मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 2 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 2
मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।
पंचवटी
पूर्वाभास[1]
पूज्य पिता के सहज सत्य पर, वार सुधाम, धरा, धन को, चले राम, सीता भी उनके पीछे चलीं गहन वन को। उनके भी पीछे लक्ष्मण थे, कहा राम ने कि “तुम कहाँ? विनत वदन से उत्तर पाया— तुम मेरे सर्वस्व जहाँ॥”
[2]
सीता बोलीं कि ये पिता की, आज्ञा से सब छोड़ चले, पर देवर, तुम त्यागी बनकर, क्यों घर से मुहँ मोड़ चले?” उत्तर मिला कि “आर्य्ये, बरबस, बना न दो मुझको त्यागी, आर्य-चरण-सेवा में समझो, मुझको भी अपना भागी॥
[3]
“क्या कर्त्तव्य यही है भाई?” लक्ष्मण ने सिर झुका लिया, “आर्य आपके प्रति इस जन ने, कब-कब क्या कर्त्तव्य किया? प्यार किया है तुमने केवल! ”सीता यह कह मुसकाईं, किंतु राम की उज्ज्वल आँखें, सफल सीप-सी भर आईं॥
पंचवटी
[1]
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अंबरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानो झीम रहे हैं तरु भी, मंद पवन के झोंकों से॥
[2]
पंचवटी की छाया में है, सुंदर पर्ण-कुटीर बना, उसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना, जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है? भोगी कुसमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥
[3]
किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किए, राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिए। बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है, जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!
[4]
मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है, तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है। वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी, विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥
[5]
कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता; आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता। बीच-बीच में इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी, मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई-नई—
[6]
क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा; है स्वच्छंद सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा? बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप, पर कितने एकांत भाव से, कितने शांत और चुपचाप!
[7]
है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर, रवि बटोर लेता है उनको, सदा सबेरा होने पर। और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है, शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।
[8]
सरल तरल जिंन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है, अति आत्मीया प्रकृति हमारे साथ उन्हीं से रोती है! अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है, पर बूढ़ों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥
[9]
तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात, वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात। अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की। किंतु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!
[10]
और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे, व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे! कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक; पर अपना हित आप नहीं क्या कर सकता है यह नरलोक!
[11]
मझली माँ ने क्या समझा था, कि मैं राजमाता हूँगी, निर्वासित कर आर्य राम को, अपनी जड़ें जमा लूँगी। चित्रकूट में किंतु उसे ही, देख स्वयं करुणा थकती, उसे देखते थे सब, वह थी, निज को ही न देख सकती॥
[12]
अहो! राजमातृत्व यही था, हुए भरत भी सब त्यागी। पर सौ सो सम्राटों से भी हैं सचमुच वे बड़भागी। एक राज्य का मूढ़ जगत ने, कितना महामूल्य रक्खा, हमको तो मानो वन में ही है विश्वानुकूल्य रक्खा॥
[13]
होता यदि राजत्व मात्र ही, लक्ष्य हमारे जीवन का, तो क्यों अपने पूर्वज उसको, छोड़ मार्ग लेते वन का? परिवर्तन ही यदि उन्नति है, तो हम बढ़ते जाते हैं, किंतु मुझे तो सीधे-सच्चे, पूर्व-भाव ही भाते हैं॥
[14]
जो हो, जहाँ आर्य रहते हैं, वहीं राज्य वे करते हैं, उनके शासन में वनचारी, सब स्वच्छंद विहरते हैं। रखते हैं सयत्न हम पुर में, जिन्हें पींजरों में कर बंद; वे पशु-पक्षी भाभी से हैं, हिले यहाँ स्वयमपि, सानंद!
[15]
करते हैं हम पतित जनों में, बहुधा पशुता का आरोप; करता है पशु वर्ग किंतु क्या, निज निसर्ग नियमों का लोप? मैं मनुष्यता को सुरत्व की, जननी भी कह सकता हूँ, किंतु पतित को पशु कहना भी, कभी नहीं सह सकता हूँ॥
[16]
आ आकर विचित्र पशु-पक्षी, यहाँ बिताते दोपहरी, भाभी भोजन देतीं उनको, पंचवटी छाया गहरी। चारु चपल बालक ज्यों मिलकर, माँ को घेर खिझाते हैं, खेल-खिलाकर भी आर्य्या को, वे सब यहाँ रिझाते हैं!
[17]
गोदावरी नदी का तट यह, ताल दे रहा है अब भी, चंचल-जल कल-कल कर मानो, तान दे रहा है अब भी! नाच रहे हैं अब भी पत्ते, मन-से सुमन महकते हैं, चंद्र और नक्षत्र ललककर, लालच भरे लहकते हैं॥
[18]
वैतालिक विहंग भाभी के, संप्रति ध्यान लग्न-से हैं, नए गान की रचना में वे, कवि-कुल तुल्य मग्न-से हैं। बीच-बीच में नर्तक केकी, मानो यह कह देता है— मैं तो प्रस्तुत हूँ देखें कल, कौन बड़ाई लेता है॥
[19]
आँखों के आगे हरियाली, रहती है हर घड़ी यहाँ, जहाँ-तहाँ झाड़ी में झिरती है झरनों की झड़ी यहाँ। वन की एक-एक हिमकणिका, जैसी सरस और शुचि है, क्या सौ-सौ नागरिक जनों की, वैसी विमल रम्य रुचि है?
[20]
मुनियों का सत्संग यहाँ है, जिन्हें हुआ है तत्व-ज्ञान, सुनने को मिलते हैं उनसे, नित्य नए अनुपम आख्यान। जितने कष्ट-कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला, गौरव गंध उन्हें उतना ही अत्र तत्र सर्वत्र मिला।
[21]
शुभ सिद्धांत वाक्य पढ़ते हैं, शुक-सारी भी आश्रम के, मुनि कन्याएँ यश गाती हैं, क्या ही पुण्य-पराक्रम के। अहा! आर्य्य के विपिन राज्य में, सुखपूर्वक सब जीते हैं, सिंह और मृग एक घाट पर आकर पानी पीते हैं।
[22]
गुह, निषाद, शबरों तक का मन, रखते हैं प्रभु कानन में, क्या ही सरल वचन रहते हैं, इनके भोले आनन में! इन्हें समाज नीच कहता है, पर हैं ये भी तो प्राणी, इनमें भी मन और भाव हैं, किंतु नहीं वैसी वाणी॥
[23]
कभी विपिन में हमें व्यंजन का, पड़ता नहीं प्रयोजन है, निर्मल जल मधु कंद, मूल, फल आयोजनमय भोजन है। मनःप्रसाद चाहिए केवल, क्या कुटीर फिर क्या प्रसाद? भाभी का आह्लाद अतुल है, मझली माँ का विपुल विषाद!
[24]
अपने पौधों में जब भाभी, भर-भर पानी देती हैं, खुरपी लेकर आप निरातीं, जब वे अपनी खेती हैं, पाती हैं तब कितना गौरव, कितना सुख, कितना संतोष! स्वावलंब की एक झलक पर, न्योछावर कुबेर का कोष॥
[25]
सांसारिकता में मिलती है, यहाँ निराली निस्पृहता, अत्रि और अनसूया की-सी होगी कहाँ पुण्य-गृहता! मानो है यह भुवन भिन्न ही, कृत्रिमता का काम नहीं; प्रकृति अधिष्ठात्री है इसकी, कहीं विकृति का नाम नहीं॥
[26]
स्वजनों की चिंता है हमको, होगा उन्हें हमारा सोच, यही एक इस विपिन-वास में, दोनों ओर रहा संकोच। सब सह सकता है, परोक्ष ही, कभी नहीं सह सकता प्रेम, बस, प्रत्यक्ष भाव में उसका, रक्षित-सा रहता है क्षेम॥
[27]
इच्छा होती है स्वजनों को, एक बार वन ले आऊँ, और यहाँ की अनुपम महिमा, उन्हें घुमाकर दिखलाऊँ। विस्मित होंगे देख आर्य्य को, वे घर की ही भाँति प्रसन्न, मानो वन-विहार में रत हैं, वे वैसे ही श्रीसंपन्न॥
[28]
यदि बाधाएँ हुईं हमें तो, उन बाधाओं के ही साथ, जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहनशक्ति भी आई हाथ। जब बाधाएँ न भी रहेंगी, तब भी शक्ति रहेगी यह, पुर में जाने पर भी वन की स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह॥
[29]
नहीं जानती हाय! हमारी माताएँ आमोद-प्रमोद, मिली हमें है कितनी कोमल, कितनी बड़ी प्रकृति की गोद। इसी खेल को कहते हैं क्या, विद्वज्जन जीवन-संग्राम? तो इसमें सुनाम कर लेना है कितना साधारण काम!
[30]
“बेचारी ऊर्मिला हमारे लिए व्यर्थ रोती होगी, क्या जाने वह, हम सब वन में, होंगे इतने सुख-भोगी! मग्न हुए सौमित्रि चित्र-सम, नेत्र निमीलित एक निमेष, फिर आँखें खोलें तो यह क्या, अनुपम रूप, अलौकिक वेश!
[31]
चकाचौंध-सी लगी देखकर, प्रखर ज्योति की वह ज्वाला, निस्संकोच, खड़ी थी सम्मुख, एक हास्यवदनी बाला! रत्नाभरण भरे अंगों में, ऐसे सुंदर लगते थे— ज्यों प्रफुल्ल बल्ली पर सौ-सौ, जुगनू जगमग जगते थे!
[32]
थी अत्यंत अतृप्त वासना, दीर्घ दृगों से झलक रही, कमलों की मकरंद-मधुरिमा, मानो छवि से छलक रही। किंतु दृष्टि थी जिसे खोजती, मानो उसे पा चुकी थी, भूली-भटकी मृगी अंत में अपनी ठौर आ चुकी थी।
[33]
कटि के नीचे चिकुर-जाल में, उलझ रहा था बायाँ हाथ, खेल रहा हो ज्यों लहरों से, लोल कमल भौंरों के साथ, दायाँ हाथ लिए था सुरभित-चित्र विचित्र-सुमन-माला, टाँगा धनुष कि कल्पलता पर, मनसिज ने झूला डाला!
[34]
पर संदेह-दोल पर ही था, लक्ष्मण का मन झूल रहा, भटक भावनाओं के भ्रम में, भीतर ही था भूल रहा। पड़े विचार-चक्र में थे वे, कहाँ न जाने कूल रहा; आज जागरित-स्वप्न-शाल यह, सम्मुख कैसा फूल रहा!
[35]
देख उन्हें विस्मित विशेष वह, सुस्मितवदनी ही बोली- (रमणी की मूरत मनोज्ञ थी, किंतु न थी सूरत भोली) “शूरवीर होकर अबला को, देख सुभग, तुम थकित हुए; संसृति की स्वाभाविकता पर, चंचल होकर चकित हुए!
