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बखना जी के पद और सबद : Bakhna Ji Pad Shabd Sangrah

 बखना जी (लगभग 16वीं–17वीं शताब्दी)

बखना जी दादूदयाल के प्रमुख शिष्यों में माने जाते हैं। वे दादूपंथ की निर्गुण भक्ति परंपरा से जुड़े संत एवं कवि थे। उनकी वाणी में भक्ति, वैराग्य और आध्यात्मिक चिंतन के भाव प्रमुखता से मिलते हैं। दादू दयाल के शिष्यों में बखना जी का विशेष स्थान माना जाता है।

बखना जी के पद : Bakhna Ji Ke Pad

आरसङी ऊजली रे

आरसङी ऊजली रे, तामै मुखङो दीठो जाइ॥
जिंहि की मैली आरसी, काठ रह्यो तिहिं ठाइ॥
काम क्रोध का मोरचा, भरम करम को काठ॥
आरसङी दीठो नहीं, कबहूँ सिकलीगर को हाठ॥
कारीगर सतगुर मिलै, सबद मसकला लाइ॥
आतम कीन्हीं ऊजली, ता मैं निरमल दरसन थाइ॥
एक तवा एक आरसी, ऊहै बहन ऊहै वीर॥
ऊहै कुसंगती थै कालो हुवो ऊहिं को निरमल देख सरीर॥
एकही आरण नीपनां, एकही घङ्या लुहार॥
दोन्यूँ एकै लोहका, बखना देखि विचार॥

बाँटो द्‌यूँ नीरों घणा

बाँटो द्‌यूँ नीरों घणा, देखी घणा चराइ॥
माथै कीया पूँछङा, या पहली खेताँ जाइ॥
तीजै व्याँइत अजहूँ व्याई, दूध घणा पण हाथि न आई॥
रात्यों दिहूँ चराई प्याई, दुहों कहाँ डोलै मछराई॥
इस का थणाँ हाथ को लावे, तो साम्ही ह्वै मारण कूँ धावे॥
बछङा आठों पहर पवावे, थण में लिसक रहण नहिं पावे॥

भजि रे मन हरिचरण

भजि रे मन हरिचरण, स्वामी असरण सरण
पतित पावन जाको बिड़द छाजै।
करम कानैं करण दुख दालिद्र हरण
बिना गोविंद क्यूँ भीड़ भाजै॥
जेथि जीव ऊबरे, काज कोई सरे,
सो नहीं कोई आपणै लोक माँही।
जीव को सगो, संसार में सोधियो
बिना गोविंद कोई और नाँही॥
तैं करम जेता किया, नहीं छटै हीया,
जीव जोलै पड्यो असति भापै।
तीन लोक मैं कहूँ ठोहर नहीं
राम बिना दूसरो कोण रापै॥
वो विरद मोटो बहै, पार को ना लहै,
तास की सापि, सुण साधू भणैं।
बात बखना बणैं, समझि घर आपणैं
चालि मन चलि मन तास सरणैं॥

भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो

भरमतो भरमतो, तुम्हारै सरणै आयो॥
दीन दयाल पतित पावन, एक तूँ ही बतायो॥
चौरासी लख भरमतो आयो, तुम्हारो घर नीठी पायो॥
अनाथ को नाथ एक, तूँ ही ज बतायो॥
और जे बाँधै धाइ, दाम दे लीजै छुङाइ॥
कर्म को बाँध्यो तुम्ह पै छूटै, रामइया राइ॥
सारां ही साधाँ बताई, उबरण की ठौर याई॥
बूझी बखनो सरण आयो, राखि लै राम राई॥

भाव भजन की भाठी आगे

भाव भजन की भाठी आगे, रांम रसायन पीवन लागे॥
भाव भजन की भाठी आगे, रांम रसायन पीवन लागे॥
देहरी कलाली तूँ जिनि नाटै, हरिरस तो है तनकै साटै॥
एक पियाला हमकों दीया, साथी सह मतवाला कीया॥
सद मतिवाले साध हमारे, तन मन कापड़ गहणैं मारे॥
सार सुधारस हिरदा धारे, हरि रस पीवे पिचका डारे॥
पीवे सदा खुमार न भागे, ल्यावही ल्याव सदा ल्यो लागै॥
नाचै गावे हरि रस राते, ‘बखना’ दादूपंथी माते॥

