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मैथिलीशरण गुप्त की कविताएँ भाग 2 : Maithilisharan Gupt Kavitaen Part 2

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

मेरा देश

बलिहारी तेरा वरवेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
बाहर मुकुट विभूषित भाल,
भीतर जटा-जूट का जाल।
ऊपर नभ, नीचे पाताल,
और बीच में तू प्रणपाल।
बंधन में भी मुक्ति निवेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
कभी मुरज-मय वीणावाद,
कभी स्वरों से साम-निनाद।
कभी गगनचुंबी प्रासाद,
कभी कुटी में ही आह्लाद।
नहीं कहीं भी भय का लेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
है तेरी कृति में विक्रांति,
भरी प्रकृति में निश्चल शांति।
फटक नहीं सकती है भ्रांति,
आँखों में है अक्षय क्रांति,
आत्मा में है अज अखिलेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
सरस्वती का तुझमें वास,
लक्ष्मी का भी विपुल-विलास।
प्रिया प्रकृति का पूर्ण विकास,
फिर भी है तू आप उदास।
हे गिरीश, हे अंबरकेश!
मेरे भारत! मेरे देश!
मस्तक में रखता है ज्ञान,
भक्ति-पूर्ण मानस में ध्यान।
करके तू प्रभु-कर्म-विधान,
है सत् चित् आनंद निधान।
मेटे तूने तीनों क्लेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
इधर विविध लीला विस्तार,
उधर गुणों का भी परिहार।
जिधर देखिए पूर्णाकार,
किधर कहें हम तेरा द्वार?
हृदय कहीं से करे प्रवेश,
मेरे भारत! मेरे देश!
तन से सब भोगों का भोग,
मन से महा अलौकिक योग।
पहले संग्रह का संयोग,
स्वयं त्याग का फिर उद्योग।
अद्भुत है तेरा उद्देश,
मेरे भारत! मेरे देश!
बनकर तू चिर साधन धाम,
हुआ स्वयं ही आत्माराम,
लिया नहीं तब तक विश्राम—
जब तक पूरा किया न काम।
दिए तुझी ने सब उपदेश,
मेरे भारत! मेरे देश!

बाजीप्रभु देशपांडे

पन्हाल नामी गढ़ में सचेष्ट,
विख्यातकर्मा जब थे शिवाजी।
लेने पिता का बदला उन्हीं से,
आया वहाँ फ़ाज़ल ख़ाँ ससैन्य॥
वैरी चढ़े यद्यपि थे हज़ारों,
हुए न तो भी सफल प्रयत्न।
होता रहा युद्ध कई महीने,
सुयुक्ति से शक्ति सदैव हारी॥
हुई कई बार विशेष हानि,
हटे न वैरी फिर भी वहाँ से।
लगे शिवाजी तब सोचने यों—
कैसे चलेगा अब काम ऐसे॥
हो मुक्ति जैसे इस आपदा से,
सोची उन्होंने तब और युक्ति।
ले वीर बाँके कुछ एक रात,
नि:शंक हो वे निकल वहाँ से॥
घिरे हुए थे नृप रक्षकों से,
उत्साह से थे वह किंतु आगे।
सुयोग्य सेनापति धीर वीर,
थे साथ बाजीप्रभु देशपांडे॥
क्रोधांध होके सहसा इन्होंने,
धावा किया सत्वर शत्रुओं पै।
जैसे मृगों के गण में सरोष,
क्षुधार्त पंचानन टूटते हैं॥
होके सुकर्तव्य-विमूढ़ भीत,
मारे गए शीघ्र अनेक वैरी।
विशाल सेनार्णव तैर मानों,
लिया इन्होंने पथ राँगना का॥
जाता हुआ देख इन्हें सगर्व,
पीछा किया तत्क्षण शत्रुओं ने।
निस्तब्धता भंग हुई निशा की—
“शिकार भागो, पकड़ो न छोड़ो॥”
विषाक्त बातें सुन वैरियों की,
जौलों खड़े हों फिर के शिवाजी।
तत्काल ही जान अनर्थ होता,
विनीत बाजीप्रभु ने कहा यों—
“हमें यहाँ रोक कटूक्तियों से,
हैं चाहते शत्रु अभीष्ट-सिद्धि।
करें शठों से शठता सदैव,
न नीति भूलो अपनी नरेश!
मैं रोकता हूँ सब शत्रुओं को,
बढ़ो यहाँ से तुम शीघ्र आगे।
हे तात! मेरा कहना विचारो,
रक्षा इसी में अब है हमारी॥
बोले शिवाजी तब हो गंभीर—
“आओ, मरेंगे सब साथ आज।
तुम्हें यहाँ संकट में गिरा के,
क्या प्राण-रक्षा अपनी करूँ मैं?”
हो व्यग्र बाजीप्रभु शीघ्र बोले—
“मेरे लिए सोच करें न आप।
उद्देश्य-रूपी मख में हमारे,
अनेक साथी बलिदान होंगे॥
अनेक बाजीप्रभु देश में हैं,
है कि एक ही किंतु यहाँ शिवाजी।
पूरा हुआ कार्य नहीं अभी है,
क्या-क्या न जानें करना तुम्हें है॥
मौक़ा नहीं वाद-विवाद का है,
हैं आ रहे शत्रु सवेग पीछे।
जाओ, दुहाई तुमको शिवा की,
हरे! महाराष्ट्र न हो अनाथ॥”
निदान लेके तब वीर आधे,
विदा हुए व्याकुल हो शिवाजी।
ससैन्य बाजीप्रभु वैरियों की,
रहे प्रतीक्षा करके अदृश्य॥
ज्यों ही विपक्षी निकले वहाँ से,
वे क्रुद्ध हो टूट पड़े सवेग।
होने लगा युद्ध अतीव घोर,
सींची गई शोणित से धरित्री॥
दो याम बीते लड़ते परंतु,
सके न वैरी बढ़ एक पाद।
हुआ क्षतच्छिन्न शरीर सारा;
हटे न बाजीप्रभु किंतु पीछे॥
जो आज प्राणों पर खेल के ये,
न रोक लेते सब शत्रुओं को।
या तो शिवाजी बचते न जीते,
या हाथ आते निज शत्रुओं के॥
आए शिवाजी जब रांगना में,
दाग़ी गाईं पीवर पाँच तोपें।
था क्षेम का सूचक भीमनाद,
निश्चिंत बाजीप्रभु हो गए यों॥
फैली मुख-श्री उनकी अपूर्व,
किया उन्होंने प्रभु-धन्यवाद।
निर्वाण के पूर्व यथा प्रदीप—
वे तेज से पूर्ण हुए विशेष॥
की स्वामिरक्षा मर के जिन्होंने,
है धन्य बाजीप्रभु देशपांडे।
अहो! महाराष्ट्र-लियोनिडास!
है सर्वथा दुर्लभ मृत्यु ऐसी॥
थे वीर ऐसे जिनके वरिष्ट,
होते शिवाजी न समर्थ कैसे?
नवीन राष्ट्रस्थिति-योग्य कार्य,
भला कहीं हो सकते अकेले?

