चेतनदास जी री रचना संग्रह (हाड़ौती ) : Chetandas Ji Rachna Pad
चेतनदास (1733–1777) हाड़ौती अंचल के रामस्नेही संप्रदाय से जुड़े संत-कवि थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भक्ति, आध्यात्मिकता और राम-नाम की महिमा का प्रचार किया। हाड़ौती क्षेत्र की संत परंपरा में उनका महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।
चेतनदास जी की कुंडलियां : Chetandas Ji RI Kundaliyan
जग धूतै रांडां करै ब्याज चलावै दाम
जग धूतै रांडां करै, ब्याज चलावै दाम।हल हांकै गाडा खडै, यो नहीं साध को काम।
यो नहीं साध को काम, बहुत पाखंड चलावै।
तांकू बरजै नाहिं, बड़ौ मोहि अचरज आवै।
मेटै दया र त्याग कूं, कहण न देवै राम।
जग धूतै रांडां करै, ब्याज चलावै दाम॥
झूठौ सुख संसार को चेतन सो थिरि नाहिं
झूठौ सुख संसार को, चेतन सो थिरि नाहिं।निसि वासर पचि पचि मरै, फुलि रहया मन माहिं।
फुलि रहया मन माहिं, करम करता नहीं डरपै।
सुमरै नाहीं राम, कपट माहीं तन अरपै।
राम भज्यां सुख पद लहै, गिरह धंध भौं माहिं।
झूठौ सुख संसार को, चेतन सो थिरि नाहिं॥
माया में मां नीसरै ग्रिह सूं होय उदास
माया में मां नीसरै, ग्रिह सूं होय उदास।राम भजन में रत रहै, सतसंगति में बास।
सतसंगति में बास, भोग दुख दायक जाणै।
मानसा बाचा होय, गुरां सूं बाणक बाणै।
कह चेतन या विधि भयां, लहै ब्रह्म में बास।
माया में मां नीसरै, ग्रिह सूं होय उदास॥
सतगुरु का परताप की महिमा अगम अपार
सतगुरु का परताप की, महिमा अगम अपार।रवि ज्यूं करि परकास, तिमिर सब दूरि गुमाया।
कल्प ब्रिच्छ को रूप, चाहि कोइ रही न काया।
दत ज्यूं ग्यान उदार, मिल्या सूं संसै खोई।
दे राम नाम ततसार, दूरि कीनी सब छोई।
जन रामचरण की सरण में, मिटि जाइ जम की मार।
सतगुरु का परताप की महिमा अगम अपार॥
चेतनदास जी की साखी : Chetandas Ji Sakhi Sangrah
नाम निरणै को अंग
राम भज्यां रामै मिलै, और भज्यां कुछ नाहिं।कूकस गाहौ लाख बर, चेतन कहा है माहिं॥
ररंकार रहता पुरुस, देह धारी माया जाणि।
देह धारि कै देह कूं भजै, क्यूं पहुंचै निरवाणि॥
जळ बूड़त जळ कूं गहै, कैसे होय उबार।
कह चेतन वे बूडसी, कदै न पावै पार॥
चेतन को चित तहां लग्यौ, जहां तेज पुंज को राम।
देह धारी चित राम सूं, नहीं हमारा काम॥
गुण तत सेती रहित है, नहीं काय नहिं माय।
चेतन सुमरै राम सो, नहिं आवै नहिं जाय॥
कह चेतन पुस्तग महीं, सिरै देखिल्यौ राम।
समदर सिला तिरावतां, लिख्यौ न दूजौ नाम॥
हीरा परखै जूहरी, रूपौ हेम सराप।
चेतन परखै नाम कूं, सो मिल्या ब्रह्मा में आप॥
निज नाम पाय गाढौ गह्यौ, चेतन सुलझ्या प्राण।
राम नाम सो जाणिये, मोहि सतगुरु की आण॥
प्रेमप्रकास को अंग
स्तुतिराम निरंजन ब्रह्मजी, पुनि सतगुरु सब दास।
जन चेतन वंदन करै, करि करि बहुत हुलास॥
अंग
प्रेम खुलण की जुगति की, याही बड़ी उपाय।
अंग
प्रेम खुलण की जुगति की, याही बड़ी उपाय।
चेतन पहली सीर थी, अब दरिया उमग्यौ आय॥सायर उमग्यौ सहज में, धरि ररंकार को ध्यान।काया बन पीवत रहै, चेतन अद्भुत ग्यान॥काया बन पीवत रहै, भयौ डहडयौ पूरि।जहां पंछी प्यासा मरै, चेतन उडि गया दूरि॥राम भजन सूं खुलि गया, प्रेम तणा दरियाव।लोभ मोह अर काम को, चेतन लगै न डाव॥राम नाम इंम्रत भर्यो, ज्यूं बादळ में मेह।कह चेतन सुमर्यां खुलै, नहीं प्रेम को छेह॥सुमरै सांस उसांस ले, राम नाम ततसार।चेतन जब इंम्रत खुलै, यामें फेर न सार॥इंम्रत पीवै संतजन, बैठा दसवैं द्वार।काम क्रोध मद लोभ कूं, चेतन वां लिया मार॥राम नाम का ध्यान से, खुलै प्रेम की सीर।चेतन ता रस के पियां, सीतल भयौ सरीर॥राम नाम का ध्यान से, देख्या औघट घाट।कह चेतन अे कुण लखै, गुरां बताई बाट॥औघट घाटां जळ चढै, ढळै गगन में सोय।चेतन ता रस के पियां, अणभै वाणी होय॥चेतन तन में बह गई, प्रेम भालि भरपूरि।निसि वासर कसकत रहै, पल नहिं होवै दूरि॥चढ़तां कसकै पीठि में, ऊतरतां सब देह।चेतन बरसै रैणि दिन, नहीं प्रेम को छेह॥बंक नाळि होइ चढ़त है, बरसै गगन मंझारि।कह चेतन जहां हो रही, ररंकार झुणकार॥प्रेम घटा अैसे झरै, ज्यूं सावण का मेह।रोम खड़ा होइ जात है, चेतन भीजै देह॥सुरति सबद दोउ रमत है, हौद सुषमना माहिं।चेतन वहां इंम्रत झरै, पल हूं खंडै नाहिं॥राम भजन सूं पाइया, प्रेम तणा दरियाव।कह चेतन अब मिटि गया, मन का आन उपाव॥
राम निरंजन ब्रह्मजी, पुनि सतगुरु सब दास।
विनती को अंग
स्तुतिराम निरंजन ब्रह्मजी, पुनि सतगुरु सब दास।
जन चेतन वंदन करै, करि करि बहुत हुलास॥
अंग
बांह गह्यां की राखियो, सुणूं रामजी टेक।
अंग
बांह गह्यां की राखियो, सुणूं रामजी टेक।
चेतन तो चूकां भर्यो, तुम बगसौ गुन्हा अनेक॥
मैं अबला कुछि बल नहीं, तुम हरि राखौ माम।
दीन होइ चते न कहै, प्रगटौ केवल राम॥
भगति कियां तुम परगटौ, सो हम कीन्हीं नाहिं।
पतित जाणि किरपा करौ, तो हम भी पतितां माहिं॥
धूत विद्या जाणूं नहीं, नहीं चातुरी कोय।
चेतन के तो अेक है, राम करै सो होय॥
राम करै सो होयगा, और न करता कोय।
चेतन तू चूकै मती, भजतां होय स होय॥
टालेड़ी के ब्रिच्छ है, ज्यूं मच्छी के नीर।
यूं चेतन के राम है, कै दूजा गुरु पीर॥
वांके सरणै तन बचै, यां सरणै जम मार।
यूं चेतन के ब्रिछ नीर ज्यूं, हरि गुरु है आधार॥
कह चेतन धनि रामजी, आछी करी सहाय।
मैं तो चाल्यौ फंद दिसि, थे सरधा दई बंधाय॥
राम निरंजन ब्रह्मजी, पुनि सतगुरु सब दास।
विरह को अंग
स्तुतिराम निरंजन ब्रह्मजी, पुनि सतगुरु सब दास।
जन चेतन वंदन करै, करि करि बहुत हुलास॥
अंग
जागत सुक्ख न सोवतां, कहूं न लागै चित्त।
अंग
जागत सुक्ख न सोवतां, कहूं न लागै चित्त।
जन चेतन कह बिरहनी, मिलौ रमइया मित्त॥
दुखी बहुत दीदार बिनि, निसि दिन आठौ जाम।
कह चेतन अब बिरहनी, मिलौ सनेही राम॥
सोवै कहा सुखिया नहीं, राम मिलण को चाव।
कह चेतन अब लगि रह्यौ, निसि दिन अेक उपाव॥
चेतन जा घटि आव करि, बिरहा करिहै गाढ।
वहां मांस कहां पाइए, कै नस अर कै हाड॥
बिरहा परचडं परजलै, धवै धवणि ज्यूं ध्यान।
तपति मेटि सीतल करौ, प्रगटौ क्रिपानिधान॥
आडा पड़दा दे रख्या, अेक महल में बास।
कह चेतन क्यूं भुगतिए, आठ पहर की त्रास॥
रो रो बिरहनि रोइ ना, धीरज धरि मन माहिं।
तेरा सिर परि गुरु खड़ा, राम मिलै पल माहिं॥
चेतनदास जी के पद : Chetandas Ji Ke Pad
पलक माहिं मर जाणा प्राणी
पलक माहिं मर जाणा प्राणी।पलक माहिं मरजाणा, कहा रंक कहा राणा॥
बहुत भांति करि पचि पचि मरिहै, ग्रिह बंधन के काजा।
मरती बरियां जाय अकेलौ, कहा रकं कहा राजा॥
हिंसा कपट सूं माया उपजै, कहै भागवत माहीं।
ग्रीह द्रव्य कोइ संगि न चालै, करम भार ले जाहीं॥
वर ब्रह्मा को ले नहिं ठार्यो, सिव का वर दिसि जोई।
काळ सबन कूं बीणि र खावै, देह धारी वा कोई॥
गहि बिसवास र राम सुमरिये, अन तन को हरि दाता।
चेतन सतगुरु सरणौ भारी, राखै दोजिग जाता॥
राम बिना को तेरा, यो जग जम का घेरा
राम बिना को तेरा, यो जग जम का घेरा॥बेटा बेटी पाळै पोखै, बड़ा होण की आसा।
मरि जावै कै होइ दुखदाई, यूं जग जाय निरासा॥
करै कमाई माया जोड़ै, भेळी करि करि सेवै।
लाव ल्हसकर राज लूटि ले, घर का खाण न देवै॥
राव रैति सारौ जग देखौ, रावण से सिकदारा।
रीता हाथां होइ करि चाल्या, माया चली न लारा॥
साचा सतगुरु सोधि र कीजे, ग्यान जिनूं को लीजे।
झूठौ झंझट छाड़ि जगत को, राम रसाइणि पीजे॥
सतगुरु सरणै जे जे आया, सुखी भया कलि माही।
चेतनदास चिताय कहत है, और ठौर सुख नाहीं॥
चेतनदास जी, पद, Chetandas Ji, Kundali, Pad, Sakhi
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