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मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ भाग 1 : Maithilisharan Gupt Kavitaen Part 1

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

नर हो, न निराश करो मन को

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को
सँभलो कि सुयोग न जाए चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को
जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को
निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोत्तैर गुंजित गान रहे
सब जाए अभी पर मान रहे
कुछ हो न तजो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को
प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्तस करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को
किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को
करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरंतर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो

मनुष्यता

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
वही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
क्षुधार्त रतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी,
तथा दधीचि ने दिया परार्थ अस्थिजाल भी।
उशीनर क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया,
सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर-चर्म भी दिया।
अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे?
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
रहो न भूले के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो करे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े,
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े।
परस्परावलंब से उठो तथा बढ़ो सभी,
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
‘मनुष्य मात्र बंधु है’ यही बड़ा विवेक है,
पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है,
परंतु अंतरैक्य में प्रणामभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥

गाँधीजी

संत, महात्मा हो तुम जग के, बापू हो हम दीनों के
दलितों के अभीष्ट वर-दाता, आश्रय हो गतिहीनों के
आर्य अजातशत्रुता की उस परंपरा के स्वतः प्रमाण
सदय बंधु तुम विरोधियों के, निर्दय स्वजन अधीनों के!

भारत-भारती / भविष्यत् खंड / कवि, शिक्षा

कवि
करते रहोगे पिष्ट-पोषण और कब तक कविवरो!
कच, कुच, कटाक्षों पर अहो! अब तो न जीते जी मरो।
है बन चुका शुचि अशुचि अब तो कुरुचि को छोड़ो भला,
अब तो दया कर के सुरुचि का तुम न यों घोंटो गला॥
आनंनदात्री शिक्षिका है सिद्ध कविता कामिनी,
है जन्म से ही वह यहाँ श्रीराम की अनुगामिनी।
पर अब तुम्हारे हाथ से वह कामिनी ही रह गई,
ज्योत्स्ना गई देखो, अँधेरी यामिनी ही रह गई॥
अब तो विषय की ओर से मन की सुरति का फेर दो,
जिस ओर गति हो समय की उस ओर मति को फेर दो।
गाया बहुत कुछ राग तुमने योग और वियोग का,
संचार कर दो अब यहाँ उत्साह का उद्योग का॥
केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए,
उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।
क्यों आज रामचरित्रमानस सब कहीं सम्मान्य है?
सत्काव्य-युत उसमें परम आदर्श का प्राधान्य है॥
धैर्यच्युतों को धैर्य से कवि ही मिलाना जानते,
वे ही नितांत पराजितों को जय दिलाना जानते।
होते न पृथ्वीराज तो रहते प्रताप व्रती कहाँ?
एथेंस कैसे जीतता होता न यदि सोलन वहाँ?॥
संसार में कविता अनेकों क्रांतियाँ है कर चुकी,
मुरझे मनों में वेग की विद्युत्प्रभाएँ भर चुकी।
है अंध-सा अंतर्जगत कवि-रूप सविता के विना,
सद्भाव जीवित रह नहीं सकते सु-कविता के विना॥
मृत जाति को कवि ही जिलाते रस-सुधा के योग से,
पर मारते हो तुम हमें उलटे विषय के रोग से!
कवियों! उठो, अब तो अहो! कवि-कर्म्म की रक्षा करो,
बस नीच भावों का हरण कर उच्च भावों को भरो॥
शिक्षा
सब से प्रथम कर्तव्य है शिक्षा बढ़ाना देश में,
शिक्षा बिना ही पड़ रहे हैं आज हम सब क्लेश में।
शिक्षा बिनाकोई कभी बनता नहीं सत्पात्र है,
शिक्षा बिना कल्याण की आशा दुराशा मात्र है॥
जब तक अविद्या का अँधेरा हम मिटावेंगे नहीं,
जब तक समुज्ज्वल ज्ञान का आलोक पावेंगे नहीं।
तब तक भटकना व्यर्थ है सुखसिद्धि के संधान में,
पाये बिना पथ पहुँच सकता कौन इष्ट स्थान में?॥
वे देश जो हैं आज उन्नत और सब संसार से—
चौंका रहे हैं नित्य सबको नव नवाविष्कार से।
बस ज्ञान के संचार से ही बढ़ सके हैं वे वहाँ,
विज्ञान-बल से ही गगन में चढ़ सके हैं वे वहाँ॥
विद्या मधुर सहकार करती सर्वथा कटु निम्ब को,
विद्या ग्रहण करती कलों से शब्द को, प्रतिविंब को!
विद्या जड़ों में भी सहज ही डालती चैतन्य है,
हीरा बनाती कोयले को, धन्य विद्या धन्य है॥
विद्या दिनों का पथ पलों में पार है करवा रही,
विद्या विविध वैचित्र्य के भांडार है भरवा रही।
गति सिद्धि उसकी हो चुकी आकाश में, पाताल में,
है वह मरों को भी जिलाना चाहती कुछ काल में!॥
पाया हमीं से था कभी जो बीज वर विज्ञान का,
उसको दिया है दूसरों ने रूप रम्योद्यान का।
हम किंतु खो बैठे उसे भी जो हमारे पास था,
हा! दूसरों की वृद्धि में ही क्या हमारा ह्रास था!॥

स्वर्गीय-संगीत

(एक) पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो। पुरुष क्या, पुरुषार्थ हुआ न जो; हृदय की सब दुर्बलता तजो। प्रबल जो तुममें पुरुषार्थ हो— सुलभ कौन तुम्हें न पदार्थ हो? प्रगति के पथ में विचरो उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ न पुरुषार्थ बिना कुछ स्वार्थ है; न पुरुषार्थ बिना परमार्थ है। समझ लो, यह बात यथार्थ है— कि पुरुषार्थ वही परमारथ है। भुवन में सुख-शांति भरो उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ न पुरुषार्थ बिना वह स्वर्ग है; न पुरुषार्थ बिना अपवर्ग है। न पुरुषार्थ बिना क्रियता कहीं, न पुरुषार्थ बिना प्रियता कहीं। सफलता वर-तुल्य वरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ न जिसमें कुछ पौरुष हो यहाँ— सफलता वह पा सकता कहाँ? अपुरुषार्थ भयंकर पाप है; न उसमें यश है, न प्रताप है। न कृमि-कीट-समान मरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ मनुज जीवन है जय के लिए— प्रथम ही दृढ़ पौरुष चाहिए। विजय तो पुरुषार्थ बिना कहाँ; कठिन है चिरजीवन भी यहाँ। भय नहीं, भव-सिंधु तरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ यदि अनिष्ट अड़े, अड़ते रहें; विपुल विघ्न पड़ें, पड़ते रहें। हृदय में पुरुषार्थ रहे भरा— जलधि क्या, नभ क्या, फिर क्या धरा? दृढ़ रहो, ध्रुव धैर्य धरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ यदि अभीष्ट तुम्हें निज सत्व है; प्रिय तुम्हें यदि मान महत्व है। यदि तुम्हें रखना निज नाम है; जगत में करना कुछ काम है। मनुज! तो श्रम से न डरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ प्रकट नित्य करो पुरुषार्थ को, हृदय से तज दो सब स्वार्थ को। यदि कहीं तुमसे परमार्थ हो— यह विनश्वर देह कृतार्थ हो। सदय हो, पर दु:ख हरो, उठो; पुरुष हो, पुरुषार्थ करो, उठो॥ (दो) नर हो, न निराश करो मन को। कुछ काम करो, कुछ काम करो, जग में रहके निज नाम करो। यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो! समझो, जिसमें यह व्यर्थ न हो। कुछ तो उपयुक्त करो तन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ सँभलो कि सु-योग न जाए चला, कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला? समझो जग को न निरा सपना, पथ आप प्रशस्त करो अपना। अखिलेश्वर हैं अवलंबन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ जल-तुल्य निरंतर शुद्ध रहो, प्रबलानल ज्यों अनिरुद्ध रहो। पवनोपम सत्कृतिशील रहो, अवनीतल वद् धृतिशील रहो। करलो नभ-सा शुचि जीवन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ जब हैं तुममें सब तत्व यहाँ, फिर जा सकता वह सत्व कहाँ? तुम स्वत्व-सुधा-रस पान करो, उठके अमरत्व-विधान करो। दव-रूप रहो भव-कानन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ निज गौरव का नित ज्ञान रहे, “हम भी कुछ हैं”—यह ध्यान रहे। सब जाए अभी, पर मान रहे, मरणोत्तर गुंजित गान रहे। कुछ हो, न तजो निज साधन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ प्रभु ने तुमको कर दान किए, सब वांछित वस्तु-विधान किए। तुम प्राप्त करो उनको न अहो! फिर है किसका यह दोष कहो? समझो न अलभ्य किसी धन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ किस गौरव के तुम योग्य नहीं? कब, कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं? जन हो तुम भी जगदीश्वर के, (सब हैं जिसके अपने, घर के) फिर दुर्लभ क्या उसके जन को? नर हो, न निराश करो मन को॥ करके विधि-वाद न खेद करो, निज लक्ष्य निरंतर भेद करो। बनता बस उद्यम ही विधि है, मिलता जिससे सुख का निधि है। समझो धिक निष्क्रिय जीवन को, नर हो, न निराश करो मन को॥ (तीन) वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे। विचार लो कि मर्त्य हो, न मृत्यु से डरो कभी; मरो, परंतु यों मरो कि याद जो करें सभी! हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए; मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए। यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती; उसी उदार से धरा कृतार्थ-भाव मानती। उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती; तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती। अखंड आत्मभाव जो असीम विश्व में मरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ क्षुधार्थ रंतिदेव ने दिया करस्थ थाल भी, तथा दधीचि ने दिया पदार्थ अस्थिजाल भी। उशीनर-क्षितीश ने स्वमांस दान भी किया, सहर्ष वीर कर्ण ने शरीर चर्म दे दिया। अनित्य देह के लिए अनादि जीव क्या डरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ सहानुभूति चाहिए, महा विभूति है यही; वशीकृता सदैव है धनी हुई स्वयं मही। विरुद्ध-वाद बुद्ध का दया-प्रभाव में बहा; विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहा? अहा! वही उदार है परोपकार जो करे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में, सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में। अनाथ कौन है यहाँ त्रिलोकनाथ साथ है; दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं। अतीव भाग्यहीन है अधीर भाव जो भरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े, समक्ष ही स्व-बाहु जो बढ़ा रहे बड़े-बड़े। परस्परावलंब से उठो, तथा बढ़ो सभी; अभी अमर्त्य-अंक में अपंक हो चढ़ो सभी। रहो न यों कि एक से न काम और का सरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ “मनुष्य मात्र बंधु है” यही बड़ा विवेक है; पुराण पूरुष स्वभू पिता प्रसिद्ध एक है। फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं, परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं। अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए, विपत्ति-विघ्न जो पड़े उन्हें ढकेलते हुए। घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी, अतर्क एक पंथ के सतर्क पांथ हों सभी। तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे॥ (चार) मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है। बना लो जहाँ, हाँ, वही स्वर्ग है, स्वयंभूत थोड़ा कहीं स्वर्ग है। खलों को कहीं भी नहीं स्वर्ग है, भलों के लिए तो यहीं स्वर्ग है। सुनो, स्वर्ग क्या है, सदाचार है, मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ नहीं स्वर्ग कोई धरा-वर्ग है, जहाँ स्वर्ग के भाव हैं, स्वर्ग है। सुखी नारकी जीव भी हो गए— वहाँ धर्मराज स्वयं जो गए। कदाचार ही रौरवागार है; मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ यहीं स्वर्ग चाहे बना लीजिए, यहीं नारकी सृष्टियाँ कीजिए। नहीं कौ-सी साधना है यहाँ? वहीं सिद्धि है साधना है जहाँ। महा-साधना-क्षेत्र संसार है, मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ स्वर्ग क्यों न संसार नि:सार हो, भले ही यहाँ मृत्यु-संचार हो। नहीं किंतु विश्वेश है क्या यहाँ? जहाँ इष्ट है क्या नहीं है वहाँ? शरीरस्थ कर्ता क्रियाधार है, मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ जहाँ ज्ञान है, कर्म है, भक्ति है, भरी जीव में ईश्वरी शक्ति है। जहाँ मुक्ति में मुक्ति का धाम है, जहाँ मृत्यु के बाद भी नाम है, वही भव्य संसार क्या भार है? मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ यहीं प्रेम है, द्रोह भी है यहीं; यहीं ज्ञान है, मोह भी है यहीं; यहीं पुण्य है, पाप भी है यहीं; यहीं शांति, संताप भी है यहीं। कहो, क्या तुम्हें आज स्वीकार है? मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ जहाँ स्वार्थ का सर्वथा त्याग है, सभी के लिए एक-सा भाग्य है। जहाँ लोक-सेवा महा धर्म है, जहाँ कामना छोड़ के कर्म है, वहाँ आप ही आप उद्धार है, मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥ यहाँ कल्पशाखी स्वयं हैं हमीं, करें यत्न तो है हमें क्या कमी? भरा कीर्ति में ही सुधा-सत्व है, मनुष्यत्व ही दिव्य देवत्व है। यही स्वर्ग-संगीत का सार है मनुष्यत्व ही मुक्ति का द्वार है॥

