बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की कविताएँ : Balkrishna Sharma Navin Kavitaen
बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल में रहते हुए भी लिखना नहीं छोड़ा। 'कुंकुम' उनका प्रसिद्ध काव्य-संग्रह है, और 'विद्रोही' उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता — जिसने उस दौर के युवाओं में आग लगा दी।
विद्रोही
हम ज्योति पुंज दुर्दम, प्रचंड,हम क्रांति-वज्र के घन प्रहार,
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम गरज उठे कर घोर नाद,
हम कड़क उठे, हम कड़क उठे,
अंबर में छायी ध्वनि-ज्वाला,
हम भड़क उठे, हम भड़क उठे!
हम वज्रपाणि हम कुलिश हृदय,
हम दृढ़ निश्चय, हम अचल, अटल
हम महाकाल के व्याल रूप,
हम शेषनाग के अतुल गरल!
हम दुर्गा के भीषण नाहर,
हम सिंह-गर्जना के प्रसार
हम जनक प्रलय-रण-चंडी के,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हमने गति देकर चलित किया
इन गतिविहीन ब्रह्मांडों को,
हमने ही तो है सृजित किया
रज के इन वर्तुल भांडों को;
हमने नव-सृजन-प्रेरणा से
छिटकाये तारे अंबर में,
हम ही विनाश भर आए हैं
इस निखिल विश्व-आडंबर में;
हम स्रष्टा हैं, प्रलयंकर हम,
हम सतत क्रांति की प्रखर धार—
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हमने अपने मन में की ‘हाँ!'
औ' प्रकृति नर्तकी नाच उठी!
हमने अपने मन में की 'ना!'
औ' महाप्रलय की आँच उठी!
जग डग-मग-डग-मग होता है
अपने इन भृकुटि-विलासों से,
सिरजन, विनाश, होने लगते
इन दायीं-बायीं श्वासों से;
हम चिर विजयी; कर सका कौन
हठ ठान हमारा प्रतीकार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
अपने शोणित से ऊषा को
हम दे आये कुंकुम-सुहाग,
आदर्शों के उद्दीपन से
हमने रवि को दी अमित आग;
माटी भी उन्नत-ग्रीव हुई
जब नव चेतनता उठी जाग,
जीवन-रँग फैला, जब हमने
खेली प्राणों की रक्त फाग;
हो चला हमारे इंगित पर
जग में नव जीवन का प्रसार,
हम जनक प्रलय-रण-चंडी के,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हो गयी सृजित संगीत कला,
हमने जो छेड़ी नवल तान
उन्मुक्त हो गये भाव-विहग
जो भरी एक हमने उड़ान;
हमने समुद्र-मंथन करके
भर दिये जगत् में अतुल रत्न,
संसृति को चेरी कर लाये
अनवरत हमारे ये प्रयत्न!
संस्कृति उभरी, लालित्य जगा,
सुन पड़ी सभ्यता की पुकार,
जब विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
बढ़ चले मार्ग पर दुर्निवार!
हम 'अग्ने! नय सुपथा राये...' का
अनल-मंत्र कह जाग उठे,
हम मोह, लोभ, भय, त्रास, छोह
सब त्याग उठे, सब त्याग उठे,
हम आज देखते हैं जगती,
यह जगती, यह अपनी जगती,—
यह भूमि हमारी विनिर्मिता,
शोषिता, परायी-सी लगती!
रवि-निर्माताओं के भू पर,
बोलो, यह कैसा अंधकार?
क्या निद्रित थे हम अति कोही,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
क्या अंधकार? हाँ अंधकार!
याँ अंधकार!! वाँ अंधकार!!
है आज सभी दिशि अंधकार;
हैं सभी दिशा के बंद द्वार;
ज्योतिष्पुंजों के हम स्रष्टा,
हम अनल-मंत्र के छंद-कार,
इस दुर्दम तम को क्यों न दलें?
हम सूर्य-कार, हम चंद्र-कार!
आओ, हम सब मिलकर नभ से
ले आएँ रवि-शशि को उतार!!!
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
चेतन ने जब विद्रोह किया,
तब जड़ता में जीवन आया;
जीवन ने जब विद्रोह किया
तब चमक उठी कंचन-काया;
यह जो विकास, उत्क्रमण, प्रगति,
प्रकटी जीवन के हिय-तल में,—
वह है केवल विद्रोह छटा
जो खिल उठती है पल-पल में!
तब, बोलो, हम क्यों सहन करें
दुर्दांत तिमिर का अनाचार ?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम खंड-खंड कर चुके गर्व
अतुलित मदमत्त करोड़ों का;
है इतिहासों को याद हमारा
भीम प्रहार हथौड़ों का!
आ चुके अभी तक कई-कई
घनघोर सूरमा बड़े-बड़े,
जा लखो, हमारे प्रांगण में
उनके हैं बस कुछ ढूह खड़े!
है इतिहासों को भी दूभर
उनके साम्राज्यों का विचार,
उनके आगे टिक सका कौन,
जो हैं विद्रोही दुर्निवार!
हमने संस्कृति का सृजन किया,
दुष्कृतियों को विध्वस्त किया,
कुविचारों के चढ़ते रवि को
इक ठोकर देकर अस्त किया!