उत्तर और बृहन्नला

अति असह्य अज्ञात वास जब
पूरा होने पर आया,
वीर पांडवों ने तब मन में
एक अलौकिक सुख पाया।
उन्हीं दिनों पाकर सहायता
कुरुपति, द्रोण, कर्ण, कृप की,
हरी सुशर्मा ने बहु गायें
चिर वैरी विराट नृप की॥
मत्स्यराज पर विपद देख कर
निज कर्तव्य सोच मन में,
करने को सहायता उनकी
गए युधिष्ठिर भी रण में।
सज्जन निज उपकारों का ज्यों
बदला कभी न लेते हैं,
प्रत्युपकार रूप ऋण त्यों ही
प्राणों से भी देते हैं॥
गए भीम, सहदेव, नकुल भी
करके अस्त्र-शस्त्र धारण,
पर अर्जुन से कहा न नृप ने
नर्तक होने के कारण।
इससे उनकी हुई विकलता
हुआ हृदय में दु:ख अपार,
प्राय: वेश देख कर ही सब
करते हैं योग्यता-विचार॥
उत्तर कुरु के जिस विजयी को
सब जगदेक वीर कहते,
अबला बना हुआ बैठा है
वही आज बल के रहते!
हाय! प्रकट होने पर हमको
लोक कौन पदवी देगा?
वह भीषण अपयश निश्चय ही
प्राण हमारे हर लेगा॥
हाय! हाय! धिक्कार हमें है
छिपे हुए बैठे हैं हम,
आश्रय-दाता नृप विराट पर
विपद पड़ी है दारुणतम।
इच्छा और शक्ति रहते भी
हम कर्तव्य न कर सकते
हाय न तो जी ही सकते हैं
न हम आज हैं मर सकते॥
कृष्णा का अपमान सभा में
और विपिन की बाधा घोर,
रहे झेलते किसी भाँति हम
करके अपना हृदय कठोर।
अहो! दैव क्या इतने पर भी
तुझको दया नहीं आई?
नरक रूप अज्ञात वास में
महा असुविधा प्रकटाई!
आर्य भीम, सहदेव, नकुल युत
धर्मराज को लेकर संग,
मत्स्यराज सानंद गए हैं
करने को रिपु से रण-रंग।
होने से विपरीत वेश हा!
हुआ हमारा ही न प्रबंध,
भला वीरता के कामों से
नाट्यकला का क्या संबंध?
अच्छा क्यों न आप ही अब हम
चले जाएँ युद्धस्थल में,
किंतु देखकर वैरी हमको
जान न लेंगे क्या पल में?
पूर्ण हुआ अज्ञात वास जब
फिर डर ही क्या है इसका?
चाहे जो हो किंतु जगत में
अर्जुन को डर है किसका?
समय कहाँ पावेंगे फिर हम
प्रकटित होने का ऐसा?
मिलता नहीं सुयोग सर्वदा
जग में जैसे को तैसा।
अब तो नहीं रहा जाता है
फिर क्यों यह अवसर खोवें?
कुछ भी हो, अर्जुन के वैरी
अब चिर निद्रा में सोवें॥
निश्चय करते हुए इसी विध
जाने को सत्वर रण में,
अस्थिर अर्जुन घूम रहे थे
नाट्य-भवन के प्रांगण में।
उसी समय पुत्री विराट की
थी जिसकी सूरत भोली,
आकर उनके निकट उत्तरा
उनसे इस प्रकार बोली—
“बृहन्नले! इस समय राज्य पर
कठिन समय जो आया है,
नीच त्रिगर्तराज ने आकर
जो उत्पात मचाया है।
उसके साथ युद्ध करने को
जिस प्रकार हैं पिता गए,
अब उससे भी अधिक
उपद्रव सुने गए हैं नए-नए!
अधम शिरोमणि दुर्योधन ने
इसी समय में पहुँच यहाँ,
करके हरण बहुत-सी गायें
घेरी नगरी जहाँ-तहाँ!
भैया उत्तर ही घर पर हैं
गए युद्ध में वीर सभी,
फिर भी, बालक होकर भी, वे
प्रस्तुत हैं युद्धार्थ अभी॥
कुछ दिन हुए अचानक उनका
मारा गया सारथी विज्ञ,
सैरंध्री कहती है तू भी
है इस गुण में पूर्ण अभिज्ञ।
कई बार अर्जुन का तूने
है समुचित सारथ्य किया,
देकर निज कौशल का परिचय
उनको अत्यानंद दिया॥
क्या भैया की भी सहायता
कर सकता है तू इस काल?
आशा है, यह बात मानकर
कर देगा तू मुझे निहाल।
तुझको अपना ही विचारकर
इस प्रकार कहती हूँ मैं,
तुझे ज्ञात है तुझसे जैसी
तुष्ट सदा रहती हूँ मैं॥”
सुनकर वचन उत्तरा के यों
सुखी हुए मन में अति पार्थ,
फिर क्या कहना अनायास ही
जो मनमाना मिले पदार्थ।
किंतु हर्ष को प्रकट न करके
बोले वे कुछ सकुचाते,
धीरों के गंभीर हृदय के
भाव नहीं ऊपर आते॥
“भला नाचने-गाने वाले
क्या जानें ऐसी बातें?
करनी पड़ती हैं कितनी ही
ऐसे समय नई घातें।
पर जब और उपाय नहीं है
यह आज्ञा पालेंगे हम,
प्रेम-भरा अनुरोध तुम्हारा
किस प्रकार टालेंगे हम?”
नववल्ली-सी खिली उत्तरा
फैली मुख पर छटा नई,
प्रकृत मंद गति को तज कर वह
झट उत्तर के निकट गई।
आख़िरकार युद्ध करने को
राजकुमार हुआ तैयार,
मानो मन्मथ ने धरणी पर
धारण किया नया अवतार॥
तब कृतज्ञता-पूर्ण दृष्टि से
सैरंध्री की ओर निहार,
बृहन्नला भी प्रस्तुत होकर
पाने लगा प्रमोद अपार।
देख उसे विपरीत ढंग से
कवच पहनते हुए विशाल,
हँसती हुई उत्तरा उससे
बोली ऐसे वचन रसाल—
“बृहन्नले! रण में जाकर तू
मुझको नहीं भूल जाना,
कुटिल कौरवों को परास्त कर
उनके वस्त्र छीन लाना।
उनसे रंग-बिरंगी गुड़ियाँ
मैं सानंद बनाऊँगी
और खेलती हुई उन्हीं से
मैं तेरा गुण गाऊँगी॥
सुन कर उसके वचन पार्थ यों
उसे देख कुछ मुसकाए,
उत्तर दिए बिना ही फिर वे
स्यंदन शीघ्र सजा लाए।
कहते नहीं श्रेष्ठ जन पहले
करके ही दिखलाते हैं,
कार्य सिद्ध करने से पहले
बातें नहीं बनाते हैं॥
रथारूढ़ होकर फिर दोनों
समर भूमि को चले सहर्ष,
चकित हुआ मन में तब उत्तर
देख पार्थ-पाटव-उत्कर्ष।
पुर से निकल शीघ्र पहुँचे वे
उसी शमी पादप के पास,
शस्त्र छिपा रक्खे थे जिस पर
पांडु-सुतों ने बिना प्रयास॥
इंद्रधनुष-सम विविध वर्णमय
वीरों के वस्त्रों वाली,
चपल चंचला के प्रकाश-सम
चमकीले शस्त्रों वाली।
पवन-वेग मय वाहनवाली
गर्जन करती हुई, बड़ी,
उसी जगह से घनमाला-सी
कौरव सेना दीख पड़ी॥
सूर्योदय होने पर दीपक
हो जाता निष्प्रभ जैसे,
उसे देखकर उत्तर का मुख
शोभा-हीन हुआ तैसे।
क्षण भर में ही उसका पहला
साहस सारा लुप्त हुआ,
जगा हुआ उत्साह भीति को
जागृत करके सुप्त हुआ॥
बोला तब भय से कातर वह
शक्ति भूल अपनी सारी—
“देखो, देखो, बृहन्नले! यह
सेना है कैसी भारी!
इसे देखकर धैर्य छूटता
अंग आप ही हैं थकते,
मैं क्या, इसे स्वयं सुर-गण भी
रण में नहीं हरा सकते॥
मैं किस भाँति लड़ूँगा इससे,
लौटाओ रथ-अश्व अभी,
सैन्य-सहित जब पिता आएँगे
होगा बस अब युद्ध तभी।
बिंदु और सागर की समता
हो सकती है भला कहीं!
गुरुतम गिरि से गज-शावक को
टक्कर लेना योग्य नहीं॥”
देख उसे भयभीत धनंजय
बोले यों उससे स्वच्छंद—
“यह क्या, राजकुमार! अभी से
पड़ते हो तुम कैसे मंद?
वीर पिता के पुत्र अहो! तुम
इस प्रकार करते आक्रंद,
सावधान! चंचल होकर यों
मत देना अरि को आनंद॥
भला अभी तक शत्रु जनों ने
है ऐसा क्या कार्य किया—
जिसने तुमसे वीर पुत्र का
हृदय अचानक कँपा दिया?
किसी कार्य को देख प्रथम ही
शंकित होना ठीक नहीं,
यश विशेषता से ही मिलता
है यह बात अलीक नहीं॥
स्वार्थ-सिद्धि के लिए लोक में
दुराचार जो करते हैं,
दुराचार ही के कारण वे
दुर्बल होकर मरते हैं।
दुर्योधन-दु:शासनादि हैं
महा दुराचारी धिक्-पात्र,
आओ उनका वध करने में
बन जावें हम कारण-मात्र॥
जैसा निश्चय कर आए हो
अब वैसा ही काम करो,
धैर्य धरो, मत डरो विघ्न से
आगे बढ़कर नाम किरो।
जो कुछ गर्व जना आए हो
देखो, वह खो जाए नहीं,
करो भूल कर काम न ऐसा
सिर नीचा हो जाए कहीं॥”
इस प्रकार अर्जुन ने बहु विध
दिया उसे उत्साह बड़ा,
पर भय के कारण उसका कुछ
उस पर नहीं प्रभाव पड़ा।
बोला वह—“चाहे जो हो पर
इससे लड़ न सकूँगा मैं,
बृहन्नले! रथ को लौटा दे
तुझे बहुत धन दूँगा मैं॥”
अर्जुन को यों उत्तर दे कर
उत्तर रथ से उतर भगा!
तब वे उसे पकड़ने दौड़े
मन में कुछ-कुछ क्रोध जगा।
तत्क्षण दुर्योधन के दल में
अट्टहास यों भास हुआ—
चंचल करता हुआ जलधि को
मानों इंदु-विकास हुआ॥
“क्षत्रिय होकर रण से डरते
है तुमको धिक्कार अरे!”
यों कह धावित हुए पार्थ जब
उड़े केश-पट पवन भरे।
कच-कलाप जा पकड़ा उसका
स्वच्छ पाट का-सा लच्छा,
“ऐसे जीने के बदले तो
है मर जाना ही अच्छा॥
अहो! तुच्छ जीवन पर तुमको
है इतनी ममता मन में,
हँसते-हँसते मर जाते हैं
धीर धर्म के साधन में।
क्षत्रिय होकर पीठ दिखाते
निश्चय ही यह है दुर्दैव,
क्या कर्तव्य-विमुख होकर भी
जो सकते हो, कहो, सदैव?
ऐसा हाल अभी से है जब
तब आगे कैसा होगा?
वृद्धकाल क्या कभी किसी का
युवाकाल जैसा होगा?
कीर्तिमान जन मरा हुआ भी
अमर हुआ जग में जीता,
मरे हुए से भी जीते जी
है अपगीत गया बीता॥
डरो नहीं तुम युद्ध न करना
सबसे स्वयं लड़ूँगा मैं,
बनो सारथी ही तुम मेरे
आँच न आने दूँगा मैं।
होता अहो! सुभद्रानंदन
यदि अभिमन्यु आज इस काल,
तो यह अभी जान लेते तुम—
कितना साहस रखते बाल॥”
यों कह कर अर्जुन ने अपना
पूरा परिचय दिया उसे,
चकित, विनीत और फिर निर्भय
इस प्रकार से किया उसे।
उसी शमी पादप के नीचे
फिर वे उसको ले आए,
और दिखाकर अपने आयुध
उसके द्वारा उतराए॥
वेश बदलने लगे पार्थ तब
कौरव भ्रमित हुए भ्रम से,
धूलि-धूसरित रत्न शाण पर
लगा चमकने क्रम क्रम से!
दुर्योधन की सब आशाएँ
मिट्टी में मिल गई वहीं,
होता है परिणाम कहीं भी
बुरे काम का भला नहीं॥