नक़ली क़िला

आज भी चित्तौर का सुन नाम कुछ जादू भरा,
चमक जाती चंचला-सी चित्त में करके त्वरा।
जिस समय लाखा नृपति सिंहासनस्थि थे वहाँ,
उस समय की यह विकट घटना प्रकट देखो यहाँ॥
एक बार अमर्ष पूर्वक तप्त होकर त्वेष से,—
प्रण किया ऐसा उन्होंने एक हेतु विशेष से—
“दुर्ग बूँदी का स्वयं तोड़े बिना ही अब कहीं—
ग्रहण जो मैं अन्न या जल करूँ तो क्षत्रिय नहीं॥”
कर दिया प्रण तो उन्होंने क्रोध में ऐसा कड़ा,
किंतु बूँदी-दुर्ग का था तोड़ना दुष्कर बड़ा।
इसलिए उनके शुभैषी सचिव चिंता में पड़े,
रह गए चित्रस्थ-से वे चकित ज्यों के त्यों खड़े॥
सोच एक उपाय फिर वे निज विवेक विचार से,
विनय राना से लगे करने अनेक प्रकार से।
देख सकते हैं अशुभ क्या स्वामि का सेवक कभी?
हों न हों कृत-कार्य तो भी यत्न करते हैं सभी॥
“वीरवर्योचित हुआ यह प्रण यदपि श्रीमान का,
काम है यह योग्य ही श्रीराम की संतान का।
वैर-शुद्धि किए बिना वर वीर रह सकते नहीं,
स्वाभिमानी जन कभी अपमान सह सकते नहीं॥
दुर्ग-बूँदी का यदपि हमको प्रथम है तोड़ना,
किंतु कैसे हो सकेगा अन्न-जल का छोड़ना?
खान-पान बिना किसी के प्राण रह सकते नहीं,
प्राण जाने पर भला प्रण पूर्ण हो सकता नहीं?
प्रेरणा करती प्रकृति जिस कार्य के व्यापार में,
त्राण हो सकता नहीं उसके बिना संसार में।
नित्य-कृत्य न छोड़ कर आज्ञा हमें दीजे अत:,
भृत्य ही हैं किसलिए जो श्रम करे स्वामी स्वत:॥
इष्ट-सिद्धि कहाँ रही फिर जब न साधन ही रहा,
कार्य करना भूप का आदेश देना ही कहा।
हो गया पूरा उसी क्षण आपका यह प्रण नया,
कह दिया जो सज्जनों ने जान लो वह हो गया॥
हो प्रथम प्रस्तुत हमें चलना यहाँ से दूर है,
पहुँच कर बूँदी पुन: करना समर भरपूर है।
तब कहीं अवसर क़िले के तोड़ने का आएगा,
काम क्या तब तक भला भोजन बिना चल जाएगा?
दिन लगेंगे क्या न कुछ भी इस कठिनतर काम में?
कौन जाने काल कितना नष्ट हो संग्राम में?
तोड़ने देंगे हमें क्या दुर्ग शत्रु बिना लड़े?
देख सकता कौन अपना सर्वनाश खड़े-खड़े?
अस्तु, कृत्रिम दुर्ग तब तक तोड़ बूँदी का यहीं,
कीजिए निज नियम रक्षा, छोड़िए भोजन नहीं।
देह रक्षा योग्य है निज इष्ट-साधन के लिए,
है असंभव कार्य सब तन की बिना रक्षा किए॥
दुर्ग को जो तोड़ने का आपने प्रण है किया,
हो सकेगी क्या कभी तनु के बिना उसकी क्रिया?
इसलिए तब तक उचित है नियम पालन विधि यही,
तनु रहे, साधन सफल हो, विज्ञता बस है वही॥
अन्न जल को छोड़ने की आपकी सुन कर कथा,
तज न देंगे अन्न जल क्या अन्य जन भी सर्वथा?
यह महान अनिष्ट होगा जानिए निश्चय इसे,
त्याग दें जो आप तो फिर ग्राह्य हो भोजन किसे?”
युक्ति से समझा बुझा कर मंत्रियों ने भूप को,
तोड़ना निश्चित किया उस दुर्ग के प्रतिरूप को।
अस्तु बूँदी दुर्ग कृत्रिम शीघ्र बनवाया गया,
मच गया चित्तौर में तब एक आंदोलन नया॥
उस समय बूँदी-निवासी भृत्य राना का भला,
वीर हाड़ा कुंभ था आखेट से आता चला।
साथियों के सहित जब आया वहाँ पर वह कृती,
देख उसको भी पड़ी उस दुर्ग की वह प्रतिकृती॥
तब कुतूहल-वश लगा वह पूछने कारण सही,
किंतु उसके जानने पर पूर्व-सी न दशा रही।
हो गया गंभीर मुख, संपूर्ण आतुरता गई,
भृकुटि-कुंचित भाल पर प्रकटी प्रभा तेजोमयी॥
वीर कुंभ न सह सका यह मातृभूमि-तिरस्क्रिया,
क्षत्रियोचित धर्म ने उसको विमोहित कर दिया।
यदपि कृत्रिम किंतु वह भव-भूमि ही तो थी अहो!
स्वाभिमानी जन उसे फिर भूलता कैसे अहो?
त्याग पादत्राण, रख मारे हुए मृग को वहीं,
सुध रही उस वीर को उस काल अपनी भी नहीं।
वंदना उस दुर्ग की करने लगा वह भाव से,
शीश पर उसने वहाँ की रज चढ़ाई चाव से॥
शीघ्र रक्त-प्रवाह उसकी देह में होने लगा,
बीज विद्युद्वेग से वीरत्व का बोने लगा।
मातृभूमि-स्नेह-जल निश्चल हृदय धोने लगा,
मान मन को मत्त करके मृत्यु-भय खोने लगा॥
यदपि सर्व शरीर उसका जल रहा था त्वेष से,
किंतु मौन न रह सका वह भक्ति के उन्मेष से।
उस समय उद्गार सहसा जो निकल उसके पड़े,
अर्थ-पूरित रत्न हैं वे शुचि सुवर्णों में, जड़े॥
“पुष्ट हो जिसके अलौकिक अन्न-नीर समीर से,
मैं समर्थ हुआ सभी विध रह विरोग शरीर से।
यदपि कृत्रिम रूप में वह मातृभूमि समक्ष है,
किंतु लेना योग्य क्या उसका न मुझको पक्ष है?
जन्मदात्री, धात्रि! तुझसे उऋण अब होना मुझे,
कौन मरे प्राण रहते देख सकता है तुझे?
मैं रहूँ चाहे जहाँ, हूँ किंतु तेरा ही सदा,
फिर भला कैसे न रक्खूँ ध्यान तेरा सर्वदा?
यदपि मेरा काल अब मेरे निकट आता चला,
किंतु जीने की अपेक्षा मान पर मरना भला।
जब कि एक न एक दिन मरना सभी को है यहाँ,
फिर मुझे अवसर मिलेगा आज के जैसा कहाँ?”
जानुओं को टेक तब वह प्रेम अद्भुत में पगा,
देव-सम उस दुर्ग की रक्षा वहाँ करने लगा।
देख कर उस काल उसको जान पड़ता था यही—
मूर्तिमान महत्व से मंडित हुई मानों मही॥
वध किया मृग पास रक्खे, धनुष धारे धीर ज्यों,
दुर्ग के द्वारे सजग, शोभित हुआ वह वीर यों—
लौट कर आखेट से निज मान मद में मोहता—
गिरि-गुहा-द्वारस्थ ज्यों निर्भय मृगाधिप सोहता॥
वीर कुंभ इसी तरह निश्चय वहाँ बैठा रहा,
शुद्ध साधन सिद्धि की संप्राप्ति में पैठा रहा।
तब प्रतिज्ञा पालने को शस्त्र लेकर हाथ में,
आ गए राना वहाँ कुछ सैनिकों के साथ में॥
देखते ही कुंभ उनको, धनुष पर रख शर कड़ा,
सहचरों के सहित उठकर हो गया रण को खड़ा।
उस समय उसकी रुचिरता देखने के योग्य थी,
शील-युत हठ-पूर्ण थिरता देखने ही योग्य थी॥
दुर्ग के नाशार्थ ज्यों-ज्यों वे निकट आने लगे,
भाव त्यों-त्यों कुंभ के अत्युग्रता पाने लगे।
क्रोध से उसके वदन पर स्वेद-जल बहने लगा,
पोंछ कर उसको अत: यों वचन कहने लगा—
“सावधान! यहाँ न आना, दूर ही रहना वहीं,
देखना, निज बाण मुझको छोड़ना न पड़े कहीं।
भृत्य होने से तुम्हारा मैं जताने को रहा,
अन्यथा कब का यहाँ पर दीखता शोणित बहा!
प्राण बेचे हैं तुम्हें बेचा न मैंने मान है,
धर्म के संबंध में नृप और रंक समान है।
बंधु भी अवहेलना करने तुम्हारी जो चले,
क्षोभ से तो क्या तुम्हारा उर न उस पर भी जले?
स्वर्ग से भी श्रेष्ठ जननी जन्म-भूमि कही गई,
सेवनीया है सभी की वह महा महिमामयी।
फिर अनादर क्या उसी का मैं खड़ा देखा करूँ?
भीरु हूँ क्या मैं अहो! जो मृत्यु से मन में डरूँ?
तोड़ने दूँ क्या इसे नक़ली क़िला मैं मान के,
पूजते हैं भक्त क्या प्रभु-मूर्ति को जड़ जान के?
भ्रांत जन उसको भले ही जड़ कहें अज्ञान से,
देखते भगवान को धीमान उसमें ध्यान से॥
है न कुछ चित्तौर यह, बूँदी इसे अब मानिए,
मातृभूमि पवित्र मेरी पूजनीया जानिए।
कौन मेरे देखते फिर नष्ट कर सकता इसे?
मृत्यु माता की जगत में सह्य हो सकती किसे?
योग्य क्या सीसोदियों को इस तरह प्रण-पालना?
है भला क्या सत्य का संहार यों कर डालना!
सरल इससे तो यही थी साध लेनी साधना,
तोड़ लेते चित्त ही में दुर्ग बूँदी का बना!
अंत में फिर मैं यही कहता तुम्हें प्रभु जान के,
लौट जाओ तुम यहाँ से बात मेरी मान के।
अन्यथा फिर मैं न जानूँ, दोष मत देना मुझे,
प्राण-नाशक बाण मेरे हैं विषम विष में बुझे॥”
यों वचन सुन कुंभ के विस्मित हुए राना बड़े,
बढ़ सके आगे न सहसा रह गए रुक कर खड़े।
ग्लानि, लज्जा, क्रोध आदिक भाव बहु मन में जगे,
किंतु वे इस भाँति फिर उत्तर उसे देने लगे—
“वीर कुंभ! विचार ऊँचे हैं तुम्हारे सर्वथा,
किंतु दोषारोप अब मुझ पर तुम्हारा है वृथा!
वीर बूँदी के स्वयं मौजूद हो जब तुम यहाँ,
फिर कहो, प्रण-पालना झूठा रहा मेरा कहाँ?”
क्रुद्ध हो तब कुंभ ने शर से उन्हें उत्तर दिया,
किंतु राना ने उसे झट ढाल पर ही ले लिया।
फिर वहाँ कुछ देर को पूरी लड़ाई मच गई,
वध किये उस वीर ने मरते हुए भी रिपु कई॥
उष्ण शोणित-धार से धरणी वहाँ की धो गई,
कुंभ के इस कृत्य से कृतकृत्य बूँदी हो गई।
इस तरह उस वीर ने प्रस्थान सुरपुर को किया,
राजपूतों की धरा को कीर्तिधवलित कर दिया॥