भो जल क्यूँ तिरो रे

भो जल क्यूँ तिरों रे, म्हारो पाँण न पूजै कोइ॥
एकही खेवट नाव बिन, डाभक डूभक होइ॥
अति ओंडो आसघ नहीं, कीजै कौन उपाइ॥
पार परोहन नीसरै, जे हरिजी होइ सहाइ॥
पाँच कुसंगी संगी रहे, भूंडा भूँडे भाइ॥
जे हूँ तिरिबा की करों, तो आधो देइ धिकाइ॥
पाँण नही पाँणी महीं, भेले पङी न वाथ॥
जे तूँ तारै तो तिरों, हरिजी पाकड़ि हाथ॥
भो सागर में डूबतां, अबकै लेहु उबारि॥
बखना देरे बूबङी साहिब कै दरबारि॥

देखी मैं डाकणी जरखि चढी

देखी मैं डाकणी जरखि चढी॥
लेवेका छोडण का नाँही, कोई अैसो मंत्र पढी॥
पाँच बीर जाकै संगि डोलै, सब जोगणी मन भावे॥
नगनि भई, चढबा कै कारणि, वन मैं जरख बुलावे॥
लापसङी का लोंदा करि करि, आपण पाइ खुलावे॥
जब यहु लोग सहर को सोवे, तबै सराडा द्यावे॥
पाडोसणि पण हाँते आई, संग मिली गटकावे॥
भूखी ह्वे तबही भख माँगे, मूँवा मसाण जगावे॥
बहुत सयाने पचिपचि हारे, कोई मंत्र न लागै॥
जाली जलै न जल में वूडै, नीसरि-नीसरि भागै॥
टूनर मंत्र सोकोत्री का सब, हरि को भजन उडावे॥
‘बखना’ अैसा गुरु हमारा, डाकणिलिया छुडावे॥
मनसा डाकणि मन जरख, दौङावै दिन राति॥
‘बखना’ कदेन ऊतरे, सांझ जिसी परभाति॥

दूध की न मूत की

दूध की न मूत की, गाइ कहे सब कोइ॥
अैसी गाइ घर वारणे, वैरी कै मति होइ॥
दूजै व्यांइत व्याई गाई, तिहि नै गूजर दुहिबा जाई॥
सावण व्यावे हाथ न आवे, तिहिं का मछर कोंण उडावे॥
ले ले ठींगा दहूँ दहोड़े, चरबा तै मन रतीन मोड़े॥
खाँट इसी छींका का फोड़े, तिहिने बखना दुहिबा लोड़े॥
चंचल चपल चहूँ दिसि दोड़े, मगरे जाती कोंण वहोड़े॥
वागिन मिलै हिली हरिहाई, भागी फिरै नहीं ठहराई॥

गावङी राखो हरि हावङी करती

गावड़ी राखो हरि हावड़ी करती, वरजो राति पसर ऊछरती॥
गावड़ी राखो हरि हावड़ी करती, वरजो राति पसर ऊछरती॥
अह निस खेत पराया खाइ, नीसरि जाइ बड़ी हरिहाइ॥
वाछा वाछी लीया संगि धावे, मांहै सांड दड़ूकतो आवे॥
जे न्यूँजो तो न्याणों तोड़ै, लातां मारि दुहावणो फोड़ै॥
ठीगैं मारै सो पसवावे, खूँटै बांधी धेन दुहावे॥
दूध घणा दे भूखां मरती, जांण मति देहु जठे पहली चरती॥
घेरि घारि ‘बखनो’ घर आणैं, नीसरि जाइ तो परमेसुर जांणै॥