यांचा

दया भी करोगे? दया-धाम हो,
रमो चित्त में आप तो राम हो।
हमें शक्ति दो, भुक्ति दो या न दो,
विभो! भक्ति दो, मुक्ति दो या न दो॥
गुणातीत हो, या निराकार हो,
हमारे लिए तो तुम्हीं सार हो।
सभी ठौर हो सृष्टि मे जो हरे!
पुन: दृष्टि से हो कहो, क्यों परे?
तजो शून्यता और साकार हो,
पुन: रूप में भाव-विस्तार हो।
बनें चर्म के चक्षु भी धन्य ये,
तुम्हें छोड़ देखें किसे अन्य ये॥
कई जन्म का हाय! विश्लेष है।
कहो, क्या अभी और भी शेष है?
नहीं किंतु चिंता कि न्यारे रहें;
तुम्हारा सदा ध्यान धारे रहें॥
व्यथा हो न जो भूमि को भार की,
नहीं है हमें भीति संसार की।
तुम्हारे जगद्राज्य में भीति क्या?
हमारे लिए है नई नीति क्या?
तुम्हारा जगद्राज्य जीता रहे,
सदा प्रेम-पीयूष पीता रहे।
बढ़े शांति ज्यों चंद्रमा की कला,
सभी के भले में हमारा भला॥
हमें ध्यान दो, ज्ञान दो या न दो,
गिरा-गान दो, मान दो या न दो।
तुम्हारे गुण-ग्राम गाया करें;
इसी भाँति विश्राम पाया करें॥
नहीं लालसा है विभो! वित्त की,
हमें चेतना चाहिए चित्त की।
भले ही न दो एक भी संपदा,
रहे आत्म-विश्वास पूरा सदा॥
नहीं माँगते हीर या हेम दो,
दिया विश्व तो विश्व का प्रेम दो।
सहें दु:ख आपत्तियों से घिरे,
रहें किंतु दुर्वृत्तियों से फिरे॥
न छूटें भले ही कभी बंध से,
फिरें मोह के मार्ग में अंध से।
न भूलें तुम्हारी निराली छटा,
घिरी ही रहे नित्य काली घटा॥
रहें सर्वदा दु:ख में, सोच क्या?
तुम्हारा दिया दु:ख, संकोच क्या?
नहीं मृत्यु से किंतु जी में डरें,
तुम्हें देखते-देखते ही मरें॥
भिखारी खड़े हैं, ज़रा ध्यान दो,
न दो और तो दृष्टि का दान दो।
मरें या जिएँ भाग्य को लेख लें,
तुम्हारी अपांग-प्रभा देख लें॥

कविता

कविता से सप्रेम कहा मैंने, “वह मुझको,
दूँगा मैं उपहार अलंकारों के तुझको।”
बोली तब वह कि “मैं चाहती हूँ कब इनको,”
पूछा मैंने—“भाषा खोजती है फिर किसको?”
“जो मुझे हृदय का दान दे,”
कविता ने उत्तर दिया,—
“वह कोई हो मैंने उसे,
अपना करके वर लिया॥”

क्षार-पारावार

छोड़ मर्यादा न अपनी, वीर, धीरज धार,
क्षुब्ध-पारावार, मेरे क्षार-पारावार!
रोक सकता है तुझे क्या मृत्तिका का तीर?
थाम अपने आपको तू, ओ अतल-गंभीर!
व्यर्थ मटमैला न हो वह नील-निर्मल-नीर,
ताप-दु:शासन-दलित भू-द्रौपदी का चीर।
सुन, अमर्यादा प्रलय का खोल देगी द्वार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
ये गले, पिघले हुए पर्वत-सदृश कल्लोल,
ग्रास करने जा रहे हैं, कह किसे मुँह खोल?
ये सलिल-वातूल अपने तनिक तू ही तोल,
वेग वह वेला वराकी सह सकेगी, बोल?
धीर, अपने ही हिए पर झेल उनका भार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
हाय! जल में भी जले जो, एक ऐसी आग,
जान ले तब प्राकृतिक है यह प्रबल उपराग।
उचित ही यह उफनना, यह हाँफना, ये झाग,
पर ठहर प्रभविष्णु, तू, न सहिष्णुता को त्याग।
काट दे बंधन सहित सब कुछ न तेरी धार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
मथित है, हृतरत्न है, फिर भी नहीं तू दीन,
देव-कार्य-निमित्त था वह योग एक नवीन।
पूछ देख, अनंत-कवि तेरे हृदय में लीन,
अचल-सा वह विश्व है तुच्छातितुच्छ विहीन।
तू बड़े से भी बड़ा, उस त्याग को स्वीकार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
क्या अमृत के अर्थ है यह भीम तेरा नाद?
तो गरल भी तो गया, फिर कौन हर्ष-विषाद?
जानते हैं जलद तेरे क्षार-जल का स्वाद,
और जगती को जनाते हैं सदा साह्लाद।
ओ मधुर-लावण्यमय, तू छोड़ क्षोभ-विकार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
विकल है यदि तू, दिवंगत देख मंजु-मयंक,
तो निरख, उसको मिला है अचल-ऊँचा अंक।
इष्ट सबका एक-सा वह, राव हो या रंक,
वह वहीं कृतकृत्य है, रह तू यहाँ नि:शंक।
देखकर सद्गति किसी की उचित क्या चीत्कार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
रह हमीं हममें यहाँ बस, ठीक है यह बात,
किंतु रक्खे एक सीमा सौम्य, तेरा गात।
अखिल में अनुभूति अपनी प्राप्त तुझको तात,
सरस है सारी रसा पाकर सलिल-संघात।
मिल हुआ दिव भी तुझी में दूर एकाकार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
वस्तुत: यह क्षोभ तेरा, या अतुल उल्लास!
हाय! उपजाती बड़ों की मौज भी है त्रास।
सह्य तेजोमय किसे रवि का अखंड-विकास?
और भोलानाथ हर का हास-तांडव-रास?
ध्वंस के ही साथ क्या निर्माण का व्यवहार?
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
शांत, ओ गंभीर, ओ उत्ताल, जल-जंजाल,
व्योम तेरी ऊर्मि में, आवर्त में पाताल।
व्यथित, तेरे वाष्प की रस-वृष्टि ही चिरकाल,
है हरा रखती धरा को, दे सुमुक्ता-माल!
एक तेरे अंक में है यान-गत संसार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!
देख अपनी ओर तू, ओ घोर-सुंदर, सार,
लाख रत्नों से भरे तेरे धरे भंडार,
लाख लहरों का सदा तुझमें रहे संचार,
लाख धाराएँ करें तेरे लिए अभिसार।
साख एक बनी रहे, बंधन नहीं, वह हार,
क्षुब्द-पारावार मेरे क्षार-पारावार!