[36]
प्रथम बोलना पड़ा मुझे ही, पूछी तुमने बात नहीं, इससे पुरुषों की निर्ममता, होती क्या प्रतिभास नहीं? सँभल गए थे अब तक लक्ष्मण, वे थोड़े से मुसकाए, उत्तर देते हुए उसे फिर, निज गंभीर भाव लाए—
[37]
सुंदरी, मैं सचमुच विस्मित हूँ, तुमको सहसा देख यहाँ, ढलती रात, अकेली अबला, निकल पड़ी तुम कौन कहाँ? पर अबला कहकर अपने को, तुम प्रगल्भता रखती हो, निर्ममता निरीह पुरुषों में, निस्संदेह निरखती हो!
[38]
पर मैं ही यदि परनारी से, पहले संभाषण करता, तो छिन जाती आज कदाचित् पुरुषों की सुधर्मपरता। जो हो, पर मेरे बारे में, बात तुम्हारी सच्ची है, चंडि, क्या कहूँ, तुमसे, मेरी, ममता कितनी कच्ची है॥
[39]
माता, पिता और पत्नी की, धन की, धरा-धाम की भी, मुझे न कुछ भी ममता व्यापी, जीवन परंपरा की भी, एक किंतु उन बातों से क्या, फिर भी हूँ मैं परम सुखी, ममता तो महिलाओं में ही होती है हे मंजुमुखी॥
[40]
शूरवीर कहकर भी मुझको, तुम जो भीरु बताती हो, इससे सूक्ष्मदर्शिता ही तुम, अपनी मुझे जताती हो? भाषण-भंगी देख तुम्हारी, हाँ, मुझको भय होता है, प्रमदे, तुम्हें देख वन में यों, मन में संशय होता है।
[41]
कहूँ मानवी यदि मैं तुमको, तो वैसा संकोच कहाँ? कहूँ दानवी तो उसमें है, यह लावण्य कि लोच कहाँ? वनदेवी समझूँ तो वह तो, होती है भोली-भाली, तुम्हीं बताओ कि तुम कौन हो, हे रंजित रहस्यवाली?
[42]
“केवल इतना कि तुम कौन हो, बोली वह-हा निष्ठुर कांत! यह भी नहीं-चाहती हो क्या, कैसे हो मेरा मन शांत? मुझे जान पड़ता है तुमसे, आज छली जाऊँगी मैं, किंतु आ गई हूँ जब तब क्या, सहज चली जाऊँगी मैं?
[43]
समझो मुझे अतिथि ही अपना, कुछ आतिथ्य मिलेगा क्या? पत्थर पिघले, किंतु तुम्हारा, तब भी हृदय हिलेगा क्या? किया अधर-दंशन रमणी ने, लक्ष्मण फिर भी मुसकाए, मुसकाकर ही बोले उससे-हे शुभ मूर्तिमती माये!
[44]
तुम अनुपम ऐश्वर्य्यवती हो, एक अकिंचन जन हूँ मैं, क्या आतिथ्य करूँ, लज्जित हूँ, वन-वासी, निर्धन हूँ मैं। रमणी ने फिर कहा कि मैंने, भाव तुम्हारा जान लिया, जो धन तुम्हें दिया है विधि ने, देवों को भी नहीं दिया!
[45]
किंतु विराग भाव धारणकर, बने स्वयं यदि तुम त्यागी, तो ये रत्नाभरण वार दूँ, तुम पर मैं हे बड़भागी! धारण करूँ योग तुम-सा ही, भोग-लालसा के कारण, पर कर सकती हूँ मैं यों ही, विपुल-विघ्न-बाधा वारण॥
[46]
इस व्रत में किस इच्छा से तुम, व्रती हुए हो, बतलाओ? मुझमें वह सामर्थ्य है कि तुम, जो चाहो सो सब पाओ। धन की इच्छा हो तुमको तो, सोने का मेरा भू-भाग, शासक, भूप बनो तुम उसके, त्यागो यह अति विषम विराग॥
[47]
और किसी दुर्जय वैरी से, लेना है तुमको प्रतिशोध, तो आज्ञा दो, उसे जला दे, कालानल-सा मेरा क्रोध। प्रेम-पिपासु किसी कांता के, तपस्कूप यदि खनते हो, सचमुच ही तुम भोले हो, क्यों मन को यों हनते हो?
[48]
अरे, कौन है, वार न देगी, जो इस यौवन-धन पर प्राण? खाओ इसे न यों ही हा! हा! करो यत्न से इसका त्राण। किसी हेतु संसार भार-सा, देता हो यदि तुमको ग्लानि, तो अब मेरे साथ उसे तुम, एक और अवसर दो दानि!”
[49]
लक्ष्मण फिर गंभीर हो गए, बोले-“धन्यवाद धन्ये! ललना सुलभ सहानुभूति है, निश्चय तुममें नृपकन्ये! साधारण रमणी कर सकती है ऐसे प्रस्ताव कहीं? पर मैं तुमसे सच कहता हूँ कोई मुझे अभाव नहीं॥
[50]
तो फिर क्या निष्काम तपस्या करते हो तुम इस वय में? पर क्या पाप न होगा तुमको, आश्रम के धर्म्मक्षय में? 'मान लो कि वह न हो, किंतु इस, तप का फल तो होगा ही, फिर वह स्वयं प्राप्त भी तुमसे, क्या न जाएगा भोगा ही?
[51]
वृक्ष लगाने की ही इच्छा, कितने ही जन रखते हैं, पर उनमें जो फल लगते हैं, क्या वे उन्हें न चखते हैं? लक्ष्मण अब हँस पड़े और यों, कहने लगे- दुहाई है! सेंतमेंत की तापस पदवी, मैंने तुमसे पाई है॥
[52]
यों ही यदि तप का फल पाऊँ, तो मैं इसे न चक्खूँगा, तुमसे जन के लिए यत्न से, उसको रक्षित रक्खूँगा। हँसी सुंदरी भी, फिर बोली- यदि वह फल मैं ही होऊँ, तो क्या करो, बताओ? बस अब, क्यों अमूल्य अवसर खोऊँ?”
[53]
“तो मैं योग्य पात्र खोजूँगा, सहज परंतु नहीं यह काम, “मैंने खोज लिया है उसको, यद्यपि नहीं जानती नाम। फिर भी वह मेरे समक्ष है, चौंके लक्ष्मण, बोले-कौन? केवल 'तुम' कहकर रमणी भी, हुई तनिक लज्जित हो मौन॥
[54]
पाप शांत हो, पाप शांत हो, कि मैं विवाहित हूँ बाले!” “पर क्या पुरुष नहीं होते हैं, दो-दो दाराओं वाले? नर कृत शास्त्रों के सब बंधन, हैं नारी को ही लेकर, अपने लिए सभी सुविधाएँ, पहले ही कर बैठे नर!”
[55]
तो नारियाँ शास्त्र रचना पर, क्या बहु पति का करें विधान? पर उनके सतीत्व-गौरव का, करते हैं नर ही गुणगान। मेरे मत में एक ओर हैं, शास्त्रों की विधियाँ सारी, अपना अन्तःकरण आप है, आचारों का सुविचारी॥
[56]
नारी के जिस भव्य-भाव का, साभिमान भाषी हूँ मैं, उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं बहुविवाह-विभ्राट, क्या कहूँ, भद्रे, मुझको क्षमा करो; तुम कुशला हो, किसी कृती को, करो कहीं कृतकृत्य, वरो।”
[57]
पर किस मन से वरूँ किसी को? वह तो तुम से हरा गया! “चोरी का अपराध और भी, लो यह मुझ पर धरा गया? झूठा? प्रश्न किया प्रमदा ने, और कहा-मेरा मन हाय! निकल गया है मेरे कर से, होकर विवश, विकल, निरुपाय!
[58]
कह सकते हो तुम कि चंद्र का, कौन दोष जो ठगा चकोर? किंतु कलाधर ने डाला है, किरण-जाल क्यों उसकी ओर? दीप्ति दिखाता यदि न दीप तो, जलता कैसे कूद पतंग? वाद्य-मुग्ध करके ही फिर क्या, व्याध पकड़ता नहीं कुरंग?
[59]
लेकर इतना रूप कहो तुम, दीख पड़े क्यों मुझे छली? चले प्रभात वात फिर भी क्या, खिले न कोमल कमल-कली? कहने लगे सुलक्षण लक्ष्मण- हे विलक्षणे, ठहरो तुम; पवनाधीन पताका-सी यों, जिधर-तिधर मत फहरो तुम।
[60]
जिसकी रूप स्तुति करती हो, तुम आवेग युक्त इतनी, उसके शील और कुल की भी, अवगति है तुमको कितनी?” उत्तर देती हुई कामिनी, बोली अंग शिथिल करके- है नर, यह क्या पूछ रहे हो, अब तुम हाय! हृदय हरके?
[61]
अपना ही कुल-शील प्रेम में पड़कर नहीं देखतीं हम, प्रेम-पात्र का क्या देखेंगी, प्रिय हैं जिसे लेखतीं हम? रात बीतने पर है अब तो, मीठे बोल बोल दो तुम, प्रेमातिथि है खड़ा द्वार पर, हृदय-कपाट खोल दो तुम।
[62]
हा नारी! किस भ्रम में है तू, प्रेम नहीं यह तो है मोह; आत्मा का विश्वास नहीं यह, है तेरे मन का विद्रोह! विष से भरी वासना है यह, सुधा-पूर्ण वह प्रीति नहीं; रीति नहीं, अनरीति और यह, अति अनीति है, नीति नहीं॥
[63]
आत्म-वंचना करती है तू, किस प्रतीति के धोखे से, झाँक न झंझा के झोंके में, झुककर खुले झरोखे से! शांति नहीं देगी तुझको यह, मृगतृष्णा करती है क्रांति, सावधान हो मैं पर नर हूँ, छोड़ भावना की यह भ्रांति॥
[64]
इसी समय पौ फटी पूर्व में, पलटा प्रकृति-पटी का रंग। किरण-कंटकों से श्यामांबर फटा, दिवा के दमके अंग। कुछ-कुछ अरुण, सुनहली कुछ-कुछ, प्राची की अब भूषा थी, पंचवटी की कुटी खोलकर, खड़ी स्वयं क्या ऊषा थी!
