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सूर्यमल्ल मीसण ( बूंदी रा राजकवि ) की रचनाएँ : Suryamalla Misan

सूर्यमल्ल मीसण

परिचय


जन्म–निधन
1815 – 1868
जन्म स्थान
हाड़ौती, राजस्थान
प्रमुख रचनाएँ
वंश भास्कर, वीर सतसई
भाषा
डिंगल एवं राजस्थानी

सूर्यमल्ल मीसण राजस्थान के प्रसिद्ध डिंगल कवि और इतिहासकार थे। उनका संबंध हाड़ौती क्षेत्र से था और वे वीर रस की काव्य-परंपरा के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना वंश भास्कर में राजस्थान के इतिहास और राजवंशों का विस्तृत वर्णन मिलता है। वीर सतसई उनकी वीरतापूर्ण काव्य-दृष्टि और राजस्थानी साहित्य में उनके महत्त्व को दर्शाती है।


सूर्यमल्ल मीसण के छंद : Suryamalla Misan Ke Chhand 

अन्नल सुत जयसिंह देव

अन्नल सुत जयसिंह देव भूपति समर्थ हुव।
पाई जिहिं प्राचीन भाग्यबल करि निधान भुव।
गढ बिंटुलि बिच गड्डि धर‌यो जनक सु कढ्यो धन।
बीसलसर सन बीस कोटि आखनि लिय अप्पन।
धर्माधिराज अर्जित धनहु लाय खोज अगनित लये।
पहिले निधान उभय हि सुपहु द्विजन बंटि अविरत दये॥


अग्गैं परिसर अटत करत

अग्गैं परिसर अटत करत स्वसखिन सह क्रीड़न।
कंदर जमुना कूल ढुंढ वह निरखि तपोधन।
पुज्ज ताहि पय प्रनमि मंगि बर लियउ जथामति।
अठ्ठ अधिक सत सखिय रहै इक थान बंधि रति।
संतति प्रवीर पावहिं सकल ललित इष्ट यह जिहिं लयो।
कमला सु व्याहि सोमेस कंहं दायज बहु तोमर दयो॥

भूप बलवंत दुर्ग नीरमय

भूप बलवंत दुर्ग नीरमय अद्रिमय अस्समय,
अैसे इष्ट काम मय बखानैं जात।
बनमय मिट्टीमय मरुमय मर्तमय दारुमय,
अेहि जगती में जोग्य जानैं जात॥
अच्छे पहिलैं द्वै इन में रु षट मध्य के जेम मध्य,
ओ अंतिम कों अधम प्रमानें जात।
अन्न जल दारु घृत तैल नालि गोले आदि,
दुर्ग बिच संचय समस्त न के ठानें जात॥

छंद पादाकुलकम्

पर्बत तब तिनके पल्लीपति, सब मैंनन मेरन रचि संगति।
रोकीय आनि मग्ग गिरि घांटो, इत उत असह बढावन आंटो॥
हो पट्टनि चालुक्य सचिव जंहं, ता प्रति नाहर सुह्रद मिल्यो तंहं।
पृतना बलि चहुवानन उप्पर, बिखम थान लखि सजी धराबर॥
पित्थल इत दाहिन मग पद्धर, आवत हो पत्तन मंडोवर।
मिलि तिहिं जुब्बनराव बीचि मग, बुल्लयो इत किय व्यर्थ पग॥
मारव तो तजिगो मंडोवर, पत्तो धर गुज्जर सीमा पर।
उतके पथ बन दुर्ग बिखम अति, अरु तस चालुक सचिव मित्रमति॥
यातैं लहि दुर्गम भुव आश्रय, गब्ब धरत प्रतिहार तत्थ गय।
पथपेदी कोउ न है पास हु, सो तुम जावत अग्ग निकास हु॥