जीवन की जय

मृषा मृत्यु का भय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन ही जड़ जमा रहा है,
निज नव वैभव कमा रहा है,
पिता-पुत्र में समा रहा है,
यह आत्मा अक्षय है,
जीवन की ही जय है!
नया जन्म ही जग पाता है,
मरण मूढ़-सा रह जाता है,
एक बीज सौ उपजाता है,
स्रष्टा बड़ा सदय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं,
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,
तो फिर महा प्रलय है,
जीवन की ही जय है।

उत्तर प्रदेश के प्रति

उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!
संत प्रश्न लेकर आए हैं सहकर कितना काय-क्लेश।
कैसे भूमि-समस्या सुलझे,
नए जाल में देश न उलझे,
इसके समाधान करने में रक्षित रख निज रूप-वेश।
उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!
राम-कृष्ण की पुण्य भूमि तू,
भूल न, निस्त्रैगुण्य भूमि तू,
तेरा प्रहरी हर-गौरी का धवल हिमालय भूधरेश।
उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!
तू स्वभाग से संत पात्र भर,
अधिक न कर, कर्त्तव्य मात्र कर,
ले उनका आशीष, कृष्ण हों पुनरपि तेरे शुभ्र केश!
उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!
जो जन नहीं शक्ति भर देता,
अपनी ही चोरी कर लेता,
हरी-भरी खेती भी खूसे करे जलद यदि लोभ-लेश।
उत्तर दे, हे उत्तर प्रदेश!

मातृभूमि

एक नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है, सूर्य-चंद्र युग मुकुट मेखला रत्नाकर है। नदियाँ प्रेम-प्रवाह फूल तारे मंडन हैं, बंदी जन खग-वृंद शेष फन सिंहासन हैं! करते अभिषेक पयोद हैं बलिहारी इसे वेष की, है मातृभूमि! तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की॥ दो मृतक-समान अशक्त विविश आँखों को मीचे; गिरता हुआ विलोक गर्भ से हम को नीचे। कर के जिसने कृपा हमें अवलंब दिया था, लेकर अपने अतुल अंक में त्राण किया था। जो जननी का भी सर्वदा थी पालन करती रही, तू क्यों न हमारी पूज्य हो? मातृभूमि, मातामही! तीन जिसकी रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं, घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं। परमहंस-सम बाल्यकाल में सब सुख पाए, जिसके कारण ‘धूल भरे हीरे’ कहलाए। हम खेले कूदे हर्षयुत जिसकी प्यारी गोद में, हे मातृभूमि! तुझको निरख मग्न क्यों न हों मोद में? चार पालन-पोषण और जन्म का कारण तू ही, वक्ष:स्थल पर हमें कर रही धारण तू ही। अभ्रंकष प्रसाद और ये महल हमारे, बने हुए हैं अहो! तुझी से तुझ पर सारे। हे मातृभूमि! जब हम कभी शरण न तेरी पाएँगे, बस तभी प्रलय के पेट में सभी लीन हो जाएँगे॥ पाँच हमें जीवनधार अन्न तू ही देती है, बदले में कुछ नहीं किसी से तू लेती है। श्रेष्ठ एक से एक विविध द्रव्यों के द्वारा, पोषण करती प्रेम-भाव से सदा हमारा। हे मातृभूमि! उपजे न जो तुझसे कृषि-अंकुर कभी, तो तड़प-तड़प कर जल मरें जठरानल में हम सभी॥ छह पाकर तुझको सभी सुखों को हमने भोगा, तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा? तेरी ही यह देह, तुझी से बनी हुई है, बस तेरे ही ससुर-सार से सनी हुई है। हा! अंत-समय तू ही इसे अचल देख अपनाएगी, हे मातृभूमि! यह अंत में तुझमें ही मिल जाएगी॥ सात जिन मित्रों का मिलन मलिनता को है खोता, जिस प्रेमी का प्रेम हमें मुददायक होता। जिन स्वजनों को देख हृदय हर्षित हो जाता, नहीं टूटता कभी जन्म भर जिनसे नाता। उन सबमें तेरा सर्वदा व्याप्त हो रहा तत्व है हे मातृभूमि! तेरे सदृश किसका महा महत्व है? आठ निर्मल तेरा नीर अमृत के सम उत्तम है, शीतल-मंद-सुगंध पवन हर लेता श्रम है। षट् ऋतुओं का विविध दृश्ययुत अद्भभुत क्रम है, हरियाली का फ़र्श नहीं मख़मल से कम है। शुचि सुधा सींचता रात में तुझ पर चंद्र-प्रकाश है, हे मातृभूमि! दिन में तरणि करता तम का नाश है॥ नौ सुरभित, सुंदर, सुखद सुमन तुझ पर लिखते हैं, भाँति-भाँति के सरस सुधोपम फल मिलते हैं। ओषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली, खानें शोभित कहीं धातु-वर रत्नोंवाली। जो आवश्यक होते हमें मिलत सभी पदार्थ हैं, हे मातृभूमि! वसुधा, धरा, तेरे नाम यथार्थ हैं॥ दस दीख रही है कहीं दूर तक शैल-श्रेणी, कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी। नदियाँ पैर पखार रही हैं वन कर चेरी, पुष्पों से तरुराजि कर रही पूजा तेरी। मृदु मलय-वायु मानो तुझे चंदन चारु चढ़ा रही, हे मातृभूमि! किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही? ग्यारह क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है, सुधामयी, वात्सल्यमयी, तू प्रेममयी है। विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुखहर्त्री है, हे शरणदायिनी देवि! तू करती सब का त्राण है, हे मातृभूमि! संतान हम, तू जननी तू प्राण है॥ बारह आते ही उपकार याद हे माता! तेरा, हो जाता मन मुग्ध भक्ति-भावों का प्रेरा। तू पूजा के योग्य, कीर्ति तेरी हम गावें, मन तो होता तुझे उठाकर शीश चढ़ावे। वह शक्ति कहाँ, हा! क्या करें, क्यों हम को लज्जा न हो? हम मातृभूमि! केवल तुझे शीश झुका सकते अहो! तेरह कारण-वश जब शोक-दाह से हम दहते हैं, तब मुझ पर ही लोट-लोट कर दुख सहते हैं। पाखंडी ही धूल चढ़ा कर तनु में तेरी, कहलाते हैं साधु नहीं लगती है देरी। इस तेरी ही शुचि धूलि में मातृभूमि! वह शक्ति है। जो क्रूरों के भी चित्त में उपजा सकती भक्ति है॥ चौदह कोई व्यक्ति विशेष नहीं तेरा अपना है, जो यह समझे हाय! देखता वह सपना है। तुझको सारे जीव एक से ही प्यारे हैं, कर्मों के फल मात्र यहाँ न्यारे न्यारे हैं। हे मातृभूमि! तेरे निकट सबका सम संबंध है, जो भेद मानता वह अहो! लोचनयुत भी अंध है॥ पंद्रह जिस पृथिवी में मिले हमारे पूर्वज प्यारे, उससे हे भगवान! कभी हम रहें न न्यारे। लोट-लोट कर वहीं हृदय को शांत करेंगे, उसमें मिलते समय मृत्यु से नहीं डरेंगे। उस मातृभूमि की धूल में जब पूरे सन जाएँगे, हो कर भव-बंधन-मुक्त हम आत्मरूप बन जाएँगे॥

द्रौपदी-दुकूल

राजसूय के समय देखकर
विभव पांडवों का भारी,
ईर्ष्या-वश मन में दुर्योधन
जलने लगा दुराचारी!
तिस पर मय कृत सभा-भवन में,
जो उसका अपमान हुआ,
कुरुक्षेत्र के भीषण रण का
मानों वही विधान हुआ॥
धर्मराज का सभा-भवन वह
हृदय सभी का हरता था,
उन्नत नभस्थली का विधु-मुख
मानों चुंबन करता था।
चित्र विचित्र रुचिर रत्नों से
मंडित यों छवि पाता था—
इंद्र-धनुष-भूषित मेघों को
नीचा-सा दिखलाता था॥
वह अद्भुत छवि से “अवनी का
इंद्र-भवन” कहलाता था;
अपने कर्त्ता के कौशल को
भली भाँति दरसाता था।
जल में थल, थल में जल का वह
भ्रम मन में उपजाता था;
इसीलिए वह भ्रांत जनों की
बहुधा हँसी कराता था॥
इसी भ्रांति से जल विचार कर
वहाँ सुयोधन ने थल को,
ऊँचा किया वसन-वर अपना
करके चपल दृगंचल को।
तथा अचल निर्मल नीलम सम
था ललाम जल भरा जहाँ;
गमन शील हो थल के भ्रम से
वह उसमें गिर पड़ा वहाँ॥
उसकी ऐसी दशा देख कर
हँस कर बोले भीम वहीं—
“अंधे के अंधा होता है,
इसमें कुछ संदेह नहीं!”
इस घटना से ऐसा दुस्सह
मर्मांतक दु:ख हुआ उसे;
जब तक जीवित रहा जगत् में
फिर न कभी सुख हुआ उसे॥
वीर पांडवों से तब उसने
बदला लेने की ठानी;
किंतु प्रकट विग्रह करने में,
कुशल नहीं अपनी जानी।
तब उनका सर्वस्व जुए में
हरना उसने ठीक किया—
कार्याकार्य विचार न करता
स्वार्थी जन का मलिन हिया॥
भीष्म पितामह और विदुर ने
उसको बहु विध समझाया;
किंतु एक उपदेश न उनका
उस दुर्मति के मन भाया।
उनका कहना वन-रोदन-सा
उसके आगे हुआ सभी—
मन के दृढ़ निश्चय को विधि भी
पलटा सकता नहीं कभी॥
“जुआ खेलना महापाप है”—
करके भी यह बात विचार,
दुर्योधन के आमंत्रण को
किया युद्धिष्ठिर ने स्वीकार।
हो कुछ भी परिणाम अंत में
धर्मशील वर-वीर तथापि,
निज प्रतिपक्षी की प्रचारणा
सह सकते हैं नहीं कदापि॥
छल से तब शकुनी ने उनका
राजपाट सब जीत लिया;
भ्राताओं के सहित स्व-वश कर
सब विध विधि-विपरीत किया।
फिर कृष्णा का पण करने को
प्रेरित किए गए वे जब;
हार पूर्ववत् गए उसे भी
रख कर द्यूत-दाँव पर तब॥
इस घटना से दुर्योधन ने
मानों इंद्रासन पाया;
भरी सभा में उस पापी ने
पांचाली को बुलवाया।
होने से ऋतुमती किंतु वह
आ न सकी उस समय वहाँ,
भेजा इस पर दु:शासन को
होकर उसने कुपित महा॥
राजसूय के समय गए थे
जो मंत्रित जल से सींचे;
जाकर वही याज्ञसेनी के
कच दु:शासन ने खींचे!
बलपूर्वक वह उस अबला को
वहाँ पकड़ कर ले आया;
करने में अन्याय हाय! यों
नहीं तनिक भी सकुचाया॥
प्रबल-जाल में फँसी हुई ज्यों
दीन मीन व्याकुल होती,
विवश विकल द्रौपदी सभा में
आई त्यों रोती-रोती।
अपनी यह दुर्दशा देखकर
उसको ऐसा कष्ट हुआ;
जिसके कारण ही पीछे से
सारा कुरुकुल नष्ट हुआ॥
दुर्योधन-दु:शासन ने यह
समझी निज सुख की क्रीड़ा,
किंतु पांडवों ने इस दु:ख से
पाई मर्मांतक पीड़ा।
तो भी वचन-बद्ध होने से
ये सब पापाचार सहे;
मंत्रों से कीलित भुजंग सम
जलते ही वे वीर रहे॥
“मुझे एक वस्त्रावस्था में
केश खींच लाया जो हाय!
दुष्ट-बुद्धि दु:शासन का वह
प्रकट देख कर भी अन्याय।
सभ्य, ख्यातनामा ये सारे
सभा मध्य बैठे चुपचाप!
तो क्या पुण्य-हीन पृथिवी में
शेष रहा अब केवल पाप?”
सुनकर रुदन द्रौपदी का यों
कहा कर्ण ने तब तत्काल—
“निश्चय सभी स्वल्प है जो कुछ
हो ऐसी असती का हाल
अच्छा, दु:शासन! यह जिसका
बार-बार लेती है नाम,
लो उतार इसके शरीर से
वह भी एक वस्त्र बेकाम॥”
कर्ण-कथन सुन दु:शासन ने
पकड़ लिया द्रौपदी-दुकूल,
किया क्रोध से भीमसेन ने
प्रण तब यों अपने को भूल—
“दु:शासन का उर विदीर्ण कर
शोणित जो मैं करूँ न पान,
तो अपने पूर्वज लोगों की
पा न सकूँ मैं गतिप्रधान॥”
ग्रसी राहु के चंद्रकला-सी
कृष्णा तब अति अकुलानी,
एक निमेष मात्र में उसने
निज लज्जा जाती जानी।
ऐसे समय एक हरि को ही
अपना रक्षक जान वहाँ;
लगी उन्हीं को वह पुकारने
धर के उनका ध्यान वहाँ॥
“हे अंतर्यामी मधुसूदन!
कृष्णचंद्र! करुणासिंधो!
रमा-रमण, भय-हरण, दयामय,
अशरणशरण, दीनबंधो!
मुक्त अनाथिनी की अब तक तुम
भूल रहे हो सुधि कैसे?
नहीं जानते हो क्या केशव!
कष्ट पा रही हूँ जैसे॥
तनिक देर में ही अब मेरी
लुटी लाज सब जाती है,
क्षण-क्षण में आपत्ति भयंकर
अधिक-अधिक अधिकाती है।
करती हुई विकट तांडव-सी
निकट मृत्यु यह आती है,
केवल एक तुम्हारी आशा
प्राणों को अटकाती है॥
दु:शासन-दावानल-द्वारा
मेरा हृदय जला जाता,
बिना तुम्हारे यहाँ न कोई
रक्षक मुझे दृष्टि आता।
ऐसे समय तुम्हें भी मेरा
ध्यान नहीं जो आवेगा,
तो हा! हा! फिर अहो दयामय!
मुझको कौन बचावेगा?
क्रिया-हीन ये चित्र-लिखे से
बैठे यहाँ मौन धारे;
मेरी यह दुर्दशा सभा में
देख रहे गुरुजन सारे!
तुम भी इसी भाँति सह लोगे
जो ये अत्याचार हरे!
निस्संशय तो हम अनाथ जन
बिना दोष ही हाय! मरे॥
किसी समय भ्रम-वश जो कोई
मुझ से गुरुतर दोष हुआ,
हो जिससे मेरे ऊपर यह
ऐसा भारी रोष हुआ।
तो सदैव के लिए भले ही
मुझको नरक-दंड दीजे;
किंतु आज इस पाप-सभा में
लज्जा मेरी रख लीजे॥
सदा धर्म-संरक्षण करने
हरने को सब पापाचार,
हे जगदीश्वर! तुम धरणी पर
धारण करते हो अवतार।
फिर अधर्म-मय अनाचार यह
किस प्रकार तुम रहे निहार,
क्या वह कोमल हृदय तुम्हारा
हुआ वज्र मेरी ही वार?
शरणागत की रक्षा करना
सहज स्वभाव तुम्हारा है;
वेद-पुराणों में अति अद्भुत
विदित प्रभाव तुम्हारा है।
सो यदि ऐसे समय न मुझ पर
दया-दृष्टि दिखलाओगे,
विरुद-भ्रष्ट होने से निश्चय
प्रभु! पीछे पछताओगे॥
जब जिस पर जो पड़ी आपदा
तुमने उसे बचाया है,
तो फिर क्यों इस भाँति दयामय!
तुमने मुझे भुलाया है?
इस मरणाधिक दु:ख से जो मैं
मुक्ति आज पा जाऊँगी,
गणिका, गज, गृध्रादिक से मैं
कम न कीर्ति फैलाऊँगी॥
जो अनिष्ट मन से भी मैंने
नहीं किसी का चाहा है;
जो कर्तव्य धर्मयुत अपना
मैंने सदा निबाहा है।
तो अवश्य इस विपत्-सिंधु से
तुम मुझको उद्धारोगे;
निश्चय दया-दृष्टि से माधव!
मेरी ओर निहारोगे॥
करती हुई विनय यों प्रभु से
कृष्णा ने दृग मूँद लिए;
क्षण भर देह-दशा को भूले
खड़ी रही वह ध्यान किए।
तब करुणामय कृष्णचंद्र ने
दूर किया उसका दु:ख घोर;
खींच-खींच पट हार गया पर
पा न सका दु:शासन छोर!