स्वर्ग-सहोदर

जितने गुण सागर नागर हैं, कहते यह बात उजागर हैं। अब यद्यपि दुर्बल, आरत है, पर भारत के सम भारत है॥ बसते वसुधा पर देश कई, जिनकी सुषमा सविशेष नई। पर है किसमें गुरुता इतनी, भरपूर भरी इसमें जितनी॥ गुण-गुंफित हैं इसमें इतने, पृथिवी पर हैं न कहीं जितने। किसकी इतनी महिमा वर है? इस पै सब विश्व निछावर है॥ जन तीस करोड़ यहाँ गिनके— कर साठ करोड़ हुए जिनके। जग में वह कार्य मिला किसको, यह देश न साध सके जिसको। उपजे सब अन्न सदा जिसमें, अचला अति विस्तृत है इसमें। जग में जितने प्रिय द्रव्य जहाँ, समझो सबकी भवभूमि यहाँ॥ प्रिय दृश्य अपार निहार नए, छवि वर्णन में कवि हार गए। उपमा इसका न कहीं पर है, धरणी-धर ईश धरोहर है॥ जलवायु महा हितकारक है, रुज-हारक स्वास्थ्य-प्रसारक है। द्युतिमंत दिगंत मनोरम है, क्रम-षड्ऋतु का अति उत्तम है॥ सुखकारक ऊपर श्याम घटा, दुखहारक भू पर शस्य-छटा। दिन में रवि लोक-प्रकाशक है, निशि में शशि ताप-विनाशक है॥ छविमान कहीं पर खेत हरे, वन बाग़ कहीं फल-फूल भरे। गिरि तुंग कहीं मन मोह रहे, सब ओर जलाशय सोह रहे॥ रतनाकर की रसना पहने, बहु पुष्प-समूह बने गहने। परिधान किए तृण-चीर हरा, अति सुंदर है यह दिव्य धरा॥ बहु चंपक, कुंद, कदंब बड़े, वकुलादि अनंत अशोक खड़े। कितने न इसे वर वृक्ष मिले, अति चित्र-विचित्र प्रसून खिले॥ मृदु1 , बेर, मुखप्रिय2, जंबु फले, कदली, शहतूत, अनार भले। फलराज रसाल समान कहीं, फल और मनोहर एक नहीं॥ कृषि केसर की भरपूर यहाँ, मृग-गंध, कुसुंभ, कपूर यहाँ। समझो मधु का बस कोष इसे, रस हैं इतने उपलब्ध किसे? अमृतोपम अद्भुत शक्तिमयी, जिनकी सुगुण-श्रुति नित्य नई। इसमें बहु ओषधियाँ खिलतीं, जल में, थल में, तल में मिलतीं॥ कृषि में इसने जग जीत लिया, किसने इस-सा व्यवसाय किया? सन, रेशम, ऊन, कपास अहो! उपजा इतना किस ठौर कहो? अवनी-उर में बहु रत्न भरे, कनकादिक धातु-समूह धरे। वह कौन पदार्थ मनोरम है, जिसका न यहाँ पर उद्गम है? कवि, पंडित, वीर उदार महा, प्रकटे मुनि धीर अपार यहाँ। लख के जिनकी गति के मग को, गुरुज्ञान सदा मिलता जग को॥ बहु भांति बसे पुर-ग्राम घने, अब भी नभ-चुंबक धाम बने। सब यद्यपि जीर्ण-विशीर्ण पड़े, पर पूर्व-दशास्मृति-चिह्न खड़े॥ अब भी वन में मिलके चरते, बहु गो-गण हैं मन को हरते। इन-सा उपकारक जीव नहीं, पय-तुल्य न पेय पदार्थ कहीं॥ मद-मत्त कहीं गज झूम रहे, मुद मान कहीं मृग घूम रहे। शुक, चातक, कोकिल बोल रहे, कर नृत्य शिखी-गण डोल रहे॥ शत पत्र कहीं पर फूल रहे, मधु-मुग्ध मधुव्रत भूल रहे। कल हंस कहीं रव हैं करते, जल-जीव प्रमोद भरे तरते॥ शुचि शीतल-मंद सुगंध सनी, अनुकूल बयार सुदार बनी। हरती सब का श्रम सेवन में, भरती सुख है तन में, मन में॥ जगती तल में वह देश कहाँ, निकले गिरि-गंध विशेष जहाँ? इसमें मलयाचल शोभन है, जिसमें घन चंदन का वन है॥ शिर है गिरिराज अहो! इसका, इस भाँति महत्व कहो किसका? तुहिनालय यद्यपि नाम पड़ा, विभवालय है वह किंतु बड़ा॥ वर विष्णुपदी बहती इसमें, रवि की तनया रहती इसमें। अघ-नाशक तीर्थ अनेक यहाँ, मिलती मन को चिर-शांति जहाँ॥ क्षिति-मंडल था जब अज्ञ सभी, यह था अति उन्नत, सभ्य तभी। बहु देश समुन्नत जो अब हैं, शिशु शिष्य इसी गुरु के सब हैं॥ शुचि शौर्य-कथा इतनी किसकी, जग-विश्रुत है जितनी इसकी? अमरों तक का यह मित्र रहा, अति दिव्य चरित्र पवित्र रहा॥ ध्रुव धर्ममयी इसकी क्षमता, रखती न कहीं अपनी समता। गरिमा इसकी न कहाँ पर है, किससे न लिया इसने कर है? श्रुति, शास्त्र, पुराण तथा स्मृतियाँ, बहु अन्य सुधी-गण की कृतियाँ। नय-नीति-निमंत्रित तंत्र बने; सब ही विषयों पर ग्रंथ घने॥ कविता, कल नाट्य सुशिल्प कला, इस भाँति बढ़ी किस ठौर भला? किस पै न रहा इसका कर है, किस सद्गुण का न यहाँ घर है? सुख मूल सनातन धर्म रहा, अनुकूल अलौकिक कर्म रहा। वर वृत्त बढ़े इतने किसके? नर क्या, सुर भी वश थे इसके॥ सुख का सब साधन है इसमें, भरपूर भरा धन है इसमें। पर हा! अब योग्य रहे न हमीं, इससे दु:ख की जड़ आन जमीं॥ सुन के इसकी सब पूर्व कथा, उठती उर में अब घोर व्यथा। इसमें इतना घृत-क्षीर बहा, जितना न कहीं पर नीर रहा॥ अब दीन दयालु दया करिए, सब भाँति दरिद्र-दशा हरिए। भरिए फिर वैभव नित्य नया, चिरकाल हुआ सुख छूट गया॥ अवलंब न और कहीं इसको, तजिए हरि हाय! नहीं इसको। खलता दु:ख दैत्य महोदर है, यह भारत स्वर्ग-सहोदर है॥

मंगल-घट

मेरी मिट्टी, मैं बलि जाऊँ,
तुझे पात्र में परिणत पाऊँ।
खुले खेत से लाकर छानूँ,
जल दूँ, सार मिलाकर सानूँ,
सनूँ स्वेद में, किंतु न मानूँ
जब लों लोच न लाऊँ।
मेरी मिट्टी, मैं बलि जाऊँ।
तू ही मेरी चाँदी-सोना,
आघातों से खिन्न न होना,
रूप बनेगा सुघर सलोना,
पहले पिंड बनाऊँ;
मेरी मिट्टी, मैं बलि जाऊँ।
चले पिता का चक्र नियम से,
बैठ शिला पर तू शम-दम से;
उठे एक आकृति क्रम क्रम से,
भली भाँति मैं भाऊँ।
मेरी मिट्टी, मैं बलि जाऊँ।
फिर भी तुझको तपना होगा,
कष्टों से न कलपना होगा,
यों मंगल-घट अपना होगा,
भर घर-घर धर आऊँ।
मेरी मिट्टी, मैं बलि जाऊँ।

बुद्ध भगवान

सुखमय शांति-निधान कहो ये कौन हैं?
तेज:-पुंज-विधान कहो ये कौन हैं?
तपोनिरत विख्यात यही विभु ‘बुद्ध’ हैं;
स्वयं ईश हैं, अत: निरीश्वर शुद्ध हैं॥
विजयी हैं ये महा मोह संग्राम के;
अधिकारी हैं परम पूर्ण विश्राम के।
शम-दम के आधार, दया के धाम हैं;
सदानंद, स्वच्छंद और निष्काम हैं॥
भारत-भाग्याकाश भव्य ये भानु हैं,
विषय-विपिन के लिए कराल कृशानु हैं।
भारत में ही नहीं, विश्व भर में कभी—
फैलाया आलोक, मिटाया तम सभी॥
मूर्ति समझिए इन्हें अलौकिक त्याग की,
चली न इनके निकट एक भी राग की।
शिशु सुत, युवती प्रिया, राज्य-वैभव तथा
परहितार्थ तज दिए इन्होंने सर्वथा!
तन पर केवल एक गेरुवा वस्त्र था,
एकाकी थे, पास न कोई शस्त्र था,
जीत लिया संसार किंतु निज शक्ति से,
सब के सिर झुक पड़े स्वयं ही भक्ति से!
आश्रय हैं ये अतुल अतर्कित युक्ति के,
पथ दर्शक हैं स्वतंत्रता या मुक्ति के,
किसी स्वार्थ के लिए न इनका कर्म है,
प्राणिमात्र में आत्मभाव ही धर्म है॥
गीताअमृत के मेघ दया करते न जो,
समयोचित वर बुद्ध रूप धरते न जो
तो वेदों का ध्यान हमें रहता कहाँ?
बनते नर पशु-हिंस्र मखों के मिष यहाँ॥
कोरा ईश्वर-वाद करेगा क्या कहो?
हैं जो प्रभु के कर्म उन्हें करते रहो।
बौद्ध और ब्राह्मण्य धर्म यों एक है,
दोनों में ही यही अभिन्न विवेक है॥

