा उलट गया
सुन कर लगी ये कहने वो अय्यार-ए-नाज़नीं
''क्या बोलें चल हमारा तो दिल तुझ से फट गया''
जब मैं ने उस सनम से कहा क्या सबब है जान
इख़्लास हम से कम हुआ और प्यार घट गया
ऐसी वो भारी मुझ से हुई कौन सी ख़ता
जिस से ये दिल उदास हुआ जी उचट गया
आँखें तुम्हारी क्या फिरीं उस वक़्त मेरी जान
सच पूछिए तो मुझ से ज़माना उलट गया
उश्शाक़ जाँ-निसारों में मैं तो इमाम हूँ
ये कह के मैं जो उस के गले से लिपट गया
कितना ही उस ने तन को छुड़ाया झिड़क झिड़क
पर मैं भी क़ैंची बाँध के ऐसा चिमट गया
ये कश्मकश हुई कि गरेबाँ मिरा उधर
टुकड़े हुआ और उस का दुपट्टा भी फट गया
आख़िर इसी बहाने मिला यार से 'नज़ीर'
कपड़े बला से फट गए सौदा तो पट गया
इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने है : नज़ीर अकबराबादी
इश्क़ फिर रंग वो लाया है कि जी जाने हैदिल का ये रंग बनाया है कि जी जाने है
नाज़ उठाने में जफ़ाएँ तो उठाईं लेकिन
लुत्फ़ भी ऐसा उठाया है कि जी जाने है
ज़ख़्म उस तेग़-ए-निगह का मिरे दिल ने हँस कर
इस मज़े-दारी से खाया है कि जी जाने है
उस की दुज़्दीदा निगह ने मिरे दिल में छुप कर
तीर इस ढब से लगाया है कि जी जाने है
बाम पर चढ़ के तमाशे को हमें हुस्न अपना
इस तमाशे से दिखाया है कि जी जाने है
उस की फ़ुर्क़त में हमें चर्ख़-ए-सितमगार ने आह
ये रुलाया, ये रुलाया है कि जी जाने है
हुक्म चुप्पी का हुआ शब तो सहर तक हम ने
रतजगा ऐसा मनाया है कि जी जाने है
तलवे सहलाने में गो ऊँघ के झुक झुक तो पड़े
पर मज़ा भी वो उड़ाया है कि जी जाने है
रंज मिलने के बहुत दिल ने सहे लेक 'नज़ीर'
यार भी ऐसा मिलाया है कि जी जाने है
ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा है : नज़ीर अकबराबादी
ये हुस्न है आह या क़यामत कि इक भभूका भभक रहा हैफ़लक पे सूरज भी थरथरा कर मुँह उस का हैरत से तक रहा है
खजूरी चोटी अदा में मोटी जफ़ा में लम्बी वफ़ा में छोटी
है ऐसी खोटी कि दिल हर इक का हर एक लट में लटक रहा है
वो नीची काफ़िर सियाह पट्टी कि दिल के ज़ख़्मों पे बाँधे पट्टी
पढ़ी है जिस ने कि उस की पट्टी वो पट्टी से सर टपक रहा है
वो माथा ऐसा कि चाँद निखरे फिर उस के ऊपर वो बाल बिखरे
दिल उस के देखे से क्यूँ न बिखरे कि मिस्ल-ए-सूरज चमक रहा है
वो चीन ख़ुद-रौ कटीले अबरू वो चश्म जादू निगाहें आहू
वो पलकें कज-ख़ू कि जिन का हर मू जिगर के अंदर खटक रहा है
ग़ज़ब वो चंचल की शोख़-बीनी फिर उस पे नथुनों की नुक्ता-चीनी
फिर उस पे नथ की वो हम-नशीनी फिर उस पे मोती फड़क रहा है
