मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 3 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 3
मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।
भारत-भारती / अतीत खंड / प्राचीन भारत की एक झलक
समयावरण से पार करके ऐतिहासिक दृष्टि को, जो देखते हैं आज भी हम पूर्णकालिक सृष्टि को। तो दीखता है दृश्य ऐसा भारतीय-विकास का, प्रतिबिंब एक सजीव है जो स्वर्ग या आकाश का॥ भारतभूमि ब्राह्मो-स्वरूपा, जन्मदात्री, ज्ञान-गौरव-शालिनी, प्रत्यक्ष लक्ष्मीरूपिणी, धन-धान्य-पूर्णा, पालिनी। दुर्द्धर्ष रुद्राणो स्वरूपा शत्रु सृष्टि-लयंकरी, वह भूमि भारतवर्ष की है भूरि भावों से भरी॥ वे ही नगर, वन, शैल, नदियाँ जो कि पहले थीं यहाँ, है आज भी, पर आज वैसी जान पड़ती हैं कहाँ? कारण कदाचित है यही, बदले स्वयं हम आज हैं, अनुरूप ही अपनी दशा के दीखते सब साज हैं॥ भवन चित्रित घनों से होड़ कर जो व्योम में फहरा रहे, वे केतु उन्नत मंदिरों के किस तरह लहरा रहे! इन मंदिरों में से अधिक अब भूमि-तल में दब गए, अवशिष्ट ऐसे दीखते हैं-अब गए या तब गए! जल-वायु पीयूष सम पीकर जिसे होता प्रसन्न शरीर है, आलस्य-नाशक, बल-विकाशक उस समय का नीर है। है आज भी वह, किंतु अब पड़ता न पूर्व प्रभाव है, यह कौन जाने नीर बदला या शरीर स्वभाव है? उत्साहपूर्वक दे रहा जो स्वास्थ्य वा दीर्घायु है, कैसे कहें, कैसा मनोरम उस समय का वायु है। भगवान जानें, आज कल वह वायु चलता ही नहीं, अथवा हमारे पास होकर वह निकलता ही नहीं? प्रभात क्या ही पुनीत प्रभात है, कैसी चमकती है मही; अनुरागिणी ऊषा सभी को कर्म में रत कर रही। यद्यपि जगाती है हमें भी देर तक प्रतिदिन वही, पर हम अविध निद्रा-निकट सुनते कहाँ उसकी कही? गंगादि नदियों के किनारे भीड़ छवि पाने लगी, मिल कर जल ध्वनि में गल ध्वनि अमृत बरसाने लगी। सरवर इधर श्रुति-मंत्र लहरी, उधर जल-लहरी अहा! तिस पर उमंगों की तरंगें, स्वर्ग में अब क्या रहा॥ दान सुस्नान के पीछे यथाक्रम दान की बारी हुई, सर्वस्व तक के त्याग की सानंद तैयारी हुई! दानी बहुत हैं किंतु याचक अल्प हैं उस काल में, ऐसा नहीं जैसी कि अब प्रतिकूलता है हाल में॥ दिनकर द्विजों से अर्ध्य पाकर उठ चला आकाश में, अति शोभित हो उठी स्वर्ण-वर्ण-प्रकाश में। वह आंतरिक आलोक इस आलोक में ही मिल गया, रवि का मुकुट धारण किया, स्वाधीन भारत खिल गया॥ गोपालन जो अन्य धात्री के सदृश सबको पिलाती दुग्ध है, (है जो अमृत इस लोक का, जिस पर अमर भी मुग्ध हैं।) वे धेनुएँ प्रत्येक ग्रह में हैं दुही जाने लगीं, या शक्ति की नदियाँ वहाँ सर्वत्र लहराने लगीं॥ घृत आदि के आधिक्य से बल-वीर्य्य का सु-विकास है, क्या आजकल का-सा कहीं भी व्याधियों का वास है? है उस समय गो-वंश पलता, इस समय मरता वही! क्या एक हो सकती कभी यह और वह भारत मही॥ होमाग्नि निर्मल पवन जिसकी शिखा को तनिक चंचल कर उठी, होमाग्नि जल कर द्विज-गृहों में पुण्य-परिमल भर उठी। प्राची दिशा के साथ भारतभूमि जगमग जग उठी, आलस्य में उत्साह की-सी आग देखो, लग उठी॥ देवालय नर-नारियों का मंदिरों में आगमन होने लगा, दर्शन, श्रवण, कीर्तन, मनन से मग्न मन होने लगा। ले ईश-चरणामृत मुदित राजा-प्रजा अति चाव से, कर्त्तव्य, दृढ़ता की विधा बनने लगी सम भाव से॥ श्रद्धा सहित किस भाँति हरि का पुण्य पूजन हो रहा, वर वेद-मंत्रों में मनोहर कीर्ति-कूजन हो रहा। अखिलेश की उस आर्तिहरिणी आरती को देख लो, असमर्थ, मूक-समान, मुखरा भारती को देख लो॥ अतिथि सत्कार अपने अतिथियों से वचन जाकर गृहस्थों ने कहे- सम्मान्य! आप यहाँ निशा में कुशलपूर्वक तो रहे? हमसे हुई हो चूक जो कृपया क्षमा कर दीजिए- अनुचित न हो तो, आज भी, यह गेह पावन कीजिए”॥ पुरुष पुरुष-प्रवर उस काल के कैसे सदाशय हैं अहा! संसार को उनका सुयश कैसा समुज्वल कर रहा! तन में अलौकिक कांति है, मन में महा सुख-शांति है; देखो न, उनको देख कर होती सुरों की भ्रांति है!!! मस्तिष्क उनका ज्ञान का विज्ञान का भांडार है, है सूक्ष्म बुद्धि-विचार उनका, विपुल बल-विस्तार है। नव नव कलाओं का कभी लोकार्थ आविष्कार है, अध्यात्म तत्वों का कभी उद्धार और प्रचार है॥ स्त्रियाँ पूजन किया पति का स्त्रियों ने, भक्ति-पूर्ण विधान से, आँचल पसार, प्रणाम कर, फिर की विनय भगवान से विश्वेश! हम अबला जनों के बल तुम्हीं हो सर्वदा, पतिदेव में मति, गति तथा दृढ़ ही हमारी रति सदा”॥ हैं प्रीति और पवित्रता की मूर्ति-सी वे नारियाँ, हैं गेह में वे शक्तिरूपा, देह में सुकुमारियाँ, गृहिणी तथा मंत्री स्वपति की, शिक्षिता हैं वे सती, ऐसी नहीं हैं वे कि जैसी आजकल की श्रीमती॥ घर का हिसाब-किताब सारा है उन्हीं के हाथ में, व्यवहार उनके हैं दयामय सब किसी के साथ में। वे पाक-शास्त्र-विशारदा हैं और वैद्यक-जानतीं, सबको सदा संतुष्ट रखना धर्म्म अपना मानतीं॥ आलस्य में अवकाश को वे व्यर्थ ही खोती नहीं, दिन क्या, निशा में भी कभी पति से प्रथम सोती नहीं। सीना, पिरोना, चित्रकारी जानती हैं वे सभी- संगीत भी, पर गीत गंदे वे नहीं गातीं कभी॥ संसार-यात्रा में स्वपति की वे अटल अश्रान्ति हैं, हैं दुःख में वे धीरता, सुख में सदा वे शांति हैं। शुभ सांत्वना हैं शोक में वे और ओषधि रोग में, संयोग में संपत्ति हैं, बस है विपत्ति वियोग में॥ संतान जब हैं स्त्रियाँ यों देवियाँ, संतान क्यों उत्तम न हो? उन बालकों के सरल, सुंदर भाव तो देखो, अहो! ऊषाऽगमन से जाग वे भी ईशगुण गाने लगे- या कंज फूले देख बंदी भृंग उड़ जाने लगे! हैं हृष्ट-पुष्ट शरीर से, माँ-बाप के वे प्राण हैं- जो सर्वदा करते दृगों की भाँति उनका बाण हैं। वे जायँ जब तक गुरुकुलों में, ज्ञान का घर है जहाँ- तब तक उन्हें कुछ-कुछ पढ़ाती आप माताएँ यहाँ॥ है ठीक पुत्रों के सदृश ही पुत्रियों का मान भी, क्या आज की-सी है दशा, जो हो न उनका ध्यान भी! हैं उस समय के जन न अब से जो उन्हें समझ बला! होंगे न दोनों नेत्र किसको एक से प्यारे भला? देखो, अहा वे पुत्रियाँ हैं या विभव की वृद्धियाँ, अवतीर्ण मानों हैं हुई प्रत्यक्ष उनके ऋद्धियाँ। हा! अब उन्हीं के जन्म से हम डूबते हैं शोक में, पर हो न उनका जन्म तो हों पुत्र कैसे लोक में? तपोवन मृग और सिंह तपोवनों में साथ हो फिरने लगे, शुचि होम-धूम उठे कि सुंदर सुरभि-घन घिरने लगे! ऋषि-मुनि मुदित मन से यथा-विधि हवन क्या करने लगे- उपकार मूलक पुण्य के भांडार से भरने लगे॥ वे सौम्य ऋषि, मुनि आजकल के साधुओं जैसे नहीं; कोई विषय जिनसे छिपा हो विज्ञ वे ऐसे नहीं। हस्तामलक-जैसे उन्हें प्रत्यक्ष तीनों काल हैं, शिवरूप हैं, तोड़े उन्होंने बंधनों के जाल हैं॥ वे ग्रंथ जो सर्वत्र ही गुरु मान से मंडित हुए- पढ़ कर जिन्हें संसार के तत्त्वज्ञजन पंडित हुए। जो आज भी थोड़े बहुत हैं नष्ट होने से बचे, हैं वे उन्हीं तप के धनी ऋषि और मुनियों के रचे॥ कुशपाणि पाकर भी उन्हें डरता स्वयं वज्री सदा, हैं तुच्छ उनके निकट यद्यपि उस सुरप की संपदा। यद्यपि उटजवासी तदपि वह तत्त्व उनके पास है, आकर अलेक्जेंडर-सदृश सम्राट बनता दास है! गुरुकुल विद्यार्थियों ने जागकर गुरुदेव का वंदन किया, निज नित्यकृत्य समाप्त करके अध्ययन में मन दिया। जिस ब्रह्मचर्य-व्रत बिना है आज हम सब रो रहे- उसके सहित वे धीर होकर वीर भी हैं हो रहे॥ पाठ आधार आर्यों के अटल जातीय-जीवन-प्राण का- है पाठ कैसा हो रहा श्रुति, शास्त्र और पुराण का। हे राम! हिंदू जाति का सब कुछ भले ही नष्ट हो, पर यह सरस संगीत उसका फिर यहाँ सु-स्पष्ट हो॥ फ़ीस पढ़ते सहस्रों शिष्य हैं पर फ़ीस ली जाती नहीं, वह उच्च शिक्षा तुच्छ धन पर बेच दी जाती नहीं। दे वस्त्र भोजन भी स्वयं कुलपति पढ़ाते हैं उन्हें, बस, भक्ति से संतुष्ट हो दिन-दिन बढ़ाते हैं उन्हें॥ भिक्षा वे ब्रह्मचारी जिस समय, गुरुदेव के आदेश से, पहुँचे नहीं भिक्षार्थ पुर में, बालरूप महेश-से। ले सात्त्विकी भिक्षा, प्रथम ही, गृहिणियाँ हर्षित बड़ीं- करने लगीं उनकी प्रतीक्षा, द्वार पर हो कर खड़ीं॥ है आज कल की भाँति वह भिक्षा नहीं अपमान की, है प्रार्थनीय गृही जनों को यह व्यवस्था दान की। वे ब्रह्मचारी भिक्षुवर ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं- भूपाल भी, पथ छोड़ कर, उन पर दिखाते भक्ति हैं॥ राजा देखा, महीपति उस समय के हैं प्रजा-पालक सभी, रहते हुए उनके किसी को कष्ट हो सकता कभी? किस भाँति पावें कर, न यदि वे न्याय से शासन करें, जो वे अनीति करें कहीं तो वेन की गति से मरें॥ अनिवार्यशिक्षा हैं खोजने से भी कहीं द्विज मूर्ख मिल सकते नहीं, अनिवार्य शिक्षा के नियम हैं जो कि हिल सकते नहीं। यदि गाँव में द्विज एक भी विद्या न विधिपूर्वक पढ़े- तो दंड दे उसको नृपति, फिर क्यों न यों शिक्षा बढ़े॥ है नित्य विप्रों के यहाँ बस, ज्ञान-चर्चा दीखती, शुक-सारिकाएँ भी जहाँ शास्त्रार्थ करना सीखती। कोई जगत को सत्य, कोई स्वप्न मात्र बता रहा, कोई शकुनि उनमें वहाँ मध्यस्थ भाव जता रहा॥ चारित्र्य देखो कि सबके साथ सबका निष्कपट बर्ताव है, सबमें परस्पर दीख पड़ता प्रेम का सद्भाव है। कैसे फले-फूल भला वे जो न हिल मिल कर रहे? वे आर्य ही क्या, यदि कभी परिवाद निज मुख से कहें॥ ठग और चोर कहीं नहीं हैं धर्म का अति ध्यान है, देखे न देखे और कोइ, देखता भगवान है। सूना पड़ा हो माल कोई किंतु जा सकता नहीं कोई प्रलोभन शांत मन को है भुला सकता नहीं॥ यदि झूठ कहने पर किसी का टिक रहा सर्वस्व भी, तो भी कहेगा सत्य ही वह क्यों कि मरना है कभी। पंचायतों में समय पर, दृष्टांत ऐसे दीखते, हैं धर्म का सब पाठ मानों गर्भ में ही सीखते॥ हैं भाव सबके आननों पर ईश्वरीय प्रसाद के, इस लोक में उनके हृदय आधार है प्रह्लाद के। मरते नहीं वह मौत वे जो फिर उन्हें मरना पड़े, करते नहीं वह काम उनको नाम जो धरना पड़े॥ बस, विश्वपति में नित्य सबकी वृत्तियाँ हैं लग रहीं, अन्तःकरण में ज्ञानमणि की ज्योतियाँ हैं जग रहीं। कर्तव्य का ही ध्यान उनको है सदा व्यवहार में, वे 'पद्मपत्रमिवाम्भसा' रहते सुखी संसार में॥भारत-भारती / वर्तमान खंड / धर्म की दशा
था धर्म-प्राण प्रसिद्ध भारत, बन रहा अब भी वही;पर प्राण के बदले गले में आज धार्मिकता रही!