[65]
अहा! अंबरस्था ऊषा भी, इतनी शुचि सस्फूर्ति न थी, अवनी की ऊषा सजीव थी, अंबर की-सी मूर्ति न थी। वह मुख देख, पांडु-सा पड़कर, गया चंद्र पश्चिम की ओर; लक्ष्मण के मुँह पर भी लज्जा, लेने लगी अपूर्व हिलोर॥
[66]
चौंक पड़ी प्रमदा भी सहसा, देख सामने सीता को, कुमुद्वती-सी दबी देख वह, उस पद्मिनी पुनीता को। एक बार ऊषा की आभा, देखी उसने अंबर में, एक बार सीता की शोभा, देखी विगताडंबर में।
[67]
एक बार अपने अंगों की, ओर दृष्टि उसने डाली, उलझ गई वह किंतु, बीच में थी विभूषणों की जाली। एक बार फिर वैदेही के, देखे अंग अदूषण वे, सनक्षत्र अरुणोदय ऐसे रखते थे शुभ भूषण वे॥
[68]
हँसने लगे कुसुम कानन के, देख चित्र-सा एक महान, विकच उठीं कलियाँ डालों में, निरख मैथिली की मुसकान॥ कौन-कौन से फूल खिले हैं, उन्हें गिनाने लगा समीर, एक-एक कर गुन-गुन करके, जुड़ आई भौंरों की भीर॥
[69]
नाटक के इस नए दृश्य के, दर्शक थे द्विज लोग वहाँ, करते थे शाखासनस्थ वे, समधुप रस का भोग वहाँ। झट अभिनयारम्भ करने को, कोलाहल भी करते थे, पंचवटी की रंगभूमि को, प्रिय भावों से भरते थे॥
[70]
सीता ने भी उस रमणी को देखा लक्ष्मण को देखा, फिर दोनों के बीच खींच दी, एक अपूर्व हास्य-रेखा। देवर, तुम कैसे निर्दय हो, घर आए जन का अपमान, किसके पर-नर तुम, उसके जो, चाहे तुमको प्राण-समान?
[71]
याचक को निराश करने में, हो सकती है लाचारी, किंतु नहीं आई है आश्रय, लेने को यह सुकुमारी। देने ही आई है तुमको, निज सर्वस्व बिना संकोच, देने में कार्पण्य तुम्हें हो, तो लेने में क्या है सोच?”
[72]
उनके अरुण चरण-पद्मों में, झुक लक्ष्मण ने किया प्रणाम, आशीर्वाद दिया सीता ने-“हों सब सफल तुम्हारे काम!” और कहा-सब बातें मैंने, सुनी नहीं तुम रखना याद; कब से चलता है बोलो यह, नूतन शुक-रंभा-संवाद?
[73]
बोलीं फिर उस बाला से वे, सुस्मितपूर्वक वैसे ही- “अजी, खिन्न तुम न हो, हमारे, ये देवर हैं ऐसे ही। घर में ब्याही बहू छोड़कर, यहाँ भाग आए हैं ये, इस वय में क्या कहूँ, कहाँ का, यह विराग लाए हैं ये!
[74]
किंतु तुम्हारी इच्छा है तो, मैं भी उन्हें मनाऊँगी, रहो यहाँ तुम अहो! तुम्हारा, वर मैं इन्हें बनाऊँगी। पर तुम हो ऐश्वर्य्यशालिनी, हम दरिद्र वन-वासी हैं, स्वामी-दास स्वयं हैं हम निज, स्वयं स्वामिनी दासी हैं॥
[75]
पर करना होगा न तुम्हें कुछ, सभी काम कर लूँगी मैं, परिवेषण तक मृदुल करों से, तुम्हें न करने दूँगी मैं। हाँ, पालित पशु-पक्षी मेरे, तंग करें यदि तुम्हें कभी, उन्हें क्षमा करना होगा तो, कह रखती हूँ इसे अभी!”
[76]
रमणी बोली-“रहे तुम्हारा, मेरा-रोम-रोम सेवी, कहीं देवरानी यदि अपनी, मुझे बना लो तुम देवी! सीता बोलीं-वन में तुम सी, एक बहिन यदि पाऊँगी, तो बातें करके ही तुमसे, मैं कृतार्थ हो जाऊँगी॥
[77]
इस भामा विषयक भाभी को, अविदित भाव नहीं मेरे, लक्ष्मण को संतोष यही था, फिर भी थे वे मुँह फेरे। बोल उठे अब-इन बातों में क्या रक्खा है हे भाभी! इस विनोद में नहीं दीखती, मुझे मोद की आभा भी।
[78]
तो क्या मैं विनोद करती हूँ! बोली उनसे वैदेही, अपने लिए रूक्ष हो तुम क्यों, होकर भी भ्रातृ-स्नेही? आज ऊर्मिला की चिंता यदि, तुम्हें चित्त में होती है, कि वह विरहिणी बैठी मेरे लिए निरंतर रोती है।
[79]
“तो मैं कहती हूँ, वह मेरी बहिन न देगी तुमको दोष, तुम्हें सुखी सुनकर पीछे भी, पावेगी सच्चा संतोष। प्रिय से स्वयं प्रेम करके ही, हम सब कुछ भर पाती हैं, वे सर्वस्व हमारे भी हैं, यही ध्यान में लाती हैं॥
[80]
जो वरमाला लिए, आप ही, तुमको वरने आई हो, अपना तन, मन, धन सब तुमको, अर्पण करने आई हो, मज्जागत लज्जा तजकर भी, तिस पर करे स्वयं प्रस्ताव, कर सकते हो तुम किस मन से, उससे भी ऐसा बर्ताव?
[81]
मुसकाए लक्ष्मण, फिर बोले-किस मन से मैं कहूँ भला? पहले मन भी तो हो मेरे, जिससे सुख-दुख सहूँ भला!” अच्छा ठहरो कह सीता ने, करके ग्रीवा-भंग अहा! “अरे, अरे’’, न सुना लक्ष्मण का, देख उटज की ओर कहा—
[82]
“आर्य्यपुत्र, उठकर तो देखो, क्या ही सुप्रभात है आज, स्वयं सिद्धि-सी खड़ी द्वार पर, करके अनुज-वधू का साज!” क्षण भर में देखी रमणी ने, एक श्याम शोभा बाँकी! क्या शस्यश्यामल भूतल ने, दिखलाई निज नर-झाँकी!
[83]
किंवा उतर पड़ा अवनी पर, कामरूप कोई घन था, एक अपूर्व ज्योति थी जिसमें जीवन का गहरापन था! देखा रमणी ने चरणों में, नत लक्ष्मण को उसने भेंट, अपने बड़े क्रोड़ में विधु-सा, छिपा लिया सब ओर समेट॥
[84]
सीता बोलीं- “नाथ, निहारो, यह अवसर अनमोल नया; तुम्हारे प्राणानुज का, तप सुरेंद्र भी डोल गया! माना, इनके निकट नहीं है, इंद्रासन की कुछ गिनती, किंतु अप्सरा की भी क्यों ये, सुनते नहीं नम्र विनती?
[85]
तुम सबका स्वभाव ऐसा ही, निश्चल और निराला है, और नहीं तो आई, लक्ष्मी, कौन छोड़ने वाला है? कुम्हला रही देख लो, कर में, स्वयंवरा की वरमाला, किंतु कुंठ देवर ने अपना, मानो कुंठित कर डाला॥
[86]
मुसकाकर राघव ने पहले, देखा तनिक अनुज की ओर, फिर रमणी की ओर देखकर कहा अहा! ज्यों बोले मोर— “शुभे, बताओ कि तुम कौन हो, और चाहती हो तुम क्या? छाती फूल गई रमणी की, क्या चंदन है, कुमकुम क्या!
[87]
बोली वह-पूछा तो तुमने- शुभे, चाहती हो तुम क्या? इन दशनों-अधरों के आगे, क्या मुक्ता हैं, विद्रुम क्या? मैं हूँ कौन वेश ही मेरा, देता इसका परिचय है, और चाहती हूँ क्या, यह भी, प्रकट हो चुका निश्चय है॥
[88]
जो कह दिया, उसे कहने में, फिर मुझको संकोच नहीं, अपने भावी जीवन का भी, जी में कोई सोच नहीं। मन में कुछ वचनों में कुछ हो, मुझमें ऐसी बात नहीं; सहज शक्ति मुझमें अमोघ है, दाव, पेंच या घात नहीं॥
[89]
मैं अपने ऊपर अपना ही रखती हूँ, अधिकार सदा, जहाँ चाहती हूँ, करती हूँ, मैं स्वच्छंद विहार सदा। कोई भय मैं नहीं मानती, समय-विचार करूँगी क्या? डरती हैं बाधाएँ मुझसे, उनसे आप डरूँगी क्या?
[90]
अर्द्धयामिनी होने पर भी, इच्छा हो आई मन में, एकाकिनी घूमती-फिरती, आ निकली मैं इस वन में। देखा आकर यहाँ तुम्हारे, प्राणानुज ये बैठे हैं, मूर्ति बने इस उपल शिला पर, भाव-सिंधु में पैठे हैं
[91]
सत्य मुझे प्रेरित करता है, कि मैं उसे प्रकटित कर दूँ, इन्हें देख मन हुआ कि इनके आगे मैं उसको धर दूँ। वह मन, जिसे अमर भी कोई, कभी क्षुब्ध कर सका नहीं; कोई मोह, लोभ भी कोई, मुग्ध, लुब्ध कर सका नहीं।
[92]
इन्हें देखती हुई आड़ में, बड़ी देर मैं खड़ी रही, क्या बतलाऊँ किन हावों में, किन भावों में पड़ी रही? फिर मानो मन के सुमनों से, माला एक बना लाई, इसके मिस अपने मानस की, भेंट इन्हें देने आई॥
[93]
पर ये तो बस-'कहो, कौन तुम?' करने लगे प्रश्न छूँछा, यह भी नहीं चाहती हो क्या', जैसा अब तुमने पूँछा। चाहे दोनों खरे रहें या, निकलें दोनों ही खोटे; बड़े सदैव बड़े होते हैं, छोटे रहते हैं छोटे॥
[94]
तुम सबको यह हास्य भले ही, करता हो मेरा उपहास, किंतु स्वानुभव, स्वविचारों पर, है मुझको पूरा विश्वास। तो अब सुनो, बड़े होने से, तुमसें बड़ी बड़ाई है, दृढ़ता भी है, मृदुता भी है, इनमें एक कड़ाई है॥
[95]
पहनो कांत, तुम्हीं यह मेरी, जयमाला-सी वरमाला, बने अभी प्रासाद तुम्हारी, यह एकांत पर्णशाला! मुझे ग्रहण कर इस भामा के, भूल जाएँगे ये भ्रू-भंग, हेमकूट, कैलास आदि पर, सुख भोगोगे मेरे संग॥
[96]
मुसकाईं मिथिलेशनंदिनी-प्रथम देवरानी, फिर सौत! अंगीकृत है मुझे, किंतु तुम, माँगो कहीं न मेरी मौत। मुझे नित्य दर्शन भर इनके, तुम करती रहने देना, कहते हैं इसको ही अँगुली, पकड़ प्रकोष्ठ पकड़ लेना!