हम काल-मेघ बन मँडराये,
हम अशनि-कुलिश बन-बन गरजे,
सुन-सुन घनघोर निनाद भीम
अत्याचारी जन-गण लरजे;
अब आज, निराशा-तिमिर देख,
लरजेंगे क्या हम क्रांतिकार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
सोचो तो कितना अहोभाग्य,—
आ पड़ा हमीं पर क्रांति-भार!
इस अटल ऐतिहासिकता पर,
हम क्यों न आज होएँ निसार?
यह क्रांति-काल, संक्रांति-काल,
यह संधि-काल युग-घड़ियों का,
हाँ! हमीं करेंगे गठ-बंधन,
युग-जंज़ीरों की कड़ियों का!
हम क्यों उदास? हों क्यों निराश?
जब सम्मुख हैं पुरुषार्थ-सार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम घर से निकले हैं गढ़ने
नव चंद्र, सूर्य, नव-नव अंबर,
नव वसुंधरा, नव जन-समाज
नव राज-काज, नव काल, प्रहर!
दिक्-काल नए, दिक्-पाल नए,
सब ग्वाल नए, सब बाल नए,
हम सिरजेंगे ब्रज भूमि नई,
गोपियाँ नई, गोपाल नए!!
क्यों आज अलस-भावना जगे,
जब आये हम हिय धैर्य धार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
मानव को नयी सुगति देने,
मानवता को उन्नत करने
हम आये हैं नर के हिय में,
नारायणता की द्युति भरने;
यह अति पुनीत, यह गुणातीत,
शुभ कर्म हमारे सम्मुख है;
तब नीच निराशा यह कैसी?
कैसा संभ्रम? अब क्या दुख है?
तिल-तिल करके यदि प्राण जायँ
तब भी क्यों हो हिय में विकार?
हम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
यह काल, लौह लेखनी लिये,
लिखता जाता है युग पुराण;
हम सबकी कृति-निष्कृतियों का
उसको रहता है ख़ूब ध्यान;
इस ध्रुव इतिहास-सुलेखक को
कैसे धोका दें हम, भाई?
इससे बचने का, अपने को
कैसे मौक़ा दें, हम भाई?
मौक़ेबाज़ी न चलेगी याँ,
यह ख़ाला का घर नहीं; यार,
है महाकाल निर्दय लेखक,
यह है विद्रोही दुर्निवार।
यह काल, लेखनी डुबो रहा
अमरों की शुभ शोणित-मसि में,
औ' उधर चढ़ रहा है पानी
उन निर्मम बधिकों की असि में!
क्यों सोचें, कब कुंठित होगी,
निर्दय, असि की यह प्रखर धार?
बचने की क्यों हो आतुरता?
क्यों टूटे यह बलि की क़तार?
यदि हम डूबें इस मृत्यु-घाट,
तो पहुँचेंगे उस अमर पार!
क्या भय? क्या शोक-विषाद हमें?
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम रहे न भय के दास कभी
हम नहीं मरण के चरण-दास;
हमको क्यों विचलित करे आज
यह हेय प्राण-अपहरण-त्रास?
माना कि लग रहा है ऐसा,
मानो प्रकाश है बहुत दूर,
तो क्या इस दुश्चिंता ही से
होगा तम का गढ़ चूर-चूर?
हम क्यों न करें विश्वास कि यह
टिक नहीं सकेगा तम अपार?
हम महा प्राण, हम इक उठान,
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
अपने ये सब बीहड़ जंगल,
अपने ये सब ऊँचे पहाड़,—
इक दिन निश्चय हिल डोलेंगे,
सिंहों की-सी करके दहाड़!
उस दिन हम विस्मित देखेंगे
यह निविड़ तिमिर होते विलीन,
उस दिन हम सस्मित देखेंगे :
हम हैं अदीन, हम शक्ति-पीन!!
उस दिन दुःस्वप्नों की स्मृति-सा
होगा बधिकों का भीम भार
उस दिवस कहेगा जग हमसे :
तुम विद्रोही, तुम दुर्निवार!
हम क्यों न करें विश्वास कि ये
नंगे-भूखे भी तड़पेंगे?
धूएँ के छितरे बादल भी,
कड़केंगे, हाँ ये कड़केंगे!
जमकर होंगे ये भी संयुत,
ये भी बिजलियाँ गिराएँगे :
अपने नीचे की धरती का
ये भी संताप सिराएँगे;
ये भी तो इक दिन समझेंगे
अपने भूले सब स्वाधिकार;
उस दिन ये सब कह उठेंगे :
हम विद्रोही, हम दुर्निवार!
हम कहते हैं भीषण स्वर से
मत सोच करो, मत सोच करो;
लख वर्तमान नैराश्य अगम,
अपने हिय को मत पोच करो;
तुम बहुदर्शी, तुम क्रांति-पथी,
तुम जागरूक, तुम गुडाकेश,
तुमको कर सका कभी विचलित
क्या गेह-मोह? क्या शोक-क्लेश?
देखी है तुमने क्षणिक जीत,
अविचल सह जाओ क्षणिक हार!