धर्मोपदेश सभा भवन की भित्ति में टकरा रहा,
आडंबरों को देख कर आकाश भी चकरा रहा!
बस कागज़ी घुड़दौड़ में है आज इति कर्तव्यता,
भीतर मलिनता हो भले ही किंतु बाहर भव्यता।
धनवान ही धाम्मिक बने यद्यपि अधर्मासक्त हैं,
है लाख में दो चार सुहृदय शेष बगुला भक्त हैं॥
अनुकूल जो अपने हुए वेही यहाँ सद्ग्रंथ हैं;
जितने पुरुष अब हैं यहाँ उतने समझ लो पंथ हैं।
यों फूट की जड़ जम गई, अज्ञान आकर अड़ गया,
हो छिन्न-भिन्न समाज सारा दीन-दुर्बल पड़ गया॥
श्रुति क्यों न हो, प्रतिकूल हैं जो स्थल वही प्रक्षिप्त हैं,
विक्षिप्त से हम दंभ में आपाद-मस्तक लिप्त हैं!
आक्षेप करना दूसरों पर धर्मनिष्ठा है यहाँ,
पाखंडियों ही की अधिकतर अब प्रतिष्ठा है यहाँ!
हम आड़ लेकर धर्म की अब लीन हैं विद्रोह में,
मत ही हमारा धर्म है, हम पड़ रहे हैं मोह में!
है धर्म बस निःस्वार्थता ही, प्रेम जिसका मूल है;
भूले हुए हैं हम इसे, कैसी हमारी भूल है?
जिसके लिए संसार अपना सर्वकाल ऋणी रहा,
उस धर्म की भी दुर्दशा हमने उठा रखी न हा!
जो धर्म सुख का हेतु है, भव-सिंधु का जो सेतु है,
देखो, उसे हमने बनाया अब कलह का केतु है!!
उद्देश है बस एक, यद्यपि पथ अनेक प्रमाण हैं,
रुचि-भिन्नता किए गए जो ज्ञान से निर्माण हैं।
पर अब पथों को ही यहाँ पर धर्म हैं हम मानते!
करके परस्पर घोर निंदा व्यर्थ ही हठ ठानते॥
प्रभु एक किंतु असंख्य उसके नाम और चरित्र हैं,
तुम शैव, हम वैष्णव, इसी से हा अभाग्य! अमित्र हैं।
तुम ईश को निर्गुण समझते, हम सगुण भी जानते,
हा! अब इसी से हम परस्पर शत्रुता हैं मानते!
हिंदू सनातन धर्म के ऐसे पवित्र विधान हैं,
संसार में सबके लिए जो मान्य एक समान हैं।
धृति, शांति, शौच, दया, क्षमा, शम, दम, अहिंसा, सत्यता;
पर हाय! इनमें से किसी का आज हममें है पता?
विख्यात हिंदू-धर्म ही सच्चा सनातन धर्म है,
वह धर्म ही धारण क्रिया का नित्य कर्ता-कर्म है।
परमार्थ की-संसार की भी सिद्धि का वह धाम है,
पर वाद और विवाद में ही आज उसका नाम है!
भारत-भारती / वर्तमान खंड / तीर्थ और तीर्थ-पंडे
आरंभ से ही जो हमारे मुख्य धर्म-क्षेत्र हैं—अब देख कर उनकी दशा आँसू बहाते नेत्र हैं।
हा! गूढ़ तत्त्वों का पता ऋषि-मुनि लगाते थे जहाँ—
सबसे अधिक अविचार का विस्तार है संप्रति वहाँ!
वे तीर्थ जो प्रभु की प्रभा से पूर्ण ही पूजित हुए—
राजर्षि-युत ब्रह्मर्षियों के कंठ से कूजित हुए,
अब तीर्थ-गुरु ही हैं अधिक उनको कलंकित कर रहे,
हा! स्वर्ग के सु-स्थान में हम नरक अंकित कर रहे!
वे तीर्थ-पंडे हैं जिन्होंने स्वर्ग का ठेका लिया;
है निंद्य कर्म न एक ऐसा हो न जो उनका किया!
वे हैं विद्या के पुरोहित, प्रविधि के आचार्य हैं,
लड़ना-झगड़ना और अड़ना मुख्य उनके कार्य हैं॥
वे आप तो हैं ही पतित, कामी, कुपथगामी बड़े—
पर पाप के भागी हमें भी हैं बनाने को खड़े।
हम-भस्म में घृत के सदृश देते उन्हें जो दान हैं—
बस वे उसी से दुर्व्यसन के जोड़ते सामान हैं॥
भारत-भारती / अतीत खंड / आदर्श
आदर्श-जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए?सत्कार्य्य-भूषण आर्य्य-गण जितने यहाँ पर हैं हुए।
हैं रह गए यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे,
पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे॥
गौतम, वशिष्ठ-समान मुनिवर ज्ञान-दायक थे यहाँ,
मनु, याज्ञवल्क्य-समान सत्तम विधि-विधायक थे यहाँ।
वाल्मीकि वेदव्यास से गुण-गान गायक थे यहाँ,
पृथु, पुरु, भरत, रघु-से अलौकिक लोकनायक थे यहाँ॥
लक्ष्मी नहीं, सर्वस्व जाने, सत्य छोड़ेंगे नहीं;
अंधे बनें पर सत्य से संबंध तोड़ेंगे नहीं।
निज सुत-मरण स्वीकार है पर वचन की रक्षा रहे,
है कौन जो उन पूर्वजों के शील की सीमा कहे?॥
सर्वस्व करके दान जो चालीस दिन भूखे रहे,
अतिथि सत्कार में फिर भी न जो रूखे रहे।
पर-तृप्ति कर निजतृप्ति मानी रन्तिदेव नरेश ने,
ऐसे अतिथि संतोष-कर पैदा किए इस देश ने॥
आमिष दिया अपना जिन्होंने श्येन-भक्षण के लिए,
जो बिक गए चाण्डाल के घर सत्य-रक्षण के लिए!
दे दीं जिन्होंने अस्थियाँ परमार्थ हित जानी जहाँ,
शिवि, हरिश्चंद्र, दधीच से होते रहे दानी यहाँ॥
सत्पुत्र पुरु से थे जिन्होंने तात-हित सब कुछ सहा,
भाई भरत-से थे जिन्होंने राज्य भी त्यागा अहा!
जो धीरता के, वीरता के प्रौढ़तम पालक हुए,
प्रह्लाद, ध्रुव, कुश, लव तथा अभिमन्यु-सम बालक हुए॥
वह भीष्म का इन्द्रिय दमन, उनकी धरा-सी धीरता,
वह शील उनका और उनकी वीरता, गंभीरता।
उनकी सरलता और उनकी वह विशाल विवेकता,
है एक जन के अनुकरण में सब गुणों की एकता॥
वर वीरता में भी सरसता वास करती थी यहाँ,
पर साथ ही वह आत्म-संयम था यहाँ का-सा कहाँ?