[97]
रामानुज ने कहा कि “भाभी, है यह बात अलीक नहीं- औरों के झगड़े में पड़ना, कभी किसी को ठीक नहीं। पंचायत करने आई थीं, अब प्रपंच में क्यों न पड़ो, वंचित ही होना पड़ता है, यदि औरों के लिए लड़ो॥
[98]
राघवेंद्र रमणी से बोले-बिना कहे भी बह वाणी, आकृति से ही प्रकृति तुम्हारी, प्रकटित है हे कल्याणी! निश्चय अद्भुत गुण हैं तुम में, फिर भी मैं यह कहता हूँ— गृहत्याग करके भी वन में, सपत्नीक मैं रहता हूँ॥
[99]
किंतु विवाहित होकर भी यह, मेरा अनुज अकेला है, मेरे लिए सभी स्वजनों की, कर आया अवहेला है। इसके एकांगी स्वभाव पर तुमने भी है ध्यान दिया, तदपि इसे ही पहले अपने प्रबल प्रेम का दान दिया॥
[100]
एक अपूर्व चरित लेकर जो, उसको पूर्ण बनाते हैं, वे ही आत्मनिष्ठ जन जग में, परम प्रतिष्ठा पाते हैं। यदि इसको अपने ऊपर तुम, प्रेमासक्त बना लोगी, तो निज कथित गुणों की सबको, तुम सत्यता जना दोगी॥
[101]
जो अंधे होते हैं बहुधा, प्रज्ञाचक्षु कहाते हैं, पर हम इस प्रेमांध बंधु को, सब कुछ भूला पाते हैं। इसके इसी प्रेम को यदि तुम, अपने वश में कर लोगी, तो मैं हँसी नहीं करता हूँ, तुम भी परम धन्य होगी।”
[102]
भेद दृष्टि से फिर लक्ष्मण को, देखा स्वगुण-गर्जनी ने, वर्जन किया किंतु लक्ष्मण की, अधरस्थिता तर्जनी ने! बोले वे–“बस, मौन कि मेरे लिए हो चुकी मान्या तुम, यों अनुरक्ता हुईं आर्य्य पर, जब अन्यान्य वदान्या तुम॥
[103]
प्रभु ने कहा कि तब तो तुमको, दोनों ओर पड़े लाले, मेरी अनुज-वधू पहले ही, बनी आप तुम हे बाले!” हुई विचित्र दशा रमणी की, सुन यों एक-एक की बात, लगें नाव को ज्यों प्रवाह के, और पवन के भिन्नाघात!
[104]
कहा क्रुद्ध होकर तब उसने- “तो अब मैं आशा छोडूँ! जो संबंध जोड़ बैठी थी, उसे आप ही अब तोडूँ? किंतु भूल जाना न इसे तुम, मुझमें है ऐसी भी शक्ति, कि झकमार कर करनी होगी, तुमको फिर मुझ पर अनुरक्ति।
[105]
मेरे भृकुटि-कटाक्ष तुल्य भी, ठहरेंगे न तुम्हारे चाप, बोले तब रघुराज- तुम्हारा, ऐसा ही क्यों न हो प्रताप। किंतु प्राणियों के स्वभाव की होती है ऐसी ही रीति, परवशता हो सकती है पर, होती नहीं भीति में प्रीति॥
[106]
इतना कहकर मौन हुए प्रभु, और तनिक गंभीर हुए, पर सौमित्रि न शांत रह सके, उन्मुख वे वरवीर हुए— “और इसे तुम भी न भूलना, तुम नारी होकर इतना- अहम्भाव जब रखती हो तब, रख सकते हैं नर कितना?
[107]
झंकृत हुई विषम तारों की, तंत्री-सी स्वतंत्र नारी, “तो क्या अबलाएँ सदैव ही, अबलाएँ हैं-बेचारी? नहीं जानते तुम कि देखकर, निष्फल अपना प्रेमाचार, होती हैं अबलाएँ कितनी, प्रबलाएँ अपमान विचार!
[108]
पक्षपातमय सानुरोध है, जितना अटल प्रेम का बोध, उतना ही बलवत्तर समझो, कामिनियों का वैर-विरोध। होता है विरोध से भी कुछ अधिक कराल हमारा क्रोध, और, क्रोध से भी विशेष है, द्वेष-पूर्ण अपना प्रतिशोध॥
[109]
देख क्यों न लो तुम, मैं जितनी सुंदर हूँ उतनी ही घोर, दीख रही हूँ जितनी कोमल, हूँ उतनी ही कठिन-कठोर!' सचमुच विस्मयपूर्वक सबने देखा निज समक्ष तत्काल- वह अति रम्य रूप पल भर में, सहसा बना विकट-कराल!
[110]
सबने मृदु मारुत का दारुण, झंझा-नर्तन देखा था, संध्या के उपरांत तमी का, विकृतावर्तन देखा था! काल-कीट-कृत वयस-कुसुम का क्रम से कर्तन देखा था! किंतु किसी ने अकस्मात् कब, यह परिवर्तन देखा था!
[110]
गोल कपोल पलटकर सहसा, बने भिड़ों के छत्तों-से, हिलने लगे उष्ण साँसों से, ओंठ लपालप लत्तों से! कुंदकली से दाँत हो गए, बढ़ बारह की डाढ़ों से, विकृत, भयानक और रौद्र रस, प्रगटे पूरी बाढ़ों-से?
[111]
जहाँ लाल साड़ी थी तनु में, बना चर्म का चीर वहाँ, हुए अस्थियों के आभूषण, थे मणिमुक्ता-हीर जहाँ! कंधों पर के बड़े बाल वे, बने अहो! आँतों के जाल, फूलों की वह वरमाला भी, हुई मुंडमाला सुविशाल!
[112]
हो सकते थे दो द्रुमाद्रि ही, उसके दीर्घ शरीर-सखा; देख नखों को ही जँचती थी, वह विलक्षणी शूर्पणखा! भय-विस्मय से उसे जानकी, देख न तो हिल-डोल सकीं, और न जड़ प्रतिमा-सी वे कुछ, रुद्र कुंठ से बोल सकीं॥
[113]
अग्रज और अनुज दोनों ने, तनिक परस्पर अवलोका, प्रभु ने फिर सीता को रोका, लक्ष्मण ने उसको टोका। सीता सँभल गई जो देखी, रामचंद्र की मृदु मुसकान, शूर्पणखा से बोले लक्ष्मण, सावधान कर उसे सुजान-
[114]
मायाविनि, उस रम्य रूप का, था क्या बस परिणाम यही? इसी भाँति लोगों को छलना, है क्या तेरा काम यही? विकृत परंतु प्रकृत परिचय से, डरा सकेगी तू न हमें, अबला फिर भी अबला ही है, हरा सकेगी तू न हमें!
[115]
बाह्य सृष्टि-सुंदरता है क्या, भीतर से ऐसी ही हाय! जो हो, समझ मुझे भी प्रस्तुत करता हूँ मैं वही उपाय, कि तू न फिर छल सके किसी को, मारूँ तो क्या नारी जान, विकलांगी ही तुझे करूँगा, जिससे छिप न सके पहचान
[116]
उस आक्रमणकारिणी के झट, लेकर शोणित तीक्ष्ण कृपाण, नाक कान काटे लक्ष्मण ने, लिए न उसके पापी प्राण्, और कुरूपा होकर तब वह, रुधिर बहाती, बिललाती, धूल उड़ाती आँधी ऐसी, भागी वहाँ से चिल्लाती
[117]
गूँजा किया देर तक उसका, हाहाकार वहाँ फिर भी, हुईं उदास विदेहनंदिनी, आतुर एवं अस्थिर भी होने लगी हृदय में उनके, वह आतंकमयी शंका, मिट्टी में मिल गई अंत में, जिससे सोने की लंका
[118]
हुआ आज अपशकुन सबेरे, कोई संकट पड़े न हा! कुशल करे कर्त्तार उन्होंने लेकर एक उसाँस कहा लक्ष्मण ने समझाया उनको- आर्य्ये, तुम निःशंक रहो, इस अनुचर के रहते तुमको, किसका डर है, तुम्हीं कहो
[119]
नहीं विघ्न-बाधाओं को हम, स्वयं बुलाने जाते हैं, फिर भी यदि वे आ जाएँ तो, कभी नहीं घबड़ाते हैं मेरे मत में तो विपदाएँ, हैं प्राकृतिक परीक्षाएँ, उनसे वही डरें, कच्ची हों, जिनकी शिक्षा-दीक्षाएँ॥
[120]
कहा राम ने कि यह सत्य है, सुख-दुख सब हैं समयाधीन, सुख में कभी न गर्वित होवे, और न दुख में होवे दीन। जब तक संकट आप न आवें, तब तक उनसे डर माने, जब वे आ जावें तब उनसे, डटकर शूर समर ठाने॥
[121]
यदि संकट ऐसे हों जिनको, तुम्हें बचाकर मैं झेलूँ, तो मेरी भी यह इच्छा है, एक बार उनसे खेलूँ। देखूँ तो कितनी विघ्नों की, वहन-शक्ति रखता हूँ मैं, कुछ निश्चय कर सकूँ कि कितनी, सहन शक्ति रखता हूँ मैं॥
[122]
नहीं जानता मैं, सहने को, अब क्या है अवशेष रहा? कोई सह न सकेगा, जितना, तुमने मेरे लिए सहा!” “आर्य्य, तुम्हारे इस किंकर को, कठिन नहीं कुछ भी सहना, असहनशील बना देता है, किंतु तुम्हारा यह कहना॥
[123]
सीता कहने लगीं कि “ठहरो, रहने दो इन बातों को, इच्छा तुम न करो सहने की, आप आपदाघातों को। नहीं चाहिए हमें विभव-बल, अब न किसी को डाह रहे, बस, अपनी जीवन-धारा का, यों ही निभृत प्रवाह बहे॥
[124]
हमने छोड़ा नहीं राज्य क्या, छोड़ी नहीं राज्य निधि क्या? सह न सकेगा कहो, हमारी, इतनी सुविधा भी विधि क्या? विधि की बात बड़ों से पूछो, वे ही उसे मानते हैं; मैं पुरुषार्थ पक्षपाती हूँ इसको सभी जानते हैं।
[125]
यह कहकर लक्ष्मण मुसकाए, रामचंद्र भी मुसकाए, सीता मुसकाईं विनोद के, पुनः प्रमोद भाव छाए। “रहो, रहो पुरुषार्थ यही है, -पत्नी तक न साथ लाए; कहते कहते वैदेही के, नेत्र प्रेम से भर आए॥
[126]
चलो नदी को घड़े उठा लो, करो और पुरुषार्थ क्षमा, मैं मछलियाँ चुगाने को कुछ, ले चलती हूँ धान, समा। घड़े उठाकर खड़े हो गए, तत्क्षण लक्ष्मण गद्गद्-से, बोल उठे मानो प्रमत्त हो, राघव महा मोद-मद से-
[127]
तनिक देर ठहरो मैं देखूँ, तुम देवर भाभी की ओर, शीतल करूँ हृदय यह अपना, पाकर दुर्लभ हर्ष-हिलोर!” यह कहकर प्रभु ने दोनों पर, पुलकित होकर सुध-बुध भूल, उन दोनों के ही पौधों के बरसाए नव विकसित फूल॥
भारत-भारती / अतीत खंड / कला-कौशल
अब लुप्त-सी जो हो गईं रक्षित न रहने से यहाँ,सोचो, तनिक कौशल्य की इतनी कलाएँ थी कहाँ?