टाइटानिक की सिंधु-समाधि

सौ योजन पुल बाँध जिन्होंने थल-सम किया जलधि को पार, भारत की लक्ष्मी-स्वरूपिणी जनक-सुता को लिया उबार। नररूपी उन परमेश्वर का राम-नाम भज बारंबार, आओ, पाठक! विपद्-काल में देखें वीरों के व्यवहार। ऊपर नील नभोमंडल है, नीचे क्षार समुद्र अपार, दोनों में अपूर्व समता है, दोनों का अद्भुत व्यापार। किंतु सिंधु-गांभीर्य देखकर नैश गगन चंचल है आज, प्रतिबिंबित होकर पानी में कंपित है नक्षत्र-समाज! ऐसे में यह धीर भाव से कौन अपूर्व पर्वताकार— नभ में मेघ-समान सिंधु की छाती पर कर रहा विहार। सुनो, सुनो, मानों उसमें से निकल रही यह ध्वनि गंभीर,— “हटो, टाइटानिक आता है हे समीर! हे सागर-नीर!” मंद वायु से हिलता-डुलता गर्वित-सा है सिंधु अथाह, किंतु टाइटानिक जहाज़ को, ज़रा नहीं उसकी परवाह। पाल नहीं, मस्तूल नहीं निज कीर्ति-केतु-पट कर उड्डीन, चीड़-फाड़कर सिंधु-नीर को, चला जा रहा है स्वाधीन। जगती के जलयानों में है आज टाइटानिक सिरमौर, इस नव युग में बना कहीं भी, ऐसा श्रेष्ठ जहाज़ न और। विश्व-विदित इंगलैंड देश की कला-कुशलता का परिणाम, है जहाज़, या सभ्य-जगत का, है यह एक मनोहर ग्राम! ग्रंथागार, वाचनालय हैं, बने कहीं क्रीड़ा के स्थान, कहीं सरोवर, कहीं नाट्यगृह, और कहीं सुंदर उद्यान। यह जहाज़ जिसमें आ सकते यात्री साढ़े तीन हज़ार— निकल पड़ा मानों पंद्रहवाँ, रत्न सिंधु से शोभागार! कर,-मुख-निधि-भू संख्यक सन्1 की चौदहवीं एप्रिल है आज, परसों चला विलायत से है, यह प्रासाद-समान जहाज़। यात्रीजन पँचगुने पाँच सौ, हैं जिनमें बहु नर-कुल-केतु, आरोही हैं इस पर सुख से, अमरीका जाने के हेतु। कहीं कहीं सोते हैं यात्री, कहीं कहीं पुस्तक का पाठ, कहीं हास-परिहास हो रहा, कहीं खेल-क्रीड़ा का ठाठ। कहीं प्रिया के संग मुदित मन करते प्रेमी प्रेमालाप, फैला है अति अचल भाव से, चारु चंचलालोक-कलाप। अटलांटिक सागर की शोभा देख कहा है कोई वीर, जा सकती है दृष्टि जहाँ तक भरा हुआ है केवल नीर। अहा! वेष्टनी दंड धरे वह कौन युवक करता है गान— “शासन कर सागर लहरों पर मेरे वीर ब्रिटेन महान!” यह क्या, यह क्या हुआ अचानक धक्के पर धक्के का ज़ोर, होने लगा यहाँ सहसा क्यों, भय-सूचक घंटे का शोर! चारों ओर हुआ कोलाहल हाय! हाय! क्या होगा आज, हिम की शैलाकार शिला से, टकरा कर फट गया जहाज़! एक साथ आसन्न-मृत्यु का देखा सबने दृश्य समक्ष, नभ में भंगपक्ष-पक्षी-से, लगे धड़कने सबके वक्ष। यह जहाज़ भी डूब जाएगा, कौन जानता था यह बात! यह यात्रा अंतिम यात्रा है, था किस यात्री को यह ज्ञात! ऐसे समय सोच के बदले है धीरज ही में कल्याण, इस कारण सब लगे सोचने कैसे बच सकते हैं प्राण! नावें इतनी नहीं कि सबकी रक्षा का हो सके उपाय, कौन मरेगा, कौन बचेगा? कैसा कठिन प्रश्न है हाय! तत्क्षण एक वीर-कंठ-स्वर धीर भाव से हुआ प्रमाण— “पीछे हटें पुरुष, हो पहले स्त्रियों और बच्चों का त्राण।” कप्तान स्मिथ की आज्ञा से पीछे हटे धन्य सब धीर, है जिनमें आस्टर से धनपति, तथा स्टेड से नैतिक वीर। हाय! दृश्य आगे का अब वह है करुणा का पूर्ण प्रताप, पति-पत्नी का, पिता-पुत्र का, है जिसमें अंतिम साक्षात्। आग्रह के वश अबलाओं का वह रोते-रोते प्रस्थान, है प्रत्यक्ष कि स्वप्न, हाय! कुछ समझ नहीं पड़ता भगवान्! कितनी ही महिलाएँ अपने, पतियों का तज सकीं न साथ,— बोलीं लिपट कंठ से उनके, “साथ मरेंगीं हम हे नाथ!” “प्रिये! धैर्य धर जियो हाय! तुम देखो सुत के मुख की ओर,” रोई यों सुन कोई पत्नी, शोक-सिंधु में उठी हिलोर॥ हुए व्यग्र भी कितने ही जन प्राण बचाने को उस काल, किंतु वीर-सिंहों के वन में होते हैं क्या नहीं शृगाल? जो हो, कर्णधार की वाणी सुनी गई फिर यों गंभीर— “छी! छी! सच्चे वृटिश बनो रे, मरो भले ही, न हो अधीर।” ऐसी गड़बड़ में भी भीतर निश्चल है वह नरवर कौन? अहो युवक! तुम सर्वनाश के समय यहाँ बैठे हो मौन! वीर फिलिप निज सोच न करके तार भेजने में है लग्न— “दौड़ो, चलो, बचाओ, आओ, हुआ टाइटानिक जल-मग्न!” देखो, एक मनुज वह जल में तैर रहा है किसी प्रकार, कुछ नौकारोही जन उसका, करने जाते हैं उद्धार। किंतु सुनो वह क्या कहता है “नौका सह न सकेगी भार— प्राण बचाओ, जाओ तुम सब है मुझको मरना स्वीकार।” औरों की रक्षा करके यों मर सकती जिसकी संतान, क्यों न भला वह देश जगत में, हो सम्मानित और महान? प्राण बचाने को औरों के तज सकता है जो निज देह, जितना गौरव प्राप्त करे वह है थोड़ा ही निस्संदेह। आए नहीं आठ सौ जन भी नौकाएँ भर गई तमाम, सोलह सौ यात्री निर्भय हो, मर कर अमर कर गए नाम। वह मरना भी दर्शनीय है, है सजीवता का वह चित्र, उस स्वर्गीय भाव को भाषा, प्रकट करेगी कैसे मित्र! वह देखो, आस्टर-से धनपति, तथा स्टेड-से नैतिक वीर— एक-एक सामान्य मनुज की, रक्षा कर तज रहे शरीर! वह देखो, वीरों की श्रेणी करके आत्मत्याग पुनीत, धन्य मृत्यु को भेंट रही है, बैंड बजा कर, गाकर गीत! (गीत) “मृत्यु! मृत्यु! आ जा, आ जा, तू, स्वागत करते हैं हम लोग, बड़े भाग्य से मिल सकता है, ऐसे गौरव का संयोग। तू तो केवल नियति मात्र है, फिर तुझसे भय का क्या काम? हम अपना कर्तव्य कर चुके, लेते हैं अब चिर-विश्राम। हँसते-हँसते स्वर्ग-धाम में भोगेंगे दुर्लभ सुख-भोग, मृत्यु! मृत्यु! आ जा, आ जा, तू, स्वागत करते हैं हम लोग! बृटिश-जाति मरने से डरती, तो क्या कर सकती कुछ काम? सिंह-उपाधि-युक्त पृथ्वी पर, हो सकता क्या उसका नाम? मृत्यु! न डर कर ही तुझसे हम, यह उन्नति कर सके समस्त— बृटिश-राज्य में आज देख लो, सूर्य नहीं हो सकता अस्त! यह तो होता ही रहता है नश्वर तनु का योग-वियोग, मृत्यु! मृत्यु! आ जा, आ जा, तू, स्वागत करते हैं हम लोग! वे जग को चौंकाने वाले अद्भुत-अद्भुत आविष्कार, वह वैज्ञानिक वृद्धि कि जिससे, होता है अपूर्व उपकार। वे यंत्रादि वाष्प-विद्युन्मय, वे वाहन, वे व्योम-विमान, प्रकटित कर सकते हम कैसे करते जो न आत्म-बलिदान? हम मर जाएँ परंतु हमारे अजर अमर हैं सब उद्योग, मृत्यु! मृत्यु! आ जा, आ जा, तू, स्वागत करते हैं हम लोग! हे करुणावरुणालय प्रभुवर! विश्वमूर्ति, विश्वंभर, ईश! नाथ! तुम्हारे पद-पद्मों में, अर्पण करते हैं हम शीश। देव! विनय स्वीकृत कर लीजे, कीजे निज सामीप्य प्रदान, परम पिता हैं आप हमारे, दीजे आत्म-शक्ति भगवान! शांतिमयी यह मृत्यु हमारे दूर करे सारे भव-रोग, मृत्यु! मृत्यु! आ जा, आ जा, तू, स्वागत करते हैं हम लोग!” अहा! शब्द-सागर में डूबा अब्धि और आकाश महान, हुआ साथ ही मग्न सिंधु में, भग्न टाइटानिक जल-यान! हुए आज निर्वाण भले ही वे बहु जीवन-दीप अनित्य, उदित हुआ आदर्श नाम का, जग में एक नया आदित्य। वीरो! हम विदेशवासी भी देते तुम्हें अश्रु-जल-दान, धन्य धैर्यमय त्याग तुम्हारा, तुम्हें शांति देवें भगवान! मिलती नहीं महत्व-प्रदर्शक आज तुम्हारे योग्य उपाधि, प्रलय-काल में भी न मिटेगी, धन्य तुम्हारी सिंधु-समाधि! हाय! आज उस दुर्घटना पर, हो कर करुणा का उद्रेक— तेरह सौ वत्सर पहले की, याद आ गई घटना एक। भारतवर्ष तीर्थ को आते, बौद्ध भिक्षुओं ने इस वार— ली समाधि थी बंग-सिंधु में, करके औरों का उद्धार। भग्न हुई ज्यों ही वह तरणी, पाकर शिखराघात कठोर— दैवयोग से एक दूसरी, नौका आ पहुँची उस ओर। करना चाहा उसने पहले बौद्ध भिक्षुओं का उद्धार, किंतु उन्होंने पहले अपना बचना नहीं किया स्वीकार। अन्य जनों का त्राण हुआ पर रहा तरी में स्थान न शेष, बौद्ध भिक्षुओं ने तब अपनी देकर सामग्री नि:शेष। बोधि-द्रुम-तल में उस सबके, अर्पण का करके उपदेश— ली समाधि 'अमिताभ' पाठ कर, सफल किया जीवन उद्देश। बौद्ध भिक्षुओं की वह वाणी अब भी मुग्ध कर रही प्राण— “संभव नहीं बौद्ध होकर जो करें प्रथम हम अपना त्राण। हमें अपेक्षा करनी होगी, बुद्धदेव की है यह उक्ति— कब तक? जब तक तुच्छ कीट तक, पा न सकें पृथ्वी पर मुक्ति!”