आकर करे रति-याचना जो उर्वशी-सी भामिनी,
फिर कौन ऐसा है, कह जो मत कहो यों कामिनी”॥
यदि भूल कर अनुचित किसी ने काम कर डाला कभी,
तो वह स्वयं नृप के निकट दण्डार्थ जाता था तभी।
अब भी 'लिखित मुनि' का चरित वह लिखित है इतिहास में,
अनुपम सुजनता सिद्ध है जिसके अमल आभास में॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / साहित्य
उस सांप्रतिक साहित्य पर भी ध्यान देना चाहिए, उसकी अवस्था भी हमें कुछ जान लेना चाहिए। मृत हो कि जीवित, जाति का साहित्य जीवन-चित्र है, वह भ्रष्ट है तो सिद्ध फिर वह जाति भी अपवित्र है॥ जिस जाति का साहित्य था स्वर्गीय भावों से भरा— करने लगा अब बस विषय के विष-विटप को वह हरा! श्रुति, शास्त्र, सूत्र पुराण, रामायण, महाभारत हटे, वे नायिकाभेदादि उनके स्थान में हैं आ डटे!! हम तो हुए ही पतित पर दुर्भाव जो भरते गए— सुकुमार भावी सृष्टि को भी वे पतित करते गए! हा! उच्च भावों को वही क्रम आज भी है खो रहा, अश्लील ग्रंथों से हमारा शील चौपट हो रहा! अब सिद्ध हिंदी ही यहाँ की राष्ट्र-भाषा हो रही, पर है वही सबसे अधिक साहित्य के हित रो रही! रीते पड़े अब तक अहो! उसके अखिल भांडार हैं, तुलसी तथा सूरादि के कुछ रत्न ही आधार हैं!! कविता उद्देश कविता का प्रमुख शृंगार रस ही हो गया, उन्मत्त होकर मन हमारा अब उसी में खो गया! कवि-कर्म कामुकता बढ़ाना रह गया देखो जहाँ, वह वीर रस भी समर-समर में हो गया परिणत यहाँ॥ सोचो, हमारे अर्थ है यह बात कैसे शोक की— श्रीकृष्ण की हम आड़ लेकर हानि करते लोक की। भगवान को साक्षी बना कर यह अनंगोपासना! है धन्य ऐसे कविवरों को, धन्य उनकी वासना!! उपन्यास है और औपन्यासिकों का एक नूतन दल यहाँ, फैला रहा है जो निरंतर और भी हलचल यहाँ! दौरात्म्य ही अब लोक-रुचि पर हो रहा है सब कहीं, हो स्वार्थ! तेरी जय, अरे, तू क्या करा सकता नहीं? वे रुचि-विघातक ग्रंथ ज्यों ही सैर करने की छुए, स्वीया हुईं कुलटा बहुत, अनुकूल बहुधा शठ हुए! ये भाव हम गिरते हुओं पर और पत्थर-से गिरे, दब कर हृदय जिनसे हमारे हो गए जर्जर निरे!! जो उपन्यास यहाँ सुशिक्षाप्रद कह कर बिक रहे, उनमें अधिक अविचार की ही नींव पर हैं टिक रहे। उनके कु-पात्रों में नरक की आग ऐसी जागती, अपनी सुरुचि भी पाठकों की दूर जिससे भागती! साद्यंत उनमें असंभवता घन-घटा सी छा रही, दुर्भाव की दुर्गंधि उनसे अंत तक है आ रही। आई कहानी भी न कहनी और हम इतना बके, 'जीवन प्रभात' न 'चंद्रशेखर' एक भी हम लिख सके! लिक्खाड़ ऐसे ही यहाँ साहित्य-रत्न कहा रहे, वे वीर वैतरणी नदी का हैं प्रवाह बहा रहे। वे हैं नरक के दूत किंवा सूत हैं कलिराज के! वे मित्ररूपी शत्रु ही हैं देश और समाज के॥ क्या मुँह दिखावेंगे भला परलोक में वे ही कहें? जो कुछ नहीं आता उन्हें तो मौन ही फिर वे रहें! पर मौन वे कैसे रहें, निरुपाय क्या भूखों मरें? मर जाए क्यों न समाज सारा, पाकिटें उनकी भरें!! पत्र हैं पत्र भी प्रायः परस्पर द्वेष-भाव न छोड़ते, दलबंदियाँ करते हुए जी के फफोले फोड़ते। बीड़ा लिए जो देश-हित का पथ हमें दिखला रहे— हठ, पक्षपात तथा हमें कुत्सा वही सिखला रहे!भारत-भारती / अतीत खंड / हमारे पूर्वज
उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है,गाते नहीं उनके हमीं गुण, गा रहा संसार है।
वे धर्म्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे,
उनसे वही गंभीर थे, वर वीर थे, ध्रुव धीर थे॥
उनके अलौकिक दर्शनों से दूर होता पाप था,
अति पुण्य मिलता था तथा मिटता हृदय का ताप था।
उपदेश उनके शांतिकारक थे निवारक शोक के,
सब लोक उनका भक्त था, वे थे हितैषी लोक के॥
लखते थे अघ की ओर थे वे, अघ न लखता था उन्हें;
वे धर्म्म को रखते सदा थे, धर्म्म रखता था उन्हें।
वे कर्म्म से हो कर्म्म का थे नाश करना जानते,
करते वही थे वे जिसे कर्तव्य थे वे मानते॥
वे सजग रहते थे सदा दुख-पूर्ण तृष्णा-भ्रांति से,
जीवन बिताते थे सदा संतोष-पूर्वक शांति से।
इस लोक में उस लोक से वे सुख पाते न थे,
हँसते हुए आते न थे, रोते हुए जाते न थे॥
जिनकी पूर्व सुगंधि से इन्द्रिय मधुपगण थे हिले,
सद्भाव-सरजित वर जहाँ पर नित्य रहते थे खिले।
लहरें उठाने में जहाँ व्यवहार-मारुत लग्न था,
उन्मत्त आत्मा-हंस उनके मानसों में मग्न था॥
ये ईश-नियमों को कभी अवहेलना करते न थे,
सन्मार्ग में चलते हुए वे विघ्न से डरते न थे।
अपने लिए वे दूसरों का हित कभी हरते न थे,
चिंता-अपूर्ण, अशांतिपूर्वक वे कभी मरते न थे॥
वे मोह-बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे, स्वाधीन थे;
संपूर्ण सुख-संयुक्त थे, वे शांति-शिखरासीन थे।
मन से, वचन से, कर्म्म से वे प्रभु-भजन में लीन थे,
विख्यात ब्रह्मानंद-नद के वे मनोहर मीन थे॥
उनके चतुर्दिक-कीर्ति-पट को है असंभव नापना,
की दूर देशों में उन्होंने उपनिवेश स्थापना।
पहुँचे जहाँ वे अज्ञता का द्वार जाने रुक गया,
वे झुक गए जिस ओर को संसार मानों झुक गया॥
वर्णन उन्होंने जिस विषय का है किया, पूरा किया;
मानों प्रकृति ने ही स्वयं साहित्य उनका रच दिया।
चाहे समय को गति कभी अनुकूल उनके हो नहीं,
हैं किंतु निश्चल एक से सिद्धांत उनके सब कहीं॥
वे मेदिनी तल में सुकृत के बीज बोते थे सदा,
परदुःख देख दयालुता से द्रवित होते थे सदा।
वे सत्त्वगुण-शुभ्रांशु से तम-ताप खोते थे सदा,
निश्चिन्त विन-विहान सुख की नींद सोते थे सदा॥
वे आर्य्य ही थे जो कभी अपने लिए जीते न थे;
वे स्वार्थ-रत ही मोह की मदिरा कभी पीते न थे।
संसार के उपकार-हित जब जन्म लेते थे सभी,
निश्चेष्ट होकर किस तरह से बैठ सकते थे कभी?॥
भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी विद्या-बुद्धि
पांडित्य का इस देश में सब ओर पूर्ण विकास था,बस, दुर्गुणों के ग्रहण में ही अज्ञता का वास था।
सब लोग तत्त्व-ज्ञान में संलग्न रहते थे यहाँ-
हाँ व्याध भी वेदांत के सिद्धांत कहते थे यहाँ!
जिसकी प्रभा के सामने रवि तेज भी फीका पड़ा,
अध्यात्म-विद्या का यहाँ आलोक फैला था बड़ा!
मानस-कमल सबके यहाँ दिन-रात रहते थे खिले,
मानों सभी जन ईश की ज्योति-छटा में थे मिले॥
समझा प्रथम किसने जगत में गूढ़ सृष्टि-महत्त्व को?
जाना कहो किसने प्रथम जीवन-मरण के तत्त्व को?
आभास ईश्वर जीव का कैवल्य तक किसने दिया?
सुनलो, प्रतिध्वनि हो रही, यह कार्य्य आर्यों ने किया॥
हम वेद, वाकोवाक्य-विद्या, ब्रह्मविद्या-विज्ञ थे,
नक्षत्र-विद्या, क्षत्र-विद्या, भूत-विद्याऽभिज्ञ थे।
निधि, नीति-विद्या, राशि-विद्या, पित्र्य-विद्या में बढ़े,
सर्पादि-विद्या, देव-विद्या, दैव-विद्या थे पढ़े॥
आए नहीं थे स्वप्न में भी जो किसी के ध्यान में,
वे प्रश्न पहले हल हुए थे एक हिंदुस्तान में?
सिद्धांत मानव जाति के जो विश्व में वितरित हुए,
बस, भारतीय तपोवनों में थे प्रथम निश्चित हुए॥
थे योग-बल से वश हमारे नित्य पाँचों तत्त्व भी,
मर्त्यत्व में वह शक्ति थी रखता न जो अमरत्व भी।
संसार-पथ में वह हमारी गति कहीं रुकती न थी,
विस्तृत हमारी आयु वह चिरकाल तक चुकती न थी॥
जो श्रम उठा कर यत्न से की जाय खोज जहाँ-तहाँ,
विश्वास है, तो आज भी योगी मिलें ऐसे यहाँ
जो शून्य में संस्थित रहें, भोजन बिना न कभी मरे;
अविचल समाधिस्थित रहें, द्रुत देह परिवर्तित करें॥
हाँ, वह मनःसाक्षित्व-विद्या की विलक्षण साधना;
वह मेस्मरेजिमर की महत्ता, प्रेत-चक्राराधना।
कारक और भी वे आधुनिक बहु वृद्धियाँ,
कहना वृथा है, है हमारे योग की लघु सिद्धियाँ॥
भारत-भारती / अतीत खंड / हमारा साहित्य
साहित्य का विस्तार अब भी है हमारा कम नहीं;प्राचीन किंतु नवीनता में अन्य उसके सम नहीं।
इस क्षेत्र से ही विश्व के साहित्य-उपवन हैं बने,
इसको उजाड़ा काल ने आघात कर यद्यपि घने॥
फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में,
जागी यहीं थी जग रही जो ज्योति अब संसार में।
इंजील और कुरान आदिक थे न तब संसार में-
हमको मिला था दिव्य वैदिक बोध जब संसार में॥
जिनकी महत्ता का न कोई पा सका है भेद हो,
संसार में प्राचीन सब से हैं हमारे वेद ही।
प्रभु ने दिया यह ज्ञान हमको सृष्टि के आरंभ में,
है मूल चित्र पवित्रता का सभ्यता के स्तंभ में॥
विख्यात चारों वेद मानों चार सुख के सार हैं,
चारों दिशाओं के हमारे वे जय-ध्वज चार हैं
वे ज्ञान-गरिमाऽगार हैं, विज्ञान के भांडार है;
वे पुण्य-पारावार हैं, आचार के आधार हैं॥
जो मृत्यु के उपरांत भी सबके लिए शांति प्रदा-
है उपनिषद्विद्या हमारी एक अनुपम संपदा।
इस लोक को परलोक से करती वही एकत्र है,
हम क्या कहें, उसकी प्रतिष्ठा हो रही सर्वत्र है॥
उन सूत्र-ग्रंथों का अहा! कैसा अपूर्ण महत्त्व है,
अत्यल्प शब्दों में वहाँ संपूर्ण शिक्षा-तत्त्व है।
उन ऋषि-गणों ने सूक्ष्मता से काम कितना है लिया,
आश्चर्य है, घट में उन्होंने सिंधु को है भर दिया॥
उस दिव्यदर्शन-शास्त्र में है कौन हमसे अग्रणी?
यूनान, यूरुप, अरब आदि हैं हमारे ही ऋणी।
पाए प्रथम जिनसे जगत ने दार्शनिक संवाद हैं-
गौतम, कपिल, जैमिन, पतंजलि, व्यास और करणाद हैं॥
दृष्टांत दर्शन ही हमारी उच्चता के हैं बड़े,
हैं कह रहे सबसे वही संसार में होकर खड़े-
“हे विश्व! भारत के विषय में फिर कुशंकाएँ करो-
हम दर्शनों का साम्य पहले आज भी आगे धरो॥
यह क्या हुआ कि अभी तो रो रहे थे ताप से,
हैं, और अब हँसने लगे वे आप अपने आप से।
ऐं क्या कहा, निज चेतना पर आ गई उनकी हँसी,
गीता-श्रवण के पूर्व थी जो मोह-माया में फँसी॥
रचते कहीं मन्वादि ऋषि वे धर्मशास्त्र न जो यहाँ,
कानून ताजीरात जैसे आज वे बनते कहाँ?