लिपि-बद्ध चौंसठ नाम उनके आज भी हैं दीखते,
दश-चार विद्या-विज्ञ होकर हम जिन्हें थे सीखते॥
हाँ, शिल्प-विद्या वृद्धि में तो थी यहाँ यों अति हुई-
होकर महाभारत इसी से देश की दुर्गति हुई!
मय-कृत भवन में यदि सुयोधन थल न जल को जानता-
तो पांडवों के हास्य पर यों शत्रुता क्यों ठानता?
प्रस्तर-विनिर्मित पुर यहाँ थे और दुर्ग बड़े-बड़े,
अब भी हमारे शिल्प गुण के चिह्न कुछ-कुछ हैं खड़े।
भू-गर्भ से जब तब निकलती वस्तुएँ ऐसी यहाँ-
जो पूछ उठती हैं कि ऐसी थी हुई उन्नति कहाँ?
वह सिंधु-सेतु बचा अभी तक, दक्षिणी मंदिर बचे?
कब और किसने, विश्व में, यों शिल्प-चित्र कहाँ रचे?
वह उच्च यमुनास्तंभ लोहस्तंभ-युक्त निहार लो,
प्राचीन भारत की कला-कौशल्य-सिद्धि विचार लो॥
बहु अभ्रभेदी स्तूप अब भी उच्च होकर कह रहे-
संसार के किस शिल्प ने जल-पात इतने हैं सहे?
शत-शत गुहाएँ साथ ही गुंजार करके कह रहीं-
प्राचीन ही वा शिल्प इतना कौन है? कोई नहीं॥
हैं जो यवन राजत्व के वे कीर्ति चिह्न बढ़े-चढ़े,
वे भी अधिकतर हैं हमारे शिल्पियों के ही गढ़े।
अन्यत्र भी तो है यवन-कुल की विपुल कारीगरी,
है किंतु भारत के सदृश क्या वह मनोहरता भरी?
निज चित्रकारी के विषय में क्या कहें, क्या क्रम रहा;
प्रत्यक्ष है या चित्र है, यों दर्शकों को भ्रम रहा।
इतिहास, काव्य, पुराण, नाटक, ग्रंथ जितने दीखते,
सब से विदित है, चित्र-रचना थे यहाँ सब सीखते॥
होती न यदि वह चित्र विद्या आदि से इस देश में-
तो धैर्य धरते किस तरह प्रेमी विरह के क्लेश में?
अब तक मिलेगा सूक्ष्म वर्णन चित्र के प्रति भाग का,
साहित्य में भी चित्र-दर्शन हेतु है अनुराग का॥
थी चित्रकार यहाँ स्त्रियाँ भी चित्ररेखा-सी कभी,
संलग्न कुशल नायक हमारे नाटकों में हैं सभी।
लिखते कहीं दुष्यंत हैं भोली प्रिया की छवि भली,
करती कहीं प्रिय-चित्र-रचना प्रेम से रत्नावली॥
अब चित्रशालाएँ हमारी नाम शेष हुई यहाँ,
पर आज भी आदर्श उनके हैं अनेक जहाँ-तहाँ।
अब भी अजेंटा की गुफाएँ चित्त को हैं मोहती;
निज दर्शकों के धन्य रव से गूँज कर हैं सोहती॥
होता न मूर्ति-विधान यदि साधन हमारे देश का,
पूजन न षोडश-विधि यहाँ होता सगुण सर्वेश का।
अनुभव न होता एक सीमा में असीमाधार का,
होता निदर्शन भी न उस हृदयस्थ रूपोद्गार का॥
निज रूप से भी दूसरे जन जिस समय अज्ञान थे-
हम उस समय प्रभु-मूर्ति का प्रत्यक्ष करते ध्यान थे।
ऐसा न करते तो भला हम भक्ति प्रकटाते कहाँ?
दर्शन-विलंबाकुल दृगों को हाय! ले जाते कहाँ?
अब तक पुराने खँडहरों में, मंदिरों में भी कहीं,
बहु मूर्तियाँ अपनी कला का पूर्ण परिचय दे रहीं।
प्रकटा रही हैं भग्न भी सौंदर्य की परिपुष्टता,
दिखला रही हैं साथ ही दुष्कर्मियों की दुष्टता॥
लोकोक्ति है 'गाना तथा रोना किसे आता नहीं',
पर गान जो शास्त्रीय है उत्पत्ति उसकी है यहीं।
आकर भयंकर भाव जिस संगीत में अब हैं भरे,
हरि को रिझा कर हम उसी से साम गान किया करे॥
आती सु-चेतनता जिन्हें सुन कर जड़ों में भी अहो!
आई कहाँ से गान में वे राग-रागिनियाँ कहो?
हैं सब हमारी ही कलाएँ ललित और मनोहरी,
थी कौतुकों में भी हमारे ऐंद्रजालिकता भरी॥
अभिनय कला के सूत्रधर भी आदि से ही आर्य्य हैं-
प्रकटे भरत मुनि से यहाँ इस शास्त्र के आचार्य्य हैं।
संसार में अब भी हमारी है अपूर्ण शकुंतला,
है अन्य नाटक कौन उसका साम्य कर सकता भला॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / समाज
हिंदू समाज कुरीतियों का केंद्र जा सकता कहा, ध्रुव धर्म पथ में कुप्रथा का जाल सा है बिछ रहा। सु-विचार के साम्राज्य में कु-विचार की अब क्रांति है, सर्वत्र पद-पद पर हमारी प्रकट होती भ्रांति है॥ बेजोड़ विवाह प्रति वर्ष विधवा-वृन्द की संख्या निरंतर बढ़ रही, होता कभी आकाश है, फटती कभी हिल कर मही। हा! देख सकता कौन ऐसे दग्धकारी दाह को? फिर भी नहीं हम छोड़ते हैं बाल्य-वृद्ध-विवाह को! अंधपरंपरा सब अंग दूषित हो चुके हैं अब समाज-शरीर के, संसार में कहला रहे हैं हम फ़कीर लकीर के! क्या बाप-दादों के समय की रीतियाँ हम तोड़ दें? वे रुग्ण हों तो क्यों न हम भी स्वस्थ रहना छोड़ दें! वर-कन्या-विक्रय बिकता कहीं वर है यहाँ बिकती तथा कन्या कहीं, क्या अर्थ के आगे हमें अब इष्ट आत्मा भी नहीं! हा! अर्थ, तेरे अर्थ हम करते अनेक अनर्थ हैं, धिक्कार, फिर भी तो नहीं संपन्न और समर्थ हैं? क्या पाप का धन भी किसी का दूर करता कष्ट है? उस प्राप्तकर्ता के सहित वह शीघ्र होता नष्ट है। आश्चर्य क्या है, जो दशा फिर हो हमारी भी वही, पर लोभ में पड़ कर हमारी बुद्धि अब जाती रही! धनोपार्जन हैं धन कमाने के हमारे और हो साधन यहाँ, होंगे कमाऊ और उद्यमशील ऐसे जन कहाँ? हमको बुराई कुछ नहीं कोई कहे जो ठग हमें, अत्यंत हीन-चरित्र अब तो जानता है जग हमें॥ निज स्वत्व, पर-संपत्ति पर कोई जमाता है यहाँ, कोई शकुनि का अनुकरण कर धन कमाता है यहाँ। कहने चले फिर लाज क्या, रसने! परंतु हरे! हरे! ठग, चोर, वंचक और कितने घूस खोर यहाँ भरे!!! सच हो कि झूँठ, किसी-किसी का साक्ष्य पर ही लक्ष है, परलोक में कुछ हो, यहाँ तो लाभ ही प्रत्यक्ष है! सत्कार जामाता-सदृश आहार में, उपहार में, सोचो, भला है लाभ ऐसा और किस व्यापार में॥ कर के मिलावट ही, विदेशी खाँड़ में गुड़ को यथा, हरते बहुत हैं देश के धन-धर्म दोनों सर्वथा। यों हो स्वदेशी में विदेशी माल बिकता है यहाँ! होगा कहो स्वार्थाग्नि में यों सत्य का स्वाहा कहाँ? अब विज्ञ व्यवसायी जनों की ओर भी तो कुछ बढ़ो, उन चारु चित्र विचित्र वर विज्ञापनों को तो पढ़ो। मानों वहाँ बैकुंठ का ही चमत्कार भरा पड़ा! हा! वंचना का बाह्य-दर्शन है मनमोहक बड़ा॥ कोई सुधा देकर हमें देता अमरता है वहाँ, दे यंत्र-मंत्र, अभीष्ट कोई सिद्ध करता है वहाँ! कुछ लाभ हो कि न हो हमें पर यह अवश्य यथार्थ है, उन 'सत्यवक्ता' सज्जनों का सिद्ध होता स्वार्थ है॥ अपकारकर्ता धूर्त वे उपकारियों के वेश में, हा! लूटपाट मचा रहे हैं दिन दहाड़े देश में। उनके विकृत विज्ञापनों से पूर्ण रहते पत्र हैं, एजेंट जेंटलमैन बनकर घूमते सर्वत्र हैं॥ माँगना खाना कर-युक्त भी क्या कार्य करना चाहते हैं हम कभी? क्या हम कुलीन कुली बनें? होगा न हमसे श्रम कभी। है मान रखा काम हमने माँगना आराम का, जीते यहाँ पर हैं बहुत खाकर सदैव हराम का! हम नीच को ऊँचा बनाते भीख के पीछे कभी, बनते कभी हम आप योगी और संतादिक सभी। कोई गिने, कितने यहाँ पर माँगने के ढंग हैं, नट-तुल्य पल-पल में बदलते हम अनेकों रंग है! दासत्व दासत्व करना भी हमें आया न अच्छी रीति से, करते उसे भी हम अधम हैं अब अधर्म-अनीति से! वह स्वामि-कार्य बने कि बिगड़े किंतु अपना काम हो, इस नीचता की नीचता का अब कहो, क्या नाम हो? अधिकार हम योग भी पाकर उसे उपयोग में लाते नहीं, सामर्थ्य पाकर भी किसी को लाभ पहुँचाते नहीं? जैसे बने हम दूसरों को हानि ही करते सदा, अधिकार पाकर और भी अघ के घड़े भरते सदा! न्यायालयों में भी निरंतर घूस खाते हैं हमीं, रक्षक पुलिस को भी यहाँ भक्षक बनाते हैं हमीं। कर्तृत्व का फल हम प्रज्ञा पर बल दिखाना जानते, हम दीन-दुखियों के रुदन को गान-सम हैं मानते! अभियोग हा! हिंस्र पशुओं के सदृश हममें भरी है क्रूरता, करके कलह अब हम इसी में समझते हैं शूरता। खोजो हमें यदि जब कि इस घर में न सोते ही पड़े, होंगे वकीलों के अड़े अथवा अदालत में खड़े! न्यायालयों में नित्य ही सर्वस्व खोते सैकड़ों, प्रति वार, पग-पग पर, वहाँ हैं खर्च होते सैकड़ों। फिर भी नहीं हम चेतते हैं दौड़ कर जाते वहीं, लघु बात भी हम पाँच मिल कर आप निपटाते नहीं॥ विपथ देखो जहाँ विपरीत पथ ही हाय! हमने है लिया, श्रीराम के रहते हुए आदर्श रावण को किया! हम हैं सुयोधन के अनुज तज कर युधिष्ठिर को अहो! सोचो भला, तब फिर हमारा पतन दिन-दिन क्यों न हो? नशेबाज़ी हम मत्त हैं, हम पर चढ़ा कितने नशों का रंग है, चंडू, चरस, गाँजा, मदक, अहिफेन, मदिरा, भंग है। सुनलो ज़रा, हममें यहाँ कैसी कहावत है चली- “पीता न गाँजे की कली उस मर्द से औरत भली”! क्या मर्द है हम वाह वा! मुख-नेत्र पीले पड़ गए; तनु सूख कर काँटा हुआ, सब अंग ढीले पड़ गए। मर्दानगी फिर भी हमारी देख लीजे कम नहीं- ये भिनभिनाती मक्खियाँ क्या मारते हैं हम नहीं! अँगरेज वणिकों ने नशे की लौ लगाई है हमें, हम दोष देते हैं कि तब यह मौत आई है हमें| पर व्यर्थ है यह दोष देना, हैं हम दोषी बड़े; हम लोग कहने से किसी के क्यों कुएँ में गिर पड़े? जो मस्त होकर तत्वमसि का गान करते थे सदा- स्वच्छंद ब्रह्मानंद-रस का पान करते थे सदा। मद्यादि मादक वस्तुओं से मत्त हैं अब हम वही, करते सदैव प्रलाप हैं, सुध-बुध सभी जाती रही! दो चार आने रोज़ के भी जो कुली मज़दूर हैं- संध्या-समय वे भी नशे में दीख पड़ते चूर हैं। मर जाएँ चाहे बाल-बच्चे भूख के मारे सभी, पर छोड़ सकते हैं नहीं उस दुर्व्यसन को वे कभी! शुचिता विदित जिनका वही हम आज कैसे भ्रष्ट हैं, किस भाँति दोनों लोक अपने कर रहे हम नष्ट हैं। हम आर्य हैं पर अब हमारे चरित कैसे गिर गए, हम दुर्गुणों से घिर गए हैं, सद्गुणों से फिर गए! आत्मविस्मृति हम आज क्या से क्या हुए, भूले हुए हैं हम इसे; है ध्यान अपने मान का हममें बताओ अब किसे? पूर्वज हमारे कौन थे, हम को नहीं यह ज्ञान भी, है भार उनके नाम पर दो अंजली जल-दान भी! होकर नितांत परावलंबी पशु-सदृश हम जी रहे, हा! कालकूट सभी परस्पर फूट का हैं पी रहे! हम देखते सुनते हुए भी देखते सुनते नहीं, पढ़ना सभी है व्यर्थ उनका जो कभी गुनते नहीं॥ मात्सर्य अब एक हममें दूसरे को देख सकता है नहीं, बैरी समझता बंधु को भी, है समझ ऐसी यहीं! कुत्ते परस्पर देख कर है दूर से ही भूंकते, पर दूसरे को एक हम कब काटने से चूकते? हों एक माँ के सुत कई व्यवहार सबके भिन्न हों, संभव नहीं यह किंतु जो संबंध-बंधन छिन्न हों। पर यह असंभव भी यहाँ प्रत्यक्ष संभव हो रहा, राष्ट्रीय भाव-समूह मानों सर्वदा को सो रहा! अनुदारता यदि एक अद्भुत बात कोई ज्ञात मुझको हो गई- तो हाय! मेरे साथ ही संसार से वह खो गई। उसको छिपा रखूँ न मैं तो कौन पूछेगा मुझे; कितने प्रयोग-प्रदीप इस अनुदारता से हैं बुझे! गृह कलह इस गृह कलह के अर्थ भारत-भूमि रणचंडी बनी, जीवन शांतिपूर्ण सबके, दीन हो अथवा धनी! जब यह दशा है गेह की, क्या बात बाहर की कहें? है कौन सहृदय जन न जिसके अब यहाँ आँसू बहें? उद्दण्ड उग्र अनैक्य क्षय कर दिया है क्षेम का, विद्वेष ने पद हर लिया है आज पावन प्रेम का। ईर्ष्या हमारे चित्त से क्षण मात्र भी हटती नहीं, दो भाइयों में भी परस्पर अब यहाँ पटती नहीं! इस गृह-कलह से ही, कि जिसकी नींव है विचार की- निंदित कदाचित है प्रथा अब सम्मिलित परिवार की। पारस्परिक सौहार्द अपना अन्यथा अश्रान्त था, हाँ, सु-“वसुधैव कुटुम्बकम्,” सिद्धांत यह एकांत था॥ व्यभिचार व्यभिचार ऐसा बढ़ रहा है, देख लो, चाहे जहाँ; जैसा शहर, अनुरूप उसके एक 'चकला' है वहाँ! जाकर जहाँ हम धर्म-धन खोते सदैव सहर्ष हैं, होते पतित, कंगाल, रोगी सैकड़ों प्रतिवर्ष हैं॥ वह कौन धन है, दुर्व्यसन में हम जिसे खोते नहीं? उत्सव हमारे बार बंधुओं के बिना होते नहीं! सर्वत्र डोंड़ी पिट रही है अब उन्हीं के नाम की, मानों अधिष्ठात्री वही हैं अब यहाँ शुभ-काम की॥ था शेष लिखने के लिए क्या इस अभागे को यही? भगवान्! भारतवर्ष की कैसी अधोगति हो रही! यदि अंत हो जाता हमारा त्यागते ही शील के, तो आज टीके तो न लगते आर्यकुल को नील के॥ हा! वे तपोधन ऋषि कहाँ, संतान हम उनकी कहाँ? थी पुण्यभूमि प्रसिद्ध जो हा! आज ऐसा अघ वहाँ! बस दीप से कज्जल सदृश निज पूर्वजों से हम हुए, वे लोक में आलोक थे पर हम निविड़तर तम हुए॥ आडंबर यद्यपि उड़ा बैठे कमाई बाप-दादों की सभी, पर ऐंठ वह अपनी भला हम छोड़ सकते हैं कभी! भूषण बिके, ऋण भी बढ़े, पर धन्य सब कोई कहे; होली जले भीतर न क्यों, बाहर दिवाली ही रहे॥ गुण, ज्ञान, गौरव, मान, धन यद्यपि सभी कुछ खो चुके, गजभुक्त शून्य कपित्थ-सम निःसार अब हम हो चुके। पर हैं दबाते दीनता श्वेतांबरों में भूल से! संभव कभी है अग्नि को भी दाब रखना तूल से? दबती कहीं आडंबरों से बहुत दिन तक दीनता? मिलता नहीं फिर क़र्ज़ भी, होती यहाँ तक हीनता! उद्योग तो हम क्या करेंगे जो अपव्यय कर रहे, पर हाँ, हमारे हाथ से हैं दीन-दुर्बल मर रहे॥ अब आय तो है घट गई, पर व्यय हमारा बढ़ गया, तिस पर विदेशी सभ्यता का भूत हम पर चढ़ गया। ऋण-भार दिन-दिन बढ़ रहा है दब रहे हैं हम यहाँ, देना जिन्हें हो, कुछ नहीं भी पास उनके हैं कहाँ? मतिभ्रंश निज पूर्वजों का हास्य करना है हमारा खेल-सा, लगता हृदय में मेल हमको अति भयंकर शेल-सा। कोई कहे हित की उसे हम शत्रु समझेंगे वहीं, मधु मय अपथ्य अभीष्ट है, कटु पथ्य हमको प्रिय नहीं॥ रहते गुणों से तो सदा हम लोग कोसों दूर हैं, परलोक में अपनी प्रशंसा चाहते भरपूर हैं! हम तेल ढुलका कर दिए को हैं जलाना चाहते, काटे हुए तरु में मनोहर फल फलाना चाहते! गुणों की स्थिति बस भाग्य की ही भावना में रह गया उद्योग है, आजीविका है नौकरी में, इंद्रियों में भोग है। परतंत्रता में अभयता, भय राज-दंड-विधान में, व्यवसाय है बैरिस्टरी या डाक्टरी दूकान में॥ है चाटुकारी में चतुरता, कुशलता छल-छद्म में, पांडित्य पर निंदा-विषय में, शूरता है सद्म में! इस मौन में गंभीरता है, है बड़प्पन वेश में, जो बात और कहीं नहीं वह है हमारे देश में॥ कारीगरी है शेष अब साक्षी बनाने में यहाँ, है सत्य या विश्वास केवल कसम खाने में यहाँ। है धैर्य तर्क-वितर्क में, योग में ही तत्व है! अवशिष्ट दारोगागरी में सत्त्व और महत्त्व है! निज अर्थ-साधन में हमारी रह गई अब भक्ति है, है कर्म बस दासत्व में, अब स्वर्ण में ही शक्ति है। गौरव जताने में यहाँ उत्साह का लगता पता, बस बाद में है वाग्मिता, पर-अनुकरण में सभ्यता॥ निज धर्म के बलिदान ही में आज यज्ञ-विधान है, है ज्ञान नास्तिक-भाव में, अब नींद में ही ध्यान है। है योग पाशव-वृत्ति में ही, हाय! कैसी व्याधि है, बस मृत्यु में ही रह गई अब भारतीय समाधि है! स्वाधीनता निज धर्म-बंधन तोड़ देने में रही, आस्वाद आमिष में, सुरा में सरलता जाती कही! संगीत विषयालाप में, पर-दुःख में परिहास है, अश्लील वर्णन मात्र में ही अब कवित्व-निवास है! बहु वर्ण रूप उपाधियों में रह गया अब मान है; बहुधा अपव्यय में यहाँ अब दीख पड़ता दान है। बस व्यसन और विवाह में अवशिष्ट अब औदार्य है, हा दैव! हिंदू जाति का क्या अंत अब अनिवार्य है॥ है शील प्राय: पूर्वजों में, एकता अभिधान में, उपकार-जन्य कृतज्ञता है धन्यवाद प्रदान में। पोशाक में शुचिता रहौं, बस क्रोध में ही कांति है, अतिदीनता में नम्रता है, स्वप्न में सुख शांति है! दुर्गुण अब है यहाँ क्या? दंभ है, दौर्बल्य है, दृढ़-द्रोह है, आलस्य, ईर्ष्या, द्वेष है, मालिन्य है, मद, मोह है। है और क्या? दुर्बल जनों का सब तरह सिर काटना, पर साथ ही बलवान का है श्वान-सम पग चाटना॥ अपने लिए यदि दूसरों को दुःख देना धर्म हो, यदि ईश-नियमों का निरादर न्याय से सत्कर्म हो। निश्चेष्ट होकर बैठने में हो न पुण्यों की कमीं, तो भुक्ति के भागी हमीं हैं, मुक्ति के भागी हमीं॥ अभाव कर हैं हमारे किंतु अब कर्तृत्व हममें है नहीं, भारतीय परंतु हम बनते विदेशी सब कहीं! रखते हृदय है किंतु हम रखते न सहृदयता वहाँ, हम है मनुज पर हाय! अब मनुजत्व हम में है कहाँ? मन में नहीं है बल हमारे, तेज चेष्टा में नहीं, उद्योग में साहस नहीं, अपमान में न घृणा कहीं: दासत्व में न यहाँ अरुचि है, प्रेम में प्रियता नहीं; हो अंत में आशा कहाँ? कर्तव्य में क्रियता नहीं॥ उत्साह उन्नति का नहीं है, खेद अवनति का नहीं, है स्वल्प-सा भी ध्यान हमको समय की गति का नहीं। हम भीरुता के भक्त हैं, अति विदित विषयासक्त हैं, श्रम से सदैव विरक्त हैं, आलस्य में अनुरक्त हैं॥ विकृति हिंदू-समाज सभी गुणों से आज कैसा हीन है, वह क्षीण और मलीन है, आलस्य में ही लीन है। परतंत्र पद-पद पर विपद में पड़ रहा वह दीन है, जीवन-मरण उसका यहाँ अब एक दैवाधीन है॥ हा! आर्य-संतति आज कैसी अन्य और अशक्त है, पानी हुआ क्या अब हमारी नाड़ियों का रक्त है? संसार में हमने किया बस एक ही यह काम है, निज पूर्वजों का सब तरह हमने डुबाया नाम है! दुःशीलता दासी हमारी, मूर्खता महिषी सदा, है स्वार्थ सिंहासन हमारा मोह मंत्री सर्वदा। यों पाप-पुर में राज-पद हा! कौन पाना चाहता? चढ़ कर गधे पर कौन जन बैकुंठ जाना चाहता? भारत! तुम्हारा आज यह कैसा भयंकर वेष है? है और सब नि:शेष केवल नाम ही अब शेष है! त्रह्मत्व, राजन्यत्व युत वैश्यत्व भी सब नष्ट है, शुद्रत्व और पशुत्व ही अवशिष्ट है, हा! कष्ट है॥ हा दीनबंधो! क्या हमारा नाम ही मिट जाएगा, अब फिर कृपा-कण भी न क्या भारत तुम्हारा पाएगा? हा राम! हा! हा कृष्ण! हा! हा नाथ! हा! रक्षा करो; मनुजत्व दो हमको दयामय! दुःख-दुर्बलता हरो॥भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी वीरता
थे कर्म्मवीर कि मृत्यु का भी ध्यान कुछ धरते न थे,थे युद्धवीर कि काल से भी हम कभी डरते न थे।
थे दानवीर कि देह का भी लोभ हम करते न थे,
थे धर्म्मवीर कि प्राण के भी मोह पर मरते न थे!
वे सूर्यवंशी, चंद्रवंशी वीर थे कैसे बली,
जो थे अकेले ही मचाते शत्रु-दल में खलबली।
होते न वे यदि चक्रवर्ती भूप दिग्विजयी यहाँ,
होते भला फिर 'अश्वमेघ' कि 'राजसूय' कहो कहाँ?
थे भीम-तुल्य महाबली, अर्जुन-समान महारथी,
श्रीकृष्ण लीलामय हुए थे आप जिनके सारथी।
उपदेश गीता का हमारा युद्ध का ही गीत है,
जीवन-समर में भी जनों को जो दिलाता जीत है॥
हम थे धनुर्वेदज्ञ जैसे और वैसा कौन था?
जो शब्द-वेधी बाण छोड़े शूर ऐसा कौन था?
हाँ, मत्स्य जैसे लक्ष्य-वेधक धीर-धन्वी थे यहाँ,
रिपु को गिरा कर अस्त्र पीछे लौट आते थे कहाँ?
थी चंचला की-सी चमक या शीघ्रता संधान की,
कृतहस्तता ऐसी कि गति थी हाथ में ही बाण की।
मुँह खोल कुत्ता भूँकने में बंद फिर जब तक करे,
भर जाए मुख तूणीर-सा, पर बात क्या जो वह मरे॥
जिसके समक्ष न एक भी विजयी सिकंदर की चली,
वह चंद्रगुप्त महीप था कैसा अपूर्व महाबली?
जिससे कि सिल्यूकस समर में हार तो था ले गया,
कांधार आदिक देश देकर निज सुता था दे गया!
जो एक सौ-सौ से लड़े ऐसे यहाँ पर वीर थे,
सम्मुख समर में शैल-सम रहते सदा हम धीर थे।
शंका न थी, जब-जब समर का साज भारत ने सजा,
जावा, सुमात्रा, चीन, लंका सब कहीं डंका बजा॥
मोहे विदेशी वीर भी जिस वीरता के गान से,
जिस पर बने हैं ग्रंथ 'रासो' और 'राजस्थान' से।
थी उष्णता वह उस हमारे शेष शोणित की अहा!
जो था महाभारत-समर में नष्ट होते बच रहा॥
रक्षक यवन साम्राज्य के भी राजपूत रहे यहाँ,
पड़ती कठिनता थी जहाँ जाते वही तो थे वहाँ।
नृप मान-कृत काबुल-विजय की बात सबको ज्ञात है,
दृढ़ता शिवाजी के निकट जयसिंह की विख्यात है॥
क्षत्राणियाँ भी शत्रुओं से हैं यहाँ निर्भय लड़ीं,
इतिहास में जिनकी कथाएँ हैं अनेक भरी पड़ीं।
देकर विदा युद्धार्थ पति को प्रेमवल्ली-सी खिली,
यदि फिर न भेंट हुई यहाँ तो स्वर्ग में झट जा मिलीं॥
वह सामरिक सिद्धांत भी औदार्य-पूर्ण पवित्र था,
थी युद्ध में ही शत्रुता, अन्यत्र बैरी मित्र था!
जय-लोभ में भी छल-कपट ने न पाता पास था,
प्रतिपक्षियों को भी हमारे सत्य का विश्वास था॥
पाते न थे जय युद्ध में ही हम सुयश के साथ में,
इंद्रिय तथा मन भी निरंतर थे हमारे हाथ में।
हम धम्म धनु से भक्ति-शर भी छोड़ने में सिद्ध थे,
अतएव अक्षर लक्ष्य भी करते निरंतर विद्ध थे॥
यद्यपि रहे हम वीर ऐसे-विश्व को जब कर सकें,
ऐसे नहीं थे जो समर में शक्र को भी डर सकें।
परराज्य को तो थे सदा हम तुच्छ तृण-सा मानते,
लाचार होकर ही कभी लंका-सदृश रण ठानते॥
भारत-भारती / अतीत खंड / ब्रिटिश राज्य
अन्यायियों का राज्य भी क्या अचल रह सकता कभी?आखिर हुए अँगरेज शासक, राज्य है जिनका अभी।
संप्रति समुन्नति की सभी हैं प्राप्त सुविधाएँ यहाँ,
सब पथ खुले हैं, भय नहीं विचरो जहाँ चाहो वहाँ॥
अन्याय यवनों का हमें निज दोष से सहना पड़ा,
है किंतु नारायण अहा! न्यायी तथा सकरुण बड़ा!
देते हुए भी कर्म-फल हम पर हुई उसकी दया,
भेजा प्रसिद्ध उदार जिसने ब्रिटिश राज्य यहाँ नया॥
शासन किसी पर जाति का चाहे विवेक-विशिष्ट हो,
संभव नहीं है किंतु जो सर्वांश में वह इष्ट हो।
यह सत्य है, तो भी ब्रिटिश शासन हमें सम्मान्य है,
वह सुव्यवस्थित है तथा आशा-प्रपूर्ण, वरदान्य है॥
संप्रति सभी साधन हमें हैं सुलभ आत्मविकास के,
पथ, रेल, तार मिटा रहे हैं सब प्रयास प्रवास के।
प्राय: चिकित्सालय, मदरसे, डाकघर हैं सब कहीं,
बस, पास पैसा चाहिए फिर कुछ असुविधा है नहीं॥
सचमुच ब्रिटिश साम्राज्य ने हमको बहुत कुछ है दिया,
विज्ञान का वैभव दिखाया समय से परिचित किया।
उससे हमारी कीर्ति का भी हो रहा उपकार है,
बहु पूर्व-चिह्नों का हुआ वा हो रहा उद्धार है॥
भारत-भारती / भविष्यत् खंड / विश्वास
सौ सौ निराशाएँ रहें, विश्वास यह दृढ़ मूल है—इस आत्म-लीला-भूमि को वह विभु न सकता भूल है।
अनुकूल अवसर पर दयामय फिर दया दिखलाएँगे,
वे दिन यहाँ फिर आएँगे, फिर आएँगे, फिर आएँगे॥
भारत-भारती / अतीत खंड / शक्ति का उपयोग
अन्याय-अत्याचार करना तो किसी पर दूर है,जिसका किया हमने किया उपकार ही भरपूर है।
पर पीड़ितों का त्राण कर जो दुःख हम खोते नहीं,
तो आज हिंदुस्तान में ये पारसी होते नहीं॥
जाकर कहाँ हमने जलाई आग युद्ध-अशांति की?
थे घूमते सर्वत्र पर हमने कहाँ पर क्रांति की?
करते वही थे हम कि जिससे शांति सुख पावें सभी,
स्वार्थान्ध होकर, पर-हित-व्रत छोड़ सकते थे कभी?
भूले हुओं को पथ दिखाना यह हमारा कार्य्य था,
राजत्व क्या है, जगत हमको मानता आचार्य था।
आतंक से पाया हुआ भी मान कोई मान है?
खिंच जाय जिस पर मन स्वयं सच्चा वही बलवान है॥
भारत-भारती / अतीत खंड / मङ्गलाचरण
मानस भवन में जन जिसकी उतारें आरतीभगवान! भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती।
हो भद्रभावोद्भाविनी वह भारती है भवगते!