केशों की कथा

घन और भस्म-विमुक्त भानु-कृशानु सम शोभित नए,
अज्ञात-वास समाप्त कर जब प्रकट पांडव हो गए।
तब कौरवों से शांति पूर्वक और समुचित रीति से,
माँगा उन्होंने राज्य अपना प्राप्य था जो नीति से॥
किंतु वश में कुमति के निज प्रबलता की भ्रांति से,
देना न चाहा रण-बिना उसको उन्होंने शांति से।
तब क्षमा-भूषण, नित्य निर्भय, धर्मराज महाबली,
कहने लगे श्रीकृष्ण से इस भाँति वर-वचनावली—
“दुर्योधनादिक कौरवों ने जो किए व्यवहार हैं
सो विदित उनके आपको संपूर्ण पापाचार हैं।
अब संधि के संबंध में उत्तर उन्होंने जो दिए,
हे कमललोचन! आपने वह भी प्रकट सब सुन लिए॥
कर्तव्य अब जो हो हमारा दीजिए सम्मति हमें,
रण के बिना कोई नहीं अब दीखती है गति हमें।
जब शांति करना चाहते वे लोग राज्य बिना दिए,
कैसे कहें फिर हम कि वे प्रस्तुत नहीं रण के लिए॥
जिसके सहायक आप हैं, हम युद्ध से डरते नहीं,
क्षत्रिय समर में काल से भी भय कभी करते नहीं।
पर भरत-वंश-विनाश की चिंता हमें दु:ख दे रही,
बस बात बारंबार मन में एक आती है यही॥
हैं दुष्ट, पर कौरव हमारे बंधु हैं, परिवार
अतएव दोषी भी क्षमा के पात्र बारंबार
यह सोच कर ही हम न उनका चाहते संहार,
पर देखते हैं दैव को स्वीकार ये न विचार॥
जो ग्राम केवल पाँच ही देते हमें वे प्रेम से,
संतुष्ट थे हम, राज्य सारा भोगते वे क्षेम से।
ये हाथ उनके रक्त से रँगना न हमको इष्ट था।
संबंध हमसे और उनसे सब प्रकार घनिष्ट था॥”
सुनकर युधिष्ठिर के वचन भगवान यों कहने लगे—
मानों गरजते हुए नीरद भूमि में रहने लगे।
“है कौरवों के विषय में जो आपने निज मत कहा,
स्वाभाविकी वह आपकी है सरलता दिखला रहा॥
औदार्य-पूर्वक आप उनको चाहते करना क्षमा,
आसन्न-मृत्यु परंतु उनमें वैर-भाव रहा समा।
अतएव उनसे संधि की आशा समझनी व्यर्थ है,
दुर्बुद्धियों को बोध देने में न दैव समर्थ है॥
उपदेश कोई यदपि उनके चित्त में न समाएँगे,
तो भी उन्हें हम संधि करने के लिए समझाएँगे।
होगा न उससे और कुछ तो बात क्या कम है यही,
निर्दोषता जो जान लेगी आपकी सारी मही॥”
यों कह युधिष्ठिर से वचन इच्छा समझ उनकी हिए,
प्रस्तुत हुए हरि हस्तिनापुर गमन करने के लिए।
इस संधि के प्रस्ताव से भीमादि व्यग्र हुए महा,
पर धर्मराज-विरुद्ध धार्मिक वे न कुछ बोले वहाँ॥
तब सहन करने से सदा मन की तथा तन की व्यथा,
जो क्षीण दीन निदाघ-निशि-सी हो रही थी सर्वथा।
वह याज्ञसेनी द्रौपदी अवलोक दृष्टि सतृष्ण से,
हिम-मलिन-विधु-सम वदन से बोली वचन श्रीकृष्ण से॥
“है तत्त्वदर्शी जन जिन्हें सर्वज्ञ नित्य बखानते,
हे तात! यद्यपि तुम सभी के चित्त की हो जानते।
तो भी प्रकट कुछ कथन की जो धृष्टता मैं कर रही,
मुझ पर विशेष कृपा तुम्हारी, हेतु है इसका यही॥
जिस हृदय की दु:खाग्नि से जलती हुई भी निज हिए,
जीवित किसी विध मैं रही शुभ समय की आशा किए।
हा! हंत!! आज अजातरिपु ने दया रिपुओं पर दिखा,
कर दी ज्वलित घृत डाल के ज्यों और भी उसकी शिखा॥
सुन कर न सुनने योग्य हा! इस संधि के प्रस्ताव को,
वह चित्त मेरा हो रहा है प्राप्त जैसे भाव को।
वर्णन न कर सकती उसे मैं वज्रहृदया परवशा,
हरि तुम्हीं एक हताश जन की जान सकते हो दशा॥
केवल दया ही शत्रुओं पर नहीं दिखलाई गई,
हा! आज भावी सृष्टि को दुर्नीति सिखलाई गई।
चलते बड़े जन आप हैं संसार में जिस रीति से,
करते उन्हीं का अनुकरण दृष्टांत-युत सब प्रीति से॥
जो शत्रु से भी अधिक बहुविध दु:ख हमें देते रहे,
वे क्रूर कौरव हा! हमीं से आज बंधु गए कहे।
नीतिज्ञ गुरुओं ने भुला दी नीति यह कैसे सभी—
“अपना अहित जो चाहता हो वह नहीं अपना कभी॥”
जो ग्राम लेकर पाँच ही तुम संधि करने हो चले,
औदार्य और दयालुता ही हेतु हों इसके भले।
पर “डर गए पांडव” सदा ही यह कहेंगे जो अहो!
निज हाथ लोगों के मुखों पर कौन रक्खेगा कहो?
क्या कर सकेंगे सहन पांडव हाय! इस अपमान को,
क्या सुन सकेंगे प्रकट वे निज घोर अपयश गान को।
होता सदा है सज्जनों को मान प्यारा प्राण से,
है यशोधनियों को अयश लगता कठोर कृपाण से॥
देवेंद्र के भी विभव को संतत लजाते जो रहे
हा! पाँच ग्रामों के वही हम आज भिक्षुक हो रहे।
अब भी हमें जीवित कहे जो, सो अवश्य अजान है,
हैं जानते यह तो सभी “दारिद्रय मरण-समान है”॥
अथवा कथन कुछ व्यर्थ अब जब क्षमा उनको दी गई,
केवल क्षमा ही नहीं उनसे बंधुता भी की गई।
सो अब भले ही संधि अपने बंधुओं से कीजिए,
पर एक बार विचार फिर भी कृत्य उनके लीजिए॥
क्या-क्या न जानें नीच निर्दय कौरवों ने है किया,
था भोजनों में पांडवों को विष इन्होंने ही दिया।
सो संधि करने के समय इस विषम विष की बात को,
मुझ पर कृपा करके उचित है सोच लेना तात को॥
है विदित जिसकी लपट से सुरलोक संतापित हुआ,
होकर ज्वलित सहसा गगन का छोर था जिसने छुआ।
उस प्रबल जतुगृह के अनल की बात भी मन से कहीं,
हे तात! संधि विचार करते तुम भुला देना नहीं॥
मृग-चर्म धारे पांडवों को देख वन में डोलते,
तुमने कहे थे जो वचन पीयूष मानों घोलते।
जो क्रोध उस बेला तुम्हें था कौरवों के प्रति हुआ,
रखना स्मरण वह भी, तथा जो जल दृगों से था चुआ॥
था सब जिन्होंने हर लिया छल से जुवे के खेल में,
प्रस्तुत हुए किस भाँति पांडव कौरवों से मेल में?
उस दिवस जो घटना घटी थी भूल क्या वे हैं गए,
अथवा विचार विभिन्न उनके हो गए हैं अब नए?”
फिर दुष्ट दु:शासन हुआ था तुष्ट जिनको खींच के,
ले दाहिने कर में वही निज केश लोचन सींच के।
रख कर हृदय पर वाम कर शर-विद्ध-हरिणी-सी हुई,
बोली विकल तर द्रौपदी वाणी महा करुणामयी॥
“करुणा-सदन! तुम कौरवों से संधि जब करने लगो,
चिंता व्यथा सब पांडवों की शांत कर हरने लगो।
हे तात! तब इन मलिन मेरे मुक्त केशों की कथा,
है प्रार्थना, मत भूल जाना, याद रखना सर्वथा॥”
कह कर वचन यह दु:ख से तब द्रौपदी रोने लगी,
नेत्रांबुधारा-पात से कृश अंग निज धोने लगी।
हो द्रवित, करके श्रवण उसकी प्रार्थना करुणा-भरी,
देने लगे निज कर उठा कर सांत्वना उसको हरी॥
“भद्रे! रुदन कर बंद हा! हा! शोक को मन से हटा,
यह देख तेरी दु:ख-घटा जाता हृदय मेरा फटा।
विश्वास मेरे कथन का जो हो तुझे मन में कभी,
सच जाने तो दु:ख दूर होंगे शीघ्र ही तेरे सभी॥
जिस भाँति गद्गद् कंठ से तू रो रही है हाल में
रोती फिरेंगी कौरवों की नारियाँ कुछ काल में।
लक्ष्मी-सहित रिपु-रहित पांडव शीघ्र ही हो जाएँगे,
निज नीच कर्मों का उचित फल कुटिल कौरव पाएँगे॥”

निवेदन

राम, तुम्हें यह देश न भूले; धाम-धरा-धन जाए भले ही, यह अपना उद्देश न भूले। निज भाषा, निज भाव न भूले, निज भूषा, निज वेश न भूले। प्रभो, तुम्हें भी सिंधु पार से, सीता का संदेश न भूले।