उन संहिताओं के विमल वे विधि-निषेध विधान हैं-
या लोक में, परलोक में, वे शांति के सोपान हैं॥
निज नीति-विद्या का हमें रहता यहाँ तक गर्व था-
हम आप जिस पथ पर चले सत्पथ वही है सर्वथा।
सामान्य नीति समेत ऐसे राजनैतिक ग्रंथ हैं-
संसार के हित जो प्रथम पुण्याचरण के पंथ हैं
चाणक्य से नीतिज्ञ थे हम और निश्चल निश्चयी,
जिनके विपक्षी राजकुल की भी इतिश्री हो गई।
है विष्णुशर्मा ने घड़े में सिंधु सचमुच भर दिया-
कहकर कहानी ही जड़ों को पूर्ण पंडित कर दिया!॥
वृत्तांत पहले व्योम का प्रकटित हमीं ने था किया,
वह क्रांति मंडल था हमीं से अन्य देशों ने लिया।
थे आर्य्यभट,आचार्य भास्कर-तुल्य ज्योतिर्विद यहाँ,
अब भी हमारे 'मान मंदिर' वर्णनीय नहीं कहाँ?॥
जिस अंक-विद्या के विषय में वाद का मुँह बंद है,
वह भी यहाँ के ज्ञान-रवि की रश्मि एक अमंद है।
डर कर कठोर कलंक से, वा सत्य के आतंक से-
कहते अरब वाले अभी तक 'हिंदसा' ही अंक से॥
उन 'सुल्व-सूत्रों' के जगत में जन्मदाता है हमीं,
रेखागणित के आदि ज्ञाता या विधाता हैं हमीं।
हमको हमारी वेदियाँ पहले इसे दिखला चुकीं-
निज रम्य-रचना-हेतु वे रेखागणित सिखला चुकीं॥
आकार देख प्रकार थे हम जान जाते आप ही,
वे शास्त्र 'सामुद्रिक' सरीखे थे बनाते आप ही।
विज्ञान से भी 'फलित ज्योतिष' हो रहा अब सिद्ध है,
यद्यपि अविज्ञों से हुआ वह निंद्य और निषिद्ध है॥
प्राचीन हो जो है न, जिससे अन्य भाषाएँ बनीं;
भाषा हमारी देववाणी श्रुति-सुधा से है सनी।
है कौन भाषा यों अमर व्युत्पत्ति रूपी प्राण से?
हैं अन्य-भाषा-शव उसके सामने म्रियमाण से॥
निकला जहाँ से आधुनिक वह भिन्न भाषा तत्त्व है,
रखती न भाषा एक भी संस्कृत-समान महत्त्व है।
पाणिनि-सदृश वैयाकरण संसार भर में कौन है?
इस प्रश्न का सर्वत्र उत्तर उत्तरोत्तर मौन है॥
उस वैद्यविद्या के विषय में अधिक कहना व्यर्थ है,
सुश्रुत, चरक रहते हुए संदेह रहना व्यर्थ है।
अनुवादकतो आज भी उपहार उनके पा रहे,
हैं आर्य्य आयुर्वेद के सब देश सद्गुण गा रहे॥
थे हार जात अन्य देशी वैद्यवर जिस रोग से-
हम भस्म करते थे उसे बस भस्म के ही योग से।
थे दूर देशों के नृपति हमको बुलाकर मानते,
इतिहास साक्षी है, हमें सब थे जगद्गुरु जानते॥
है आज कल की डाक्टरी जिससे महामहिमा मयी,
वह 'आसुरी' नामक चिकित्सा है यहीं से ली गई।
नाड़ी-नियम-युत रोग के निश्चित निदान हुए यहाँ,
सब औषधों के गुण समझकर रस-विधान हुए यहाँ॥
कविवर्य्य शेक्सपियर तथा होमर सदा सम्मान्य हैं,
विख्यात फिरदौसी-सदृश कवि और भी अन्यान्य हैं।
पर कौन उनमें मनुज-मन को मुग्ध इतना कर सके,
वाल्मीकि, वेदव्यास, कालीदास जितना कर सके॥
संसार भर के ग्रंथ-गिरि पर चित्त से पहले चढ़ो,
उपरांत रामायण तथा गीता-प्रथित भारत पढ़ो।
कोई बतादो फिर हमें, ध्वनि सुन पड़ी ऐसी कहाँ?
हे हरि! सुनें केवल यही ध्वनि अंत में हम हों जहाँ॥
यद्यपि अतुल अगणित हमारे/ग्रंथ-रत्न नए नए,
बहु बार अत्याचारियों से नष्ट-भ्रष्ट किए गए।
पर हाय! आज रहीं सहीं भी पोथियाँ यों कह रहीं-
क्या तुम वही हो! आज तो पहचान तक पड़ते नहीं॥
भारत-भारती / अतीत खंड / महत्ता
जो पूर्व में हमको अशिक्षित या असभ्य बता रहे,वे लोग या तो अज्ञ हैं या पक्षपात जता रहे।
यदि हम अशिक्षित थे, कहें तो सभ्य वे कैसे हुए?
वे आप ऐसे भी नहीं थे आज हम जैसे हुए॥
ज्यों-ज्यों प्रचुर प्राचीनता की खोज बढ़ती जाएगी,
त्यों-त्यों हमारी उच्चता पर ओप चढ़ती जाएगी।
जिस ओर देखेंगे हमारे चिह्न दर्शक पाएँगे;
हमको गया बतलाएँगे, जब जो जहाँ तक जाएँगे॥
पाए हमीं से तो प्रथम सबने अखिल उपदेश हैं,
हमने उजड़ कर भी बसाए दूसरे बहु देश हैं।
यद्यपि महाभारत-समर था मरण भारत के लिए,
यूनान-जैसे देश फिर भी सभ्य हमने कर दिए॥
हमने बिगड़ कर भी बनाए जन्म के बिगड़े हुए;
मरते हुए भी हैं जगाए मृतक-तुल्य पड़े हुए।
गिरते हुए भी दूसरों को हम चढ़ाते ही रहे,
घटते हुए भी दूसरों को हम बढ़ाते ही रहे॥
कल जो हमारी सभ्यता पर थे हँसे अज्ञान से-
वे आज लज्जित हो रहे हैं अधिक अनुसंधान से।
जो आज प्रेमी हैं हमारे भक्त कल होंगे वही,
जो आज व्यर्थ विरक्त हैं अनुरक्त कल होंगे यही॥
सब देश विद्याप्राप्ति को सन्तत यहाँ आते रहे,
सुरलोक में भी गीत ऐसे देव-गण गाते रहे-
हैं धन्य भारतवर्ष-वासी, धन्य भारतवर्ष है;
सुरलोक से भी सर्वथा उसका अधिक उत्कर्ष है”॥
भारत-भारती / अतीत खंड / हमारा उद्भव
शुभ शांति-मय शोभा जहाँ भव बंधनों को खोलती,हिल मिल मृगों से खेल करती सिंहिनी थी डोलती।
स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ,
उन ऋषि गणों से ही हमारा था हुआ उद्भव यहाँ॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / व्यापार
इस रत्नगर्भा भूमि पर हा दैव ऐसी दीनता,है शोच्य कृषि से कम नहीं व्यापार की भी हीनता।
जिस देश के वाणिज्य की सर्वत्र धूम मची रही—
क्या पर मुखापेक्षी नहीं है आज पद-पद पर वही?
अब रख नहीं सकते स्वयं हम लाज भी अपनी अहो!
रखते विदेशी वस्त्र उसको, सभ्य हैं हम, क्यों न हो!
करती अपेक्षा अपनी पूर्ण जो जितनी जहाँ—
वह जाति उतनी ही समुन्नति प्राप्त करती है वहाँ॥
जो वस्तु देखो,'मेडइन' इँगलैंड, इटली, जर्मनी,
जापान, फ्रांस, अमेरिका वा अन्य देशों की बनी।
होकर सजीव मनुष्य हम निर्जीव से हैं हो रहे,
घर में लगा कर आग अपने बेखबर हैं सो रहे!
कुल-नारियाँ जिनको हमारी हैं करों में धारतीं—
सौभाग्य का शुभ-चिह्न जिनको हैं सदैव विचारतीं।
वे चूड़ियाँ तक हैं विदेशी देख लो, बस हो चुका;
भारत स्वकीय सुहाग भी परकीय करके खो चुका!
वे तुच्छ सुइयाँ भी विदेशी जो न हमको मिल सकें—
तो फिर पहनने के हमारे वस्त्र भी क्या सिल सकें?
माचिस विदेशी जो न लें तो हम अँधेरे में रहें,
हैं क्षुद्र छड़ियों तक विदेशी और आगे क्या कहें?
केवल विदेशी वस्तु ही क्यों, अब स्वदेशी है कहाँ?
वह वेष-भूषा और भाषा, सब विदेशी है यहाँ!
गुण मात्र छोड़ विदेशियों के हम उन्हीं में सन गए,
कैसी नकल की,वाह! हम नक्काल पूरे बन गए!
गर्दभ बना था सिंह उसकी खाल को पाकर कभी,
पर सिंह के से गुण कहाँ? हँसने लगे उसको सभी।
इस माँति के नरपुंगवों को क्या यहाँ बढ़ती नहीं?
पर हाय! काले भाल पर लाली कभी चढ़ती नहीं॥
संप्रति स्वदेशी की हमें है गंध भी भाती नहीं,
खस, केवड़ा, बेला, चमेली चित्त में आती नहीं।
मस्तक न 'लेवेंडर' बिना अब मस्त होता है अहो!
बस शौक़ पूरा हो हमारा, देश ऊजड़ क्यों न हो!
सब स्वाभिमान डुबा चुके जो पूर्व-पारावार में—
आश्चर्य है, हम आज भी हैं जी रहे संसार में;
किंवा इसे जीना कहें तो फिर कहें मरना किसे?
जीता कहाँ है वह नहीं है ध्यान कुछ अपना जिसे!
आती विदेशों से यहाँ सब वस्तुएँ व्यवहार की,
धन-धान्य जाता है यहाँ से, यह दशा व्यापार की!
कैसे न फैले दीनता, कैसे न हम भूखों मरे?
ऐसी दशा में देश की भगवान ही रक्षा करें॥
जिस वस्तु को हम दूसरों को बेचते हैं 'एक' में,
लेते उसी को 'बीस' में हैं डूब कर अविवेक में!
जो देश कच्चा माल ही उत्पन्न करके शांत है,
उसका पतन एकांत है, सिद्धांत यह निर्भ्रान्त है॥
रालीब्रदर इत्यादि को हम बेचते जो माल हैं,
लेते वही पंद्रह गुने तक मूल्य में तत्काल हैं!
आता विलायत से यहाँ वह माल नाना रूप में,
आश्चर्य क्या फिर हम पड़े हैं जो अँधेरे कूप में॥
हम दूसरों को पाँच सौ की बेचते हैं जब रुई,
सानंद कहते हैं कि हमको आय क्या अच्छी हुई।
पर दूसरे कहते कि ठहरो, वस्त्र जब हम लाएँगे—
तब और पैंतालीस सौ लेकर तुम्हीं से जाएँगे॥
हा! आप आगे दौड़ कर हम दीनता को ले रहे,
लेकर खिलौने काँच आदिक अन्न-धन हैं दे रहे!