तुम विप्लव-रण-चंडिका-जनक,
तुम विद्रोही, तुम दुर्निवार!!
विप्लव गान
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए!एक हिलोर इधर से आए, एक हिलोर उधर से आए,
प्राणों के लाले पड़ जाएँ, त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाए;
नाश और सत्यानाशों का धुआँधार जग में छा जाए,
बरसे आग, जलद जल जाएँ, भस्मसात् भूधर हो जाएँ;
पाप पुण्य सदसद् भावों की धूल उड़ उठे दाएँ-बाएँ,
नभ का वक्षस्थल फट जाए, तारे टूक-टूक हो जाएँ;
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए!
माता की छाती का अमृतमय पय कालकूट हो जाए,
आँखों का पानी सूखे, हाँ, वह ख़ून की घूँट हो जाए;
एक ओर कायरता काँपे, गतानुगति विगलित हो जाए,
अंधे मूढ़ विचारों की वह अचल शिला विचलित हो जाए;
और दूसरी ओर कँपा देनेवाला गर्जन उठ धाए,
अंतरिक्ष में एक उसी नाशक तर्जन की ध्वनि मँडराए;
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए!
नियम और उपनियमों के ये बंधन टूट-टूक हो जाएँ,
विश्वंभर की पोषक वीणा के सब तार मूक हो जाएँ;
शांति-दंड टूटे, उस महा रुद्र का सिंहासन थर्राए,
उसकी पोषक श्वासोच्छ्वास, विश्व के प्रांगण में घहराए;
नाश! नाश!! हाँ, महानाश!!! की प्रलयंकरी आँख खुल जाए,
कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल-पुथल मच जाए!
“सावधान! मेरी वीणा में चिनगारियाँ आन बैठी हैं,
टूटी हैं मिज़राबें, युगलांगुलियाँ ये मेरी ऐंठी हैं;
कंठ रुका जाता है महानाश का गीत रुद्ध होता है,
आग लगेगी क्षण में, हृत्तल में अब क्षुब्ध युद्ध होता है;
झाड़ और झंखाड़ व्याप्त हैं इस ज्वलंत गायन के स्वर से,
रुद्ध गीत की क्षुब्ध तान निकली है मेरे अंतरतर से!
“कण-कण में है व्याप्त वही स्वर, रोम-रोम गाता है वह ध्वनि,
वही तीन गाती रहती है कालकूट फणि की चिंतामणि;
जीवन-ज्योति लुप्त है अहा! सुप्त हैं संरक्षण की घड़ियाँ,
लटक रही हैं प्रतिफल में इस नाशक संभक्षण की लड़ियाँ;
चकनाचूर करो जग को, गूँजे ब्रह्मांड नाश के स्वर से,
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान निकली है मेरे अंतरतर से!
दिल को मसल-मसल मेंहदी रचवा आया हूँ मैं यह देखो—
एक-एक अंगुलि-परिचालन में नाशक तांडव को पेखो!
विश्वमूर्ति! हट जाओ, यह वीभत्स प्रहार सहे न सहेगा,
टुकड़े-टुकड़े हो जाओगी, नाश-मात्र अवशेष रहेगा;
आज देख आया हूँ, जीवन के सब राज़ समझ आया हूँ,
भू-विलास में महानाश के पोषक सूत्र परख आया हूँ;
जीवनगीत भुला दो, कंठ मिला दो मृत्युगीत के स्वर से,
रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान निकली है मेरे अंतरतर से!
“जीवर में जंज़ीर पड़ी खन-खन करती है मोहक स्वर से—
'बरसों की साथिन हूँ—तोड़ोगे क्या तुम अपने इस कर से?',
अंदर आग छिपी है, इसे भड़क उठने दो एक बार अब,
ज्वालामुखी शांत है, इसे कड़क उठने दो एक बार अब;
दहल जाय दिल, पैर लड़खड़ाएँ, कँप जाय कलेजा उनका,
सिर चक्कर खाने लग जाए, टूटे बंधन शासन-गुण का;
नाश स्वयं कह उठे कड़ककर उस गंभीर कर्कश-से स्वर से—
'रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान निकली है मेरे अंतरतर से'!”
क्रांति?
क्रांति? क्रांति? मेरे आँगन मेंयह कैसा हुंकार मचा?
बोलो तो यह किसने अपने—
श्वासों का फुंकार रचा?
झंकारों, धनु टंकारों का
यह चिर परिचित स्वर छाया;
रण-भेरी का यह भैरव-रव,
कहो कहाँ से घिर आया?
क्या सचमुच ही महा प्रलय की आँधी उठ आयी क्षण में?
ऐं? क्या महा क्रांति मतवाली आयी मेरे प्रांगण में?
क्रांति जगी, आँधी आयी, यह
उठी ज्वाल, चीत्कार हुआ;
नभ काँपा धरती भर्रायी,
जग में हाहाकार हुआ;
वार हुए छाती पर; मन के—
मंसूबे मिस्मार हुए;
प्रलयंकर प्रवाह में पड़कर
कितने बे-घर-बार हुए?