हरिभज लाहो लीज्यो रे

हरिभज लाहो लीज्यो रे॥
थारो जनम सुफल सो होइ, तूँ अहलो यूँही न खोइ॥
लाहो साधूं सेवियां रे, लाहो भगति कीया॥
जीवन मुक्ति फल पामिये, हरि जी को नाँव लीया॥
साधां सेती गोठङी रे, कोटि करैं अपराध॥
धनि रे दिहाङो आज को, म्हारे द्वारे आया साध॥
धन जोबन सब पाहुणों रे, आइ मिल्या दिन दोइ॥
घिरती फिरती छांहङी, जातां वार न होइ॥
नैणां वैणां श्रवणा रे, रसना रामइयो गाइ॥
जनम सुफल करि आपणों, बखना बिलम न लाइ॥

माया वादली रे

माया वादली रे, तामैं हरि चंदा दीसै नाँही॥
तिहि कारण दुख पाइ है, कमोदनि जल माँहि॥
माया का वादल मिल्या, चंद छिप्या ता माँहि॥
मोह अंधारा ह्वै रह्या, तांथै सूझै नाँहि॥
ए वादल बहु भाँति का, पार न पावे कोइ॥
नाँ वादल आघाखिसै, ना रैणि उजाला होइ॥
घात घटा बिन ऊलरै, गाजै नित अहंकार॥
तन तृष्णा दिन की पिवे, यों भीगा संसार॥
रन मैं वन मैं घर महैं, घूमि रही सब ठाँइ॥
बङा बङा गैवर गल्या, माया कादो माँहि॥
ज्ञान पवन जे संचरे, तो वादल देइ उडाइ॥
‘बखना’ कँवल कमोदनी, विगसै चंद तहों दिठे जाइ॥

मेरे मन के माने मोहनलाल

मेरे मन के माने मोहनलाल, तोहि मिलन का मोहि बहुत ख़याल॥
भँवर भवै बन रवै नाँहि, वाकी निरत निवासे कँवल माँहि।
यों मेरा मन लगा तोहि, नैकक मिलने दीजै मोहि॥
कुंज चितारे धरणी छेव, चित नित रापै करे सेव।
यों मेरा मन चरन जाइ, लालचि लागो रहै लुभाइ॥
सीप समंदा जल भझारि, वा जल सों नांहि हेत प्यार।
स्वाति बूँद की रटै प्यास, यों मेरा मन हरि की आस॥
चात्रग कै चित बहुत चाइ, रटतो डोलै तिस न जाइ॥

पहिले व्यांइति व्याइ गाई

पहिले व्यांइति व्याइ गाई, कोण दुहै कोण मेलण जाई॥
लातां मारे बांटो खाइ, जाका बाछा बडी बलाइ॥
काजल पीपल वरण अवरणी, तीनि लोक मैं फिरि फिरि चरणीं॥
वनि वनि फिरै समंदि जल पीवे, धरणी गगन में पल फिरि आवे॥
अमृत सरवे भूखां मरती, धाई फिरै मछरका करती॥
घेरि घेरि के करुं उपाइ, तो मारगि छाड़ि कुमारगि जाइ॥

पकड़ि पकड़ि मन को बैठाइ

पकड़ि पकड़ि मन को बैठाइ, इहि विधि हरि कै सुमिरण लाइ॥
मन दौड़े देहीं बैसांणी, आसण इसा न होइ रे प्राणी।
मन फोरा देही पांगुली, भो सागर तिरवा की रली॥
जब लग मन वैसे नहिं ठाइ, तौ लग तिल भरि तिरयां न जाइ।
मन जाते का करो गरासा, 'बखना' सतगुर कह्या संदेसा॥