आवश्यकीय पदार्थ अपने यदि बनाते हम यहीं,
जो हानि होकर ये हमारी दुर्दशा होती नहीं॥
लेकर विदेशी टीन हम सानंद चाँदी दे रहे,
देकर तथा सोना निरंतर है गिलट हम ले रहे।
हम काँच लेकर दूसरों को दे रहे हीरे खरे,
निज रक्त के बदले महोदक ले रहे हैं हा हरे!
क्या इस पुरातन देश में था समय ऐसा भी कभी—
अपनी प्रयोजन-पूर्ति जय करते स्वयं थे हम सभी?
हाँ, यह न होता तो कभी का नाश हो जाता यहाँ,
इसका अभी तक चिह्न भी क्या दृष्टि में आता यहाँ॥
जो दिव्य दर्शन शास्त्र की विख्यात है जन्मस्थली,
पहले जहाँ पर अंकुरित हो सभ्यता फूली-फली।
संगीत, कविता, शिल्प की जननी वही भारत मही,
होगी किसे स्पर्धा कहे जो पर मुखापेक्षी रही!
इतिहास में इस देश की वाणिज्य वृद्धि प्रसिद्ध है,
अन्यान्य देशों से वहाँ संबंध इसका सिद्ध है।
बन कर यहाँ हर वस्तुएँ सर्वत्र ही जाती रहीं,
नर-रचित कहलाती न थीं, सुर-रचितर कहलाती रहीं॥
हिंदू-कला-कौशल्य पर संसार मुग्ध बना रहा,
जग में बिना संकोच सबने अद्वितीय उसे कहा।
'हारूँ रशीद' तथा प्रतापी 'शार्लमेंगन' की सभा,
है हो चुकी विस्मित निरख कर भारतीय-पट-प्रभा॥
सब वस्तुएँ उपहार के ही योग्य बनती थीं यहाँ,
संसार में होती उन्हीं की माँग थी देखो जहाँ।
तब तो अतुल वैभव रहा, त्रुटि थी न कोई आय में;
सच है कि रमती है रमा वाणिज्य में, व्यवसाय में॥
है आज कश्मीरे विदेशी नाम पर जिनके चले,
बनते दुशाले हाय! थे काश्मीर में कैसे भले!
है विदित बंगाली किनारी धोतियों की आज भी,
पर है विदेशी आज वह, आती न हमको लाज भी!
ढाके,चँदेरी आदि की कारीगरी अब है कहाँ?
हा! आज हिंदू-नारियों की कुशलता सब है कहाँ?
थी वह कला या क्या, कि ऐसी सूक्ष्म थी, अनमोल थी,
सौ हाथ लंबे सूत की बस आध रत्ती तोल थी॥
रखा नली में बाँस को जो थान कपड़े का नया,
आश्चर्य अंबारी सहित हाथी उसी से ढक गया।
ये वस्त्र कितने सूक्ष्म थे, कर लो कई जिनकी तहें—
शहज़ादियों के अंग फिर भी झलकते जिनमें रहें!
थे मुग्ध वस्त्रों पर हमारे अन्य देशी सर्वथा,
यूरोप के ही साहबों को हम सुनाते हैं कथा।
वे लोग वस्त्रों को यहाँ के थे सदैव सराहते,
निज देश के पट मुफ़्त में भी थे न लेना चाहते॥
जिस भाँति भारतवर्ष का व्यापार नष्ट किया गया,
कर से तथा प्रतिरोध से जिस भाँति भ्रष्ट किया गया।
वर्णन वृथा है उस विषय का, सोचना अब है यही—
किस भाँति उसकी वृद्धि हो, जैसे कि पहले थी रही॥
यदि हम विदेशी माल से मुँह मोड़ सकते हैं नहीं—
तो हाय! उसका मोह भी क्या छोड़ सकते हैं नहीं?
क्या बंधुओं के हित तनिक भी त्याग कर सकते नहीं?
निज देश पर क्या अल्प भी अनुराग कर सकते नहीं?
भारत-भारती / अतीत खंड / मुसलमानों का प्रवेश
देखो न होगी ऐक्य की ऐसी किसी ने छिन्नता, बढ़ कर महा मत भिन्नता फैली भयंकर खिन्नता। आखिर अहले इसलाम दल को हम बुला कर ही रहे, स्वातन्त्र्य को, मानों सदा को, हम सुला कर ही रहे॥ जयचंद और पृथ्वीराज क्या थे यवन, पाते न प्रश्रय यदि अधम जयचंद्र से? जयशील पृथ्वीराज हारे अंत में छल-छंद से। हा! देश का दीपक बुझा, भीषण अँधेरा छा गया; निज कर्म्म के फल-भोग का वह काल आगे आ गया॥ क्या पा लिया जयचंद ने निज देश का हित हार के? है कह रहे कन्नौज के वे सौध-धुस्स पुकार के— जर्जर हुए भी आज तक हम इसलिए हैं जी रहे, अब भी सजग हो जाएँ वे विद्वेष-विष जो पी रहे॥रण-निमंत्रण
कौरव तथा पांडव परस्पर विजय की आशा किए,होने लगे जब प्रकट प्रस्तुत युद्ध करने के लिए।
उस समय निज-निज पक्ष के राजा बुलाने को वहाँ,
भेजे गए युग पक्ष से ही दक्ष दूत जहाँ-तहाँ॥
फिर शीघ्र ही श्रीकृष्ण को निज ओर करने युद्ध में,
देने उन्हें रण का निमंत्रण निज-विपक्ष-विरुद्ध में।
लेने तथा साहाय्य उनसे और सर्व-प्रकार का,
दैवात् सुयोधन और अर्जुन संग पहुँचे द्वारका॥
उस समय सुंदर सेज ऊपर सो रहे भगवान थे,
गंभीर नीरव शांत सुस्थिर सिंधुसम छविमान थे।
ओढ़े मनोहर पीतपट अति भव्य रूप निधान थे,
प्रत्यूष-आतप-सहित शुचि यमुना-सलिल-उपमान थे॥
मुकुलित विलोचन युग्म उनके इस प्रकार ललाम थे,
भीतर मधुप मूँदे हुए ज्यों सुप्त सरसिजल श्याम थे।
कच-गुच्छ मुखमंडल सहित यों सोहते अभिराम थे,
घेरे हुए ज्यों सूर्य को घन सघन शोभा धाम थे॥
नीलारविंद समान तनु की अति मनोहर कांति से,
शुचि हार-मुक्ता दीखते थे नीलमणि ज्यों भ्रांति से।
थे चिह्न कंधों में विविध यों कुंडलों के सोहते,
मन्मथ-लिखित मानो वशीकर मंत्र थे मन मोहते॥
नि:श्वास नैसर्गिक सुरभि यों फैल उनकी थी रही,
ज्यों सुकृति-कीर्ति गुणी जनों की फैलती है लहलही।
सुकपोल करतल पर ललित यों दर्शनीय विशेष था,
मृदु-नवल-पल्लव-सेज पर ज्यों पड़ा नक्षत्रेश था॥
शय्या-वसन-संघर्ष से जो हो रहे अति क्षीण थे,
उन अंगरागों से रुचिर यों अंग उनके पीन थे।
ज्यों शरद ऋतु में धवल घन के विरल खंडों से सदा,
होती सुनिर्मल नील नभ की छवि-छटा मोद प्रदा॥
था शयन-पाटांबर अरुण, झालर लगी जिसमें हरी;
उस पर तनिक तिरछे पड़े थे पीतपट ओढ़े हरी।
वह दिव्य शोभा देख करके ज्ञात होता था यही—
मानों पुरंदर-चाप सुंदर कर रहा शोभित मही॥
ऐसे समय में शीघ्रता से पहुँच दुर्योधन वहाँ,
श्रीकृष्ण के सिर ओर बैठा रुचिर आसन था जहाँ।
कुछ देर पीछे फिर वहाँ आकर बिना ही कुछ कहे,
हरि के पदों की ओर अर्जुन नम्रता से स्थित रहे॥
उस काल उन दोनों सहित शोभित हुए अति विष्णु यों,
कंदर्प और वसंत-सेवित सो रहे हों जिष्णु ज्यों।
फिर एक दूजे को परस्पर तुच्छ मन में लेखते,
हरि जागरण की बाट दोनों रहे ज्यों-त्यों देखते॥
उस समय दोनों के हृदय में भाव बहु उठने लगे,
पर कह सके कुछ भी न वे जब तक न पुरुषोत्तम जगे।
दो ओर से आते हुए युग जल-प्रवाह बहे-बहे,
मानो मनोरम शैल से हों बीच ही मैं रुक रहे॥
कुछ देर में जब भक्तवत्सल देवकीनंदन जगे,
तब देख अर्जुन को प्रथम बोले वचन प्रियता-पगे।
है कुशल तो सब भाँति भारत! आज भूल पड़े कहाँ?
जो कार्य मेरे योग्य हो प्रस्तुत सदा मैं हूँ यहाँ॥
कहते हुए यों सेज पर निज पूर्व तनु के भाग से,
पर्यंक-तकिए के सहारे बैठ कर अनुराग से।
सब जान कर भी पार्थ को निज वचन कहने के लिए,
दृग-कमल उनकी ओर हरि ने मुदित हो प्रेरित किए॥
तब देख उनकी ओर हँस कर कुछ विचित्र विनोद से,
निज सिर झुकाते हुए उनको नम्र होकर मोद से।
करते हुए कुरुनाथ का मुख-तेज निष्प्रभ-सा तथा,
यों कह सुनाई पार्थ ने संक्षेप में अपनी कथा—॥
“होते सुलभ सुख-भोग जिससे भागते भव-रोग हैं,
सो कृपा जिन पर आपकी सकुशल सदा हम लोग हैं।
संप्रति समर-साहाय्य-हित, कर विनय, सुख पाकर महा,
मैं हुआ देने ‘रण-निमंत्रण’ प्राप्त सेवा में यहाँ॥”
कर्तव्य ही कुरुनाथ अपना सोचता जब तक रहा,
कर लिया तब पार्थ ने यों कार्य निज ऊपर कहा।
यह शीघ्र घटना देख कर अति चकित-सा वह रह गया,
सब गर्व उसका उस समय नैराश्य-नद में बह गया॥
धिक्कार तब देता हुआ वह प्रथम आने के लिए,
मन के विकारों को किसी विध रोक कर अपने हिए।
श्रीकृष्ण से मिल कर तथा पाकर उचित सत्कार को,
कहने लगा इस भाँति उनसे त्याग सोच-विचार को॥
“आया प्रथम गोविंद! हूँ मैं आपके शुभ धाम में,
अतएव मुझको दीजिए साहाय्य इस संग्राम में।
मैं और अर्जुन आपको दोनों सदैव समान हैं,
पर प्रथम आए को अधिकतर मानते मतिमान हैं।”
श्रीकृष्ण बोले —“कहे तुमने उचित वचन विवेक से,
तुम और पांडव हैं हमें दोनों सदा ही एक से।
तब प्रथम आने के वचन भी सब प्रकार यथार्थ हैं,
पर प्रथम दृग्गोचर हुए मुझको यहाँ पर पार्थ हैं॥
जो हो, करूँगा युद्ध मैं साहाय्य दोनों ओर मैं,
पालन करूँगा यह किसी विध आत्मकर्म कठोर मैं।
दस कोटि निज सेना करूँगा एक ओर सशस्त्र मैं,
केवल अकेला ही रहूँगा एक ओर निरस्त्र मैं॥
दो भाग निज साहाय्य के इस भाँति हैं मैंने किए,
स्वीकार तुम दोनों करो, हो जो जिसे रुचिकर हिए।
रण-खेत में निज ओर से सेना लड़ेगी सब कहीं,
पर युद्ध की है बात क्या, मैं शस्त्र भी लूँगा नहीं॥”
सुन कर वचन यों पार्थ ने स्वीकार श्रीहरि को किया,
कुरुनाथ ने नारायणी दश कोटि सेना को लिया।
तब पार्थ से हँस कर वचन कहने लगे भगवान यों—
“स्वीकृत मुझे तुमने किया है त्याग सैन्य महान क्यों?”
गंभीर होकर पार्थ ने तब यह उचित उत्तर दिया—
“था चाहिए करना मुझे जो, है वही मैंने किया।
है सैन्य क्या, मुझको जगत भी तुम बिना स्वीकृत नहीं,
श्रीकृष्ण रहते हैं जहाँ सब सिद्धियाँ रहती वहीं॥”
भारत-भारती / वर्तमान खंड / अविद्या
ये सब अ-शिक्षा के कुफल हैं, वास है जिसका यहाँ;अध्यात्म विद्या का भवन हा! आज वह भारत कहाँ?
धिक्कार है, हम खो चुके हैं आज अपना ज्ञान भी;
खोकर सभी कुछ अंत में खोया महाधन मान्य भी!
हा! सैकड़े पीछे यहाँ दस भी सुशिक्षित जन नहीं!
हाँ, चाह कुलियों की कहीं हो, तो मिलेंगे सब कहीं!!
हतभाग्य भारत! जो कभी गुरुभाव से पूजित रही—
करती भुवन में भृत्यता संतान अब तेरी वही!!!
छाई अविद्या की निशा है, हम निशाचर बन रहे;
हा! आज ज्ञानाऽभाव से वीभत्स रस में सन रहे!
हे राम! इस ऋषि भूमि का उद्धार क्या होगा नहीं?
हम पर कृपा कर आपका अवतार क्या होगा नहीं?
विद्या बिना अब देख लो, हम दुर्गुणों के दास हैं;
हैं तो मनुज हम, किंतु रहते दनुजता के पास हैं।
दाएँ तथा बाएँ सदा सहचर हमारे चार हैं—
अविचार, अँधाचार हैं, व्यभिचार, अत्याचार हैं!
हा! गाढ़तर तमसावरण से आज हम आच्छन्न हैं,
ऐसे विपन्न हुए कि अब सब भाँति मरणासन्न हैं!
हम ठोकरें खाते हुए भी होश में आते नहीं,
जड़ हो गए ऐसे कि कुछ भी जोश में आते नहीं!
भारत-भारती / वर्तमान खंड / कृषि और कृषक
अब पूर्व की-सी अन्न की होती नहीं उत्पत्ति है,पर क्या इसी से अब हमारी घट रही संपत्ति है?
यदि अन्य देशों को यहाँ से अन्न जाना बंद हो—
तो देश फिर संपन्न हो, क्रंदन रुके, आनंद हो॥
वह उर्वरापन भूमि का कम हो गया है, क्यों न हो?
होता नहीं कुछ यत्न उसका, यत्न कैसे हो, कहो?
करते नहीं कृषक परिश्रम, और वे कैसे करें?
कर-वृद्धि है जब साथ तब क्यों वे वृथा श्रम कर मरें?
सौ में पचासी जन यहाँ निर्वाह कृषि पर कर रहे,
पाकर करोड़ों अर्द्धभोजन सर्द आहें भर रहे।
जब पेट की ही पड़ रही फिर और की क्या बात है;
'होती नहीं है भक्ति भूखे' उक्ति यह विख्यात है॥
कृषि-कर्म को उत्कर्षता सर्वत्र विश्रुत है सही,
पर देख अपने कृषकों को चित्त में आता यही—
हा दैव! क्या जीते हुए आजन्म मरना था उन्हें?
भिक्षुक बनाते पर विधे! कर्षक न करना था उन्हें॥
कृषि में अपेक्षा वृष्टि की रहती हमें अब है सदा,
होता जहाँ वैषम्य उसमें क्या कहें फिर आपदा।
रहता अवर्षण से हो! अब जो हमारा हाल है,
दृष्टांत उसका इन दिनों गुजरात का दुष्काल है॥
था एक ऐसा भी समय पड़ता अकाल न था यहाँ,
हो या न हो वर्षा जलाशय थे यथेष्ट जहाँ-तहाँ।
भारत पढ़ो, देवर्षि ने है क्या युधिष्ठिर से कहा—
“कृषि-कार्य वर्षा की अपेक्षा के बिना तो हो रहा?
केवल अवर्षण ही नहीं, अतिवृष्टि का भी कष्ट है;
बढ़ कर प्रलय-सम प्रबल जल सर्वस्व करता नष्ट है;
“दैवोऽपि दुर्बलघातकः” अथवा अभाग्य कहें इसे?
किंवा कहो, निज कर्म का मिलता नहीं है फल किसे?
अब ऋतु-विपर्यय तो यहाँ आवास ही-सा है किए,
होती प्रकृति में भी विकृति हा! भाग्यहीनों के लिए।
हेमंत में बहुधा घनों से पूर्ण रहता व्योम है,
पावस-निशाओं में तथा हँसता शरद का सोम है!
हो जाए अच्छी भी फसल पर लाभ कृषकों को कहाँ?
खाते, खवाई, बीज-ऋण से हैं रँगे रखे यहाँ।
आता महाजन के यहाँ वह अन्न सारा अंत में,
अधपेट रह कर फिर उन्हें है काँपना हेमंत में!
पानी बना कर रक्त का, कृषि कृषक करते हैं यहाँ,
फिर भी अभागे भूख से दिन-रात मरते हैं यहाँ।
सब बेचना पड़ता उन्हें निज अन्न वह निरुपाय है,
बस चार पैसे से अधिक पड़ती न दैनिक आय है!
जब अन्य देशों के कृषक संपत्ति में भरपूर हैं—
लाते कि जिनसे आठ रुपया रोज़ के मजदूर हैं।
तब चार पैसे रोज़ ही पाते यहाँ कर्षक अहो!
कैसे चले संसार उनका, किस तरह निर्वाह हो?
बीता नहीं बहु काल उस औरंगजेबी को अभी,
करके स्मरण जिसका कि हिंदू काँप उठते हैं सभी;
उस दुःसमय का चावलों का आठ मन का भाव है,
पर आठ सेर नहीं रहा अब, क्या अपूर्व अभाव है॥
होती नहीं है कृषि यहाँ पूरी तरह से अब कभी,
यद्यपि शुभाशा चित्त में होती हमें है जब कभी।
पाला कहीं, ओले कहीं, लगता कहीं कुछ रोग है,
पहले शुभाशा, फिर निराशा, दैव! कैसा योग है?
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा-सा जल रहा,
चल रहा सनसन पवन, तन से पसीना ढल रहा!
देखो, कृषक शोणित सुखा कर हल तथापि चला रहे,
किस लोभ से इस आँच में वे निज शरीर जला रहे!
मध्याह्न है, उनकी स्त्रियाँ ले रोटियाँ पहुँची वहीं,
हैं रोटियाँ रूखी, खबर है शाक की हमको नहीं!
संतोष से खाकर उन्हें वे, काम में फिर लग गए,
भर पेट भोजन पा गए तो भाग्य मानों जग गए!॥
उन कृषक-बंधुओं की दशा पर नित्य रोती है दया,
हिम, ताप, वृष्टि-सहिष्णु जिनका रंग काला पड़ गया!
नारी-सुलभ सुकुमारता उनमें नहीं है नाम को,
वे कर्कशानी क्यों न हों, देखो न उनके काम को!!
गोबर उठातीं, थापती हैं, भोगतीं, आयास वे,
कृषि काटतीं, लेतीं परोहे, खोदती हैं घास वे!
गृहकार्य जितने और हैं करतीं वही संपन्न हैं,
तो भी कदाचित् ही कभी भर पेट पाती अन्न हैं॥
कुछ रात रहते जाग कर चक्की चलाने बैठतीं,
हम सच कहेंगे, उस समय वे गीत गाने बैठतीं!
पर क्या कहें, उस गीत से क्या लाभ पाने बैठतीं,
वे सुख बुलाने बैठतीं, या दुख भुलाने बैठतीं!!
घनघोर वर्षा हो रही है, गगन गर्जन कर रहा,
घर से निकलने को कड़क कर वज्र वर्जन कर रहा!
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं,
किस लोभ से वे आज भी लेते नहीं विश्राम हैं?
बाहर निकलना मौत है, आँधी अँधेरी रात है,
आ:शीत कैसा पड़ रहा है, थरथराता गात है!
तो भी कृषक ईंधन जलाकर खेत पर हैं जागते,
वह लाभ कैसा है न जिसका लोभ अब भी त्यागते॥
यह अन्न तो लेंगे विदेशी, लाभ क्या उनको कहो?
मिलता उन्हें जो अर्द्धभोजन विघ्न उसमें भी न हो!
कहते इसी से हैं कि क्या आजन्म मरना था उन्हें!
भिक्षुक बनाते पर विधे! कर्षक न करना था उन्हें!
हैं वे सभ्य तथा अशिक्षित, भाव उनके भ्रष्ट हैं;
दुख-भार से सुविचार मानों हो गए सब नष्ट हैं!
अपनी समुन्नति के उन्हें कुछ भी उपाय न सूझते,
अपना हिताहित भी न कुछ वे हैं समझते चूकते!!
सज्ञान कैसे हों, उन्हें संयोग ही मिलता नहीं,
विख्यात कमलालय कमल भी दिन बिना खिलता नहीं!
है पेट से ही पेट की पड़ती उन्हें, वे क्या करें!
वे ग्वाल हो जीते रहें या छात्र बन भूखों मरें?
संप्रति कहाँ क्या हो रहा है, कुछ न उसको ज्ञान है,
है वायु कैसा चल रहा, इसका न कुछ भी ध्यान है!
मानों भुवन से भिन्न उनका दूसरा ही लोक है,
शशि-सूर्य हैं, फिर भी कहीं उसमें नहीं आलोक है!
भर पेट भोजन ही चरम सुख वे अकिंचन मानते,
पर साथ ही दुर्भाग्यवश दुर्लभ उसे हैं जानते!
दिन दुःख के हैं भर रहे करते हुए संतोष वे,
लाचार हैं, निज भाग्य को ही दे रहे हैं दोष वे॥
उनको निरंतर दुःख ने अब कर दिया यों दीन है—
सुख-कल्पना तक से हुआ उनका हृदय अब हीन है!
आलोक का अनुभव कभी जन्मांध कर सकते नहीं,
मरु-जंतु सहसा सुरसरी का ध्यान धर सकते नहीं॥
ग्रामीण गीत यदा कदा ये गान करते हैं सही,
है फाग उनका राग बहुधा और उत्सव भी वही।
पर चित्त को वे दीन जन किस भाँति बहलाया करें?
क्या आँसुओं से ही उसे वे नित्य नहलाया करें?॥
तुम सभ्य हो,'मार्केट' जिनका सात सागर पार है,
पर ग्राम की वह हाट ही उनका 'बड़ा बाजार' है।
तुम हो विदेशों से मँगाते माल लाखों का यहाँ,
पर वे अकिंचन नमक-गुड़ ही मोल लेते हैं वहाँ॥
करते सहर्ष प्रदर्शिनी की सैर तुम कौतुक भरी,
(क्या लाभ उससे ही उठाते, बात है, यह दूसरी।)
वे हो सका तो ग्राम्य-मेले देख कर ही धन्य हैं,
मनिहार की दूकान से जिनमें सुदृश्य न अन्य हैं॥
तुम दार्शनिक हो ईश का अस्तित्व सत्य न मानते;
हैं भूत-प्रेतों से अधिक वे भी न उसको जानते।
हा देव! इस ऋषि भूमि का यह आज कैसा हाल है!
तू काल! सचमुच काल ही है, क्रूर और कराल है॥
पाठक! न यह कह बैठना, छेड़ा कहाँ का राग है,
यह फूल कैसा है कि इसमें गंध है, न पराग है?
है यह कथा नीरस तदपि इसमें हमारा भाग है,
निकले बिना बाहर नहीं रहती हृदय की आग है॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / मंदिर और महंत
कैसी भयंकर अब हमारी तीर्थ यात्रा हो रही,उन मंदिरों में ही विकृति की पूर्ण मात्रा हो रही!
अड्डे-अखाड़े बन रहे हैं ईश के आवास भी,
आती नहीं है लोक-लज्जा अब हमारे पास भी॥
हा! पुण्य के भांडार में हैं भर रहीं अघ-राशियाँ,
हैं देव आप महंतजी ही, देवियाँ हैं दासियाँ!
तन, मन तथा धन भक्तजन अर्पण किया करते जहाँ—
वे भंड साधु सुकर्म का तर्पण किया करते वहाँ!!
अब मंदिरों में रामजनियों के बिना चलता नहीं,
अश्लील गीतों के बिना वह भक्ति-फल फलता नहीं।
वे चीरहरणादिक वहाँ प्रत्यक्ष लीला-जाल हैं,
भक्त-स्त्रियाँ हैं गोपियाँ, गोस्वामि ही गोपाल हैं!!!
भारत-भारती / वर्तमान खंड / दुर्भिक्ष
दुर्भिक्ष मानों देह धर के घूमता सब ओर है,हा! अन्न! हा! हा! अन्न का रव गूँजता घनघोर है!
सब विश्व में सौ वर्ष में, रण में भरे जितने हरे!
जन चौगुने उनसे यहाँ दस वर्ष में भूखों मरे॥
उड़ते प्रभंजन से यथा तप-मध्य सूखे पत्र हैं,
लाखों यहाँ भूखे भिखारी घूमते सर्वत्र हैं!
है एक चिथड़ा ही कमर में और खप्पर हाथ में,
नंगे तथा रोते हुए बालक विकल हैं साथ में॥
आवास या विश्राम उनका एक तरुतल मात्र है,
बहु कष्ट सहने से सदा काला तथा कृश गात्र है!
हेमंत उनको है कँपाता, तप तपाता है तथा,
है झेलनी पड़ती उन्हें सिर पर विषम वर्षा-व्यथा!
वह पेट उनका पीठ से मिल कर हुआ क्या एक है?
मानों निकलने को परस्पर हड्डियों में टेक है!
निकले हुए हैं दाँत बाहर, नेत्र भीतर हैं धँसे;
किन शुष्क आतों में न जाने प्राण उनके हैं फँसे!
अविराम आँखों से बरसता आँसुओं का मेह है,
है लटपटाती चाल उनकी, छटपटाती देह है!
गिर कर कभी उठते यहाँ, उठ कर कभी गिरते वहाँ;
घायल हुए से घूमते हैं वे अनाथ जहाँ-तहाँ॥
हैं एक मुट्ठी अन्न को वे द्वार-द्वार पुकारते,
कहते हुए कातर वचन सब ओर हाथ पसारते—
दाता! तुम्हारी जय रहे, हमको दया कर दीजियो,
माता! मरे, हा! हा! हमारी शीघ्र ही सुध लीजियो”
कृमि, कीट, खग, मृग आदि भी भूखे नहीं सोते कभी,
पर वे भिखारी स्वप्न में भी भूख से रोते सभी!
वे सुप्त हैं या मृत कि मूर्च्छित, कुछ समझ पड़ता नहीं;
मूर्च्छा कि मृत्यु अवश्य है, यह नींद की जड़ता नहीं!
है काँखता कोई कहीं, कोई कहीं रोता पड़ा;
कोई विलाप प्रलाप करता, ताप है कैसा कड़ा।
हैं मृत्यु-रमणी पर प्रणयि-सम वे अभागे मर रहे,
जब से बुभुक्षा कुट्टनी ने उस प्रिया के गुण कहे!॥
नारी-जनों की दुर्दशा हमसे कहीं जाती नहीं,
लज्जा बचाने को अहो! जो वस्त्र भी पाती नहीं।
जननी पड़ी है और शिशु उसके हृदय पर मुख धरे,
देखा गया है, किंतु वे माँ-पुत्र दोनों हैं मरे!
जो कुलवती हैं भीख भी वे माँग सकती हैं नहीं,
मर जायँ चाहे किंतु झोली टाँग सकती हैं नहीं।
संतान ने आकर कहा—'माँ! रात तो होने लगी,
भूखे रहा जाता नहीं माँ?' हाय! माँ रोने लगी॥
है खोलती सरकार यद्यपि काम शीघ्र अकाल के,
होती सभाएँ, और खुलते सत्र आटे-दाल के।
पूरा नहीं पड़ता तदपि, वह त्राहि कम होती नहीं;
कैसी विषमता है कि कुछ भी हाय! सम होती नहीं॥
प्रायः सदा दुर्भिक्ष ऐसा है बना रहता जहाँ,
आश्चर्य क्या यदि फिर निरंतर नीचता फैले वहाँ।
करता नहीं क्या पाप भूखा! पेट! हो तेरा बुरा,
है! छोड़ती सुत तक नहीं उरगी क्षुधा से आतुरा!
शासक यहाँ जो दोषियों को साँकलों से कस रहे,
जो अंडमान समान टापू है यहाँ से बस रहे।
फिर भी दिनोंदिन बढ़ रहा जो घोर घटना-जाल है,
है हेतु इसका और क्या, दुर्भिक्ष या दुष्काल है॥
कुल, जाति-पाँति न चाहिए, यह सब रहे या जाए रे;
बस एक मुट्ठी अन्न हमको चाहिए अब हाय रे!
इस पेट पापी के लिए ही हम विधर्मी बन रहे,
निज धर्म-मानस से निकल अघ-पंक में हैं सन रहे॥
जिन दूर देशों में हमारे धर्म के झंडे उड़े-
आकर स्वयं जिनके तले दिन-दिन वहाँ के जन जुड़े।
तजना पड़े हमको वहीं के धर्म पर निज धर्म को!
हा! देखती है क्या बुभुक्षा-राक्षसी दुष्कर्म को!
हे धर्म्म और स्वदेश! तुमको बार-बार प्रणाम है,
हा! हम अभागों का हुआ क्या आज यह परिणाम है!
हमको क्षमा करियो, क्षुधा-वश हम तुम्हें हैं खो रहे,
होकर विधर्मी हाय! अब हम हैं विदेशी हो रहे॥
आनंद-नद में मग्न थे जिस देश के वासी सभी,
सुर भी तरसते थे जहाँ पर जन्म लेने को कभी।
हा! आज उसकी यह दशा, संताप छाया सब कहीं,
सुर क्या, असुर भी अब यहाँ का जन्म चाहेंगे नहीं॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / दारिद्रय
रहता प्रयोजन से प्रचुर पूरित जहाँ धन-धान्य था,जो 'स्वर्ण-भारत' नाम से संसार में सम्मान्य था!
दारिद्र्य दुर्द्धर अब वहाँ करता निरंतर नृत्य है,
आजीविका अवलंब बहुधा भृत्य का ही कृत्य है!!
देखो जिधर अब बस उधर ही है उदासी छा रही,
काली निराशा की निशा सब ओर से है आ रही।
चिंता-तरंगें चित्त को बेचैन रखती हैं सदा,
अब नित्य ही आती यहाँ पर एक नूतन आपदा॥
भारत-भारती / अतीत खंड / राजत्व और शासन
हम भूप होकर भी कभी होते न भोगाऽसक्त थे,रह कर विरक्त विदेह जैसे आत्मयोगासक्त थे।
कर्तव्य के अनुरोध से ही कार्य करते थे सभी,
राजत्व में भी फिर भला हम भूल सकते थे कभी?
हाँ मेदिनी-पति भी यहाँ के भक्त और विरक्त थे,
होते प्रजा के अर्थ ही वे राज्यकार्य्यासक्त थे।
सुत-तुल्य ही वे सौम्य उसको मानते थे सर्वदा,
होता प्रजा का अर्थ ही 'संतान' संस्कृत में सदा॥
देते प्रजाहित ही बढ़ा कर प्राप्त-कर वे सर्वथा,
ले भूमि से जल रवि उसे देता सहस्र गुना यथा।
बन कर नृत-स्थानीय भी हरते प्रजा का सोच थे,
करते तदर्थ न पुत्र के भी त्याग में संकोच थे॥
हैं मद्यपी कायर न मेरे राज्य में तस्कर कहीं,
व्यभिचारिणी तो फिर कहाँ जब एक व्यभिचारी नहीं।
यों सत्यवादी नृप बिना संकोच कहते थे यहाँ,
कोई बता दे विश्व में शासक हुए ऐसे कहाँ?
भारत-भारती / वर्तमान खंड / गो-वध
है कृषि प्रधान प्रसिद्ध भारत और कृषि की यह दशा!होकर रसा यह नीरसा अब हो गई है कर्कशा।
अच्छी उपज होती नहीं है, भूमि बहु परती पड़ी;
गोवंश का वध ही यहाँ है याद आता हर घड़ी!
यूरोप में कल के हलों से काम होता है सही,
जुत क्यों न जाती हो अरब में ऊँट के हल से मही।
गो-वंश पर ही किंतु है यह देश अवलंबित सदा,
पर दीन भारत! हाय तेरे भाग्य में है क्या बदा!॥
है भूमि बंध्या हो रही, वृष-जाति दिन-दिन घट रही;
घी-दूध दुर्लभ हो रहा, बल-वीर्य की जड़ कट रही।
गो-वंश के उपकार की सब ओर आज पुकार है;
तो भी यहाँ उसका निरंतर हो रहा संहार है!
वह भी समय था एक जो अब स्वप्न जा सकता कहा,
घी तीस सेर विशुद्ध रुपए में हमें मिलता रहा।
देहात में भी सेर भर से अधिक मिलता नहीं!
दुर्बल हुए हम आज यों-तनुभार भी मिलता नहीं॥
दाँतों तले तृण दाबकर हैं दीन गायें कह रहीं—
हम पशु तथा तुम हो मनुज, पर योग्य क्या तुमको यही?
हमने तुम्हें माँ की तरह है दूध पीने को दिया,
देकर कसाई को हमें तुमने हमारा वध किया!
जो जन हमारे मांस से निज देह पुष्टि विचार के—
उदरस्थ हमको कर रहे हैं, क्रूरता से मार के।
मालूम होता है सदा, धारे रहेंगे देह वे—
या साथ ही ले जाएँगे उसको बिना संदेह वे!
हा! दूध पीकर भी हमारा पुष्ट होते हो नहीं,
दधि, घृत तथा तक्रादि से भी तुष्ट होते हो नहीं।
तुम खून पीना चाहते हो, तो यथेष्ट वही सही;
नर-योनि हो, तुम धन्य हो, तुम जो करो थोड़ा वही!