छोटे बड़े सैनिक छ भेद

छोटे बड़े सैनिक छ भेद पहिलो जो मौल,
पीढ़िन तैं सो वसवर्त्ती विसवास धाम।
भृत्य नाम दूजो जो अधीन कीनों वेतन दै,
तीजो मैत्र मित्रता सों आवै जो सहाय काम॥
सोहि श्रेण समय अधीन जाकी आश्रिता,
आटविक सो जो बनवासी सवरा हि ग्राम।
सो अमित्र है जहं दबायो अरि आश्रित व्है,
मुख्य त्रिक मुख्य चौथौ मध्य खिल नेष्ट नाम॥

धकि तोपन घमचक्क

धकि तोपन घमचक्क अग्गि लग्गिय धर अंबर।
ओलन गति दुहुं ओर असह गोलन आडंबर।
सलिल निवानन सुक्कि तजत पत्रन भुरसे तरु।
देस अनूपहु दहत महत झंखर बनिगो मरु।
हडुहु चलाइ रोके अहित तारागढ़ सन तोप तति।
किन्नों बिहाल मंडुव कटक गजब डारि पबि पात गति॥

एकादसि दिन प्रात नयर

एकादसि दिन प्रात नयर प्रबिसत वह रक्खस।
जुज्झत हनि तव जनक तिहिं सु खायो परिकर तस।
बहुरि बसावन द्रंग मनुज तव जनक बुलाये।
खाये ते सब खोजि कतिक भज्जे अकुलाये।
अजमेर बहुरि संभर नगर सुत तब खंधावार दुव।
उद्यान रहत क्रव्याद भय हेय सबन वह देस हुव॥

गागरोणि अचलेस सजे गढ

गागरोणि अचलेस सजे गढ, रण बहु बरस किये रावण रढ।
असुचि मन्त्र दिल्लीस उपायो, बारि पटकि गोपल बिगड़ायो॥

इत दिल्लिय कनउज्ज उभय

इत दिल्लिय कनउज्ज उभय उरझे कछु कारन।
बिजयचन्द्र रठ्ठोर चढ्यो तोमर संहारन।
सोमेश्वर यह सुनत सज्जि दिल्लिय सहाय पर।
पहुंच्यो लै दल प्रचुर ताहि आवत सुनि तोमर।
संक्रमि अनंगपालहु समुख मिलि स्वगेह लैगो मुदित।
इक थाल बिरचि दुव नृप असन हुव प्रसन्न करि परमहित॥

इत पत्तन अजमेर तजिग

इत पत्तन अजमेर तजिग आनंदमेय तनु।
सोमेस्वर तस सूनु भयो भूपति मघवा मनु।
पट्ट लहत जिहिं प्रबल गज्जि गुज्जरधर गंजिय।
मरुधर जैसलमेर भुम्मि दब्बि रु अरि भंजिय।
दलि रन अनेक खुरसान दल धारापति रनधीर हनि।
सबनृप हटाय प्रतप्यो सुमति बसुधातल पुरूहूत बनि॥

जरैं अपेय अचळ जळ जाणे

जरैं अपेय अचळ जळ जाणे, तोड़े अरर मुच्छ कर ताणे।
मथे जवन दळ उदधिखीर मित, अचळ हुवो तिलतिल सुर अंचित॥

झमकि सोम असि झरत

झमकि सोम असि झरत परत बरबर प्रबीर पर।
बिजयचंद्र दल बिकल भज्यो सिर गिरत घोर भर।
दइव भद्र इत उदित जुद्ध हुव मच्छरीक जय।
स्वबपु घाय चउसठ्ठि लहे करि अरिन महालय।
सतपंच करी हय भट सहंस पहु दोउ न इतके परे।
प्रतिभट हजार पंचक प्रमित उतके धारन उत्तरे॥

कक्षा उर सिथिल प्रलम्ब

कक्षा उर सिथिल प्रलम्ब थूल कुक्षि गल,
पेचक मृगेंद्र दृष्टि मंद कै अे मानें हैं।
ह्रस्व रद सूंडा कंठ मेहन उदार लोम,
कर्ण पय थूल नैन मृग कै बखानें हैं॥
मिश्र के अे चिन्ह सब मिश्रित मुनिन कहे,
तीजो अंग बाजी तास भेद बहु ठानें हैं।
जैसो खेत जाको तैसो रूप रय अर्घ आयु,
सत्व बल विक्रम प्रतीत पहिचानें हैं॥