लब ओ दहाँ भी वो नर्म-ओ-नाज़ुक मिसी ओ पाँ भी वो क़हर-ओ-आफ़त
सुख़न भी करने की वो लताफ़त कि गोया मोती टपक रहा है
वो कान ख़ूबी में छक रहे हैं जवाहरों में झमक रहे हैं
इधर को झुमके झमक रहे हैं उधर का बाला चमक रहा है
सुराही गर्दन वो आबगीना फिर आगे सीना भी जूँ नगीना
भरा है जिस में तमाम कीना कि जूँ नगीना दमक रहा है
कुचें वो कुछ कुछ समर दरख़्ती कुछ उन की सख़्ती वो कुछ करख़्ती
हैं जिस ने देखे वो फल दरख़्ती कलेजा उस का धड़क रहा है
वो सुर्ख़ अंगिया जो कस रही है वो चुस रही है उकस रही है
कुछ ऐसे ढब से वो कस रही है कि उस का कसना कसक रहा है
वो पेट दिल को लपेट लेवे वो नाफ़ जी को समेट लेवे
मज़ार जी का झपेट लेवे कुछ ऐसा पेड़ू फड़क रहा है
वो पीठ गोरी कमर वो पतली ग़ज़ब लगावट वो फिर सुरीं की
अब आगे कहिए तो क्या कहूँ मैं कि होश इस जा ठिठुक रहा है
फ़क़त वो चम्पे की इक कली है कुछ इक मुँदी है कुछ इक खुली है
सलाख़ सोने की इक डली है कि गोया कुंदन दमक रहा है
वो प्यारी रानें वो गोल साक़ें वो कफ़ मुलाएम वो नर्म पहुँचे
कड़ी कड़ी से खड़क रही है कड़ा कड़े से खड़क रहा है
'नज़ीर' ख़ूबी मैं उस परी की कहूँ कहाँ तक सना बना कर
सिफ़त सरापा में जिस के लिखने दिल अब उसी से अटक रहा है
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी है : नज़ीर अकबराबादी
सरापा हुस्न-ए-समधन गोया गुलशन की कियारी हैपरी भी अब तो बाज़ी हुस्न में समधन से मारी है
खिंची कंघी गुँधी चोटी जमी पट्टी लगा काजल
कमाँ-अबरू नज़र जादू निगह हर इक दुलारी है
जबीं महताब आँखें शोख़ शीरीं लब गुहर दंदाँ
बदन मोती दहन ग़ुंचे अदा हँसने की प्यारी है
नया कम-ख़्वाब का लहँगा झमकते ताश की अंगिया
कुचें तस्वीर सी जिन पे लगा गोटा कनारी है
मुलाइम पेट मख़मल सा कली सी नाफ़ की सूरत
उठा सीना सफ़ा पेड़ू अजब जोबन की नारी है
सुरीं नाज़ुक कमर पतली ख़त-ए-गुलज़ार रूमा दिल
कहूँ क्या आगे अब इस के मक़ाम-ए-पर्दादारी है
लटकती चाल मध-माती चले बिच्छों को झनकाती
अदा में दिल लिए जाती अजब समधन हमारी है
भरे जोबन पे इतराती झमक अंगिया की दिखलाती
कमर लहंगे से बल खाती लटक घूँघट की भारी है
अंदाज़ कुछ और नाज़-ओ-अदा और ही कुछ है : नज़ीर अकबराबादी
अंदाज़ कुछ और नाज़-ओ-अदा और ही कुछ हैजो बात है वो नाम-ए-ख़ुदा और ही कुछ है
न बर्क़ न ख़ुर्शीद न शो'ला न भभूका
क्यूँ साहिबो ये हुस्न है या और ही कुछ है
बिल्लोर की चमकें हैं न अल्मास की झमकें
उस गोरे से सीने की सफ़ा और ही कुछ है