भीष्म प्रतिज्ञा

विलोक शोभा विविध प्रकार,
जी में सुखी होकर एक बार।
यशोधनी शांतनु भूप प्यारे,
थे घूमते श्रीयमुना किनारे॥
वहाँ उन्होंने अति ही विचित्र,
आघ्राण की एक सुगंध मित्र!
थी चित्तहारी वह गंध ऐसी,
पाई कई पूर्व कभी न जैसी॥
भूपाल ऐसे उससे लुभाने,
शरीर की भी सुधि वे भुलाने।
चली प्रमोदार्णव में समाने,
पता-ठिकाना उसका लगाने॥
देखी उन्होंने तब एक बाला,
जो कांति से थी करती उजाला।
मिलिंद ने फुल था विशाला,
मानों निहारी अरविंद-माला॥
कैवर्त्त-कन्या वह सुंदरी थी,
बिंबाधरी और कृशोदरी थी।
मनोभिरामा मृगलोचनी थी,
मनोज-रामा-मद-मोचनी थी॥
सुवर्ण-गात्रोद्भव गंध द्वारा,
प्रसार कोसों निजनाम प्यारा।
प्रत्यक्ष मानों वह थी दिखाती—
सुवर्ण में भी मृदु गंध आती॥
तत्काल जी को वह मोह लेती,
थी दर्शकों को अति मोद देती।
विलोक तद्रूप विचित्र कांति,
थी दूर होती सब शांति दांति॥
यों देख शोभा उसकी गंभीर,
तत्काल भूपाल हुए अधीर।
क्या देख पूर्णेंदु नितांत कांत,
कभी रहा है सलिलेश शांत?
पुनः उन्होंने उससे सकाम,
हो मुग्ध पूछा जब नाम-धाम।
बोली अहा! सो प्रमदा प्रवीणा,
मानों बजी मंजुल मिष्ट वीणा॥
“हो आपका मंगल सर्व काल,
जानों मुझे सत्यवती नृपाल!
नौका चलाती सुकृतार्थ-काज,
पिता महात्मा मम दासराज॥”
थी मिष्ट वाणी उसकी विशेष,
हुआ अतः और सुखी नरेश।
रसाल-शाखा पिक-गान-संग,
देती नहीं क्या दुगनी उमंग?
पुनः उन्होंने उसके पिता से,
माँगा उसे जाकर नम्रता से।
किंतु प्रतिज्ञा अति स्वार्थ-सानी,
यों पूर्ण चाही उसने करानी॥
“संतान जो सत्यवती जनेगी,
राज्याधिकारी वह ही बनेगी।”
कामार्त थे यद्यपि वे, तथापि,
न की प्रतिज्ञा नृप ने कदापि॥
लौटे अतः सत्यवती बिना ही,
पाया उन्होंने दु:ख चित्त-दाही।
पावें व्यथा क्यों न सदा अनंत,
अकार्य तो भी करते न संत॥
मंदस्मिता, योजन-गंध-दात्री,
कैवर्त्त-पुत्री वह प्रेम-पात्री।
कैसे मुझे हा! अब प्राप्त होगी?
क्या हो सकूँगा उसका वियोगी?
प्राणांतकारी उसका वियोग,
हुआ मुझे निश्चय काल-रोग।
अवश्य ही मैं उससे मरूँगा,
न किंतु वैसा प्रण मैं करूँगा॥
वैसी प्रतिज्ञा कर दु:ख खोना,
पुत्रघ्न मानों जग बीच होना।
क्या तात देवव्रत का रहा मैं,
जो मान लूँ धीवर का कहा मैं?
चाहे मरूँ मैं दु:ख से भले ही,
चाहे बनूँ भस्म बिना जले ही।
स्वीकार है मृत्यु मुझे घनिष्ट,
न किंतु देवव्रत का अनिष्ट॥
है पुत्र देवव्रत वीर मेरा,
गुणी, प्रतापी, रणधीर मेरा।
वही अकेला मम वंश-वृक्ष,
न पुत्र लाखों उसके समक्ष॥
सारे गुणों में वह अद्वितीय,
आज्ञानुकारी सुत है मदीय।
गाऊँ कहाँ लों उसकी कथा मैं,
होने न दूँगा उसको व्यथा मैं॥
असह्य ज्यों सत्यवती वियोग,
त्यों इष्ट देवव्रत-राज्य-भोग।
न किंतु दोनों सुख ये मिलेंगे,
न प्राण मेरे मुरझे खिलेंगे॥
कैवर्त्त से सत्यवती सही मैं,
लूँ छीन, चाहूँ यदि आज ही मैं,
परंतु ऐसा करना अनीति,
अन्याय दुष्कर्म अधर्म-रीति॥
हो क्यों न मज्जीवन आज नष्ट,
दूँगा प्रजा को न परंतु कष्ट।
सदा प्रजा-पालन राज-धर्म,
कैसे तजूँ मैं यह मुख्य कर्म?
हे पंचबाण स्मर, काम, मार,
तू बाण चाहे जितने प्रहार।
अन्याय मैं किंतु नहीं करूँगा,
न स्वत्त्व देवव्रत का हरूँगा॥”
यों नित्य चिंता करके नरेश,
न चित्त में पाकर शांति-लेश।
ग्रीष्मार्त-पद्माकर के समान,
होने लगे क्षीण, दुखी महान॥
भूपाल की व्याकुलता विलोक,
कुमार गांगेय हुए सशोक।
अत: उन्होंने नृप-मंत्री द्वारा,
जाना पिता का दु:ख-हेतु सारा॥
“स्वयं दुखी तात हुए मदर्थ,
वात्सल्य ऐसा उनका समर्थ।
मैं किंतु ऐसा अति हूँ निकृष्ट,
जो देखता हूँ उनका अरिष्ट!”
यों सोच देवव्रत स्वार्थ त्याग,
प्यारे पिता के हित सानुराग।
तुरंत मंत्री-वर के समेत,
गए स्वयं धीवर के निकेत॥
आया उन्हें धीवर गेह देख,
अभ्यर्थना की उनकी विशेष।
सवंश पूजा करके तुरंत,
सौभाग्य माना अपना अनंत॥
सप्रेम बोला तब राज्य-मंत्री—
माँगी सुता शांतनु-शोक-हंत्री।
परंतु हा! धीवर ने न मानी,
चाही प्रतिज्ञा वह ही करानी॥
अमात्य ने ख़ूब उसे मनाया,
अन्याय अर्थार्थ तथा लुभाया।
न किंतु माना जब दास एक,
जी में हुआ रोष उसे कुछेक॥
परंतु सो कोप अयोग्य जान,
गांगेय ने शांत किया प्रधान।
पुनः स्वयं वे निज वंश-केतु,
बोले पिता के दुःख नाश हेतु॥
“प्यारे पिता के हित दासराज!
दीजे स्वकन्या तज सोच आज।
हैं कामनाएँ जितनी तुम्हारी,
हैं वे मुझे स्वीकृत मान्य सारी॥”
पुनः उन्होंने कर को उठा के,
औदार्य नि:स्वार्थ-भरा दिखा के,
प्यारे पिता के हित मोद पा के,
की यों प्रतिज्ञा सबको सुना के॥
“है नाम देवव्रत सत्य मेरा,
है सत्य का ही व्रत नित्य मेरा।
अतः पिता के दुःख नाशनार्थ,
मैं हूँ प्रतिज्ञा करता यथार्थ॥
मैं राज्य की चाह नहीं करूँगा,
है जो तुम्हें इष्ट वही करूँगा।
संतान जो सत्यवती जनेगी,
राज्याधिकारी वह ही बनेगी॥
विवाह भी मैं न कभी करूँगा,
आजन्म आद्याश्रम में रहूँगा।
निश्चिंत यों सत्यवती सुखी हो,
संतान से भी न कभी दुखी हो॥
जो चाहते थे तुम दासराज,
मैंने किए सो प्रण सर्व आज।
जो-जो कहो और वही करूँ मैं,
व्यथा पिता की जड़ से हरूँ मैं॥”
ऐसी प्रतिज्ञा सुन के कठोर,
कहा सुरों ने तक भीष्म—घोर।
हुए तभी से वह भीष्म नामी,
अपुत्र भी इच्छित लोक गामी॥

भारतवर्ष

मस्तक ऊँचा हुआ मही का,
धन्य हिमालय का उत्कर्ष।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा,
भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥
हरा-भरा यह देश बना कर
विधि ने रवि का मुकुट दिया,
पाकर प्रथम प्रकाश जगत ने
इसका ही अनुसरण किया।
प्रभु ने स्वयं ‘पुण्य-भू’ कह कर
यहाँ पूर्ण अवतार लिया,
देवों ने रजद सिर पर रक्खी,
दैत्यों का हिल गया हिया!
लेखा श्रेष्ठ इसे शिष्टों ने,
दुष्टों ने देखा दुर्द्धर्ष!
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा
भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥
अंकित-सी आदर्श मूर्ति है
सरयू के तट में अब भी,
गूँज रही है मोहनमुरली
ब्रज वंशीवट में अब भी।
लिखा बुद्ध-निर्वाण-मंत्र जय—
पाणि-केतुपट में अब भी,
महावीर की दया प्रकट है
माता के घट में अब भी।
मिली स्वर्ण-लंका मिट्टी में,
यदि हमको आ गया अमर्ष।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा
भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥
आर्य, अमृत संतान, सत्य का
रखते हैं हम पक्ष यहाँ,
दोनों लोक बनाने वाले
कहलाते हैं दक्ष यहाँ।
शांतिपूर्ण शुचि तपोवनों में
हुए तत्व प्रत्यक्ष यहाँ,
लक्ष बंधनों में भी अपना
रहा मुक्ति ही लक्ष यहाँ।
जीवन और मरण का जग ने
देखा यहाँ सफल संघर्ष।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा
भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥
मलय पवन सेवन करके हम
नंदनवन बिसराते हैं,
हव्य भोग के लिए यहाँ पर
अमर लोग भी आते हैं!
मरते समय हमें गंगाजल
देना, याद दिलाते हैं,
वहाँ मिले न मिले फिर ऐसा
अमृत, जहाँ हम जाते हैं!
कर्म हेतु इस धर्म भूमि पर
लें फिर-फिर हम जन्म सहर्ष।
हरि का क्रीड़ा-क्षेत्र हमारा
भूमि-भाग्य-सा भारतवर्ष॥

महाराज पृथ्वीराज का पत्र

स्वस्तिश्री स्वाभिमानी कुल-कमल तथा हिंदुआसूर्य सिद्ध, शूरों में सिंह सुश्री शुचिरुचि सुकृति श्री प्रताप1 प्रसिद्ध। लज्जाधारी हमारे कुशल युत रहें आप सुद्धर्म-धाम; श्रीपृथ्वीराज का हो विदित विनय से प्रेम-पूर्ण प्रणाम॥ मैं कैसा हो रहा हूँ इस अवसर में घोर-आश्चर्य-लीन, देखा है आज मैंने अचल चल हुआ, सिंधु संस्था-विहीन! देखा है, क्या कहूँ मैं, निपतित नभ से इंद्र का आज छत्र, देखा है और भी, हाँ, अकबर-कर में आपका संधि-पत्र! आशा की दृष्टि से वे पितर-गण किसे स्वर्ग से देखते हैं? सच्ची वंशप्रतिष्ठा क्षिति पर अपनी वे कहाँ लेखते हैं? मर्यादा पूर्वजों की अब तक हम में दृष्टि आती कहाँ है? होती है व्योम-वाणी वह गुण-गरिमा आप ही में यहाँ है॥ खो के स्वाधीनता को अब हम सब हैं नाम के ही नरेश, ऊँचा है आपसे ही इस अहो! देश का शीर्ष-देश। जाते हैं क्या झुकाने अब उस सिर को आप भी हो हताश? सारी राष्ट्रीयता का शिव-शिव! फिर तो हो चुका सर्वनाश! हाँ, निस्संदेह देगा अकबर हमसे आपको मान-दान, खोते हैं आप कैसे उस पर अपना उच्च धर्मोभिमान? छोड़ो स्वाधीनता को मृगपति! वन में दु:ख होता बड़ा है; लोहे के पींजड़े में तुम मत रहना स्वर्ण का पींजड़ा है! ये मेरे नेत्र हैं क्या कुछ विकृत कि हैं ठीक ये पत्र-वर्ण? देखूँ है क्या सुनाता विधि अब मुझको, व्यग्र हैं हाय! कर्ण। रोगी हों नेत्र मेरे वह लिपि न रहे आपके लेख जैसी, हो जाऊँ देव! चाहे बधिर पर सुनूँ बात कोई न वैसी। बाधाएँ आपको हैं बहु विध वन में, मैं इसे मानता हूँ, शाही सेना सदा ही अनुपद रहती, सो सभी जानता हूँ। तो भी स्वाधीनता ही विदित कर रही आपको कीर्तिशाली, हो चाहे वित्त वाली पर उचित नहीं दीनता चित्त वाली॥ आए थे, याद है, जिस समय वहाँ ‘मान’ सम्मान पाके, खाने को थे न बैठे मिस कर उनके साथ में आप आके। वे ही ऐसी दशा में हँस कर कहिए, आपसे क्या कहेंगे? अच्छी हैं ये व्यथाएँ, पर वह हँसना आप कैसे सहेंगे? है जो आपत्ति आगे वह अटल नहीं, शीघ्र ही नष्ट होगी, कीर्ति-श्री आपकी यों प्रलय तक सदा और सुस्पष्ट होगी। घेरे क्या व्योम में है अविरत रहती सोम को मेघ-माला? होता है अंत में क्या प्रकट वह नहीं और भी कांतिवाला॥ है सच्ची धीरता का समय बस यही है महा धैर्यशाली! क्या विद्यु द्वंहि का भी कुछ कर सकती वृष्टिधारा-प्रणाली? हों भी तो आपदाएँ अधिक अशुभ हैं क्या पराधीनता से? वृक्षों जैसा झुकेगा अनिल-निकट क्या शैल भी दीनता से? डूबे हैं वीर सारे अकबर-बल का सिंधु ऐसा गंभीर, रक्खे हैं नीर नीचे कमल-सम वहाँ आप ही के एक धीर। फूलों-सा चूस डाला अकबर-अलि ने देश है ठौर-ठौर, चंपा-सी लाज रक्खी अविकृत अपनी धन्य मेवाड़-मौर! सारे राजा झुके हैं जब अकबर के तेज-आगे सभीत, ऊँची ग्रीवा किए हैं सतत् तब वहाँ आप ही हे विनीत! आर्यों का मान रक्खा, दु:ख सह कर भी है प्रतिज्ञा न टाली, पाया है आपने ही विदित भुवन में नाम आर्यीशुमाली॥ गाते हैं आपका ही सुयश कवि-कृति छोड़ के और गाना; वीरों की वीरता को सु-वर मिल गया चेतकारूढ़ राना। माँ! है जैसा प्रताप प्रिय सुत जन तू तो तुझे धन्य मानें; सोता भी चौंकता है अकबर जिससे साँप हो ज्यों सिरानें॥ “राना ऐसा लिखेंगे, यह अघटित है, की किसी ने हँसी हैं; मानी हैं एक ही वे, बस नस-नस में धीरता ही धँसी है।” यों ही मैंने सभा में कुछ अकबर की वृत्ति है आज फेरी; रक्खो चाहे न रक्खो अब सब विध है आपको लाज मेरी॥ हो लक्ष्यभ्रष्ट चाहे कुछ, पर अब भी तीर है हाथ ही में, होगा हे वीर! पीछे विफल सँभलना, सोचिए आप जी में। आत्मा से पूछ लीजे कि इस विषय में आपका धर्म क्या है; होने से मर्म-पीड़ा समझ न पड़ता कर्म-दुष्कर्म क्या है॥ क्या पश्चाताप पीछे न इस विषय में आप ही आप होगा? मेरी तो धारणा हे कि इस समय भी आपको ताप होगा। क्या मेरी धारणा को कह निज मुख से आप सच्चा करेंगे। या पक्के स्वर्ण को भी सचमुच अब से ताप कच्चा करेंगे? जो हो, ऐसा न हो जो हँस कर मन में ‘मान’ आनंद पावें; जीना है क्या सदा को फिर अपयश की ओर क्यों आप जावें? पृथ्वी में हो रहा है सिर पर सबके मृत्यु का नित्य नृत्य; क्या जानें, ताल टूटे किस पर उसकी, कीजिए कीर्ति-कृत्य॥ हे राजन्, आपको क्या यह विदित नहीं, आप हैं कौन व्यक्ति? होने दीजे न हा! हा! शुचितर अपने चित्त में यों विरक्ति। आर्यों को प्राप्त होगी, स्मरण कर सदा आपका, आत्मशक्ति; रक्खेंगे आप में वे सतत् हृदय से देव की भाँति भक्ति॥ शूरों के आप स्वामी यदि अकबर की वश्यता मान लेंगे, तो दाता दान देना तज कर उलटा आप ही दान लेंगे। सोवेंगे आप भी क्या इस अशुभमयी घोर काली निशा में? होगा क्या अंशुमाली समुदित अब से अस्तवाली दिशा में? दो बातें पूछता हूँ, अब अधिक नहीं, हे प्रतापी प्रताप! आज्ञा हो, क्या कहेंगे अब अकबर को तुर्क या शाह आप? आज्ञा दीजे मुझे जो उचित समझिए, प्रार्थना है प्रकाश— मूँछें ऊँची करूँ या सिर पर पटकूँ हाथ हो के हताश?