शोक कहाँ? वेदना कहाँ है? मिटने का उल्लास यहाँ;
मोह उठा, सब पाप कटा, अब रहा न जीवन-त्रास यहाँ!
आओ क्रांति, बलाएँ ले लूँ,
अनाहूत आ गयी भली;
वास करो मेरे घर-आँगन,
बिचरो मेरी गली-गली;
सड़ी-गली परिपाटी मेरी,
इसे भस्म तुम कर जाओ;
विकट राज-पथ में मँडराओ
जन-पद में डोलो आओ;
नयी अग्नि ज्वाला भड़का दो तुम मेरे अंतरतर में
अरी, नये नक्षत्र जगा दो मेरे धूमिल अंबर में।
हम अनिकेतन
हम अनिकेतन, हम अनिकेतन हम तो रमते राम, हमारा क्या घर? क्या दर? कैसा वेतन? हम अनिकेतन, हम अनिकेतन। एक अब तक इतनी यों ही काटी, अब क्या सीखें नव परिपाटी? कौन बनाए आज घरौंदा हाथों चुन-चुन कंकड़, माटी ठाट फ़कीराना है अपना, बाघंबर सोहे अपने तन, हम अनिकेतन, हम अनिकेतन। दो देखे महल, झोंपड़े देखे, देखे हास–विलास मज़े के, संग्रह के विग्रह सब देखे, जँचे नहीं कुछ अपने लेखे, लालच लगा कभी, पर, हिय में मच न सका शोणित-उद्वेलन, हम अनिकेतन, हम अनिकेतन। तीन हम जो भटके अब तक दर-दर अब क्या ख़ाक बनाएँगे घर? हमने देखा : सदन बने हैं, लोगों का अपना-पन लेकर; हम क्यों सनें ईंट-गारे में? हम क्यों बने व्यर्थ में बेमन? हम अनिकेतन, हम अनिकेतन। चार ठहरे अगर किसी के दर पर कुछ शरमा कर, कुछ सकुचाकर तो दरबान कह उठा—बाबा, आगे जा : देखो कोई घर। हम दाता बन कर बिचरे; पर हमें भिक्षु समझे जग के जन, हम अनिकेतन, हम अनिकेतन।ओ मज़दूर किसान, उठो
उठो, उठो ओ नंगो भूखोओ मज़दूर किसान, उठो,
इस गतिमय मानव-समूह के
ओ प्रचंड अभिमान, उठो।
आज मुक्ति के अरमानों ने
मिलकर यों ललकारा है :
ओ सब सोनेवालो, जागो,
गूँज रहा नक्कारा है!
कैसी रात? कहाँ के सपने
यह नव प्रात पधारा है!
ऐसे हँसते-से प्रभात का
तुम करने सम्मान, उठो,
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
ले प्राणों के फूल करों में,
हिय में अमित उमंग भरे,—
कंधों पर ले विजय-पताका,
नयनों में रण-रंग भरे,—
नवल प्रात के स्वागत को तुम
चलो वीर निश्शंक, अरे;
क्या भय? क्या डर? आज झिझक क्या?
ओ मानस संतान उठो।
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
शतियों के आदर्श तुम्हारे
मूर्त रूप धर आये हैं;
नव समाज के नवल सृजन का
नया सँदेसा लाये हैं;
दिशि-दिशि में समता-स्थापन के
ये अभिनव स्वर छाये हैं;
महाक्रांति के नव विधान हित
तुम करने बलिदान उठो;
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
अब न आ सके रात भयंकर
ऐसा कुछ गति-चक्र चले;
फिर न अँधेरा छाये जग में
चाल न कोई वक्र चले;
चमके स्वतंत्रता का सूरज,
परवशता का अभ्र टले;
शोषण के शासन की इति हो,
तुम ऐसा प्रण ठान, उठो,
उठो, उठो ओ नंगो भूखो
ओ मज़दूर किसान, उठो।
सभी ओर तव भुज-बल-अंकित,
पृथिवी देखो, हल देखो,
निखिल विश्व के यंत्र-तंत्र में
तुम अपना कौशल देखो;
भू-मंडल के सिरजन में तुम
अपनी चहल-पहल देखो;
ज्योति जगाते, भीति भगाते,
ओ तुम शक्ति-निधान, उठो;
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
तुमने पीकर गरल, जगत को—
मधुरामृत का दान दिया;
शीतल हुआ जगत, जब तुमने
प्रलय-अग्नि का पान किया!
मरण-वरण कर तुमने सबको
नव जीवन, नव प्राण दिया;
बहुत पिया विष; अमृत पियो अब,
त्यागी वीर महान्, उठो;
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
सुलगा दो निज अंतर्जाला,
विकट लपट लंबी धधके,
होवे भस्म दासता, शोषण,
ऐसी यह होली भभके!
हो जाओ तुम मुक्त, कि विहँसें
ये सब तारागण नभ के
दुर्निवार तुम, सदा मुक्त, तुम,
करो विजय के गान, उठो;
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
किसका साहस है कि रख सके
तुमको यों चिर बंधन में?
स्वयं मुक्ति ही नाच रही है
सदा तुम्हारे स्पंदन में!
