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बखना के सबद : Bakhna Ke Sabad

बखना जी (लगभग 16वीं–17वीं शताब्दी)बखना जी दादूदयाल के प्रमुख शिष्यों में माने जाते हैं। वे दादूपंथ की निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े संत एवं कवि थे। उनकी वाणी में भक्ति, वैराग्य और आध्यात्मिक चिंतन के भाव प्रमुखता से मिलते हैं। दादू दयाल के शिष्यों में बखना जी का विशेष स्थान माना जाता है।

हरिभज लाहो लीज्यो रे

हरिभज लाहो लीज्यो रे।

थारो जनम सुफल सो होइ, तूँ अहलो यूँ ही न खोइ॥टेर॥

लाहो साधूं सेवियां रे, लाहो भगति कीया।

जीवन मुक्ति फल पामिये, हरि जी को नाँव लीया॥

साधां सेती गोठड़ी रे, कोटि करैं अपराध।

धनि रे दिहाडो आज को, म्हारे द्वारे आया साध॥

धन जोबन सब पाहुणों रे, आइ मिल्या दिन दोइ।

घिरती फिरती छांहडी जातां वार न होइ॥

नैणां वैणां श्रवणा रे, रसना रामइयो गाइ।

जनम सुफल करि आपणों, बखना बिलम न लाइ॥

गाइये रामइयो दातार

गाइये रामइयो दातार।

सब सुख आपै रोर कांपै, निरधारां आधार॥टेर॥

नारद सारद द्वारे गावे, कीरति करै कै बार।

नाथ तू अनाथ बंधु, दालिद भंजनहार॥

अखें अमरपद च्यारि पदारथ, देत न लावे बार।

मैं अस करिनें गाइयो, कमला नों भरतार॥

दूझै सदा भगति कै होझै, पंडित नांहि धार।

भगति भूरि दान आपै, मुकति पाडी लार॥

पीलीपहु आराधियो, म्हारा समरथ सिरजनहार।

'बखना' दरबार पहाऊ बोलै, वासन्यों करतार॥

माया बादली रे

माया बादली रे, तामैं हरि चंदा दीसै नाँहि।

तिहि कारण दुख पाइ है, कमोदनि जल माँहि॥टेर॥

माया का बादल मिल्या, चंद छिप्या ता माँहि।

मोह अंधारा ह्वै रह्या, तामैं सूझै नाँहि॥

ए बादल बहु भाँति का, पार न पावे कोइ।

नाँ बादल आघापिसै, ना रैंणि उजाला होइ॥

घात घटा बिन ऊलरै, गाजै नित अहंकार।

तन तृष्णा दिन की पिवे, यों भीगा संसार॥

रन मैं वन मैं घर महैं, घूमि रही सच ठाँइ।

बडा बड़ा गैवर गल्या, माया कादो माँहि॥

ज्ञान पवन जे संचरे, तो बादल देइ उड़ाइ।

'बखना' कँवल कमोदनी, विगसै चंद तहों दिठे जाइ॥

साहिब सुलतान तू ही

साहिब सुलतान तू ही, मैं गुलाम तेरा।

धणी तू धणियाप कीजै, मिहरवान मेरा॥टेर॥

आदि अंत तू ही जाणैं, पाना जाद तुम्हारा।

लाल बुवा लौंडी का जाया, हरि बोला हुसियारा॥

सादिया वैहल वै मीराँ, ऐसी भाँति कमाऊँ।

तुम्हारे दरबार बिना, दूरि रह्या दुख पाऊँ॥

बंदे की अरदासि यांही, साहिब सुणि लीजै।

बखनो बकसीस पावे, पाऊँ लागण दीजै॥

भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो

भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो।

दीन दयाल पतित पावन, एक तूँ ही बतायो॥ टेर॥

चौरासी लख भरमतो आयो, तुम्हारो घर नीठि पायो।

अनाथ को नाथ एक, तूँ ही ज बतायो॥

और जे बाँधै धाइ, दाम दे लीजै छुड़ाइ।

कर्म को बाँध्यो तुम्ह पै छूटै, रामइया राइ॥

सारां ही साधाँ बताई, उबरण की ठौर याई।

बूझि बखनो सरण आयो, राखि लै राम राई॥