नक्षत्र-निपात

जो स्वजनों के बीच चमकता था अभी,
आशा-पूर्वक जिसे देखते थे सभी।
होने को था अभी बहुत कुछ जो बड़ा,
हाय! वही नक्षत्र अचानक खस पड़ा।
निशि का सारा शांत भाव हत हो गया;
नभ के उर का एक रत्न-सा खो गया।
आभा उसके अमल अंतिमालोक की,
रेखा-सी कर गई हृदय पर शोक की!
सारे तारे उसे देखते ही रहे;
हिम-कण-रूपी कोटि-कोटि आँसू बहे।
किंतु न उसको बचा सका फिर इंदु भी;
काम न कुछ कर सके अमृत के बिंदु भी।
भूतल का भी इसी तरह का हाल है—
सचमुच निष्ठुर काल बड़ा विकराल है।

मातृ-मंदिर

भारतमाता का मंदिर यह,
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव-कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
जाति, धर्म, या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर,
सबका सम सम्मान यहाँ।
राम-रहीम, बुद्ध-ईसा का,
सुलभ एक-सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव-संस्कृतियों के
गुण-गौरव का ज्ञान यहाँ।
नहीं चाहिए बुद्धि वैर की,
भला प्रेम उन्माद यहाँ,
सबका शिव-कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
सब तीर्थों का एक तीर्थ यह,
हृदय पवित्र बना लें हम,
आयो, यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम।
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम,
सौ-सौ आदर्शों को लेकर,
एक चरित्र बना लें हम।
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर,
उठे एक जयनाद यहाँ,
सबका शिव-कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।
मिला सत्य का हमें पुजारी,
सफल काम उस न्यायी का,
मुक्ति-लाभ कर्तव्य यहाँ है,
एक-एक अनुयायी का।
बैठो माता के आँगन में,
नाता भाई-भाई का,
समझे उसकी प्रसव-वेदना,
वही लाल है भाई का।
एक साथ मिल बैठ बाँट लो,
अपना हर्ष-विषाद यहाँ,
सबका शिव-कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ।

संबंध

मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ,
हरे! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।
विचारता किंतु यही यहाँ हूँ
नहीं वहाँ क्या तुम, मैं जहाँ हूँ?
चाहे जहाँ क्यों न बना रहूँ मैं,
हूँ कौन? सो तो पहले कहूँ मैं।
हाँ, जो तुम्हें मैं कुछ मानता हूँ,
तो कौन हूँ मैं यह जानता हूँ।
संबंध जो है तुम आप जानो,
मैं हूँ तुम्हारा, यह सत्य मानो।
हूँ तो तुम्हारे बल से बड़ा हूँ,
मैं आप साक्षी अपना खड़ा हूँ।
सर्वज्ञ सर्वेश सदा स्वतंत्र,
तुम्हीं चलाते यह विश्व यंत्र।
पाती तुम्हीं से गति गात्र नाड़ी,
मैं हूँ खिलौना, तुम हो खिलाड़ी।
है व्यर्थ वाक्य-व्यय और सारा,
सदैव मेरे तुम, मैं तुम्हारा।
मेरा तुम्हें ध्यान सभी कहीं है,
मैं और मेरा फिर क्या नहीं है?
जाने मुझे लोग अनाथ चाहे,
थामें न कोई यह हाथ चाहे।
सनाथ हूँ मैं, तुम नाथ मेरे,
सभी कहीं हो तुम साथ मेरे।
विश्वास जो प्राप्त हुआ तुम्हारा,
मेरा वही है बल वित्त सारा।
आशा तुम्हारी मन से न टूटे,
छूटा करे संग न रंग छूटे।
वांछा यही है अब एक मात्र,
रहूँ सदा मैं तव दृष्टि-पात्र।
स्वदेश ही हो अथवा विदेश,
उद्देश मेरा प्रभु का निदेश!

गंगा

यह घट इतना कहाँ हाय! जो
इस में रहती गंगा?
मुझे हाथ धोने का अवसर
दे तू बहती गंगा!
देखे हैं कितने युग तूने,
क्या कहती है गंगा?
आज हमारे पाप ताप ही
तू सहती है गंगा!
तुझसे बुझती रहे चिता वह
जो दहती है गंगा!
फूल भेंट के साथ बाँह यह
तू गहती है गंगा!
बहती रह इस महा मही पर
मेरी महती गंगा!
मुझे हाथ धोने का अवसर
दे तू बहती गंगा!

कुंति और कर्ण

जब दुर्योधन किए बिना संग्राम सरासर,
देने लगा न भूमि सुई की नोक बराबर।
जब न एक भी बात संधि की उसने मानी,
तब विग्रह को विविश हुए पांडव विज्ञानी॥
सुन कर यह सब हाल युद्ध होना निश्चित कर,
कुंति कर्ण-समीप गई गंगा के तट पर।
था उसका उद्देश कर्ण को समझाने का,
तथा मना कर आत्म-पक्ष में कर लाने का॥
वहाँ कर्ण आकंठ-मग्न सुरसरी-नीर में,
कर युग ऊँचे किए लग्न था तप गभीर में।
जप से हुआ निवृत्त न वह बल-गर्वित जौलों,
राह देखती रही खड़ी उसकी यह तौलों॥
किए चित्त एकाग्र सूर्य में दृष्टि लगाए,
अस्फुट स्वर से वेद-मंत्र पढ़ता मन भाए।
सलिल मग्न आकंठ सुहाता था वह ऐसे,
अलि-कुल-कलकल-कलित कमल फूला हो जैसे॥
गंगा-गर्भ-प्रविष्ट सूर्य-सुत शोभाशाली,
दिखलाता था छटा एक वह नई निराली।
सूर्योन्मुख था दृश्य अचल यों मुख-मंडल का—
जल में ज्यों प्रतिबिंब सूर्य का ही हो झलका॥
करके पूरा ध्यान देख कुंती को आगे,
बोला वह यों वचन विनय पूर्वक अनुरागे।
अधिरथ-सुत यह कर्ण तुम्हें करता प्रणाम है;
हो आर्ये! आदेश, कौन मम योग्य काम है?
होकर तब आशीष उसे समुचित हितकारी,
बोली कुंती गिरा प्रकट उससे यों प्यारी।
“बढ़े तुम्हारी कीर्ति वत्स! नित भूमंडल में;
आखंडल सम कहें सकल जन तुम को बल में॥
अधिरथ-सुत की बात वदन से तुम न बखानो
शुद्ध सूर्य-सुत श्रेष्ठ सदा अपने को जानो।
राधा-सुत तुम नहीं, पुत्र मेरे हो प्यारे;
मानों मेरे वचन सत्य ये निश्चय सारे॥
आमंत्रित कर सूर्य देव को मैंने मन में,
मंत्र शक्ति से तुम्हें जना था पिता-भवन में।
आत्म-विषय में विज्ञ न होने से तुम संप्रति,
रखते हो रिपु-रूप कौरवों में अनुचित रति॥
अहो दैव! उत्पन्न किया था जिसको मैंने,
सुर-संभव नर-जन्म दिया था जिसको मैंने।
वही आज तुम वैर पांडवों से रखते हो,
कर्तव्याकर्तव्य नहीं कुछ भी लखते हो॥
होता तुम से सदा पांडवों का अनहित है,
सोचो तो हे वत्स! तुम्हें क्या यही उचित है।
सुत-सेवा-उपहार दिया जाता क्या यों ही?
माता-ऋण-प्रतिकार किया जाता क्या यों ही॥
जननी का संतोष पूर्ण करना मनमाना,
धर्मयज्ञों ने यही धर्म का मर्म बखाना।
सो हे धार्मिक-धीर! तुम्हारा है सब जाना,
फिर क्या समुचित नहीं पांडवों को अपनाना॥
सदाचरण-रत सदा युद्धिष्ठिर अनुज तुम्हारे,
भीम, नकुल, सहदेव, पार्थ अनुगामी सारे।
हो तुम मम सुत प्रथम पांडवों के प्रिय भ्राता,
सो सब सोच विचार बनो अब उनके त्राता॥
पार्थ-भुजों से हुई उपार्जित सब सुखकारी,
दुर्योधन से हरी गई जो छल से सारी।
धर्मराज की वही राजलक्ष्मी अति प्यारी,
भोगो अरि संहार स्वयं तुम हे बलधारी॥
तुम लोगों को देख भेंटते बंधु-भाव से,
प्रेम और आनंद सहित अत्यंत चाव से।
पामर कौरव जलें, स्वजन सारे सुख पावें,
मन चीते सब काम तभी मेरे हो जावें॥
राम-कृष्ण का नाम लिया जाता है जैसे,
सूर्य-चंद्र को याद किया जाता है जैसे।
वैसे ही सब लोग कहें कर्णार्जुन सुख से,
करो वीर तुम वही छुड़ा कर मुझको दु:ख से॥
कर्णार्जुन-सम्मिलन जगत को आज बता दो,
बंधु-बंधु-संबंध सभी को प्रकट जता दो।
प्रेम-सिंधु में स्वजन-वर्ग को शीघ्र नहा दो,
शत्रु-जनों का गर्व खर्व कर सर्व बहा दो॥
राम-भरत की भेंट हुई थी पहले जैसे,
कर्ण-युधिष्ठिर-मिलन आज देखें सब तैसे।
आई हूँ मैं इसीलिए इस समय यहाँ पर,
करो पुत्र स्वीकार वचन मेरे ये हितकर॥”
मर्म-स्पर्शी वचन श्रवण कर भी कुंती के,
बदले नहीं विचार कर्ण के निश्चल जी के
प्रत्युत्तर फिर लगा उसे देने वह ऐसे—
मुरज मधुर गंभीर घोष करता है जैसे॥
“हे नर-वीरप्रसू! वचन ये सत्य तुम्हारे,
जन्म-कथा निज जान अंग पुलकित मम सारे।
सूत वंश में हुए किंतु संस्कार हमारे,
अधिरथ-राधा विदित हमारे पलक प्यारे॥
दुर्योधन ने सदा हमारा मान किया है,
प्रेमसहित धन-धान्य पूर्ण बहु राज्य दिया है।
किए सतत् उपकार जिन्होंने ऐसे-ऐसे
त्यागें उनका संग कहो फिर हम अब कैसे॥
टाले नहीं कदापि जिन्होंने वचन हमारे,
बंधु-भाव जो रहे सदा ही हम पर धारे।
उनका ऐसे समय साथ कैसे हम छोड़ें?
तोड़ पूर्व-संबंध वैर कैसे हम जोड़ें?
किए भरोसा सदा हमारा ही निज मन में,
दुर्योधन ने सकल कार्य हैं किए भुवन में।
फिर भी जो साहाय्य करें उनका न कहीं हम,
यही कहेंगे विज्ञ मही में मनुज नहीं हम॥
इस कारण हे जननि! रहेंगे जीवित जौलौं,
होने देंगे अहित न दुर्योधन का तौलौं।
लेंगे हम आमरण पक्ष उस बलधारी का,
करना क्या अपकार चाहिए उपकारी का?
कौरवपति की ओर धर्म को हम पालेंगे,
किंतु तुम्हारे भी न वचन माँ, हम टालेंगे।
एक पार्थ को छोड़, निरत जिससे हैं पण में,
मारेंगे हम नहीं किसी पांडव को रण में॥
अर्जुन ही या हमीं एक जन लड़ स्वपक्ष में,
पावेंगे यदि विमल वीरगति को समक्ष में।
तो भी सुत हे जननि! रहेंगे पाँच तुम्हारे,
होंगे मिथ्या नहीं कभी ये वचन हमारे॥”