सब सुख आपै रोर कांपै

सब सुख आपै रोर कांपै, निरधारां आधार॥
सब सुख आपै रोर कांपै, निरधारां आधार॥
नारद सारद द्वारे गावे, कीरति करै कै वार॥
नाथ तूँ अनाथ बंधू, दालिद भंजनहार॥
अखें अमरपद च्यारी पदारथ, देत न लावे बार॥
मैं अस करिनें गाइयो, कमला नों भरतार॥
दूझै सदा भगति कै होझै, पंडित नांहि धार॥
भगति भूरि दान आपै, मुकति पाडी लार॥
पीलीपहु आराधियो, म्हारा समरथ सिरजनहार॥
‘बखना’ दरबार पहाऊ बोलै, वासन्यों करतार॥

तिहि तीरथ मेरा मन न्हावे

तिहि तीरथ मेरा मन न्हावे, जिहि तीरथ का थाघ न आवे॥
तिहि तीरथ मेरा मन न्हावे, जिहि तीरथ का थाघ न आवे॥
सो बाहरि न भीतर नेड़ान दूरि, सो जल आवे सहज हलूरि॥
मुक्ता झूलि रह्या सर पूरि, तिहिं सर न्हावे पंचू दूरि॥
अड़सठ तीरथ तिन थैं भला, तिस तीरथ मेरा मन चला॥
तिन कै न्हाये निरमल होइ, अैसा तीरथ और न कोइ॥
सुखसागर तीरथ कानांउ, तिहि सागर में डूबी पाउं॥
आठ पहर ताही में रहूँ, अैसा तीरथ और न कहूँ॥
अवरण वरण बहुत विसतार, ता का सूझै वार न पार॥
राँम कलस ता माँहू भरे, तहाँ ‘बखना’ साँपडि सेवा करे॥

बखना जी के सबद शब्द : Bakhna Ji Shabd Sabad Sangrah 



अकलि तहाँ बे अकलि

अकलि तहाँ बे अकलि, सुमति तहाँ कुमति कमाई।
बुद्धि तहाँ करि कुबुधि, पूरी तहाँ ओछी आई॥
साहिब सौं ल्यौ टूटि, जाइ औरा दिशि लागी।
सुधि बुधि का बल मिट्या, बात परचै की भागी॥
सुरति टूटि चंहु दिशि गई, ज्यों जाणौ त्यों जोड़िये।
अब बखना का बल नहीं, गुर दादू गई बहोड़िये॥

आनंद बधावो बाजै

आनंद बधावो बाजै, आतम केवल रांम बिराजै।
अगर चंदन आंगणो लिपाऊँ, मोतियन चौक पुराऊँ॥
प्रेम कलस सिर ऊपरि धारों, हरि आया सामंही पधारों।
पांच सहेली मंगल गावो, तन-मन वारि-वारि दरसन पावो॥
गोवल गुडी भयो उछाह, नारि नेह घरि आवो नाह।
आज म्हारै बस्ती, आज म्हारै वासा, कहै बखनो हरि पुरवी आसा॥

आरती करि आरती आतमा ऊजली

आरती करि आरती आतमा ऊजली।
रामजी पधार्या म्हारे , पूरवन रली॥
तेंतीस समाना ऊपरि चाढी।
चंवर ढुलावे इकपग ठाढी़॥
पंच सबद घंटा निरवाणी।
झालरि बाजै राम नाम बांणी॥
पांच तत्त्व को दीपक धार्यो।
जोति सरूपी ऊपरि वार्यो॥
दसवें द्वारी देव मुरारी।
सनमुख सुंदरि पूजणहारी॥
मन पंडो तिहि सेवा मांही।
'बखना' वारै आवे नाहीं॥

बाणी बरसै सबद सुहावे

बाणी बरसै सबद सुहावे, कनरस भरि-भरि हरिरस पावे।
हरि भगता नें भावे॥
साध सीप संसार समंदा, तामै लिपतन थावे।
स्वाति बूँद सूं हरिरस बरसै, मन मोती होइ आवे॥
रूप बिरप बाबा की बाड़ी, केला भेला ढाँई।
काया केलि में हरिरस बरसै, ह्वै कपूर ता माँही॥
डूँगर हरिया सरवर भरिया, नीर निंवाणा सरिया।
फूली-फूली पृथमी सगली, बाबै आनंद करिया॥
दादुर मोर पपीहा बोलै, और जलचरा जीवे।
बखना बाणी हरि रस बरसै, साध सवाया पीवे॥