पीछे को नज़र की तो वो गुद्दी है क़यामत
आगे को जो देखा तो गिला और ही कुछ है
सीने पे कहा मैं ने ये दो सेब हैं क्या हैं
शर्मा के ये चुपके से कहा और ही कुछ है
तुम बातें हमें कहते हो और सुनते हैं हम चुप
अपनी भी ख़मोशी में सदा और ही कुछ है
हैं आप की बातें तो शकर-रेज़ पर ऐ जाँ
इस गूँगे के गुड़ में भी मज़ा और ही कुछ है
पूछी जो दवा हम ने तबीबों से तो बोले
बीमारी नहीं है ये बला और ही कुछ है
उन्नाब न ख़ुतमी न बनफ़शा न ख़ियारीन
इस ढब के मरीज़ों की दवा और ही कुछ है
हम को तो 'नज़ीर' उन से शिकायत है जफ़ा की
और उन का जो सुनिए तो गिला और ही कुछ है
न मैं दिल को अब हर मकाँ बेचता हूँ : नज़ीर अकबराबादी
न मैं दिल को अब हर मकाँ बेचता हूँकोई ख़ूब-रू ले तो हाँ बेचता हूँ
वो मय जिस को सब बेचते हैं छुपा कर
मैं उस मय को यारो 'अयाँ बेचता हूँ
ये दिल जिस को कहते हैं अर्श-ए-इलाही
सो उस दिल को यारो मैं याँ बेचता हूँ
ज़रा मेरी हिम्मत तो देखो अज़ीज़ो
कहाँ की है जिंस और कहाँ बेचता हूँ
लिए हाथ पर दिल को फिरता हूँ यारो
कोई मोल लेवे तो हाँ बेचता हूँ
वो कहता है जी कोई बेचे तो हम लें
तो कहता हूँ लो हाँ मियाँ बेचता हूँ
मैं एक अपने यूसुफ़ की ख़ातिर अज़ीज़ो
ये हस्ती का सब कारवाँ बेचता हूँ
जो पूरा ख़रीदार पाऊँ तो यारो
मैं ये सब ज़मीन-ओ-ज़माँ बेचता हूँ
ज़मीं आसमाँ अर्श-ओ-कुर्सी भी क्या है
कोई ले तो मैं ला-मकाँ बेचता हूँ
जिसे मोल लेना हो ले ले ख़ुशी से
मैं इस वक़्त दोनों जहाँ बेचता हूँ
बिकी जिंस ख़ाली दुकाँ रह गई है
सो अब इस दुकाँ को भी हाँ बेचता हूँ
मोहब्बत के बाज़ार में ऐ 'नज़ीर' अब
मैं आजिज़ ग़रीब अपनी जाँ बेचता हूँ
दिल यार की गली में कर आराम रह गया : नज़ीर अकबराबादी
दिल यार की गली में कर आराम रह गयापाया जहाँ फ़क़ीर ने बिसराम रह गया
किस किस ने उस के इश्क़ में मारा न दम वले
सब चल बसे मगर वो दिल-आराम रह गया
जिस काम को जहाँ में तू आया था ऐ 'नज़ीर'
ख़ाना-ख़राब तुझ से वही काम रह गया
ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला है : नज़ीर अकबराबादी
ये छपके का जो बाला कान में अब तुम ने डाला हैइसी बाले की दौलत से तुम्हारा बोल-बाला है
नज़ाकत सर से पाँव तक पड़ी क़ुर्बान होती है
इलाही उस बदन को तू ने किस साँचे में ढाला है
ये दिल क्यूँकर निगह से उस की छिदते हैं मैं हैराँ हूँ
न ख़ंजर है न नश्तर है न जमधर है न भाला है
बलाएँ नाग काले नागिनें और साँप के बच्चे
ख़ुदा जाने कि इस जूड़े में क्या क्या बाँध डाला है