न हो सिद्धि, साधन तो है

न हो सिद्धि, साधन तो है
बुद्धि नहीं, न सही, पर मैंने पाया अपना मन तो है
यही बहुत जो इसे सँजोऊ
अधिक-हेतु क्यों रोऊँ-धोऊँ
सखा, सूत वा दूत न होऊँ
पर यह जन प्रभु-जन तो है
न हो सिद्धि, साधन तो है!
माना मुक्त नहीं हो पाया,
खींच मुझे यह बंधन लाया
तब भी मेरी ममता-माया
मिला मुझे नर-तन तो है
न हो सिद्धि, साधन तो है!
बाहर भी क्या आज खड़ा मैं
काले कोसों दूर पड़ा मैं
देख रहा हूँ किंतु बड़ा मैं
तेरा खुला भवन तो है
न हो सिद्धि, साधन तो है!
घेरे है घनघोर अँधेरा
छिपा मुझी से सब कुछ मेरा
किंतु आ रहा जो यह तेरा
पुण्य स्पर्श-पवन तो है
न हो सिद्धि, साधन तो है!
मेरा कंठ रुँधा है स्वामी,
पर तू तो है अंतर्यामी
रहूँ मत मैं पर-पथ-गामी
संगी चिर चेतन तो है
न हो सिद्धि, साधन तो है!

विशाल-भारत

उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
उठ अमिताभ, लाभ कर निज पद,
लुटा, लक्ष्य पर लाल।
जीवन के अरुणोदय में ही
होमामोद पवित्र—
फैल गया पृथ्वी में तेरा,
बजे त्रिदिव-वादित्र।
दो देशों के संधिपत्र में,
ओ चिर-चारु-चरित्र,
साक्षी होते थे तेरे ही
इंद्र, वरुण, वसु, मित्र;
गूँजे तेरे ही मंत्रों से
जल, थल, नभ, पाताल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
बेध गई वासुकि की मणि को
तेरे मख की मेख,
धर्म-स्तंभ उठे अंबर में,
शिलातलों पर लेख।
जल पर नहीं, उपल पर तूने
खींची अक्षय रेख,
अब भी देश-विदेशों में निज
शेष मूर्तियाँ देख;
तेरे आदेशों के आगे
प्रणत हुआ भव-भाल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
विश्व-विजय के स्वप्नों में थे
ग्रीस, रोम, ईरान,
और हो रहे थे बेचारे
बस-बस कर वीरान।
तूने ही मैत्री-करणा का
गाया था तब गान,
पाया था संपूर्ण अवनि में
अग्र-दूत का मान;
एक बार तू उस अतीत की
ओर दृष्टि तो डाल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
दिया स्व हेतु महत्व न जिसको
तूने किसी प्रकार,
पर जिसके हितार्थ त्यागा था
राज-पाट, घर-बार,
बाट देखता है फिर तेरी
वह व्याकुल संसार,
सुन, वह चारों ओर मचा है
दारुण हाहाकार।
जकड़ रहा है मकड़-जाल-सा
उसे स्वयं निज जाल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
स्वार्थ आज भी करा रहा है
विषम विश्व-विद्रोह,
सभ्य वेश में, दस्य दुराशय,
बजा रहे हैं लोह।
नहीं धर्म पर, धन-धरती पर
अड़ा लोभ मय मोह,
वह अशोक-साम्राज्य-निदर्शन
निष्फल था क्या ओह!
तू ही सफल करेगा उसको,
आ, अपना व्रत पाल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
देख रहे हैं सागर तेरे
जल-यानों की बाट,
स्वागतार्थ आतुर, उत्सुक हैं
उनके सारे घाट।
मेटें तेरे बुद्ध वीर फिर
विषम युद्ध-विभ्राट—
लूट पाट की, मार काट की,
नर शोणित की चाट।
हृदय हीन हिंसक बदलेंगे
सहज न अपनी चाल!
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
उठ, फिर देव-पितर अंबर में
होकर सब समवेत,
देने को उद्यत हैं तुझको
स्वस्ति और संकेत।
उठ, प्रत्यय-दृढ़ निश्चय पूर्वक,
साहस शौर्य समेत,
पूर्व प्रमादों से शिक्षा ले,
तज यह तंद्रा, चेत।
अपने ही अधीन हैं अपने
बंध-मोक्ष चिरकाल,
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
विश्व मिलन का भार उठा कर
बैठ न यों तू हार,
“चित्ते दया, समर-निष्ठुरता
व्यर्थ और विस्तार।”
धर्म राम का, कर्म कृष्ण का,
प्रेम बुद्ध का धार,—
और अहिंसा महावीर की,
सर्व समन्वय-सार।
कौन सँभाल सकेगा तुझको,
स्वयं स्वरूप सँभाल,
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!
तेरे ही स्वर का साधक है
भव-भविष्य-संदेश,
किंतु कंठ में पाश पड़ा है
तेरे, मेरे देश!
यह कैसा अपमान और हा!
है यह कैसा क्लेश!
आने दे तू आत्म-स्मृति का
एक उष्ण आवेश।
शीतल पाकर ही चंदन पर
लिपटे हैं बहु व्याल।
उठ, ओ वृहद्, विराट, विशाल!

काट-छाँट

“कोकिल! क्यों तू ‘कु-ऊ कु-ऊ’ कहता रहता है,
करके उसमें संधि क्यों न कू-कू कहता है?”
“आलोचकजी, रीति मुझे भी यह जँचती है,
बात वही है और एक मात्रा बचती है।
सुनिए, वह उल्लू व्याकरण
कैसा अच्छा जानता।
है ‘घु-ऊ घु-ऊ’ कह कर न जो,
‘घू-घू’ मात्र बखानता॥”

पुष्पांजलि

मेरे आँगन का एक फूल!
सौभाग्य-भाव से मिला हुआ,
श्वासोच्छ्वासों से हिला हुआ,
संसार-विटपि में खिला हुआ,
झड़ पड़ा अचानक झूल-झूल;
मेरे आँगन का एक फूल!
ऊषा ने अपना उदय किया,
दीपक ने निज निर्वाण लिया,
मुझको मारुत ने जगा दिया,
देखा कि दे गया हृदय-शूल;
मेरे आँगन का एक फूल!
वह रूप कहाँ, वह रंग कहाँ,
हिलने-डुलने का ढंग कहाँ,
हो गया हरे! रस भंग यहाँ,
उड़ गई गंध की हाय! धूल;
मेरे आँगन का एक फूल!
करता समीर था साँय-साँय,
भूतल लगता था भाँय-भाँय,
बकता था मैं भी आँय-बाँय,
दिखलाई देता था न कूल;
मेरे आँगन का एक फूल!
आए इतने में श्रीनिवास,
था उसी फूल-सा मंद हास,
बोले—उसमें था स्वर्ग-वास,
वह गई, सूक्ष्म था, रहा स्थूल;
मेरे आँगन का एक फूल!
बोला तब मैं हे राज-राज!
क्या है इसके अतिरिक्त आज,
जिसकी अंजलि दूँ तुम्हें साज,
लो इसको भी सब दोष भूल;
मेरे आँगन का एक फूल!

जीवन की ही जय है

मृषा मृत्यु का भय है
जीवन की ही जय है
जीवन ही जड़ जमा रहा है
नीत नव वैभव कमा रहा है
पिता पुत्र में समा रहा है
यह आत्मा अक्षय है
जीवन की ही जय है।
नया जन्म ही जग पाता है,
मरण मूढ़-सा रह जाता है,
एक बीज सौ उपजाता है।
स्रष्टा बड़ा सदय है,
जीवन की ही जय है।
जीवन पर सौ बार मरूँ मैं,
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं?
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं,
तो फिर महाप्रलय है,
जीवन की ही जय है।

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