तुममें विप्लव अंतर्हित है,
जैसे ज्वाला चंदन में;
टेर रहा है तुम्हें विश्व यह
ओ जग के बलवान, उठो;
उठो, उठो ओ नंगो भूखो,
ओ मज़दूर किसान, उठो।
अरे तुम हो काल के भी काल
कौन कहता है कि तुमको खा सकेगा काल?अरे, तुम हो काल के भी काल अति विकराल!
काल का तव धनुष; दिक् की है धनुष की डोर;
धनु-विकंपन से सिहरती सृजन-नाश-हिलोर!
तुम प्रबल दिक्-काल-धनु-धारी सुधन्वा वीर;
तुम चलाते हो सदा चिर चेतना के तीर।
क्या बिगाड़ेगा तुम्हारा, यह क्षणिक आतंक?
क्या समझते हो कि होंगे नष्ट तुम अकलंक?
यह निपट आतंक भी है भीति-ओत-प्रोत!
और तुम? तुम हो चिरंतन अभयता के स्रोत!!
एक क्षण को भी न सोचो कि तुम होगे नष्ट;
तुम अनश्वर हो! तुम्हारा भाग्य है सुस्पष्ट!
चिर विजय दासी तुम्हारी, तुम जयी उबुद्ध;
क्यों बनो हतआश तुम, लख मार्ग निज अवरुद्ध?
फूँक से तुमने उड़ायी भूधरों की पाँत;
और तुमने खींच फैंके काल के भी दाँत;
क्या करेगा यह विचारा तनिक-सा अवरोध?
जानता है जग : तुम्हारा है भयंकर क्रोध!
जब करोगे क्रोध तुम, तब आयगा भूडोल,
काँप उट्ठेंगे सभी भूगोल और खगोल;
नाश की लपटें उठेगी गगन-मंडल बीच;
भस्म होंगी ये असामाजिक प्रथाएँ नीच!
औ' पधारेगा सृजन कर अग्नि से सुस्नान;
मत बनो गत आश! तुम हो चिर अनंत, महान्!
पराजय-गीत
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ,विजय पताका झुकी हुई है, लक्ष्यभ्रष्ट यह तीर हुआ,
बढ़ती हुई क़तार फ़ौज की सहसा अस्त-व्यस्त हुई,
त्रस्त हुई भावों की गरिमा, महिमा सब संन्यस्त हुई;
मुझे न छेड़ो, इतिहासों के पन्नो, मैं गतधीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
मैं हूँ विजित, जीत का प्यासा विजित, भूल जाऊँ कैसे?
वह संघर्षण की घटिका है बसी हुई हिय में ऐसे,—
जैसे माँ की गोदी में शिशु का दुलार बस जाता है,
जैसे अंगुलीय में मरकत का नवनग कस जाता है;
'विजय-विजय' रटते-रटते मेरा मनुआ कल-कीर हुआ,
फिर भी असि की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
गगन भेद कर वरद करों ने विजय प्रसाद दिया था जो,
जिसके बल पर किसी समय में मैंने विजय किया था जो,
वह सब आज टिमटिमाती स्मृति-दीपशिखा बन आया है,
कालांतर ने कृष्ण आवरण में उसको लिपटाया है,
गौरव गलित हुआ, गुरुता का निष्प्रभ क्षीण शरीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
एक सहस्र वर्ष की माला मैं हूँ उलटी फेर रहा,
उन गत युग के गुंफित मनकों को मैं फिर-फिर हेर रहा,
घूम गया जो चक्र उसी की ओर देखता जाता हूँ,
इधर-उधर सब ओर पराजय की ही मुद्रा पाता हूँ!
आँखों का ज्वलंत क्रोधानल क्षीण दैन्य का नीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
विजय-सूर्य ढल चुका अँधेरा आया है रखने को लाज,
कहीं पराजित का मुख देख न ले यह विजयी कुटिल समाज,
अंचल, कहाँ फटा अंचल वह? माँ का प्यारा वस्त्र कहाँ?
अर्धनग्न, रुग्णा, कपूत की माँ का लज्जा-अस्त्र कहाँ?
कहाँ छिपाऊँ यह मुख अपना? खोकर विजय फ़क़ीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
जहाँ विजय के पिपासार्त हो गये, आँख की ओट कई,
जहाँ जूझकर मरे अनेकों, जहाँ खा गये चोट कई,
वहीं आज संध्या को मैं बैठा हूँ अपनी निधि छोड़े,
कई सियार, श्वान, गीदड़ ये लपक रहे दौड़े-दौड़े!
विजित साँझ के झुटपुटे समय कर्कश रव गंभीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
रग-रग में ठंडा पानी है, अरे उष्णता चली गयी,
नस-नस में टीसें उठती हैं, विजय दूर तक टली सही,
विजय नहीं, रण के प्रांगण की धूल बटोरे लाया हूँ,
हिय के घावों में, वर्दी के चिथड़ों में ले आया हूँ!
टूटे अस्त्र, धूल माथे पर, हा! कैसा मैं वीर हुआ,
आज खड्ग की धार कुंठिता है, ख़ाली तूणीर हुआ!
वर्दी फटी, हृदय घायल; कारिख मुख भर, क्या वेश बना?
आँखें सकुच रहीं, कायरता के पंकिल से देश सना!