गाइये रामइयो दातार

गाइये रामइयो दातार।
सब सुख आपै रोर कांपै, निरधारां आधार॥
नारद सारद द्वारे गावे, कीरति करै कै बार।
नाथ तू अनाथ बंधु, दालिद भंजनहार॥
अखें अमरपद च्यारि पदारथ, देत न लावे बार।
मैं अस करिनें गाइयो, कमला नों भरतार॥
दूझै सदा भगति कै होझै, पंडित नांहि धार।
भगति भूरि दान आपै, मुकति पाडी लार॥
पीलीपहु आराधियो, म्हारा समरथ सिरजनहार।
'बखना' दरबार पहाऊ बोलै, वासन्यों करतार॥

मेरे लालन हो, दरस द्‌यो क्यूँ नांही

मेरे लालन हो, दरस द्‌यो क्यूँ नांही।
जैसे जल बिन मीन तलपै, यूँ हूँ तेरे तांई॥
बिन देख्यूँ तन तालावेली, विरहनि बारहमासी।
दिल मेरी का दरद पियारे, तुम्ह मिलियां तैं जासी॥
रैणि निरासी होइ छै मासी, तारा गिणत बिहासी।
दिन बिरहनि कूँ बाट तुम्हारी, सदा उडीकत जासी॥
जल थल देखूँ परवत पेखूँ बन बन फिरों उदासी।
बूझो कोई उहां थै आया, ठावा मोहि बतासी॥
फिरि फिरि सबै सयाने बूझे, हों तो आस पियासी।
बखना कहै कहो क्यूँ नांही, कब साहिब घर आसी॥

रे चित चिंता जिनि करे

रे चित चिंता जिनि करे, हरि चिंता करसी।
भांडा घडि मुह्डा किया, सोई भलैं भरसी॥
जठर आगनि मैं जीव की, जिनि करी संभाला।
अब नाऊँ नांहि करे, ओ दीन दयाला॥
आगाही आगा लगै, यों करता आया।
भुवंग पिटारां मांहि था भख मारग पाया॥
खूहण खपी अठारहूँ भारथ बहु तेरा।
अंडा राष्या घंट दे, सो साहिब मेरा॥
सुंरजाम तिहुँ लोक का ताकै करि छाँड्या।
सो मांहे छिटकाइसी 'बखने' मुख मांड्या॥

साहिब सुलतान तूं ही

साहिब सुलतान तूं ही, मैं गुलाम तेरा।
धंणी तूं धणियाप कीजै, मिहरबान मेरा॥
आदि अंत तूं ही जाणै, पाना जाद तुम्हारा।
लाल बुवा लौंडी का जाया, हरि बोला हुसियारा॥
सादिया वैहल वै मीरां, ऐसी भांति कमाऊँ।
तुम्हारे दरबार बिना, दूरि रह्या दुख पाऊँ॥
बंदे की अरदासि याही, साहिब सुणि लीजै।
बखनो बकसीस पावे, पाँव लागण दीजै॥

तहा मन भयो रे अडोल

तहा मन भयो रे अडोल।
म्हारे मन बसियो रे, गुर म्हारा को बोल॥
थिति मांहै थिति पाई, आगम थी सो गुरि बताई।
तहां लागो मन लाई, तहां उपजै नहीं और काई॥
चंचल था सो निह्चल कीया, जाइ था सो फेरि लीया।
ऐसा गुरि उपदेस दीया, तिहि आलंबन लागि जीया॥
सबद मांहि सतोष पाया, मन था सो तहां लाया।
कह्या सो हाथि आया, राम रमि सहजि समाया॥
जहां गुरि थापना थापी, जप करै जहां पंच जापी।
प्रगट्यों तहां आप आपी, निरखि 'बखना' सकल व्यापी॥

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