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बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' के दोहे : Balkrishna Sharma Navin Dohe

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल में रहते हुए भी लिखना नहीं छोड़ा। 'कुंकुम' उनका प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है, और 'विद्रोही' उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता — जिसने उस दौर के युवाओं में आग लगा दी।

दोहा / भाग 1

जीवन-तरल-तरंगणी, सूखि भई कृश-धार।
द्वेष-मत्त जग ने दियौ, यह निदाध-उपहार।।1।।
जग प्यासौं अवलोकि कैं, हम भरि लाए नीर।
फूटि गई गगरी, लगे उपालम्भ के तीर।।2।।
साँझ भई, सूरज भयौ, पश्चिम दिशि की ओर।
नभ अँधियारौ बढ़ि चल्यौ, हिय कसकी निशि चोर।।3।।
सोच भयो हिय देखि कैं, अपनी जीवन साँझ।
दिन की घड़ियाँ रहि गईं, हाय बोझ की बाँझ।।4।।
नेह दियौ निष्ठा सहित, पाई घृणा अपार।
सेवा कौ मेवा मिल्यौ, यह कृतघ्न व्योहार।।5।।
बोल्यो नेह पपीहरा, जीवन तरु पर बैठि।
पिऊ? पिऊ? की ध्वनि गई, अन्तरिक्ष में पैठि।।6।।
अरुणा भई विभावरी, ढूँढ़त पिउ की ठाँव।
कितै पिया की डगरिया, कितै पिया को गाँव।।7।।
निखिल सौर मण्डल बन्यौ, सजन सुमिरनी काल।
घूर्षित त्रिभुवन रव भर्यो, नाम-स्मरण सब काल।।8।।
रवि शशि तारक वृन्द लौं, गूँजि रह्यो पिय नाम।
ढूँढ़ि थके अणु-अणु उन्हें, पर न ढरे घनश्याम।।9।।
जीवन डगर
नापत जीवन डगरिया, आइ गये इहि ठाँव।
हिम थाक्यो, जिय थकि गयौ, थके बापुरे पाँव।।10।।

दोहा / भाग 2

दृग थाके अवलोकि कैं, मन अनन्त की लीक।
यह अहनिशि चलिबौ भयो, गति को स्वयं प्रतीक।।11।।
अरुझानी मन भावना, मुरझानी हिय आस।
पथ की न-दूति विचार कै, सकुचि रह्यो उल्लास।।12।।
उन, जिन दीन्ही चरण गति, उन जिन दियो विकास।
उन, जिन पथ निर्मित कियौ, उनकौ कौन विसास।।13।।
मुरि देख्यौ गत पथ; मिले, द्वै पद चिह्न अनेक।
पै निज पग में ना मिली, चार चरण की रेख।।14।।
अपने बेगाने भये, कोऊ देत न संग।
जग जन क्यों यारी करें, जब हम नंग धड़ंग।।15।।
जिन्हें दियो हिय नेह, वे, कब पूछत हम कौन।
कहा हमारो नाम है, कितै हमारो भौन।।16।।
पूछहु सब मिलि आज तुम, हमारो नामरु गाँव।
हम अनिकेतन जनम के, हमारो कहूँ न ठाँव।।17।।
पथ चलिबे की रंचहू, रही न अब जिय चाह।
शिथिल गाथ संश्लथ चरण, भंग भयो उत्साह।।18।।
अब लों आए चलत हम, पै न सर्यो कछु काम।
अपने पीतम की मिली, कहूँ न ठौर, न ठाम।।19।।
धिक ऐसो मग संचरण, धिक यह पद-विन्यास।
जो न सकै पहुंचाय कछु, अपने पिय के पास।।20।।

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