अरे पराजित, ओ! रणचंडी के कुपूत! हट जा, हट जा,
अभी समय है, कह दे, माँ-मेदिनी ज़रा फट जा, फट जा,
हंत! पराजय-गीत आज क्या द्रुपद-सुता का चीर हुआ?
खिंचता ही आता है जब से ख़ाली यह तूणीर हुआ!!
एक बार तो देख
एक बार तो देख, अरे जग मेरी डंडा-बेड़ी;एक बार तो देख : कट गयी है यह मेरी एड़ी;
टेढ़ी-मेढ़ी यह मदमाती मेरी चाल निहार,
झन-झन-झन-झन करता है हम मस्तों का संसार;
गुर्राते झन्नाते फिरते हैं ये मेरे शेर
ओ जग, ज़रा देख तो हैं याँ कैसे विकट दिलेर!
यहाँ बेड़ियों की उठती है स्वर-झंकार-हिलोर,
बैरक और अड़गड़ों में, चक्कर में, चारों ओर;
झन-झन-खन-खन की यह जीवन-दर्शक मोहक टेक—
बार-बार उठ-उठ आती है यों ही एकाएक;
सुन ले, कान लगाकर सुन ले ओ जग इसको आज,
अरे, देख तो इन बँधुओं का फैला यहाँ स्वराज!
नहीं बेड़ियों की यह झन-झन यह है जीवन-मंत्र,
काँप रहा है सुनकर जिसको क्षण-क्षण शासन-तंत्र;
वे पशुबल के अधिनायक क्या जानें इसका तत्त्व!
निज सर्वस्व होम कर ही है मिलता मुक्त निजत्व।
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो!
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,जागृति के ये भैरव स्वर—
जिनसे आज तरंगित है यह
अपना अति विस्तृत अंबर।
स्वयं प्रलय-वीणा अपने ही
आप अनाहत गूँज उठी;
और तन गयी महाकाल की
लय-उद्भव-कारी भृकुटी;
आज वायु की प्रति तरंग में
अमित स्वरों की भीर जुटी;
अब भी क्या न स्वरभरित होंगे
सुप्त तुम्हारे कर्ण-कुहर?
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
वीणा बजी, स्वरावलि उभरी,
दशों दिशाएँ नाच उठीं;
अंबर से पृथिवी तक सहसा
विप्लव-स्वर की आँच उठी;
सभी जातियाँ इस प्रकाश में
अपनी भावी बाँच उठीं;
तुम कैसे हो जो कि आज भी
नहीं रहे हो रंच सिहर?
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
खेत और खलिहान तुम्हारे;
ये पहाड़, जंगल, उपवन,—
ये नदियाँ, ये ताल सरोवर,
गाते हैं विप्लव-गायन!
उत्तर में गा रहा हिमाचल;
दक्षिण में वह सिंधु गहन;
सभी गा रहे हैं : लो आया
यह लोहित जागरण-प्रहर!
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
गंगा गाती कल-कल ध्वनि में
भावी के कल की बातें,
यमुना गाती है कल-कल कर
कि अब गयीं कल की रातें :
साबरमती गरज कर बोली :
अब कैसी निशि की घातें!
दिन आया, अपना दिन आया,
यों गाती है लहर-लहर;
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
उत्तर से दक्खिन, पूरब से
पच्छिम तक तुम एक, अरे,
भेद-भाव से परे एक ही
रही तुम्हारी टेक, अरे;
एक देश है; एक प्राण तुम;
तुम हो नहीं अनेक, अरे!
खोलो निज लोचन, देखो यह
खिली एकता ज्योति प्रखर,
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
इस क्षण भी यदि तुम न उठ सके
तो इतिहास कहेगा क्या?
सोचो तो, यह भाग्य तुम्हारा,
चिर उपहास सहेगा क्या?
यह अनुकूल पवन का झोंका
फिर भी कभी बहेगा क्या?
अपने हाथों क्यों खोदो हो
तुम अपनी ही आज क़बर?
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के यह भैरव स्वर!
शतियों से नदियाँ इस भू की
गरज रही हैं क्रोध-भरी!
शतियों से सागर की लहरें
गरज रहीं प्रतिशोध-भरी!
यह वृद्धा पृथिवी माता भी
गरज रही है, गोद-भरी!
बस, तुम ही भूले हो अपनी
विकट गर्जना प्रलयंकरः
गरजो, सोनेवालो, गाओ,
जागृति के ये भैरव स्वर!
छोड़ो निद्रा, लो अँगड़ाई;
आज शृंखलाएँ तोड़ो,
आज मुक्ति की होड़-दौड़ में
आओ तुम भी तो दौड़ो,
समता के तारे की गति से
अपनी रथ-गति तुम जोड़ो;
तोड़ो इस शोषण की दाढ़ें;
अब सम्मुख है विकट समर,
सुनो, सुनो ओ सोनेवालो,
जागृति के ये भैरव स्वर!
राखी की सुध
बिटिया, मेरी गुड़िया रानी, कहाँ तुम्हारा तार?कहाँ तुम्हारी स्नेहमयी मंजुल राखी सुकुमार?