कुमर दूत रनकाज

कुमर दूत रनकाज अग्ग पठये मंडोवर।
नाहर भटन बुलाय कह्यो न भलो इत संगर।
संक्रमि सोझति सरनि नैर पट्टनि लै अप्पन।
मिलि मित्रन सन मुररि रारि गंजहिं रिपु दप्पन।
करि यह प्रपंच लै निज कटक गुज्जरधर अंतिक गयो।
चहुवान समुख मैंनन चमू भट अटकन भेजत भयो॥

मधुणिभ दंत जाकै जंघन

मधुणिभ दंत जाकै जंघन बराह सम,
चाप सम बंस मद सुरभि हरित व्है।
रक्त मुख ओठ तालु नैन मधु पिंगल व्है,
सुंडादंड वृत्त मृदु लोम आवरित व्है।
वृत्त पीन कंधरा पयोद सम गाज जाकी,
सप्त कर ऊंचो मत्त पावन चरित व्है।
नखर अठारह बावीस अैसो जा नृप कै,
भद्र गज होइ तासों दुर्जन दरित व्है॥

रजनि जाम खिल रहत बज्जि

रजनि जाम खिल रहत बज्जि गुड प्रखर बकत्तर।
अस्ववार हुव उभय सूर तोमर अरु संभर।
बिजयंत्र सु कबंध अनखि उततैं पहुंच्यो इत।
इततैं तुरग उठाय मिले ए नृप समुद्रमित।
सेना कबंध अहिव्यूह सुनि विपतिव्यूह संभर बिरचि।
ब्रहमंड अजक डारत बहुरि तमकि जुरे रसउग्र तचि॥

सम्भरीक खिच्ची जिण संतति

सम्भरीक खिच्ची जिण संतति, भुजबळ अनड़ हुवा बहु भूपति।
आहणि जंदराव धर अब्बू, पुणु कबंध हणियो रण पब्बू॥

सविया दोय मुहुक्कर्मा सुत

सविया दोय मुहुक्कर्मा सुत, जिके पढण बितरण रण जयजुत।
अग्रज रामचंद्र मन उज्जळ, खिच्चीराज अनुज गाहण खळ॥

तातारी दळ अतुळ साजि रमजान कुतुब सह

तातारी दळ अतुळ साजि रमजान कुतुब सह।
मुगल साह तैंमूर आइ दिल्ली जय आग्रह।
सक चोवन चउ सोम हांकि संका विणु हैंबर।
पाणीपथ लग पूगि धणी बणियो आरिजधर।
महमूद मीर निरखे निबळ कचरघाण घमसाण करि।
मंडियो तखत दिल्ली मुगल कातर बंस पठाण करि॥

सूर्यमल्ल मीसण के गीत : Suryamalla Misan Ke Geet 


दगौ विचारै फेरियौ अंगरेजां लोगां चौगिड़द्दौ

दगौ विचारै फेरियौ अंगरेजां लोगां चौगिड़द्दौ,
तासा बंबी झड़ंदा, तेड़ियौ नाग ताय।
भाल घांचौ फेरियौ, खैह री हूंत छायौ भाण,
बाघलौ केहरी ‘चैन’ घेरियौ बलाय॥1॥
माचै खाग झाटां राचै तंवाई छ खंडां माथै,
रत्रां आट पाटां नदी बहाई रोसाग।
पाथ थाटां जंग रूपी कुबांणा नवाई पांणा,
सत्राटां वेढियौ थाटां, सवाई सौभाग॥2॥
सुणै घोर तासां, आसमाण लागियौ सीस,
सत्रां धू ‘चैन’ रो खाग वागियौ समूळ।
कोपै ‘हण’ आसुरां विभाड़वा आगियौ किनां,
सिंधुर पाड़ेवा सूतौ जागियौ सादूळ॥3॥
देखतां एहवो जंग धड़क्कै आगरो दिल्ली,
बंबी जैत मागरा रड़क्कै बारंबर।
झड़क्कै खाग रा बाढ, भड़क्कै कायरां झुंड,
हमल्लां नाग रा माथा रड़क्कै हजार॥4॥

गीत महारावराजा रामसिंघ हाडा बूंदी रौ

बागे नकीबां अताई हाक हरोळां जलेब बधै,
उरोळां उछाह मंडै करोळां अथाह।
कोह हाकां केड़ै लाग रेड़ै लाग बंब जोस खाथे,
सारदूळां रोस माथे छेड़े रामसाह॥
हकालै अझाड़ां चौतरफां नरां फौज हल्ले,
भल्ले जठै बोल दे दकालै के भाराथ।
अजौ दूजो गाढ़ेराव गयंदां बकालै असां,
प्रळै काळा मयंदां दकालै प्रथीनाथ॥
भत्ते आप हालणां धरंतां पांव मट्ठां वाळा,
सिपाहां सालणा रट्ठां घट्टां वाळा सीर।
कीधां छत्र सट्टावाळां चग्गावै आपाण काचां,
काळकी-सी छट्टा वाळां जगावै कंठीर॥
सिकारां रंजाक यूं साहां रा साल दूजै सतै,
ऊभै ही राहां रा कीधौ जाहारां आपांण।
घासांहरां थाहरां में काल रा धका सै घांचे,
चौड़ै धाड़ै नाहरां चकासै चाहूवांण॥

गीत महारावराजा रामसिंघ हाडा रा

गजब धाक दध लगा आठूं पोहोर पूगता,
चोहोर मुख ऊगतां खलां चूभौ।
सजे किम नींव वत्रधर अवनी सही,
अजै छत्रधर रामेण ऊभौ॥
पियै जळ केहरी गाय इक घाट प्रति,
भुजंग सिखरे हरी इकठ भाळो।
कळू क्रत बधाळत जपै दुनियाण किम,
अदाळत तपै बिसनेस वाळो॥
रिमहरां वहण पतसाह सरणे रहण,
चाह कर कीरती लहण चित पै।
क्रम ग्रहण नीच दुनियाण न करें करां,
पाण रो महण चहुवाण प्रतपै॥
जोर की माड साहंस रावण जिसै,
बीजलां वंस सीमाड़ बाढ़ौ।
साहियां उछब उरजाद आचां,
सुपोह हिंदवां तणी मुरजाद हाडौ॥

गीत ठाकुर खुसालसिंघ आउवा रौ

डांण ठेलै तूं मातंगां भड़ां डाचरा उबाड़ डाकी,
मूंछां तांण पैलै तूं कंपनी गंजै माल।
काट थाणो रेळै तूं स्त्रयणां जमी जोस खाथै,
खसतो खपांणां माथै झेलै तूं खुसाल॥
जिकां जिकां ओद्रावा पडतां लारै जेण लागी,
तिकां तिकां कायरां करेण लागी ताय।
राजा रौ कड़ूबो है कंपियो लारै जेण लागी,
आउवै नाथ रै चूंबे देण लागी आय॥
आछा आछा..आछा आछा..आछा आछा..
पाछा पाछा भूपती देण लागा पांव।
दूजा वीर काळ रै सुभाव खुसाल रै देखै,
गाजै रिड़माल रै अगंजी गाढ़ेराव॥
मेवाड़ ढूंढ़ाड़ ज्योंहीं हाड़ौती मालवो मोलौ,
दोळां काल चक्र सो किणी न आवै दाय।
झाले किसौ तो विनां पयाळ जाती काळ झांप,
लाडली पंगुळी चांपा अंगुळी लगाय॥