मेरे लालन हो, दरस द्यो क्यूँ नांही

मेरे लालन हो, दरस द्यो क्यूँ नांही।

जैसे जल बिन मीन तलपै, यूँ हूँ तेरे तांई॥ टेर॥

बिन देख्यूँ तन तालावेली, विरहनि बारहमासी।

दिल मेरी का दरद पियारे, तुम्ह मिलियां तैं जासी॥

रैणि निरासी होइ छै मासी, तारा गिणत बिहासी।

दिन बिरहनि कूँ बाट तुम्हारी, सदा उडीकत जासी॥

जल थल देखूँ परवत पेखूँ बन बन फिरों उदासी।

बूझो कोई उहां थै आया, ठावा मोहि बतासी॥

फिरि फिरि सबै सयाने बूझे, हों तो आस पियासी।

बखना कहै कहो क्यूँ नांही, कब साहिब घर आसी॥

रे चित चिंता जिनि करे

रे चित चिंता जिनि करे, हरि चिंता करसी।

भांडा घडि मुह्डा किया, सोई भलैं भरसी॥टैर॥

जठर आगनि मैं जीव की, जिनि करी संभाला।

अब नाऊँ नांहि करे, ओ दीन दयाला॥

आगाही आगा लगै, यों करता आया।

भुवंग पिटारां मांहि था भख मारग पाया॥

खूहण खपी अठारहूँ भारथ बहु तेरा।

अंडा राष्या घंट दे, सो साहिब मेरा॥

सुंरजाम तिहुँ लोक का ताकै करि छाँड्या।

सो मांहे छिटकाइसी 'बखने' मुख मांड्या॥

आरती करि आरती, आतमा ऊजली

आरती करि आरती, आतमा ऊजली।

रामजी पधार्यो म्हारे, पूरवन रली॥टेर॥

तेतीस समांना ऊपरि चाढी, चँवर ढुलावे इकपग ठाढी।

पंच सबद घंटा निरवाणी, झालरि बाजै राम नांम वांणी॥

पांच पत्त को दीपक धार्यो, जोति सरूपी ऊपरि वार्यो।

दसवें द्वारि देव मुरारी, सनमुख सुंदरि पूजणहारी॥

मन पंडो तिंहि सेवा मांही, 'बखना' वारै आवे नांही॥

आनंद बधावो बाजै

आनंद बधावो बाजै, आतम केवल राम बिराजै॥टेर॥

अगर चंदन आँगनो लिपाऊँ, मोतियन चौक पुराऊँ॥

प्रेम कलस सिर ऊपरि धारों, हरि आया सामहीं पधारों।

पांच सहेली मंगल गावो, तन मन वारि वारि दरसन पावो॥

गोबल गुडी भयो उछाह, नारी नेह घरि आवो नाह।

आज म्हारै बस्ती आज म्हारै बासा, कहै बखनों हरि पुरवी आसा॥

बाणी बरसै सबद सुहावे

बाणी बरसै सबद सुहावे, कनरस भरि-भरि हरिरस पावे।

हरि भगता नें भावे॥टेर॥

साध सीप संसार समंदा, तामै लिपतन थावे।

स्वाति बूँद सूं हरिरस बरसै, मन मोती होइ आवे॥

रूप बिरप बाबा की बाड़ी, केला भेला ढाँई।

काया केलि में हरिरस बरसै, ह्वै कपूर ता माँही॥

डूँगर हरिया सरवर भरिया, नीर निंवाणा सरिया।

फूली-फूली पृथमी सगली, बाबै आनंद करिया॥

दादुर मोर पपीहा बोलै, और जलचरा जीवे।

बखना बाणी हरि रस बरसै, साध सवाया पीवे॥

तहा मन भयो रे अडोल

तहा मन भयो रे अडोल।

म्हारे मन बसियो रे, गुर म्हारा को बोल॥टेर॥

थिति मांहै थिति पाई, आगम थी सो गुरि बताई।

तहां लागो मन लाई, तहां उपजै नहीं और काई॥

चंचल था सो निह्चल कीया, जाइ था सो फेरि लीया।

ऐसा गुरि उपदेस दीया, तिहि आलंबन लागि जीया॥

सबद मांहि सतोष पाया, मन था सो तहां लाया।

कह्या सो हाथि आया, राम रमि सहजि समाया॥

जहां गुरि थापना थापी, जप करै जहां पंच जापी।

प्रगट्यों तहां आप आपी, निरखि 'बखना' सकल व्यापी॥

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