ओ तुम कच्चे धागे वाली, विहँस हुलसती बाल,
ओ तुम कुंकुम-अक्षत वाली लघुरक्षिका विशाल,
यह श्रावणी-पूर्णिमा कारागृह में आयी आज,
संग लिये सावन की मोहकता का हरित समाज!
नभ में, नेह-भरे दल-बादल, धरे विविध आकार,
दौड़-दौड़कर भू-मंडल पर डाल रहे जलधार,
हहर-हहर करती लहराती बही वायु गंभीर,
फुहियों के मिस टपक रही है रिम-झिम नभ की पीर;
ऐसे समय ओढ़ गत-संस्मृतियों का विरल दुकूल,
बरबस, राखी-पूनम आयी कारा में पथ भूल!
बहिना, यहाँ तुम्हारा भैया, निपट अरक्षित, मूक,
साधन हीन, छीन तन, बैठा किये हृदय दो-टूक;
आज, तुम्हारे कुंकुम-रोचन की स्मृति से ये प्राण,
ऐसे तड़प रहे हैं, जैसे घायल हिरन अजान,
बनकर याद, लहरता है तव अंगुलियों का तार,
बहन, आज आती है सुध राखी की बारंबार!
उस दिन तुम आयी थीं लेकर कुंकुम, अक्षत, और—
अपने हाथों कते सूत की राखी की मृदु डोर;
थाल भरे मेवे सँग में थे लगे हुए तांबूल,
रानी, ये संस्मरण बने याँ मेरे हिय के शूल;
यहाँ बनी हथकड़ियाँ राखी, साखी है संसार
यहाँ, कई बहनों के भैया बैठे हैं मन-मार!
हम संक्रांति-काल के प्राणी बदा नहीं सुख भोग,
हमें क्या पता क्या होता है स्निग्ध-सुखद संयोग?
हम बिछोह के पले, ख़ूब जाने हैं पूर्ण वियोग
घर उजाड़कर जेल बसाने का है हमको रोग—
फिर भी, हाँ, हाँ; फिर भी, दिल ही तो है यह अनजान
बरबस तड़प-तड़प उट्ठा करता है यह नादान!
अपना मृदु गोपाल
देखा बेड़ी पहने मैंने अपना मृदु गोपाल,अपना मृदु गोपाल, सलौना वह मन मोहन लाल।
वह प्यारे मुख मंडल वाला,
वह तेजस्वी, चपल निराला,
वह गोरा, वह कुछ-कुछ काला,
वह अपनी धुन का मतवाला,
जिसको देख उमड़ आती है, वत्सलता बेहाल,
सलौना वह मन मोहन लाल!
देखा बेड़ी पहने मैंने अपना मृदु गोपाल—
सलौना वह मन मोहन लाल।
वह इठलाता, मृदु मुसकाता,
खनन-खनन करता मदमाता,
इधर-उधर से आता-जाता,
नुपूर के स्वन को शरमाता,
कुलिश बेड़ियाँ झनकाता वह चलता मादक चाल,
सलौना वह मन मोहन लाल।
देखा बेड़ी पहने मैंने अपना मृदु गोपाल,
सलौना वह मन मोहन लाल।
मंद ज्योति
प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती,शायद लुट जाए यह मेरी मुसाफ़िरी की थाती!
पथ सुनसान, कँटीला, टेढ़ा, पथरीला, अज्ञात,
मंज़िल लंबी, भ्रमित पथिक, मग में छायी चिर रात;
शिथिल गात, हो रहे अनेकों विकट घात-प्रतिघात,
किससे कहे मुसाफ़िर अपने मन की आकुल बात?
कुसमय में लप-झप करने लग गयी ज्योति अकुलाती,
प्रिय, धीमी पड़ रही आज मेरे प्रदीप की बाती!
तुम प्रकाशपति, तुम दिन-मणि-पति सतत-सनातन ज्योतिपते!
संशय-दाहक अनल-प्रवाहक, हे जगपावक अग्निमते!
निज प्रचंड किरणांगुलियों से उकसा दो मेरी बाती,
फिर से इसे बना दो प्रिय तुम अग्नि-अरुण-धुन मदमाती।
हम हैं मस्त फ़कीर
एक हमसे दूर रहो री सतत, हम हैं मस्त फ़कीर। बाघंबर से कहो क्यों बँधे चीनांशुक का चीर। सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर। दो हमें मिला है सतत अटन का यह प्रसाद अभिशाप: गृही लोग, हम अनिकेतन की क्या जानें सुख-पीर? सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर! तीन हम क्या जानें दृग-अंजन की पतली-पतली रेख? हम तो जान सके हैं केवल मग की ‘न-इति’-लकीर। सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर। चार हमें मिले हैं पथ में जब-तब कुछ लोचन स्मयमान, जो हम से सैनों में बोले : दिखलाओ हिय चीर! किंतु हम ठहरे मस्त फ़कीर! पाँच तुम्हें मिली है मानव हिय की यह चंचल ठकुरास! पर, हमको तो मिली अचंचल मस्ती की जागीर! सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर। छह क्या चिंता जो हम आ बैठे कारागृह में आज? क्या भय, जो हम को घेरे है यह ऊँची प्राचीर? सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर! सात तुम समझो हो कि अब हो चले हम ‘नवीन’, प्राचीन! क्यों भूलो हो कि हम अमर हैं!! हम हैं लौह शरीर!!! सखी री, हम हैं मस्त फकीर! आठ क्या पूछो हो पता हमारा? हम हैं अगृह, अनाम! यही पता है कि है कहीं भी अपनी नहीं कुटीर!! सखी री, हम हैं मस्त फ़कीर!!!डोले वालो
डोला लिए चलो तुम झटपट, छोड़ो अटपट चाल, रे, सजन-भवन पहुँचा दो हमको, मन का हाल-विहाल, रे; एक बरखा ऋतु में सब सहेलियाँ मैके पहुँचीं आय, रे; बाबुल घर से आज चलीं हम, पिय-घर, लाज बिहाय, रे; उनके बिन, बरसाती रातें कैसे करें अचूक, रे? प्रिय की बाँह उसीस न हो तो मिटे न मन की हूक, रे, डोले वालो, बढ़े चलो तुम आया संध्या-काल, रे, सजन-भवन पहुँचा दो हमको, छोड़ो अटपट चाल, रे। दो ढली दुपहरी, किरनें तिरछी हुई, साँझ नजदीक रे, अभी दूर तक दीख पड़े है, पथ की लम्बी लीक, रे, आज साँझ के पहले ही तुम, पहुँचा दो पिय-गेह, रे, हम कह आई हैं इंदर से, रात पड़ेगा मेह, रे, घन गरजेंगे, रस बरसेगा होगी सृष्टि निहाल, रे, डोला लिए चलो तुम जल्दी, छोड़ो अटपट चाल, रे। तीन बाबुल घर में नेह भरा है; पर वाँ द्वैत विचार है, रे साजन के नव नेह-सलिल में है अद्वैत-विहार, रे, हृदय हृदय से, प्राण प्राण से, आज मिलें भरपूर, रे, पिय-मय तिय, तिय-मय पिय हों जब, तब हाँ संभ्रम दूर, रे, दूर करो पथ के अंतर का यह अटपट जंजाल, रे, डोले वालो, बढ़े चलो तुम, आया संध्या-काल, रे। चार घन गरजे, तब हो न सजन-आलिंगन का संयोग, रे, तो फिर कैसे मिट सकता है, हिय का अतुल वियोग, रे? जब झनकारें अमित झिल्लियाँ, हो दादुर का शोर, रे तब हम हुलस कहेंगी उन से : तुम्हारा ओर न छोर, रे, डोले वालो, कोयल कुहकी हरित आम की डाल, रे, सजन भवन पहुँचा दो हमको आया संध्या-काल, रे।शिखर पर
चढ़ चल, चढ़ चल, थक मत, रे बलि-वध के सुंदर जीव,उच्च कठोर शिखर के ऊपर है मंदिर की नींव;
बड़े बड़े थे शिलाखंड मग रोके पड़े अचेत,
इन्हें लाँघ तू, यदि जाना है तुझे मरण के हेत;
ऊपर, अगम शिखर के ऊपर, मचा मृत्यु का रास!
नीचे, उपत्यका में, है जीवन-पंकिल का त्रास।
चढ़ चल, चढ़ चल, थक मत रे तू बलिदानों के पुंज,
देख कहीं न लुभावे तुझको यह जीवन की कुंज;
मधुर मृत्यु का नृत्य देख तू देने लग जा ताल,
अपना सीस पिरोकर कर दे पूरी माँ की माल;
है जीवन अनित्य, कट जाने दे तू मोहक बंध;
कर दे पूरा आज मरण का तू अपना सुप्रबंध।
प्रिय, जीवन-नद अपार
प्रिय, जीवन- नद अपार, विशद पाट, तीव्र धार, गहर भँवर, दूर पार,— प्रिय, जीवन-नद अपार। एक इस तट पर ना जाने कब से रम रहे प्राण, ना जाने कितने युग बीत चुके शून्य मान, पर, अब की उस तट से आई है वेणु-तान, खींच रही प्राणों को बरबस ही बार-बार प्रिय, जीवन-नद अपार। दो किस विधि नद करूँ तरित? पहुँचूँ उस पार, सजन? कच्चा घट, जल-संकट, लहर, भँवर, तीव्र व्यजन; भय है, गल जाएगा यह मम तरणोपकरण, दुस्तर-सी लगती है जीवन की तीव्र धार; प्रिय, जीवन-नद अपार। तीन यदि वाहित करना था जीवन-नद वेग-युक्त,— तो यह रज-भाजन भी कर देते अग्नि-भुक्त; पर यह तो कच्चा है, हे मेरे बन्ध मुक्त, हैं इसमें छिद्र कई, और अनेकों विकार; प्रिय, जीवन-नद अपार। चार पहले इसके कि करो सजन वेणु-वादन तुम,— पहले इसके कि करो स्वर का आराधन तुम,— भेज अग्नि-पुंज, करो पक्का रज-भाजन तुम, छूट जाए जिससे यह तरण- मरण-भीति-रार; प्रिय, जीवन-नद अपार।बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें
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