न ग़ोल आता है ख़ूबाँ का सरक ऐ दिल मैं कहता हूँ
ये कम्पू की नहीं पलटन ये परियों का रिसाला है
जिसे तुम ले के बेदर्दी से पाँव में कुचलते हो
ये दिल मैं ने तो ऐ साहब बड़ी मेहनत से पाला है
'नज़ीर' इक और लिख ऐसी ग़ज़ल जो सुन के जी ख़ुश हो
अरी इस ढब की बातों ने तो दिल में शोर डाला है
तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिब : नज़ीर अकबराबादी
तुम्हारे हाथ से कल हम भी रो लिए साहिबजिगर के दाग़ जो धोने थे धो लिए साहिब
ग़ुलाम आशिक़ ओ चाकर मुसाहिब ओ हमराज़
ग़रज़ जो था हमें होना सो हो लिए साहिब
क़रार-ओ-सब्र जो करने थे कर चुके बर्बाद
हवास-ओ-होश जो खोने थे खो लिए साहिब
हमारे वज़्न-ए-मोहब्बत में कुछ हो फ़र्क़ तो अब
फिर इम्तिहाँ की तराज़ू में तौलिए साहिब
कुछ इंतिहा-ए-बुका हो तो और भी यक-चंद
सरिश्क-ए-चश्म से मोती को रोलिए साहिब
कल उस सनम ने कहा देख कर हमें ख़ामोश
कि अब तो आप भी टुक लब को खोलिए साहिब
ये सुन के मैं ने 'नज़ीर' उस से यूँ कहा हँस कर
जो कोई बोले तो अलबत्ता बोलिए साहिब
अगर है मंज़ूर ये कि होवे हमारे सीने का दाग़ ठंडा : नज़ीर अकबराबादी
अगर है मंज़ूर ये कि होवे हमारे सीने का दाग़ ठंडातो आ लिपटिए गले से ऐ जाँ झमक से कर झप चराग़ ठंडा
हम और तुम जाँ अब इस क़दर तो मोहब्बतों में हैं एक तन मन
लगाया तुम ने जबीं पे संदल हुआ हमारा दिमाग़ ठंडा
लबों से लगते ही हो गई थी तमाम सर्दी दिल-ओ-जिगर में
दिया था साक़ी ने रात हम को कुछ ऐसे मय का अयाग़ ठंडा
दरख़्त भीगे हैं कल के मेंह से चमन चमन में भरा है पानी
जो सैर कीजे तो आज साहब अजब तरह का है बाग़ ठंडा
वही है कामिल 'नज़ीर' इस जा वही है रौशन-दिल ऐ अज़ीज़ो
हवा से दुनिया की जिस के दिल का न होवे हरगिज़ चराग़ ठंडा
उस के शरार-ए-हुस्न ने शो'ला जो इक दिखा दिया : नज़ीर अकबराबादी
उस के शरार-ए-हुस्न ने शो'ला जो इक दिखा दियातूर को सर से पाँव तक फूँक दिया जला दिया
फिर के निगाह चार सू ठहरी उसी के रू-ब-रू
उस ने तो मेरी चश्म को क़िबला-नुमा बना दिया
मेरा और उस का इख़्तिलात हो गया मिस्ल-ए-अब्र-ओ-बर्क़
उस ने मुझे रुला दिया मैं ने उसे हँसा दिया
मैं हूँ पतंग-ए-काग़ज़ी डोर है उस के हाथ में
चाहा इधर घटा दिया चाहा उधर बढ़ा दिया
तेशे की क्या मजाल थी ये जो तराशे बे सुतूँ
था वो तमाम दिल का ज़ोर जिस ने पहाड़ ढा दिया
तिरी क़ुदरत की क़ुदरत कौन पा सकता है क्या क़ुदरत : नज़ीर अकबराबादी
तिरी क़ुदरत की क़ुदरत कौन पा सकता है क्या क़ुदरततिरे आगे कोई क़ादिर कहा सकता है क्या क़ुदरत
तू वो यकता-ए-मुतलक़ है कि यकताई में अब तेरी
कोई शिर्क-ए-दुई का हर्फ़ ला सकता है क्या क़ुदरत
ज़मीं से आसमाँ तक तू ने जो जो रंग रंगे हैं
ये रंग-आमेज़ियाँ कोई दिखा सकता है क्या क़ुदरत
हज़ारों गुल हज़ारों गुल-बदन तू ने बना डाले
कोई मिट्टी से ऐसे गुल खिला सकता है क्या क़ुदरत
हुए हैं नूर से जिन के ज़मीन ओ आसमाँ पैदा
कोई ये चाँद ये सूरज बना सकता है क्या क़ुदरत
हवा के फ़र्क़ पर कोई बना कर अब्र का ख़ेमा
तनाबें तार-ए-बाराँ की लगा सकता है क्या क़ुदरत
जम ओ अस्कंदर ओ दारा ओ कैकाऊस ओ केख़ुसरौ
कोई इस ढब के दिल बादल बना सकता है क्या क़ुदरत
किया नमरूद ने गो किब्र से दावा ख़ुदाई का
कहीं उस का ये दा'वा पेश जा सकता है क्या क़ुदरत
निकाला तेरे इक पुश्ते ने कफ़शीं मार-ए-मग़्ज़ उस का
सिवा तेरे ख़ुदा कोई कहा सकता है क्या क़ुदरत
निकाले लकड़ियों से तू ने जिस जिस लुत्फ़ के मेवे
कोई पेड़ों में ये पेड़े लगा सकता है क्या क़ुदरत
तिरे ही ख़्वान-ए-ने'मत से है सब की परवरिश वर्ना
कोई च्यूँटी से हाथी तक खिला सकता है क्या क़ुदरत
हमारी ज़िंदगानी को बग़ैर अज़ तेरी क़ुदरत के
कोई पानी को पानी कर बहा सकता है क्या क़ुदरत
तिरे हुस्न-ए-तजल्ली का जहाँ ज़र्रा झमक जावे
तो फिर मूसा कोई वाँ ताब ला सकता है क्या क़ुदरत
दम-ए-ईसा में वो तासीर थी तेरी ही क़ुदरत की
वगर्ना कोई मुर्दे को जिला सकता है क्या क़ुदरत
तू वो महबूब चंचल है कि बार-ए-नाज़ को तेरे
बग़ैर-अज़-मुस्तफ़ा कोई उठा सकता है क्या क़ुदरत
'नज़ीर' अब तब्अ' पर जब तक न फ़ैज़ान-ए-इलाही हो
कोई ये लफ़्ज़ ये मज़मूँ बना सकता है क्या क़ुदरत
ऐ मिरी जान हमेशा हो तिरी जान की ख़ैर : नज़ीर अकबराबादी
ऐ मिरी जान हमेशा हो तिरी जान की ख़ैरनाज़ुकी दौर-ए-बला, हुस्न के सामान की ख़ैर
रात दिन शाम सहर पहर घड़ी पल साअत
माँगते जाती है हम को तिरी आन आन की ख़ैर
मेहंदी चोटी हो सिवाई हो चमक पेटी की
उम्र चोटी की बड़ी ज़ुल्फ़-ए-परेशान की ख़ैर
बे-तरह बोझ से झुमकों के झुके पड़ते हैं
कीजो अल्लाह तू उन झुमकों की और कान की ख़ैर
पान खाया है तो इस वक़्त भी लाज़िम है यही
एक बोसा हमें दीजे लब-ओ-दंदान की ख़ैर
आँख उठा देखिए और देख के हँस भी दीजे
अपने काजल की ज़कात और मिसी-ओ-पान की ख़ैर
पहले जिस आन तुम्हारी ने लिया दिल हम से
अब तलक माँगते हैं दिल से हम उस आन की ख़ैर
क्या ग़ज़ब निकले है बन-ठन के वो काफ़िर यारो
आज होती नज़र आती नहीं ईमान की ख़ैर
जितने महबूब परी-ज़ाद हैं दुनिया में 'नज़ीर'