आँसू

नेत्र-गंगा में नहा लो मानवो,
पाप-तापों को बहा लो मानवो।
आँसुओं का दान करके लोक में,
कारुणीक-कृती कहा लो मानवो॥
अश्रु क्या हैं, मनुज! पहचानों उन्हें,
क्षार जल के बिंदु मत मानों उन्हें,
स्वर्ग की शुचिता उन्हीं में है यहाँ,
अमृत के अनुभूत कण जानों उन्हें॥
ताप जब जग का सहा जाता नहीं,
घन बरसते हैं, रहा जाता नहीं।
भूमि होती है तुरंत हरी-भरी,
देख लो यह सब कहा जाता नहीं॥
देखते हो व्योम-भूषण सम जिन्हें,
प्रिय नहीं नक्षत्र वे शुचितम किन्हें।
कुछ कहें इन नैशदीपों को सुधी,
प्रकृति-करुणा-कण कहेंगे हम इन्हें॥
ओस के वे रत्न देखे हैं कभी?
मोद भरते हैं सुमन जिनसे सभी!
हैं तुम्हारे लोचनों में भी वही,
विश्व के भंडार भर जावें अभी॥
स्वाति जल को सीप का मुँह खुल रहा,
और चातक भी उसी पर तुल रहा।
पर तुम्हारे एक ही दृग बिंदु से,
देख लो सब लोक का मुँह धुल रहा॥
उमड़ कर जब प्रभु-पदों तक जाएगा,
सुरसरी का रूप लेकर आएगा।
एक ही उस विमल दृग जल बिंदु में,
मुक्ति होगी भव-जलधि लय पाएगा॥
हृदय का अभिषेक आँखों से करो,
राजराजेश्वर बनोगे हे नरो!
वीर वर हो तो निकल कर गेह से,
जन-विजयिनी वेदना को तो वरो॥
नष्ट हों त्रैताप लोचन-वृष्टि में,
दीन क्यों हो मोतियों की सृष्टि में।
भींगते हैं ईश भी याचक बने,
उस तुम्हारी एक करुण-दृष्टि में॥
नेत्र मुक्ता हार जो पहना नहीं,
पत्थरों की बात मत कहना कहीं।
और तुम यह भी न कहना अंत में,
रह गया सब हाय! यह गहना यहीं॥

निर्झर

शत-शत बाधा-बंधन तोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
प्लावित कर पृथ्वी के पर्त्त,
समतल कर बहु गह्वर गर्त्त,
दिखला कर आवर्त्त-विवर्त्त,
आता हूँ आलोड़ विलोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
पारावार-मिलन की चाह,
मुझे मार्ग की क्या परवाह?
मेरा पथ है स्वत: प्रवाह,
जाता हूँ चिर जीवन जोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
गढ़ कर अनगढ़ उपल अनेक,
उन्हें बना कर शिव सविवेक,
करके फिर उनका अभिषेक,
बढ़ता हूँ निज नवगति मोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
हरियाली है मेरे संग,
मेरे कण-कण में सौ रंग,
फिर भी देख जगत के ढंग,
मुड़ता हूँ मैं भृकुटि मरोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
धरकर नव कलरव निष्पाप,
हर कर संतापों का ताप,
अपना मार्ग बनाकर आप,
जाऊँ सब कुछ पीछे छोड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।
है सबका स्वागत-सम्मान,
करे यहाँ कोई रस-पान,
मेरा जीवन गतिमय गान,
काल! तुझी से मेरी होड़,
निकल चला मैं पत्थर फोड़।

कीर

किधर उड़ गया, बता दो वीर!
किसी ने देखा मेरा कीर?
अभागा वह असहाय अनाथ,
पड़ा हो कहीं किसी के हाथ,
मुझे दे दो साहस के साथ,
तोल कर ले लो हाटक-हीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
देह थी हरी-भरी सुकुमार,
गले में एक अरुण गुण-हार,
चंचु पुट पल्लव सहज सुढार,
गिरा पर गद्गद् थे सब धीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
ग्राम-वन छान चुकी हूँ हाय,
कहाँ जाऊँ अब मैं असहाय,
बता दो कोई मुझे उपाय,
करूँ मैं आज कौन तदबीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
दु:ख होता है दूना आज,
कहाँ वह एक नमूना आज,
पड़ा है पंजर सूना आज,
अछूती रक्खी है वह खीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
रहा जो खा खा कर भी खंख,
काल निज बजा रहा है शंख,
और दुर्बल हैं उसके पंख,
एक मुट्ठी भी नहीं शरीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
शून्य में गई जहाँ तक दृष्टि,
देख ली मैंने नभ की सृष्टि,
वहाँ भी हुई निराशा-वृष्टि,
भरा आँखों में उलटा नीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
अँधेरा कोटर-सा पाताल,
टटोला हाथ दूर तक डाल,
न पाया मैंने अपना लाल,
रुका उलटा नि:श्वास-समीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
खोज डाला सब सागर तीर,
और आगे है केवल नीर,
अगम है वह अथाह गंभीर,
पार उड़ गया न हो बेपीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?
कहाँ खोजूँ उसको हे राम!
तुम्हारा लेता था वह नाम,
दिखाओ मुझको अपना धाम,
झाड़ दो निज माया का चीर।
किसी ने देखा मेरा कीर?

सांत्वना

कैसी विधि है विधे, हाय! यह कहो तुम्हारी,
ऐसी सुंकर सृष्टि और क्षणभंगुर सारी।
इंद्रजाल का शाल खड़ा निर्मूल किया है,
सोने का संसार बना कर धूल किया है।
बस पत्तों पर ही दृष्टि थी,
सुध बुध रही न मूल की।
चतुरानन, हो कर भी चतुर,
तुमने यह क्या भूल की॥
है विकास सर्वत्र नाश का सूचक हम मैं,
होकर पूर्ण सुधांशु तूर्ण मिलता है तम में।
किंतु चंद्र तो हाय! दृष्टि में फिर आता है;
हममें से तो गया सदा को ही जाता है।
फिर भी अपना कुछ बस नहीं,
यह विधि का व्यापार है।
हे हृदय, धैर्य, शांत हो,
मिथ्या सोच विचार है॥
रोग, शोक, संताप सहन करने ही होंगे,
भव के भीषण भार वहन करने ही होंगे।
जैसे बीते समय बिता देना ही होगा;
जो कुछ देगा दैव हमें लेना ही होगा।
जब जन्म हुआ है मृत्यु भी,
होगी निश्चय ही कभी।
होते हैं इस संसार के,
कार्य नियति के वश सभी॥
है जिसकी यह देह उसी के मर्म हमारे,
कर्म उसी के और उसी के फल हैं सारे।
होंगे फिर सुख दु:ख हमारे भला कहाँ से,
गत होंगे सब वहीं, समागत हुए जहाँ से।
हे देव, जना दो बस यही,
यदि हम इतना जानते।
तो भ्रांत भाव से व्यर्थ ही,
हर्ष शोक क्यों मानते॥
हैं हम तो आदेश पालने वाले प्रभु के,
जड़ शरीर में जीव डालने वाले प्रभु के।
जीना है, वह कहै, कहै मरना है हमको,
इंगित के अनुसार कार्य करना है हमको।
जो कुछ उसको अच्छा करो,
वह कर्ता करता रहे।
स्वीकार हमें है दु:ख-सुख,
जो चाहे भरता रहे॥
कण कण में है कांति उसी हृदयस्थ कांत की,
किंतु मोह ने हाय! हमारी दृष्टि भ्रांत की।
हम सांसारिक जीव रहीं यह तत्व समझते,
तो अशांति के जटिल जाल में कभी उलझते।
पर अब उपाय है और क्या,
उसका ही आधार है।
वह करुणा वरुण आलय विदित,
विभुवर विश्वाधार है॥
हे अचिंत्य, अखिलेश, विश्व-ब्रह्मांड-बिहारी,
शिरोधार्य है नाथ, हमें सब शास्ति तुम्हारी।
देव! तुम्हारा दान सदा समुचित ही होगा,
अहित न होगा कभी, हमारा हित ही होगा।
है केवल इतनी प्रार्थना,
हमें आत्मबल दीजिए।
इस दुर्गम जीवन-मार्ग में,
कभी कभी सुध लीजिए॥

अन्वेषण

“कठिन धूप में दौड़ रहा है हरिण! कहाँ तू?
हाय! हाय! मर रहा व्यर्थ क्यों आज यहाँ तू?”
“जीवन धन के लिए सभी यह श्रम है मेरा,”
“पर जीवन-धन कहाँ, अरे वह भ्रम है तेरा।”
“क्या कहा कि जीवन-धन नहीं,
दौड़ा जाता हूँ जहाँ?
वह न हो, किंतु आभास तो
मिलता है उसका वहाँ॥”