सीतापते! सीतापते!! गीतामते! गीतामते!!॥
भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी सभ्यता
शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे,निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे।
संसार को पहले हम ने ज्ञान-भिक्षा दान की,
आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की॥
'हाँ' और 'ना' भी अन्य जन करना न जब थे जानते,
थे ईश के आदेश तब हम वेदमंत्र बखानते।
जब थे दिगंबर रूप में वे जंगलों में घूमते,
प्रासाद-केतन-पट हमारे चंद्र को थे चूमते॥
जब मांस-भक्षण पर वनों में अन्य जन थे जी रहे,
कृषि-कार्य्य करके आर्य्य तब शुचि सोमरस थे पी रहे।
मिलता न यह सात्त्विक सु-भोजन यदि शुभविष्कार का,
तो पार क्या रहता जगत में उस विकृत व्यापार का?
था गर्व नित्य निजत्व का पर दंभ से हम दूर थे,
थे धर्म-भीरु परंतु हम सब काल सच्चे शूर थे।
सब लोक-सुख हम भोगते थे बांधवों के साथ में,
पर पारलौकिक-सिद्धि भी रखते सदा थे हाथ में॥
थे ज्यों समुन्नति के सुखद उत्तुंग श्रृंगों पर चढ़े,
त्यों ही विशुद्ध विनीतता में हम सभी से थे बढ़े।
भव-सिंधु तरने के लिए आत्मावलंबी धीर ज्यों,
परमार्थ-साधन हेतु थे आतुर परंतु गभीर त्यों॥
यद्यपि सदा परमार्थ ही में स्वार्थ थे हम मानते,
पर कर्म से फल-कामना करना न हम थे जानते।
विख्यात जीवन-व्रत हमारा लोक-हित एकांत था,
'आत्मा अमर है, देह नश्वर,' यह अटल सिद्धांत था॥
हम दूसरों के दुःख को थे दुःख अपना मानते,
हम मानते कैसे नहीं, जब थे सदा यह जानते-
'जो ईश कर्त्ता है हमारा दूसरों का भी वही,
हैं कर्म्म भिन्न परंतु सबमें तत्त्व-समता हो रही॥
बिकते गुलाम न थे यहाँ, हममें न ऐसी रीति थी,
सेवक-जनों पर भी हमारी नित्य रहती प्रीति थी।
वह नीति ऐसी थी कि चाहे हम कभी भूखे रहें,
पर बात क्या, जीते हमारे जो कभी वे दुख सहें॥
अपने लिए आज हम क्यों जी न सकते हों यहाँ,
पर दूसरों ही के लिए जीते जहाँ थे हम जहाँ।
यद्यपि जगत में हम स्वयं विख्यात जीवन-मुक्त थे,
करते तदपि जीवन्मृतों को दिव्य जीवन-युक्त थे॥
थी दूसरों की आपदाहरणार्थ अपनी संपदा,
कहते नहीं थे किंतु हम करके दिखाते थे सदा।
नीचे गिरे को प्रेम से ऊँचा चढ़ाते थे हमीं,
पीछे रहे को घूम कर आगे बढ़ाते थे हमीं॥
संयम-नियम-पूर्वक प्रथम बल और विद्या प्राप्त की,
होकर गृही फिर लोक की कर्तव्य रीति समाप्त की।
हम अंत में भव-बंधनों को थे सदा को तोड़ते,
आदर्श भावी सृष्टिहित थे मुक्ति-पथ में छोड़ते॥
हमको विदित थे तत्त्व सारे नाश और विकाश के,
कोई रहस्य छिपे न थे पृथ्वी तथा आकाश के!
थे जो हज़ारों वर्ष पहले जिस तरह हमने कहे,
विज्ञान-वेत्ता अब वही सिद्धांत निश्चित कर रहे॥
है हानिकारक नीति निश्चय निकटकुल में ब्याह की,
है लाभकारक रीति शव के गाड़ने से दाह की”।
यूरोप के विद्वान भी अब इस तरह कहने लगे!
देखो कि उलटे स्रोत सीधे किस तरह बहने लगे!॥
निज कार्य्य प्रभु की प्रेरणा ही थे नहीं हम जानते,
प्रत्युत उसे प्रभु का किया ही थे सदा हम मानते।
भय था हमें तो बस उसी का और हम किससे डरे?
हाँ, जब मरे हम तब उसी के प्रेम से विह्वल मरे॥
था कौन ईश्वर के सिवा जिसको हमारा सिर झुके?
हाँ, कौन ऐसा स्थान था जिसमें हमारी गति रुके?
सारी धरा तो थी धरा ही, सिंधु भी बँधवा दिया;
आकाश में भी आत्म-बल से सहज हो विचरण किया॥
हम बाह्य उन्नति पर कभी मरते न थे संसार में,
बस मग्न थे अंतर्जगत के अमृत-पारावार में।
जड़ से हमें क्या, जब कि हम थे नित्य चेतन से मिले,
हैं दीप उनके निकट क्या जो पद्म दिनकर से खिले?
रौंदी हुई है सब हमारी भूमि इस संसार की,
फैला दिया व्यापार, कर दी धूम धर्म प्रचार की।
कप्तान 'कोलम्बस' कहाँ था उस समय, कोई कहे?
जब के सु-चिह्न अमेरिका में हैं हमारे मिल रहे॥
हम देखते फिरता हुआ जोड़ा न जो दिन-रात का-
करते कहीं वर्णन भला फिर किस तरह इस बात का?
हम वर-वधू की भाँवरों से साम्य उसका कर चुके,
अब खोजने जाकर जिसे कितने विदेशी मर चुके!
आरंभ जब जो कुछ किया हमने उसे पूरा किया,
था जो असंभव भी उसे संभव हुआ दिखला दिया।
कहना हमारा बस यही था विघ्न और विराम से-
करके हटेंगे हम कि अब मर के हटेंगे काम से॥
यह ठीक है, पश्चिम बहुत ही कर रहा उत्कर्ष है,
पर पूर्व-गुरु उसका यही पुरु वृद्ध भारतवर्ष है।
जाकर विवेकानंद-सम कुछ साधु जन इस देश से,
करते उसे कृतकृत्य हैं अभी अतुल उपदेश से॥
वे जातियाँ जो आज उन्नति-मार्ग में हैं बढ़ रहीं,
सांसारिकी स्वाधीनता की सीढ़ियों पर चढ़ रहीं।
यह तो कहें, यह शक्ति उनको प्राप्त कब कैसे हुई?
यह भी कहें वे दार्शनिक चर्चा वहाँ ऐसे हुई॥
यूनान ही कह दे कि वह ज्ञानी-गुणी कब था हुआ?
कहना न होगा, हिंदुओं का शिष्य वह जब था हुआ।
हमसे अलौकिक ज्ञान का आलोक यदि पाता नहीं,
तो वह अरब-यूरोप का शिक्षक कहा जाता नहीं॥
संसार भर में आज जिसका छा रहा आतंक है,
नीचा दिखा कर रूस को भी जो हुआ निःशंक है।
जयपाणि जो वर्द्धक हुआ है एशिया के हर्ष का,
है शिष्य वह जापान भी इस वृद्ध भारतवर्ष का॥
यूरोप भी जो बन रहा है आज कल मार्मिक मना,
यह तो कहे उसके खुदा का पुत्र कब धार्म्मिक बना?
था हिंदुओं का शिष्य ईसा, यह पता भी है चला,
ईसाइयों का धर्म्म भी है बौद्ध साँचे में ढला॥
संसार में जो कुछ जहाँ फैला प्रकाश-विकास है,
इस जाति की ही ज्योति का उसमें प्रधानाभास है
करते न उन्नति-पथ परिष्कृत आर्य्य जो पहले कहीं,
संदेह है, तो विश्व में विज्ञान बढ़ता या नहीं॥
अनमोल आविष्कार यद्यपि हैं अनेकों कर चुके,
निज नीति, शिक्षा, सभ्यता की सिद्धि का दम भर चुके।
पर पीटते हैं सिर विदेशी आज भी जिस शांति को,
थे हम कभी फैला चुके उसकी अलौकिक कांति को॥
है आज पश्चिम में प्रभा जो पूर्व से ही है गई,
हरते अँधेरा यदि न हम होती न खोज नई-नई।
इस बात की साक्षी प्रकृति भी है अभी तक सब कहीं,
होता प्रभाकर पूर्व से ही उदित, पश्चिम से नहीं॥
अंतिम प्रभा का है हमारा विक्रसी संवत् यहाँ,
है किंतु औरों का उदय इतना पुराना भी कहाँ?
ईसा, मुहम्मद आदि का जग में न था तब भी पता,
कब की हमारी सभ्यता है, कौन सकता है बता?॥
सर्वत्र अनुपम एकता का इस प्रकार प्रभाव था-
थी एक भाषा, एक मन था, एक सबका भाव था।
संपूर्ण भारतवर्ष मानों एक नगरी थी बड़ी,
पुर और ग्राम-समूह-संस्था थी मुहल्लों की लड़ी॥
हैं वायु-मंडल में हमारे गीत अब भी गूँजते,
निर्झर, नदी, सागर, नगर, गिरि, वन सभी हैं कूजते।
देखो, हमारा विश्व में कोई नहीं उपमान था,
नरदेव थे हम, और भारत? देव-लोक समान था॥
भारत-भारती / अतीत खंड / आर्य-स्त्रियाँ
केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था,गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा।
था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में,
दांपत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में॥
निज स्वामियों के कार्य में सम भाग जो लेतीं न वे,
अनुरागपूर्वक योग जो उसमें सदा देतीं न वे,
तो फिर कहातीं किस तरह 'अर्द्धांगिनी' सुकुमारियाँ?
तात्पर्य यह–अनुरूप ही थीं नरवरों के नारियाँ॥
हारे मनोहत पुत्र को फिर बल जिन्होंने था दिया,
रहते जिन्होंने नव-वधू के सुत-विरह स्वीकृत किया।
द्विज-पुत्र-रक्षा-हित जिन्होंने सुत-मरण सोचा नहीं,
विदुला, सुमित्रा और कुंती-तुल्य माताएँ रहीं॥
बदली न जो, अल्पायु वर भी वर लिया सो वर लिया;
मुनि को सता कर भूल से, जिसने उजित प्रतिफल दिया।
सेवार्थ जिसने रोगियों के था विराम लिया नहीं,
थीं धन्य सावित्री, सुकन्या और अंशुमती यहीं॥
मूँदे रही दोनों नयन आमरण 'गांधारी' जहाँ,
पति-संग 'दमयंती' स्वयं वन-वन फिरी मारी जहाँ।
यों ही जहाँ की नारियों ने धर्म का पालन किया,
आर्य क्या फिर ईश ने जो दिव्यबल उनको दिया॥
अबला जनों का आत्म-बल संसार में वह था नया,
चाहा उन्होंने तो अधिक क्या, रवि-उदय भी रुक गया!
जिस क्षुब्ध मुनि की दृष्टि से जल कर विहग भू पर गिरा,
वह भी सती के तेज सम्मुख रह गया निष्प्रभ निरा॥
मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें