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मैथिलीशरण गुप्त के काव्य खंड भाग 4 : Maithilisharan Gupt Kavya Khand Part 4

मैथिलीशरण गुप्त को महात्मा गांधी ने 'राष्ट्रकवि' कहा था। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले बड़े कवि माने जाते हैं। 'भारत-भारती', 'साकेत', 'यशोधरा' और 'पंचवटी' उनकी अमर रचनाएँ हैं। 'नर हो, न निराश करो मन को' और 'मनुष्यता' जैसी कविताएँ आज भी हर जुबान पर हैं।

भारत-भारती / वर्तमान खंड / रईसों के सपूत

जब याद आती है बड़ों के उन सपूतों की कथा,
उनके सखा, संगी, विदुषक और दूतों की कथा।
तब निकल पड़ते हैं हृदय से वचन ऐसे दुख भरे—
होवें न ऐसे पुत्र चाहे हो कुल-क्षय हे हरे!
यों तो सभी का बीतता है बाल्यकाल विनोद में,
वे किंतु सोते-जागते रहते सदा हैं गोद में।
इस भाँति पल कर प्यार में जब वे सपूत बड़े हुए,
उत्पात उनके साथ ही घर में अनेक खड़े हुए!
श्रीमान शिक्षा दे उन्हें तो श्रीमती कहती वहीं—
“घेरो न लल्ला को हमारे, नौकरी करनी नहीं!”
शिक्षे! तुम्हारा नाश हो, तुम नौकरी के हित बनी;
लो मूर्खते! जीती रहो, रक्षक तुम्हारे हैं धनी॥
तीतर, लवे, मेंढ़े, पतंगे वे लड़ाते हैं कभी,
वे दूसरों के व्यर्थ झगड़े मोल लाते हैं कभी।
दस, बीस उनके दुर्व्यसन हों तो गिने भी जा सकें,
पथ या विपथ है कौन ऐसा वे न जिस पर आ सकें!
निकले कि फिर दस पाँच चिड़ियाँ मार लाना है उन्हें,
बंदूक ले, वन-जंतुओं पर बल दिखाना है उन्हें।
घातक! तुम्हारी तो सहज ही शाम को यह सैर है,
पर उन अभागों से कहो, किस जन्म का यह बैर है?
आया जहाँ यौवन उन्हें बस भूत मानों चढ़ गया,
जीवन सफल करणार्थ अब उनमें अपव्यय बढ़ गया!
सौंदर्य के शशि-लोक में सब ओर उनके चर उड़े,
गुंडे, 'पसीने की जगह लहू' बहाने को जुड़े॥
संगीत के मर्मज्ञ उनसे आज वे ही दीखते,
हैं आप भी उनमें बहुत गाना-बजाना सीखते।
यदि रंडियों के साथ वे ठेका लगाते हैं कभी—
तो क्या हुआ? अपनी प्रिया पर प्रेम रखते हैं सभी!
रहती उन्हीं के ठाठ की है धूम मेलों में सदा,
आगे मिलेंगे वे थियेटर और खेलों में सदा।
वे नाच-मुजरे और जलसे हैं उन्हीं से लग रहे,
हैं यार लोगों के उन्हीं से भाग्य जग में जग रहे॥
यों कुछ दिनों घर फूँक कौतुक देख कर नंगे हुए।
फिर क्या हुआ? 'सरकार' थे जो दीन भिखमंगे हुए,
हँसने लगा संसार उनको यार छोड़ गए सभी,
लुच्चे लफंगे भी किसी के मीत होते हैं कभी?
आशा भविष्यत् की हमारी क्या इन्हीं पर लग रही?
क्या पुन्नरक से अंत में हमको उबारेंगे यही?
बेड़ा इन्हीं से पार होगा क्या स्वदेश-समाज का?
होगा सु-दृढ़ फिर राज्य किसके हाथ से कलिराज का?

भारत-भारती / अतीत खंड / आत्माभिमान

निश्चय यवन राजत्व में ही हम पतित थे हो चुके, बल और वैभव आदि अपना थे सभी कुछ खो चुके। पर यह दिखाने का कि भारत पूर्व में ऐसा न था, आत्मावलंबी भी हुए कुछ लोग हममें सर्वथा॥ महाराणा प्रतापसिंह राजा प्रताप-समान तब भी शूरवीर यहाँ हुए, स्वाधीनता के भक्त ऐसे श्रेष्ठ और कहाँ हुए? सुख मान कर बरसों भयंकर सर्व दुःखों को सहा, पर व्रत न छोड़ा, शाह की बस तुर्क ही मुख से कहा॥ जौहर चित्तौर चंपक ही रहा यद्यपि यवन अलि हो गए, धर्मार्थ हल्दीघाट में कितने सुभट बलि हो गए! कुल-मान जब तक प्राण तब तक, यह नहीं तो वह नहीं, मेवाड़ भर में वक्तृताएँ गूँजती ऐसी रहीं॥ विख्यात वे जौहर यहाँ के आज भी हैं लोक में, हम मग्न हैं उन पद्मिनी-सी देवियों के शोक में! आर्य स्त्रियाँ निज धर्म पर मरती हुई डरती नहीं, साद्यन्त सर्व सतीत्व-शिक्षा विश्व में मिलती यहीं॥ शिवाजी फिर भी दिखाई देश में जिसने महाराष्ट्रच्छटा— दुर्दांत आलमगीर का भी गर्व जिससे था घटा। उस छत्रपति शिवराज का है नाम ही लेना अलम्, है सिंह-परिचय के लिए बस 'सिंह' कह लेना अलम्॥

भारत-भारती / अतीत खंड / विकास में ह्रास

पर ठीक वैसा ही हमारा यह प्रसिद्ध विकास है—
जैसा कि बुझने के प्रथम बढ़ता प्रदीप-प्रकाश है।
हो बौद्ध लक्ष्य-भ्रष्ट सहसा घोर नास्तिक ही रहे,
सँभले न फिर हम आर्य भी, इस भाँति विषयों में बहे!॥
यद्यपि सनातन धर्म्म की ही अंत में जय-जय रही,
भगवान शंकर ने भगा दी बौद्ध-भ्रांति भयावही।
पर हाय! हम चेते नहीं फँस कर कलह के जाल में,
क्या फूट की जड़ फैलती है फूट कर पाताल में!
बढ़ने लगा विग्रह परस्पर, क्रांतियाँ होने लगीं,
अनुदारता मय स्वार्थ के वश भ्रांतियाँ होने लगीं।
जिसमें हुआ कुछ बल वही अधिकार पर मरने लगा,
सौभाग्य भय खाकर भगा दुर्भाग्य जय पाकर जगा॥
बहु तुच्छ रजवाड़े बने, साम्राज्य सब कट छँट गया;
यों भूरि भागों में हमारा दीन भारत बँट गया!
जो एक अनुपम रत्न था परिणत कणों में हो गया,
वह मूल्य और प्रकाश सारा टूटते ही खो गया॥
आचार और विचार तक ही यह विभेद बढ़ा नहीं,
बहु भिन्न भाषाएँ हुई, फैली विषमता सब कहीं।
आलाप करना भी परस्पर क्लेश हमको हो गया,
निज देश में ही हा विधे! परदेश हमको हो गया॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / प्राचीन चिह्न

प्राचीनता के चिह्न भी क्या अब तुम्हारे रह गए?
खँडहर खड़े हैं कुछ सही, पर आज वे भी हैं नए।
सुनते यही हैं हाय! हम जा पहुँचते हैं जब वहाँ,
कोई हमें वे मत कहो, देखो न, अब हम वे कहाँ!”
उन मंदिरों के ढोर ऊँचे, आद्रि-रूप,उजाड़ हैं;
हाँ पूर्वजों की बैठकों पर दीखते अब झाड़ हैं,
वे झाड़ मर्मर-मिस पवन में भर रहे ये शब्द हैं—
“जो थे यहाँ उनको हुए बीते अनेकों अब्द हैं॥
जिन श्रेष्ठ सौधों में सुगायक श्रुति-सुधा थे घोलते,
निशि-मध्य टोलों पर उन्हीं के आज उल्लू बोलते!
सोते रहो हे हिंदुओं! हम मौज करते हैं यहाँ”,
प्राचीन चिह्न विनष्ट यां किस जाति के होंगे कहाँ?
श्रुति, शास्त्र और पुराण का होता जहाँ प्रिय-पाठ था,
सुंदर, सुखद, शुचि सत्त्व गुण का एक अद्भुत ठाठ था।
जंबुक अचानक अब वहाँ की शांति करते भंग हैं,
आकाश के बहु रंग-जैसे भूमि के भी ढंग हैं॥
आमोद बरसाती जहाँ थी यज्ञ-धूममयी घटा,
यश-तुल्य जिस आमोद की थी स्वर्ग में छाई छटा।
अब प्लेग जैसी व्याधियों की है वहाँ फली हवा,
चलती नहीं जिस पर धुरंधर डाक्टरों की भी दवा!

भारत-भारती / अतीत खंड / महाभारत

क्या देर लगती है बिगड़ते, जब बिगड़ने पर हुए?
फिर क्या परमशत्रु बंधु ही तैयार बनने पर हुए।
आखिर महाभारत-समर का साज सज ही तो गया,
डंका हमारे नाश का बेरोक बज ही तो गया!
हाँ सोचनीय, परंतु, ऐसा कलह भी होगा नहीं,
तू ही बता हे काल! ऐसा हाल देखा है कहीं?
हा! बंधुओं के ही करों से बंधु कितने कट मरे,
यह भव्य भारत अंत में बन ही गया मरघट हरे!
इस सर्वनाशी युद्ध का वह दृश्य कैसा घोर था,
उस ओर था यदि पुत्र तो लड़ता पिता इस ओर था!
संतान ही के रक्त में यह मातृभूमि सनी यहाँ,
उस स्वर्ग की-सी वाटिका की हाय! राख बनी यहाँ॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / स्त्रियाँ

होगी यहाँ तक कर्कशा क्या लेखनी! तू परवशा—
गृहदेवियों की जो हमारी लिख सके तू दुर्दशा?
किस भाँति देखोगे यहाँ, दर्शक! दृगों को मींच लो,
यह दृश्य है क्या देखने का, दृष्टि अपनी खींच लो॥
अनुकूल आद्याशक्ति को सुखदायिनी जो स्फूर्ति है,
सद्धर्म की जो मूर्ति और पवित्रता की पूर्ति है।
नर-जाति की जननी तथा शुभ शांति की स्त्रोतस्वती,
हा देव! नारी-जाति की कैसी यहाँ हैं दुर्गति!
होती रहीं गार्गी अनेकों और मैत्रेयी जहाँ,
अब है अविद्या-मूर्ति-सी कुल-नारियाँ होती वहाँ!
क्या दोष उनका किंतु जो उनमें गुणों की है कमीं?
हा! क्या करें वे जब कि उनको मूर्ख रखते हैं हमीं॥
बी.ए. गृहस्वामी विदित किंतु क्या है स्वामिनी?
कैसे कहें, हा! हैं अशिक्षारूपिणी वे भामिनी!
अत्युक्ति क्या, दिन-रात का-सा भेद जो इसको कहें;
दांपत्य-भाव भला हमारे धाम में कैसे रहें?
बहु कुशलता-सूचक कथाएँ जानती थीं जो कभी,
अब कलह-कुशला है हमारी गृहणियाँ प्राय: सभी।
हा! बन रहे हैं गृह हमारे विप्रहस्थल-से यहाँ,
दो नारियाँ भी हैं जहाँ वाग्बाण बरसेंगे वहाँ!
रखतीं यही गुण वे कि गंदे गीत गाना जानतीं,
कुल, शील, लज्जा उस समय कुछ भी नहीं वे मानतीं!
हँसते हुए हम भी अहो! वे गीत सुनते सब कहीं,
रोदन करो हे भाइयो! यह बात हँसने की नहीं!
है ध्यान पति से भी अधिक आभूषणों का अब उन्हें,
तब तुष्ट हों तो हों कि मढ़ दो मंडनों से जब उन्हें।
है यह उचित ही, क्योंकि जब ज्ञान से हैं दूषिता—
क्या फिर भला आभूषणों से भी न हों वे भूषिता?
अत्यल्प भी अपराध पर डंडे उन्हें हम मारते,
पर हेतु उनकी मूर्खता का सोचते न विचारते।
हैं हाय! दोषी तो स्वयं देते उन्हें हम दंड हैं,
आश्चर्य क्या फिर पा रहे जो दुःख आज अखंड हैं॥
ऐसी उपेक्षा नारियों की जब स्वयं हम कर रहे,
अपना किया अपराध उनके शीश पर हैं धर रहे।
भागे न क्यों हमसे भला फिर दूर सारी सिद्धियाँ,
पातीं स्त्रियाँ आदर जहाँ रहती वहीं सब ऋद्धियाँ॥
हम डूबते हैं आप तो अघ के अँधेरे कूप में—
है किंतु रखना चाहते उनकी सती के रूप में;
निज दक्षिणाङ्ग पुरीष से रखते सदा हम लिप्त हैं,
वामांग में चंदन चढ़ाना चाहते, विक्षिप्त हैं!
क्या कर नहीं सकतीं भला यदि शिक्षिता हों नारियाँ?
रण-रंग, राज्य, सु-धर्म-रक्षा, कर चुकीं सुकुमारियाँ।
लक्ष्मी, अहल्या, बायजाबाई, भवानी पद्मिनी—
ऐसी अनेकों देवियाँ हैं आज जा सकती गिनी॥
सोचो, नरों से नारियाँ किस बात में हैं कम हुई?
मध्यस्थ वे शास्त्रार्थ में हैं भारतीय के सम हुई।
हैं धन्य थेरी-तुल्य गाथा-कवित्रियाँ वे सर्वथा,
कवि हो चुकी हैं विज्जका, विजया, मधुरवाणी यथा॥
निज नारियों के साथ यदि कर्तव्य अपना पालते,
अज्ञान के गहरे गढ़े में जो न उनको डालते,
तो आज नर यों मूर्ख होकर पतित क्यों होते यहाँ?
होती जहाँ जैसी स्त्रियाँ वैसे पुरुष होते वहाँ॥
पाले हुए पशु-पक्षियों का ध्यान तो रखते सभी,
पर नारियों की दुर्दशा क्या देखते हैं हम कभी?
हमने स्वयं पशु-वृत्ति का साधन बना डाला उन्हें,
संतान-जनने मात्र को वसनान्न दे पाला उन्हें॥