तुलसीदास

(एक) देखकर सहसा हमारी साधना म्रियमाण— जिस कमंडलु के अमृत ने थे बचाए प्राण। वह तुम्हारे हाथ में था साधु तुलसीदास! जी उठी फिर भावना, दृढ़ हो गया विश्वास॥ जब तपोमय शून्य में भय दृश्य थे सब ओर, जब निराशा की घटाएँ कर रहीं थीं घोर। तब तुम्हीं ने था किया मानस-सरोज-विकास, कवि कहें या रवि तुम्हें हे अमर तुलसीदास! हो गया जब आदि-कवि का मार्ग दुर्गमनीय, सुगम तुमने ही किया करके उसे कमनीय। मुक्त जीवन-धन लिए हो जाएँगे हम पार, देखता रह जाएगा संसार-पारावार! रम्य रामचरित्र भी तुमसे हुआ कृतकार्य, आर्द्र होते हैं जिसे सुन आर्य और अनार्य। काव्य से इतिहास है, इतिहास से हैं तंत्र, तंत्र से फिर हैं तुम्हारे वाक्य वैदिक मंत्र! पैठ संस्कृत-सिंधु में पाए जहाँ जो रत्न— ग्रथित करने में उन्हें करके अलौकिक यत्न। हार जो तुमने दिए इस देश को उपहार— कर सकेगा कौन उनके मूल्य का निर्धार? प्रस्फुटित करके हमारा पुण्य पूर्णादर्श, हृदय को तुमने दिया है अमृत-हस्तस्पर्श। राम राजा ही नहीं, पूर्णवतार पवित्र, पर न हमसे भिन्न है साकेत का गृहचित्र॥ है हमारे अर्थ बस आदर्श ही आराध्य, और साधन भी उसी का है हमारा साध्य। जो हमारे सामने कर दे उसे प्रतिभात, है वही तुम-सा हमारा विश्व-कवि विख्यात॥ प्रकृति-पट पर धन्य वह अंतर्जगत का दृश्य, धन्य वह संगीतमय सत्काव्य हृदय-स्पर्श। धन्य भारतवर्ष का प्रतिभा-प्रकाश-विलास, धन्य रामचरित्र मानस, धन्य तुलसीदास! (दो) कवे, तुम्हारी पुण्य-स्मृति से सचमुच हम सब शुचि होते हैं, सुकृति, तुम्हारी अविकृति कृति से कोटि-कोटि कल्मष धोते हैं। तुम्हें विश्व ने कुछ न दान कर धन जन साधन हीन किया था, तुमने उसको दीन जान कर कितना गौरव ज्ञान दिया था। तुममें इतना प्रेम भरा था जो भुजंग को रज्जु बनाया, पर विषयों में कुछ न धरा था, तुमने उससे प्रभु को पाया। साधु तुम्हारी प्रेत-साधना परमात्मा में परिणति जिसकी, विश्व-हेतु विभु-गुणाराधना करती है यों शुभमति किसकी? शब्द शिल्पि, चिर कविता-मंदिर तुमने जो निर्माण किया है, भ्रांत श्रांत जीवों का फिर-फिर उसने कितना त्राण किया है। वह मानस आदर्श तुम्हारा, मनस्ताप सब हट जाता है; उसमें रामचरित-रस-धारा पाप आप ही कट जाता है। दास हुए तुम जिसके आकर घर-घर क्यों न पुजे वह तुलसी, धन्य हुई तुम-सा सुत पाकर प्यारी मातृभूमि माँ तुलसी।

स्वप्नोत्त्थित

सोया मैं, सदियों तक सोया!
ऐसा सोया हूँ कि आप ही मैं अपने में खोया।
किंतु नींद जो मुझको आई,
वह कुछ भी विश्रांति न लायी।
सौ स्वप्नों ने धूम मचाई,
अपनी-अपनी छटा दिखाई।
चिंता, शोक, विषाद और भय सबने घोर घटा छाई।
और रुधिर-धारा बरसाई॥
बह कर उसने मुझे बहाया और दबोच डुबोया।
सोया मैं, सदियों तक सोया!
उन स्वप्नों का ऐसा क्रम था—
बस, प्रत्यक्ष भाव का भ्रम था!
लूट-मार से नाकों दम था,
न मैं था न मेरा आश्रम था।
धरा धसकती, नभ फटता था, धुआँधार दुस्तर तम था,
और दस्यु दल अति दुर्दम था॥
अब भी प्रहार निरंतर सहता हूँ मैं गोया।
सोया मैं, सदियों तक सोया!
पर अब आँख खुली है मेरी,
और दृष्टि भी मैंने फेरी।
फिर भी है सब ओर अँधेरी,
प्रभा प्रकाशित हो अब तेरी।
देखूँ मैं क्या गया, रहा क्या, न कर दया-मय देरी।
बजने दे फिर जीवन-भेरी॥
किसी प्रकार भार यह मैंने जीवित रह कर ढोया।
सोया मैं, सदियों तक सोया!
तेरी पुण्य पताका फहरे,
मुक्त मुक्ति-पट उसका लहरे।
आँधी उठे, घटा भी घहरे,
मेरी दृष्टि उसी पर ठहरे।
लाख-लाख कंटक हों पथ में, चलूँ जिधर वह छहरे।
भय-विघ्नों से हृदय न हहरे॥
पद-पद पर उसका फल भोगे, जो जिसने हो बोया।
सोया मैं, सदियों तक सोया!

आभास

अरे, ओ अब्दों का इतिहास!
कह, तू किन शब्दों में देगा युग-युग का आभास?
देख इधर, वह विष ही पीते,
हमें यहाँ कितने दिन बीते,
फिर भी अमृतपत्र हम जीते
जिए आत्म-विश्वास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
पुण्य-भूमि के इस अंचल में,
सिंधु और सरयु के जल में,
गंगा-यमुना के कल-कल में,
अगणित वीचि-विलास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
मंत्रों का दर्शन, अवतारण,
और दर्शनों का ध्रुव-धारण,
वह उपनिषदों का उच्चारण,
योगों का अभ्यास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
आत्म-रूप का वह उजियाला,
त्याग, याग, तप की वह ज्वाला,
पावन पवन तपोवन वाला,
वह विकाश, वह ह्रास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
कब की थी वह संचित माया,
जो पसार कर अपनी काया,
पाकर राम-राज्य की छाया,
करती थी सुख-वास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
बजी चैन की वंशी निर्भय,
आया कलि के आगे अविनय,
फिर भी धर्मराज का जय जय,
छाया वह उछ्वास!
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
हम उजड़ों ने भी बढ़-बढ़ कर,
पार उतर ऊपर चढ़-चढ़ कर,
देश बसाए हैं गढ़-गढ़ कर,
तब भी बिना प्रयास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
संघ-शरण लेकर सुखदाई,
फिर भी यहाँ शांति फिर आई,
गूँज गिरा गौतम की छाई,
फिर नव भव-विन्यास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
उदासीनता की दोपहरी,
श्रांतिमयी निद्रा थी गहरी,
तब भी जाग रहे थे प्रहरी,
कर न सका कुछ त्रास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
सहसा एक स्वप्न-सा आया,
वह क्या-क्या उत्पात न लाया,
जागे तो यह बंधन पाया,
हुआ हाय खग्रास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
किंतु निराश न होना भाई,
इसमें भी कुछ भरी भलाई,
तुमने मोहन की मति पाई,
उठने दो उल्लास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!
निज बंधन भी विफल न जावे,
विश्व एक नूतन बल पावे,
बंधु-भाव में वैर बिलावे,
अनुपम ये दिन-मास।
अरे, ओ अब्दों के इतिहास!

मातृ-मूर्ति

जय जय भारत-भूमि-भवानी!
अमरों ने भी तेरी महिमा
बारंबार बखानी।
तेरा चंद्र-वदन वर विकसित
शांति-सुधा बरसाता है;
मलयानिल-निश्वास निराला
नवजीवन सरसाता है।
हृदय हरा कर देता है यह
अंचल तेरा धानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!
उच्च-हृदय-हिमगिरि से तेरी
गौरव-गंगा बहती है;
और करुण-कालिंदी हमको
प्लावित करती रहती है।
मौन मग्न हो रही देखकर
सरस्वती-विधि वाणी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!
तेरे चित्र विचित्र विभूषण
हैं फूलों के हारों के;
उन्नत-अंबर-आतपत्र में
रत्न जड़े हैं तारों के।
केशों से मोती झरते हैं
या मेघों से पानी?
जय जय भारत-भूमि-भवानि!
वरद-हस्त हरता है तेरे
शक्ति-शूल की सब शंका;
रत्नाकर-रसने, चरणों में
अब भी पड़ी कनक लंका।
सत्य-सिंह-वाहिनी बनी तू
विश्व-पालिनी रानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!
करके माँ, दिग्विजय जिन्होंने
विदित विश्वजित याग किया,
फिर तेरा मृत्पात्र मात्र रख
सारे घन का त्याग किया।
तेरे तनय हुए हैं ऐसे
मानी, दानी, ज्ञानी—
जय जय भारत-भूमि-भवानी!
तेरा अतुल अतीत काल है
आराधन के योग्य समर्थ;
वर्तमान साधन के हित हैं
और भविष्य सिद्धि के अर्थ।
भुक्ति मुक्ति की युक्ति, हमें तू
रख अपना अभिमानी;
जय जय भारत-भूमि-भवानी!

विदा

आँखों में आँसू भरते हैं।
बारंबार रोम कूपों में निर्झर-से झरते हैं॥
भावी की आशाएँ करके सब धीरज धरते हैं।
फिर मिलने के लिए बंधु, हम तुम्हें विदा करते हैं॥

चयन

चुन ले चला हमारा साथी सुमन कहाँ तू,
माली, कठोर माली,
केवल कराल काँटे है छोड़ता यहाँ तू,
यह रीति है निराली॥
किसको सजाएगा हा! हमको उजाड़ कर यों,
यह तो हमें बता तू?
झंखाड़ छोड़ता है इस वन्य झाड़ पर क्यों!
हत देख यह लता तू॥
तेरे कठोर कर में कुम्हला रहा कुसुम है,
बिखरें न हाय! दल ये।
खोकर किरीट मणि ज्यों दु:खार्त्त आज द्रुम है,
द्विज मौन हैं विकल ये॥
भौंरे पलट रहे हैं इस शून्य वृंत पर से,
मकरंद कौन देगा?
आतिथ्य को उठा कर इसके सुवास घर से,
तू कौन पुण्य लेगा?
मृदु मंद मंद गति से शीतल समीर आकर,
दल-द्वार खड़ खड़ाता;
पर लौटता विरति से वह है सुरभि न पाकर,
निज पंख फट फटाता॥
यह फूल जो मधुर फल समयानुकूल लाता,
तू सोच देख मन में,
भगवान के लिए क्या वह भोग में न आता,
बलिदान कर भुवन में॥
हे बंधु, जा रहे हो तुम आज टूट कर यों,
कुछ बस नहीं तुम्हारा!
हम रह गए गहन में क्यों हाय! छूट कर यों,
चारा नहीं हमारा॥
तुम आप तो कृती हो खिल कर बिना झड़े जो,
सुर-कंठ-हार होगे;
हत भाग्य हाय! हम हैं काटों भरे पड़े जो,
किसने न कर्म भोगे?

संसार

संसार नाट्यालय है विचित्र,
बने यहाँ हैं हम पात्र मित्र!
रिझा सके जो प्रभु का न चित्त,
तो लाभ क्या है अपने निमित्त?
संसार है रात्रि-नभोपमान,
मनुष्य तारा-गण के समान।
प्रकाश जो व्यक्त न नाम का है,
होना हमारा किस काम का है?
कर्तव्यता की कृषि का निकेत,
संसार है एक विशाल खेत।
बोता यहाँ जो जन बीज जैसा,
होता उसे है फल लाभ वैसा॥
संसार है एक गंभीर कूप,
भरा हुआ है जल मोद-रूप।
होगा यहाँ सद्गुण जो न पास,
कहो बुझेगी किस भाँति प्यास?
संसार युद्ध-स्थल है कठोर,
हैं लोभ-मोहादिक शत्रु घोर।
विवेक-रूपी बल जो नहीं है,
तो हार ही हार सभी कहीं है॥
संसार है एक अरण्य-भारी,
हुए जहाँ हैं हम मार्गचारी।
जो कर्म रूपी न कुठार होगा,
तो कौन निष्कंटक पार होगा॥
संसार है एक समुद्र मानों,
इसे महा दुस्तर-दीर्घ जानों।
न धर्म-नौका-अवलंब होगा,
तो डूबने में न विलंब होगा॥
समुक्ति-रूपी फल का विशाल,
संसार है एक रसाल शाल।
अनुन्नतात्मा जन जो यहाँ है,
रक्खी फल-प्राप्ति उसे कहाँ है?
संसार है एक कुटुंब भारी,
है बंधु संपूर्ण शरीरधारी।
देखो, मिटै आपस का न मेल,
बना बनाया बिगड़े न खेल॥

झंकार

गूँज रही अब भी झंकार।
होकर भी क्रम-क्रम से मंद,
उड़ी जा रही है स्वच्छंद,
मृदुल पवन पर है मृदु भार।
गूँज रही अब भी झंकार।
किधर गई वह देखो घूर,
सुन पड़ती है दूर—सुदूर,
करती हुई शून्य को पार।
गूँज रही अब भी झंकार।
लय हो गई प्रलय में लीन,
पड़ी मूर्च्छना मूर्च्छित दीन,
तजा काल ने ताल-विचार।
गूँज रही अब भी झंकार।
धम से गिरी गमक पर गाज,
कसकी मींड-मसक वह आज,
उड़ी कणों की क्षण में छार।
गूँज रही अब भी झंकार।
टूटी तान आप पर आप,
करो भले ही अब अनुताप,
टूट गया तंत्री का तार।
गूँज रही अब भी झंकार।

व्यास-स्तवन

शुभ-सौम्य-मूर्ति तेजोनिधान,
हो अन्य भानु ज्यों भासमान,
ध्यानस्थ, स्वस्थ, सद्धर्म-धाम,
भगवान व्यास! तुमको प्रणाम॥
तव गुण अनंत भू-कण समान,
है कौन उन्हें सकता बखान?
उपकार याद कर तव अपार,
होते बुध विस्मित बार-बार॥
कर ज्ञान-भानु तुमने प्रकाश,
अज्ञान-निशा कर दी विनाश।
कर तव शिक्षामृत-पान शुद्ध,
संसार हुआ शिक्षित प्रबुद्ध॥
क्या राजनीति, सामान्य-नीति,
क्या धर्म-कर्म, क्या प्रीति-रीति।
क्या भक्ति-भाव, व्यवहार वेश,
उपदेश दिए तुमने अशेष॥
होता है जग में जो सदैव,
जो हुआ और होगा तथैव,
कथनानुसार तव सो समग्र,
होता है, होगा, हुआ अग्र॥
जो दिखलाया तुमने समक्ष,
हैं वही देख सकते सुदक्ष।
तुमने न किया हो जिसे व्यक्त,
सब उसे बताने में अशक्त॥
है विषय अहो! ऐसा न एक,
जिसका न किया तुमने विवेक।
रचनाएँ कवियों की प्रशस्त,
उच्छिष्ट तुम्हारी है समस्त॥
कर वेदों का तुमने विभाग,
रक्षा की उनकी सानुराग।
वेदांत-सूत्र रच कर अमोल,
है दिए हृदय के नेत्र खोल॥
सुन कर जिनका शुभ सदुपदेश,
रह जाता कुछ सुनना न शेष;
शुचि-शुद्ध, सनातन-धर्म-प्राण,
सो रचे तुम्हीं ने हैं पुराण॥
जिसको सब कवि-कोविद-समाज,
कहते हैं पंचम वेद आज।
वह गीत तुम्हारा ही प्रणीत,
इतिहास महाभारत पुनीत॥
हो जाता धर्म सहाय-हीन,
सब पूर्व-कीर्ति होती विलीन।
स्वच्छंद विचरते पाप-ताप,
लेते न जन्म यदि ईश! आप॥
करता शुभ कर्म प्रचार कौन?
सिखलाता वेदाचार कौन?
हरता तुम बिन त्रयताप कौन?
दिखलाता पूर्व-प्रताप कौन?
करने को तब सन्मार्ग लुप्त,
हैं हुए यत्न बहु प्रकट-गुप्त।
वे हुए किंतु निष्फल, निषिद्ध,
हो क्यों कर सत्य असत्य सिद्ध?
हिंदुत्व हिंदुओं का प्रधान,
हैं अब तक भी जो विद्यमान।
हे जगद्वन्द्य, करुणा-निधान!
हो तुम्हीं एक इसके निदान॥
जो आर्य-जाति का कीर्ति-गान,
पाता है जग में मुख्य मान,
है उसका जो गौरव महान,
सो किया आप ही ने प्रदान॥
वर्णन करते भी बार बार,
रहते हैं तब गुण-गण अपार।
घन चाहे जितना भरें नीर,
घटता न किंतु सागर गंभीर॥
है हमें तुम्हारा अमित गर्व,
है तब कृतज्ञ संसार सर्व,
हे भारत धन्य अश्वमेव,
तुम हुए जहाँ अवतीर्ण देव॥

शब्द के प्रति

सागर भरा तुम्हारे घट में,
विश्रुत तुम बहु वृत्त-विधान;
भरे रहें भंडार तुम्हारे,
अहो शब्द! जो अर्थ-निधान!
जननी सरस्वती के छौने,
मधुर सलौने, शुचि, सोत्साह;
तुम्हीं खिलौने मुग्धामति के,
तुम्हीं ज्ञान के पुतले वाह!
खेलो-कूदो, हँसो-हँसाओ,
करो चित्त की पूरी चाह;
आह! तुम्हारे रोने में भी,
रहता है क्या रस-प्रवाह!
हे भावों के चित्र बोलते!
गाओ तुम निज नव-नव गान;
भरे रहें भंडार तुम्हारे,
अहो शब्द! ओ अर्थ-निधान!
जीते रहो, जगत है जब तक,
तुम ध्वनि के जीवन-धन प्राण;
लो अनुभूति-विभूति विश्व की,
तुम्हीं करोगे उसका त्राण।
तुम सजीव संकेत हमारे,
आत्म-सिद्धि के स्वत: प्रमाण;
तुम्हीं प्रकाशक सत्य-तत्व के,
तुम्हीं कल्पना के कल्याण!
तब सुवर्ण-पात्रों में, हम सब
करें सदा कर्णामृत-पान;
भरे रहें भंडार तुम्हारे,
अहो शब्द! ओ अर्थ-निधान!

मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें

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