वीरलोक

इळा न देणी आपणी, हालरियां हुलराय।
पूत सिकावै पालणै, मरण बडाई माय॥1॥
पायौ हेली पूत नूं, सोमल थण लिपटाय।
अचरज अतरै जीवियौ, क्यूं न मरै अब जाय॥2॥
बिण नूतै घण पाहुणा, हेली ठलिया आय।
जाणै पीव परूसणौ, भूखौ हेक न जाय॥3॥
धण नूं आळगसी धणी, सुणियां वागौ सार।
हालीजै उण देसड़ै, प्राणां रौ व्यापार॥4॥
निधड़क सूतौ केहरी, तो भी विमुहा पाव।
गज गैंडा धीर न धरै, वज्र पड़ै बघवाव॥5॥
पग पाछा, छाती धड़क, काळौ-पीळौ दीह।
नैण मिचै साम्हौ सुणै, कवण हकाळै सीह॥6॥
तुंडां गज, फेटां तुरी, डाढां भड़ औझाड़।
हेकण कोलै घूंदिया, फोजां पाथर पाड़॥7॥
बंबी अंदर पौढियौ, काळौ दबके काय।
पूंगी ऊपर पाधरौ, आवै भोग उठाय॥8॥
बिण माथै वाढै दळां, पोढै करज उतार।
तिण सूरां रो नाम ले, भड़ बांधै तरवार॥9॥
टोटै सरका भींतड़ा, घाते ऊपर घास।
वारीजै भड़ झूंपड़ा, अधपतियां आवास॥10॥


सूर्यमल्ल मीसण रा छप्पय : Suryamalla Misan Ra Chhappay 

असवारी उतरै दसमी पूजन नृप साजै

असवारी उतरै, दसमी पूजन नृप साजै।
आप चढै असि पूठ, बळोवळ त्रंबक बाजै॥
बिसंटाळा कज बिहद, ब्यास कमधज बतलाया।
वरधीचंद नाहरो उभै लंका मझि आया॥
दससीस हूंत कहियौ जदन, भगति भाव अति भेस सूं।
जानकी हेर सब तज जिलौ, आण मिलौ अवधेस सूं॥

ब्रह्मा अर ब्रहस्पति

ब्रह्मा अर ब्रहस्पति, बेद मों आगळ बांचै।
दसही भड़ द्रगपाल, सदा सेवा मुझ सांचै॥
किन्नर गंध्रब किता, संगीत उचारै।
नारद आवै नति, सदा मुझ कारज सारै॥
सुरराज सदा राखूं सरण, अप्प रहूं अति मान सूं।
झट खगां बीस बिसवा झळै, मिळै न रांवण रांम सूं॥

इम रावण ऊचरै

इम रावण ऊचरै, भ्रात कूंभेण जिसा भड़।
सुतन इंद्रजीत सा, इसो लंका गढ उन्नड़॥
प्रहसत सा परधांन, मान असुरां सुर मारण।
खाह समंदर खार, कोट कंचन बड़ कारण॥
अन्नेक लार सेना अधिक, धर लंका गढ़ धांम सूं।
झट खागां बीसबिसवा झल्लै, मिळै न रावण रांम सूं॥

इंद्रजीत सुणि एम

इंद्रजीत सुणि एम, कह्यौ रावण सूं हित करि।
कितौक दळ रांम को, सरब मारूं समहरि॥
रथ साजै चढि रीस, ईस बर मांगि अभंगी।
चोड़ै चढि चालियौ, राम सेना चतुरंगी।
थरहरे जमी परबत थरर, नाद घरर त्रंब नाम सूं।
उण बार आय भड़ियौ असुर, रावण को सुत राम सूं॥

इंद्रजीत सूं एम

इंद्रजीत सूं एम, कहि रावण जदि कटंक।
जाव लड़ौ जुध मांझ, रांम सेना सुं इक रुख।
अब तौ या आ बणी, मरौ साम्हां चढि सम्मर।
बेटा अब बाप को, काज सारौ इसड़ी कर।
पाछा न पाव धरजै प्रकट, आधाइ दीजै अवनि।
जुध भड़ण रांम सूं जोरवर, पूर अबै व्हैजा पवन॥

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