भारत-भारती / वर्तमान खंड / ब्राह्मण

उन अग्रजन्मा ब्राह्मणों की हीनता तो देख लो,
भू-देव थे जो आज उनकी दीनता तो देख लो।
थे ब्रह्म-मूर्ति यथार्थ जो अब मुग्ध जड़ता पर हुए,
जो पीर थे देखो, वही भिश्ती, बावर्ची, खर हुए!
वह वेद का पढ़ना-पढ़ाना अब न उनमें दीखता,
वह यज्ञ का करना-कराना कौन उनमें सीखता?
बस पेट को ही आज उनमें दान देना रह गया,
है कर्म उनमें एक ही अब दान लेना रह गया!
कुछ 'शीघ्र-बोध' रटा कि फिर वे गणक-पुंगव बन गए,
पंचांग पकड़ा और बस सर्वज्ञता में सन गए!
संकल्प तक भी शुद्ध वे साद्यंत कह सकते नहीं,
वे पखरवाए पाद-पंकज किंतु रह सकते नहीं॥
संदेह है, जप के समय क्या मंत्र जपते मौन वे,
हैं 'ॐ नमः' वा 'हा! निमंत्रण' पाठ करते कौन वे!
निश्चय नहीं दृग बंद कर वे लीन हैं भगवान में—
या दक्षिणा की मंजु मुद्रा देखते हैं ध्यान में!
जिन ब्राह्मणों ने लोभ को संतत तिरस्कृत था किया,
देखा, उन्हीं के वंशजों को आज उसने ग्रस लिया।
अब आप उनकी दक्षिणा पहले नियत कर दीजिए—
फिर निंद्य से भी निंद्य उनसे काम करवा लीजिए!
आचार उनका आज केवल रह गया 'असनान' में,
जप, तप तथा वह तेज अब है शेष बाह्य-विधान में!
वे भ्रष्ट यद्यपि हो रहे हैं डूब कर अज्ञान में,
जाते मरे हैं किंतु फिर भी वंश के अभिमान में!
था हाय! जिनके पूर्वजों ने धन्य धरणीतल किया,
इस लोक की, परलोक की, प्रश्नावली को हल किया।
सर्वत्र देखो, आज वे कैसे तिरस्कृत हो रहे,
खोकर तपोबल, ज्ञान-धन, जीते हुए मृत हो रहे॥

भारत-भारती / अतीत खंड / हमारी दशा

पर हाय! अब भी तो नहीं निद्रा हमारी टूटती,
कैसी कुटेवें हैं कि जो भी नहीं हैं छूटती।
बेसुध अभी तक हैं, न जाने कौन ऐसा रस पिया?
देखा बहुत कुछ किंतु हमने सब बिना देखा किया!
हैं घट गए संप्रति हमारे चरित ऐसे सर्वथा,
कवि-कल्पना-सी जान पड़ती पूर्वजों की वह कथा!
आश्चर्य क्या जो फिर हमें वह युक्ति-युक्त जँचे नहीं,
छोटे दिलों में भी बड़ी बातें समा सकती कहीं?
गायक मदन शिशु जो कहीं होता पुरातन काल में,
होते कहीं ये भीमकर्मा राममूर्ति न हाल में,
लेते न संप्रति जन्म जो वे आधुनिक अर्जुन कई,
इनकी कथा भी कल्पना की दौड़ कहलाती नई॥
सारे जगत में जब परा-विद्या प्रमुखता पाएगी—
उत्पत्ति भारत में तथा उसकी बताई जाएगी।
तब भी कदाचित् मुँह बना कर कह उठेंगे हम यही—
क्यों जी, हमारे पूर्वजों की यह कथा क्या है सही॥
संसार रूप शरीर में जो प्राण रूप प्रसिद्ध था,
सब सिद्धियों में जो कभी संपूर्णता से सिद्ध था।
हा हंत! जोते जो वही अब हो रहा म्रियमाण है,
अब लोक-रूप-मयंक में भारत कलंक-समान है!
हा देव! अब वे दिन कहाँ हैं और वे रातें कहाँ?
हैं काल की घातों कि कल की आज हैं बातें कहाँ?
क्या थे तथा अब क्या हुआ हम, जानता बस काल है;
भगवान जाने, काल की कैसी निराली चाल है॥

भारत-भारती / अतीत खंड / विचार

वह भद्र भारत सर्वदा भू-लोक-नेता सिद्ध है,
संसार में सब से अधिक स्वाधीनचेता सिद्ध है।
उन्मादिनी माया स्वयं उसको भुला पाती नहीं,
पुनरागमन की बंधता भी है उसे भाती नहीं॥
है लक्ष्य केवल मुक्ति ही उसके अतुल उद्देश्य का,
है दास भी तो वह उसी बैकुण्ठपति विश्वेश का।
साक्षी स्वयं इस बात के उसके वही सुविचार हैं-
संसार के साहित्य के जो सार हैं, आधार हैं॥

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