सब के अल्लाह करे हुस्न की और जान की ख़ैर
चितवन में शरारत है और सीन भी चंचल है : नज़ीर अकबराबादी
चितवन में शरारत है और सीन भी चंचल हैकाफ़िर तिरी नज़रों में कुछ और ही छल-बल है
बाला भी चमकता है जुगनू भी दमकता है
बध्धी की लिपट तिस पर ता'वीज़ की हैकल है
गोरा वो गला नाज़ुक और पेट मिलाई सा
सीने की सफ़ाई भी ऐसी गोया मख़मल है
वो हुस्न के गुलशन में मग़रूर न हो क्यूँ-कर
बढ़ती हुई डाली है उठती हुई कोंपल है
अंगिया वो ग़ज़ब जिस को मलमल ही करे दिल भी
क्या जाने कि शबनम है ननसुख है कि मलमल है
ये दो जो नए फल हैं सीने पे तिरे ज़ालिम
टुक हाथ लगाने दे जीने का यही फल है
उभरा हुआ वो सीना और जोश भरा जोबन
एक नाज़ का दरिया है इक हुस्न का बादल है
क्या कीजे बयाँ यारो चंचल की रुखावट का
हर बात में दुर दुर है हर आन में चल-चल है
ये वक़्त है ख़ल्वत का ऐ जान न कर कल कल
काफ़िर तिरी कल कल से अब जी मिरा बेकल है
कल मैं ने कहा उस से क्या दिल में ये आया जो
कंघी है न चोटी है मिस्सी है न काजल है
मा'लूम हुआ हम से रूठे हो तुम ऐ जानी
उल्टा ही दुपट्टे का मुखड़े पे ये आँचल है
ये सुन के लगी कहने रूठी तो नहीं तुझ से
पर क्या कहूँ दो दिन से कुछ दिल मिरा बेकल है
जिस दिन ही 'नज़ीर' आ कर वो शोख़ मिले हम से
हथ-फेर हैं बोसे हैं दिन रात की मल-दल है
टुक होंट हिलाऊँ तो ये कहता है न बक बे : नज़ीर अकबराबादी
टुक होंट हिलाऊँ तो ये कहता है न बक बेऔर पास जो बैठूँ तो सुनाता है सरक बे
कहता हूँ कभी घर में मिरे आ तो है कहता
चौखट पे हमारी कोई दिन सर तो पटक बे
जब बद्र निकलता है तो कहता है वो मग़रूर
कह दो उसे याँ आन के इतना न चमक बे
पर्दा जो उलट दूँगा अभी मुँह से तो दम में
उड़ जाएगी चेहरे की तिरे सब ये झमक बे
सब बाँकपन अब तेरा 'नज़ीर' इश्क़ ने खोया
क्या हो गई सच कह वो तेरी दूत दुबक बे
सहर जो निकला मैं अपने घर से तो देखा इक शोख़ हुस्न वाला : नज़ीर अकबराबादी
सहर जो निकला मैं अपने घर से तो देखा इक शोख़ हुस्न वालाझलक वो मुखड़े में उस सनम के कि जैसे सूरज में हो उजाला
वो ज़ुल्फ़ें उस की सियाह पुर-ख़म कि उन के बल और शिकन को यारो
न पहुँचे सुम्बुल न पहुँचे रैहाँ न पहुँचे नागिन न पहुँचे काला
अदाएँ बाँकी 'अजब तरह की वो तिरछी चितवन भी कुछ तमाशा
भंवें वो जैसे खिंची कमानें पलक सिनाँ-कश निगाह भाला
वो आँखें मस्त और गुलाबी उस की कि उन को देखे तो देखते ही
मय-ए-मोहब्बत का उस की दिल को हो क्या ही गहरा नशा दो-बाला
लबों पे सुर्ख़ी वो पान की कुछ कि ला'ल भी मुन्फ़'इल हो जिस से
वो आन हँसने की भी फिर ऐसी कि जिस का 'आलम है कुछ निराला
वो जामा-ज़ेबी वो दिल-फ़रेबी वो सज-धज उस की वो क़द्द-ए-ज़ेबा
कि देख जिस पर फ़िदा हों दिल से वो जिन को कहते हैं सर्व-ए-बाला
निगह लड़ाई है उस ने जिस दम झटक लिया झप तो दिल को मेरे
अदा अदा ने इधर दबोचा पलक पलक ने उधर उछाला
जो ले लिया दिल को मेरे यारो तो उस ने ली राह अपने घर की
पड़ा तड़पता मैं रह गया वाँ ज़बाँ पे आह और लबों पे नाला
बहुत ये मैं ने तो चाहा पूछूँ मैं नाम उस का वले वो गुल-रू
न मुझ से बोला न की इशारत न दी तसल्ली न कुछ सँभाला
परी-रुख़-ए-मन शकर-लब-ए-मन व मय तू बाज़ आ ब-पेश-ए-चश्मम
ब-याद-ए-सर्व-ए-तू बे-क़रारम निहाल-ए-इशक़त शुद-अस्त बाला
फ़िदा-ए-वजहक अशी-ए-शरक़न व माै-ए-नहरन व मन फ़िराक़क
कसीर-ए-हुज़ना मअल-हुमूमे सक़ील-ए-हिजरा व कल-जिबाला
तुसा दे मिलने नूँ दिल है बे-कल एही ओ गल्लाँ नित आखदा है
सदा ले मैनूँ दे अपने घर विच नहीं तो इत्थे असा दे नाल आ
तुम्हारी आसा लगी है निस दिन तुम्हारे दर्शन को तरसें नैनाँ
दुलारे सुंदर अनूठे अबरन हटीले मोहन अनोखे लाला
चहन के मन को जो छन्ननूं थी ऐ यार काएँ लगाई इतनी
भराएतीं आ खबर लो म्हाँ की पलक कटारा जो थाँ ने घाला
अगन बरत है हिया में मोरे बिरह में तेरे ऐ मन-मुहनवाँ
तोरे जो नैनाँ ने मोहा मोहको न जीनूँ तिन्को भवा वखाला
जगत सबहहा अमत बरहमुख अटक कहसवा ममन करन खा
दिवानी केनी तुमन सुरीजन न सुध की गर पर न बुध की झाला
कभी तो हँस कर शिताब आ जा 'नज़ीर' की भी तरफ़ टुक ऐ जाँ
बना के सज-धज फिरा के दामन लगा के ठोकर हिला के बाला
अल्ताफ़ बयाँ हों कब हम से ऐ जान तुम्हारी सूरत के : नज़ीर अकबराबादी
अल्ताफ़ बयाँ हों कब हम से ऐ जान तुम्हारी सूरत केहैं लाखों अपनी आँखों पर एहसान तुम्हारी सूरत के
मुँह देखे कि ये बात नहीं सच पूछो तो अब दुनिया में
बेहोश करे हैं परियों को इंसान तुम्हारी सूरत के
आईना-रुख़ों की महफ़िल में जिस वक़्त अयाँ तुम होते हो
सब आइना साँ रह जाते हैं हैरान तुम्हारी सूरत के
कुछ कहने पर मौक़ूफ़ नहीं मा'लूम अभी हो जावेगा
ख़ुर्शीद मुक़ाबिल हो देखे इक आन तुम्हारी सूरत के
कि अर्ज़ 'नज़ीर' इक बोसे की जब हँस कर चंचल बोला यूँ
इस मुँह से बोसा लीजिएगा क़ुर्बान तुम्हारी सूरत के
कभी तो आओ हमारे भी जान कोठे पर : नज़ीर अकबराबादी
कभी तो आओ हमारे भी जान कोठे परलिया है हम ने अकेला मकान कोठे पर
खड़े जो होते हो तुम आन आन कोठे पर
करोगे हुस्न की क्या तुम दुकान कोठे पर
तुम्हें जो शाम को देखा था बाम पर मैं ने
तमाम रात रहा मेरा ध्यान कोठे पर
यक़ीं है बल्कि मिरी जान जब कि निकलेगी
तो आ रहेगी तुम्हारे ही जान कोठे पर
मुझे ये डर है किसी की नज़र न लग जावे
फिरो न तुम खुले बालों से जान कोठे पर
बशर तो क्या है फ़रिश्ते का जी निकल जावे
तुम्हारे हुस्न की देख आन-बान कोठे पर
झमक दिखा के हमें और भी फँसाना है
जभी तो चढ़ते हो तुम जान जान कोठे पर
तुम्हें तो क्या है व-लेकिन मिरी ख़राबी हो
किसी का आन पड़े अब जो ध्यान कोठे पर
गो चूने-कारी में होती है सुर्ख़ी तो ऐसी
किसी के ख़ून का ये है निशान कोठे पर
ये आरज़ू है किसी दिन तो अपने दिल का दर्द
करें हम आन के तुम से बयान कोठे पर
लड़ाओ ग़ैर से आँखें कहो हो हम से आह
कि था हमें तो तुम्हारा ही है ध्यान कोठे पर
ख़ुदा के वास्ते इतना तो झूट मत बोलो
कहीं न टूट पड़े आसमान कोठे पर
कमंद ज़ुल्फ़ की लटका के उस सनम ने 'नज़ीर'
चढ़ा लिया मुझे अपने निदान कोठे पर
जो आवे मुँह पे तिरे माहताब है क्या चीज़ : नज़ीर अकबराबादी
जो आवे मुँह पे तिरे माहताब है क्या चीज़ग़रज़ ये माह तो क्या आफ़्ताब है क्या चीज़
ये पैरहन में है इस गोरे गोरे तन की झलक
कि जिस के सामने मोती की आब है क्या चीज़
भुला दीं हम ने किताबें कि उस परी-रू के
किताबी चेहरे के आगे किताब है क्या चीज़
तुम्हारे हिज्र में आँखें हमारी मुद्दत से
नहीं ये जानतीं दुनिया में ख़्वाब है क्या चीज़
'नज़ीर' हज़रत-ए-दिल का न कुछ खुला अहवाल
मैं किस से पूछूँ ये नुदरत-मआब है क्या चीज़
जो सख़्त होवे तो ऐसा कि कोह आहन का
जो नर्म होवे तो बर्ग-ए-गुलाब है क्या चीज़
घड़ी में संग घड़ी मोम और घड़ी फ़ौलाद
ख़ुदा ही जाने ये आली-जनाब है क्या चीज़
रखता है गो क़दीम से बुनियाद आगरा : नज़ीर अकबराबादी
रखता है गो क़दीम से बुनियाद आगराअकबर के नाम से हुआ आबाद आगरा
याँ के खंडर न और जगह की 'इमारतें
यारो 'अजब मक़ाम है दिल-शाद आगरा
शद्दाद ज़र लगा न बनाता बहिश्त को
गर जानता कि होवेगा आबाद आगरा
तोड़े कोई क़िले को कोई लूटे शहर को
अब किस से अपनी माँगे भला दाद आगरा
अब तो ज़रा सा गाँव है बेटी न दे इसे
लगता था वर्ना चीन का दामाद आगरा
यक-बारगी तो अब मुझे या-रब तू फिर बसा
करता है अब ख़ुदा से ये फ़रियाद आगरा
इक ख़ूब-रू नहीं है यहाँ वर्ना एक दिन
था रश्क-ए-हुस्न-ए-बल्ख़-व-नौशाद आगरा
हरगिज़ वतन की याद न आवे उसे कभी
जो कर के अपनी जाँ को करे शाद आगरा
इस में सदा ख़ुशी से रहा है तिरा 'नज़ीर'
या-रब हमेशा रखियो तो आबाद आगरा

0 comments:
एक टिप्पणी भेजें