क्या वश हमारा है भला, हम दीन हैं, बलहीन हैं;
मारो कि पालो, कुछ करो तुम, हम सदैव अधीन हैं।
प्रभु के यहाँ से भी कदाचित् आज हम असहाय हैं,
इससे अधिक क्या कहें, हा! हम तुम्हारी गाय हैं॥
बच्चे हमारे भूख से रहते समक्ष धीर हैं,
करके न उनका सोच कुछ देती तुम्हें हम क्षीर हैं।
चर कर विपिन में घास फिर आती तुम्हारे पास हैं,
होकर बड़े वे वत्स भी बनते तुम्हारे दास हैं॥
“जारी रहा क्रम यदि यहाँ यों ही हमारे नाश का—
तो अस्त समझो सूर्य भारत-भाग्य के आकाश का।
जो तनिक हरयाली रही वह भी न रहने पाएगी,
यह स्वर्ण-भारत-भूमि बस मरघट-मही बन जाएगी!
बहुधा हमारे हेतु ही विग्रह यहाँ होता खड़ा;
सहवासियों में बैर का जो बीज बोता है बड़ा।
जो हे मुसलमानो! हमें कुर्बान करना धर्म है—
तो देश की यों हानि करना क्या नहीं दुष्कर्म है?
बीती अनेक शताब्दियाँ जिस देश में रहते तुम्हें,
क्या लाज आवेगी उसे अपना 'वतन' कहते तुम्हें?
तुम लोग भारत को कभी समझो अरब से कम नहीं,
यद्यपि जगत में और कोई देश इसके सम नहीं॥
जिस देश के वर-वायु से सकुटुंब तुम हो जी रहे,
मिष्ठान जिसका खा रहे, पीयूष-सा जल पी रहे।
जो अंत में तनु को तुम्हारे ठौर देगा गोद में,
कर्तव्य क्या तुमको नहीं रखना उसे आमोद में॥
जिसमें बुजुर्गों के तुम्हारे हैं शरीर मिले हुए,
जिसने उगाए हैं वहाँ छायार्थ वृक्ष खिले हुए।
क्या मान्य 'मरारिव' की तरह तुमको न होगी वह धरा?
अजमेर की दरगाह का कर ध्यान सोचो तो ज़रा॥
हिंदू हमें जब पालते हैं धर्म अपना मान के,
रक्षा करो तब तुम हमारी देश-हित ही जान के।
यदि तुम कहो—अब हम कलों से काम ले लेंगे सभी,
तो पूछती हैं हम कि क्या वे दूध भी देंगी कभी?
हिंदू तथा तुम सब चढ़े हो एक नौका पर यहाँ,
जो एक का होगा हित तो दूसरे का हित कहाँ?
सप्रेम हिल-मिल कर चलो, यात्रा सुखद होगी तभी;
पीछे हुआ सो हो गया, अब सामने देखो सभी॥
हा! शोचनीय किसे नहीं गो वंश का यह ह्रास है?
इस पाप से ही बढ़ रहा क्या यह हमारा त्रास है!
घृत और दुग्धाभाव से दुर्बल हुए हम रो रहे,
होकर अशक्त, अकाल में ही काल-कवलित हो रहे॥
जो नित्य नूतन व्याधियाँ करती यहाँ आखेट हैं,
क्या दीन-दुर्बल ही अधिक होते न उनकी भेट हैं?
'देवोऽपि दुर्बलघातकः' फिर याद आता है यहाँ,
'छिद्रोष्वनर्था' वाक्य पर भी ध्यान जाता है यहाँ॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / संगीत
हैं पंडितों की राय यह—संगीत भी साहित्य है,श्रुति-मार्ग से मन को सुधा-रस वह पिलाता नित्य है।
विष किंतु उसमें भी यहाँ हमने मिला कर रख दिया,
हतभाग्य घुल-घुल कर मरा जिसने कि यह रस चख लिया॥
जो मंजु मानस में तरंगें था उठाता भक्ति की—
अब आग भड़काता वही संगीत विषयासक्ति की!
हमने बने को भी बिगाड़ा, याद रखना है इसे,
लो, रम्य रस में विष मिलाना और कहते हैं किसे?
संगीत में जब से मदन की मूर्ति अंकित हो गई,
वह भावुकों की भक्तिवाणी भी कलंकित हो गई!
करते प्रकट थे हाय! वे जिससे अनन्योपासना,
बढ़ने लगी देखो, उसी से अब विषय की वासना!
गिर जाए कुछ गंगांबु भी अस्पृश्य नाली में कभी,
तो फिर उसे अपवित्र ही बतलाएँगे निश्चय सभी।
यों भक्तिरस भी सन गया अश्लीलता के नील में,
गुड़ भी बनेगा नमक यदि पड़ जाए साँभर झील में॥
कविता तथा संगीत ने हमको गिराया और भी,
सच पूछिए तो अब कहीं हमको नहीं है ठौर भी।
हा! जो कलाएँ थीं कभी अत्युच्च भावोद्गारिणी,
विपरीतता देखो कि अब वे हैं अधोगतिकारिणी!
भारत-भारती / अतीत खंड / हिंदू
इस काल में भी हिंदुओं में धीरता कुछ शेष थी, निज पूर्वजों की वीरता, गंभीरता कुछ शेष थी। फैली विशेष विलासिता थी किंतु थी कुछ भक्ति भी, हम घट चले थे किंतु फिर भी शेष थी कुछ शक्ति भी॥ विक्रमादित्य विक्रम कि जिनका आज भी संवत् यहाँ है चल रहा— ध्रुव-धर्म को ऐसे नृपों का उस समय भी बल रहा। जिनसे अनेकों देश-हितकर पुण्यकार्य किए गए; जो शक यहाँ शासक बने थे सब निकाल दिए गए॥ नर-रूप-रत्नों से सजी थी वीर विक्रम की सभा, अब भी जगत में जागती है जगमगी जिनकी प्रभा। जाकर सुनो, उज्जैन मानों आज भी यह कह रही— मैं मिट गई, पर कीर्ति मेंरी तब मिटेगी जब मही॥ भोज विद्यानुरागी भोज भी कैसा सदाशय भूप था— विख्यात कवियों के लिए जो कल्पवृक्ष-स्वरूप था। साहित्य के उद्यान में वह पुण्यकाल बसंत है, वे-वे प्रसून खिले कि अब भी सुरभि-पूर्ण दिगंत है॥भारत-भारती / अतीत खंड / बौद्ध काल
भारत-गगन में उस समय फिर एक वह झंडा उड़ा—जिसके तले, आनंद से, आधा जगत आकर जुड़ा।
वह बौद्धकालिक सभ्यता है विश्व भर में छा रही,
अब भी जिसे अवलोकने को भूमि खोदी जा रही!
वर्णन विदेशी यात्रियों ने उस समय का जो दिया,
पढ़कर तथा सुनकर उसे किसने नहीं विस्मय किया?
बनते न विद्या प्राप्त कर ही वे यहाँ बुधवर्य्य थे—
श्री भी यहाँ की देख कर करते महा आश्चर्य थे॥
तब भी कला-कौशल यहाँ का था जगत के हित नया,
है फाहियान विलोक जिसको मुग्ध होकर कह गया—
यह काम देवों का किया है, मनुज कर सकते नहीं—
दृग देखकर जिसको कभी श्रम मान कर थकते नहीं!
था सार्वभौम अशोक का कैसा प्रताप बढ़ा-चढ़ा,
विस्तार जिसके राज्य का था अन्य देशों तक बढ़ा।
थे गुप्तवंशी नृप, न धर्म-द्वेष जिनको इष्ट था;
तात्पर्य, तब भी भूमि पर भारत बहुत उत्कृष्ट था॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / वैश्य
जो ईश के ऊरुज अत: जिन पर स्वदेश स्थिति रही,व्यापार, कृषि, गो-रूप में, दुहते रहे जो सब मही।
वे वैश्य भी अब पतित होकर नीच पद पाने लगे,
बनियें कहा कर वैश्य से 'बक्काल' कहलाने लगे!
वह लिपि, कि जिसमें 'सेठ' को 'सठ' ही लिखेंगे सब कहीं,
सीखी उन्होंने और उनकी हो चुकी शिक्षा वही!
हा! वेद के अधिकारियों में आज ऐसी मूढ़ता,
है शेष उनके 'गुप्त' पद में किन गुणों की गूढ़ता?
कौशल्य उनका यहाँ बस तोलने में रह गया,
उद्यम तथा साहस दिवाला खोलने में रह गया!
करने लगे हैं होड़ उनके वचन कच्चे सूत से,
करते दिवाली पर परीक्षा भाग्य की वे घृत से!
वाणिज्य या व्यवसाय का होता शऊर उन्हें कहीं,
तो देश का धन यों कभी जाता विदेशों को नहीं।
है अर्थ सट्टा-फाटका उनके निकट व्यापार का,
कुछ पार हैं देखो भला उनके महा अविचार का?
बस हाय पैसा! हाय पैसा!! कर रहे हैं वे सभी,
पर गुण बिना पैसा भला क्या प्राप्त होता है कभी?
सबसे गए बीते नहीं क्या आज वे हैं दीखते,
वे देख सुन कर भी सभी कुछ क्या कभी कुछ सीखते?
बस अब विदेशों से मँगा कर बेचते हैं माल वे,
मानों विदेशी वाणिजों के हैं यहाँ दल्लाल वे।
वेतन सदृश कुछ लाभ पर वे देश का धन खो रहे,
निद्रव्य कारीगर यहाँ के हैं उन्हीं को रो रहे॥
उनका द्विजत्व विनष्ट है, है किंतु उनको खेद क्या?
संस्कार-हीन जघन्यजों में और उनमें भेद क्या?
उपवीत पहने देख उनको धर्म-भाग्य सराहिए,
पर तालियों के बाँधने को रज्जु भी तो चाहिए!
चंदा किसी शुभ कार्य में दो चार सौ जो है दिया,
तो यज्ञ मानों विश्वजित ही है उन्होंने कर लिया!
बनवा चुके मंदिर, कुआँ या धर्मशाला जो कहीं,
हा स्वार्थ, तो उनके सदृश सुर भी सुयश भागी नहीं!!
औदार्य उनका दीखता है एक मात्र विवाह में,
वह जाए चाहे वित्त सारा नाच-रंग-प्रवाह में!
वे वृद्ध होकर भी पता रखते विषय की थाह का,
मरे भी जी उठें वे नाम सुन कर ब्याह का!
उद्योग-बल से देश का भांडार जो भरते रहे,
फिर यज्ञ आदि सुकर्म में जो व्यय उसे करते रहे।
वे आज अपने आप ही अपघात अपना कर रहे,
निज द्रव्य खोकर घोर अघ के घट निरंतर भर रहे॥
भारत-भारती / वर्तमान खंड / साधु-संत
वे भूरि संख्यक साधु जिनके पंथ-भेद अनंत है—अवधूत, यति, नागा, उदासी, संत और महंत हैं।
हा! वे गृहस्थों से अधिक हैं आज रागी दीखते,
अत्यल्प हो सच्चे विरागी और त्यागी दीखते॥
जो कामिनी-कांचन न छूटा फिर विराग रहा कहाँ?
पर चिह्न तो वैराग्य का अब है जटाओं में यहाँ!
भूखों मरे कि जटा रखा कर साधु कहलाने लगे,
चिमटा लिया,'भस्मी' रमाई, माँगने-खाने लगे!!
संख्या अनुद्योगी जनों की ही न उनसे बढ़ रही—
शुचि साधुता पर भी कुयश की कालिमा है चढ़ रही।
है भस्म-लेपन से कहीं मन की मलिनता छूटती?
हा! साधु-मर्यादा हमारी दिनों-दिन टूटती!
यदि ये हमारे साधु ही कर्तव्य अपना पालते—
तो देश का बेड़ा कभी का पार ये कर डालते।
पर हाय! इनमें ज्ञान तो बस राम का ही नाम है,
दम की चिलम में लौ उठाना मुख्य इनका काम है!
मैथिलीशरण गुप्त की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें