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बाबा रामदेव जी लोक देवता रा सबद : Lok Devta Ramdev Ji Ka Sabad

साधो भाई मूळ भेद विचारा

बाबा रामदेव

साधो भाई मूळ भेद विचारा।
इक ब्रह्म दुई कर दरसै, रचिया सकळ पसारा॥
चेतन समान विशेष होय ईश्वर, किया जीव विस्तारा।
ब्रह्मा विष्णु किया शिव स्वामी, पाँच तत्त्व गुण सारा॥
रजोगुण ब्रह्मा,सतोगुण विष्णु, तमोगुण शिव औंकारा।
दसूं इन्द्रियाँ रजोगुण क्रिया, सतोगुण देव अपारा॥
तमोगुण पाँच तत्त्व कर रचिया चवदह लोक संसारा।
सब में अंश ईश्वर कर देखो, चली शक्ति री धारा॥
पै’ली पंथ चलायो शिव शक्ति, महा धरम विस्तारा।
ईश्वर नेम दिया शिव शक्ति, रिया निकलंक निज नियारा॥
च्यारूं खांणी,बांणी, थिर चर जीव उपाया।
अंतरजामी आप अखंडी, रचना उणांरी छांयां॥
जमी आसमांन सूर अर चंदा, सप्त समुन्द्र रचिया।
नवसै नदी उडगण नवलख, अंत प्रकाश कराया॥
अरबद निरबद कळपै बहुता, अड़ा-औड़ा जुग रचाया।
चार चौकड़ी कळप रचाया, जुग आरम्भ गाया॥
सतजुग त्रेता, द्वापर कळु थापिया, जैड़ा सिमरथ राया।
रिषी मुनी मिलकर साख बांधी, ईश्वर अखंड रहाया॥
सात द्वीप नौ खंड बणाया, चौबीस अवतार विस्तारा।
जळ पर धरण चहूँ दिश राची, ग्रह गोचर विस्तारा॥
बोलिया रामदेव रचना देखी, किया अनंत नर नारी।
अनेक रचना कही नई जावै, जैड़ा धणी अपारा॥

सुणजो ग्यान गोष्ठी री बातां

बाबा रामदेव

सुणजो ग्यान गोष्ठी री बातां।
ओर आरंम तो अनेकूं कर ली, उळटी आवै घातां॥
बंधा पाळै बंधण में आवै, निरबंदी होय रहणा।
सिमरथ नैं दोष नई कोई, निरभै रोप्या थाणा॥
नीति-अनीति सही कर समझे, माया ब्रह्म पिछांणै।
सिष्टी-मुष्टि दोनां सूं दूरा, इण विध अनुभव आंणै॥
जीव यूं ब्रह्म आत्मा, यानै समझै माया।
ग्यान जुगत सूं कारण जांण, कुण ब्रह्म कुण माया॥
मन में मंत्र-तंत्र री सिद्धि, ग्यान हुओ कछु नांई।
दोनूं भगति दिल रैवै, और करतब कहो कांई॥
निरबंधण सोई निरंजण पावै, समदिष्ट होय रहणा।
एको जाणै दुविधा कहो कांई, अनुभव अंदर लेणा॥
मेटो भेद-अभेद कर लेणा, दुरमत दूर मिटाया।
अनेक रीति और कर देखौ, है सब त्रिगुण माया॥
नाम रूप सब माया दरसै, धरम-पाप कहो कांई।
ऐड़ी भूल पड़ी निज मांही, सिमरथ गुरु समझाई॥
करतब मिटियो कमाई पावै, तीरथ व्रत नई जाई।
भागा ज्यांरा भरम-करम सब मिटिया, दोनूं करम मिटाई॥
ग्यानी सिमरथ गुरु कर लीजौ, अधूरां नै गम नांई।
बंधिया आप औरां नै बांधे, पूरा गुरु मुगति दिलाई॥
भगति धरम अर करम-उपासना, तीनूं पद तांई कांई।
अभय ग्यान चौथो पद पावै, सिद्ध रामदेव गाई॥

हां रे बीरा ओ संसार अथग जळ भरियौ

बाबा रामदेव

हां रे बीरा ओ संसार अथग जळ भरियौ,
नीर नजर नईं आवै।
ओ संसार अथग जळ भरियौ रे, म्हारा लाल॥
हां रे बीरा सत री नाव गुरु खेवटिया,
बैठी पार हो जावे म्हारा लाल।
डूबै जिकै नर करणी रा हीणा रे,
बिन विश्वास दुःख पावै म्हारा लाल॥
हां रे बीरा तीन पांच एकण घर लावै,
धीरज धजा लगावै म्हारा लाल।
नेम धरम मल्लाह दोय आछा रे,
समझ नै नाव हलावै म्हारा लाल॥
हां रे बीरा हालै नाव समंद रै कांठै,
सत रौ पंथ बुवारै म्हारा लाल।
चूका जिकै जळ बिच डूबा रे,
फेर ऊंचा नई आवै म्हारा लाल॥
हां रे बीरा जग सूं तार उतारै पार,
वै नर संत बाजै म्हारा लाल।
कैवै रामदै साचा संत अभय हुय जावै,
जम सूं नई डरै म्हारा लाल॥

देखो भाव भगति री बातां

बाबा रामदेव

देखो भाव भगति री बातां।
भाव विचारो भूल मत राखौ,मेटौ दिल री सांसा॥
अपणा भाव जांणौ थारै जैड़ा,दुतिया दूर हटावी।
अपणा भाव सफळ कर लीजौ,गुरु रौ वचन निभावौ॥
धारण धरम सही कर लीजौ,कपट दूर रखावौ।
भाव भगति भूल मत जाइजौ,जद थे मुगति पावौ॥
अपणै भाव सूं चेतन दरसे,अैड़ो भाव लगावौ।
अपणै भाव सूं माया दरसे,जैड़ो मन फळ पावी॥
अपणै भाव सूं बंधन दरसै,गुण गोविन्द रा गावौ।
अपणै भाव सूं भगति कीजै,इण विध सूरत लगावौ॥
अपणै भाव सूं गुरु अर चेला,तन मन सेवा करावौ।
मन में सदा शान्ति राखी,जद भगति पद पावौ॥
अपणै भाव सूं भगति कीजै,पंच कळेश मिटावौ।
तन मन धन गुरु नै अरपौ,सतसंगत में जावौ॥
अपणै भाव सूं सब जुग त्यागौ,ममता मार हटावौ।
गुरु री सेवा निज मन कीजै, तीनूं ताप मिटावौ॥
अपणै भाव सूं जड़ चेतन में, चेतन चौगस करावौ।
तीरथ व्रत भाव सूं मेटौ, जनम मरण नई आवौ॥
अपणै भाव सूं ग्यान ध्यान सब, हिरदे प्रीत लगावौ।
अपणौ धरम अखै कर जाणौ, निज मन गुण गावौ॥
संवत चतुरदस साल नवमें, श्रीमुख आप जगायौ।
भणै रांमदेव चैत सुद पांचम्, अजमल घर में आयौ॥

नाथ निकळंक देव कुण है

बाबा रामदेव

नाथ निकळंक देव कुण है?
पूछो जूना जोगियां नै, पूरा पंडितां नैं,
नेम मंडप छावीया तो नेम रा गुरु कुण है?
इण्ड रा सरूप कुण है,
पृथ्वी रा रूप कुण है?
अनाद री स्तुति कुण है,
वेद री जात कुण है?
रणुकार रौ रूप कुण है,
ओंकारी अजर कुण है?
अजर जोगी बजर कुण है,
संत री तो सार कुण है?
संत री तो पार कुण है,
धर्म री तो धार कुण है?
तत्त्व री तार कुण है,
ब्रह्म रो विचार कुण है?
आकाश रौ तो मूळ कुण है,
पवन रौ तोल कुण है?
रवी रौ डोळ कुण है,
अवाची रौ वाच कुण है?
प्रमांण रौ सूत कुण है,
बांजड़ी रौ पूत कुण है?
घट मांईलौ भूत कुण है,
जोग में अवधूत कुण है?
चले ध्रुव जिकी राह कुण है,
बीजळी रौ बियाव कुण है?
सागर रौ थिराव कुण है,
शिखर चढ़े बिन पावै कुण है?
नाथजी रौ लिंग कुण है,
भवानी रौ भग कुण है?
ईश री अर्धागिणी कुण है,
भग में जोत जागी जिकी देवी कुण है?
नाथजी रौ नाद कुण है,
जुगां पेली जात कुण है?
संन्यासी री साख कुण है,
परमपद प्रमांण कुण है?
पांच पेड़ी पाठ कुण है,
पाठ रा प्रमाण कुण है?
परवांणा रौ प्रेम कुण है,
हरि डाळी हेम कुण है?
दरवेशां रौ दास कुण है,
ईश रा उपकार कुण है?
साखियां री साख कुण है,
प्रेम बायक पड़दे मेळा जिका मिळणी कुण है?
अमर क्रिया कळस कुण है,
कळस री करतूत कुण है?
जोगियां री जुगत कुण है,
जुगत मायली मुगत कुण है?
साध ज्यां री सुरत कुण है,
सुरत मायली नुरत कुण है?
देवतां री दिष्टी कुण है,
दिष्टी में दिदार कुण है?
पड़दे भेळा पाँच कुण है,
पांचां रा आचार कुण है?
धरम रौ विचार कुण है,
संत सेनी मुगती लावै जिको सेनी कुण है?
जग रा नेम व्रत कुण है,
पड़दे वायक प्रेम कुण है?
तेतीसां री साख कुण है, राय झालने तिरीया कुण है?
तिरीया जिको क्रिया कुण है?
पड़दे रा दस दोष कुण है,
पायळ मांही पोख कुण है।
अजर प्याले मोख कुण है,
सोळा बेड़ी सेंस मंत्र कुण है?
अड़सठ तीरथ काया में कुण है,
असंग जुगां री माया कुण है?
अटळ विरख री छाया कुण है,
अजर प्याला पीया कुण है?
सती रौ सत धर्म कुण है,
अजपा रौ मरम कुण है?
ओंकारी आद कुण है,
आद रौ अनाद कुण है?
साध ज्यां री रीत कुण है,
प्रजा री परीत कुण है?
प्रेम री प्रतीत कुण है,
अखै धरम ले पाट मिळसी, ज्यांरी मिळणी कुण है॥
पाट रा परवांण पूरा,
बांचसी कोई संत सूरा।
अजमाल नंद समझ छांण,
बोलिया अवतार बाणी, गुरु गम सूं निरवांण है॥

तोई राणी निज धरम अधिकार है

बाबा रामदेव

तोई राणी निज धरम अधिकार है।
भाइड़ां सूं भाव राखो गुरां सूं प्रतीत, बोले रांमदे कुंवर है॥
पृथ्वी कोस पचास दीजौ, दान कनक सुमेर कीजौ।
चिंतामणि कल्पबिरख, पारस कामधेनु समापौ॥
लाख हीरा लाख माणक, पन्ना किरोड़ पचास है।
गंगा तट दान करे, तोई निज धरम अधिकार है॥
किरोड़ कुंजर कनक भरिया, गउ किरोड़ पचास है।
किरोड़ मण गउ-घास आपी, तोई निज धरम अधिकार है॥
भोम गऊ दान तुरी, लाख अठारै हजार है।
पुष्कर दांन आपी, तोई निज धरम अधिकार है॥
किरोड़ कन्या धर्म परणाव, देवे दान अपार है।
पृथ्वी री परकमा कीजै, तोई निज धरम अधिकार है॥
करै जग अश्वमेघ कोटि, गंग तट निज सार है।
विप्र किरोड़ अठियासी जीमै, तोई निज धरम अधिकार है॥
हेम तुल में भेंट देवै, गऊ लख चार है।
रतन चवदह दान देवै, निज धरम अधिकार है॥
तप करै ले काशी, करवत धरै।
गंगा सागर छाप ले, तोई निज धरम अधिकार है॥
जुग चारों सेवा साजै, ऊंधै शीश सार है।
एक मन विश्वास राखै, तोई निज धरम अधिकार है॥
पदम नागण नेम झेलिया, इंद्र कहिजे अवतार है।
मिले प्याले भ्रांत राखै, सोई भगति अनादर विचार है॥
सेंस धारा इंद्र बरसै, अखंड इमरत धार है।
उण धर्म सूं बासक थापियो, जमीं हंदा भार है॥
जुगां पै'ली अमर जोगी, परमांण रै पार है।
ओस रा अलील राणी, पूजे धर्म निज या सार है॥
शंकर रै घर अटळ भगति, इंद्रनेम आधार है।
शक्ति शंकर विष्णु ब्रह्मा, वे ही पूजै धर्म निज सार है॥
वेद विरला ग्यान गीता, ध्यान तपस्या सार है।
तेज तुरीया विणज करिया, वे साधु सुचियार है॥
हरष मन सत धर्म अपणाओ, सोई तेतीसां लार है।
सो नर पूगसी प्रमांण, बोल्या रांमदे कुंवार है॥

है दुरळभ साध कळू में पूरा

बाबा रामदेव

है दुरळभ साध कळू में पूरा, निकळंक करणी सदा निकाळ।
सुणजौ बात असंग जुग पैलां री, कळजुग आवतां करौ संभाळ॥
भायां च्यार जुगां री एक चौकड़ी, असंख चौकड़ी पुळ परकास।
ज्यां पै’ली दाता सरब नीं होता, वां दिनां रा सुणी विचार॥
निरगुण तीनूं नार उपाई, नेम झेलिया निरगुण नाथ।
बीज थावर रौ मेळ बंधियौ, इळा-अंबर (इड़ा-अमर) कियौ परकास॥
बीरां वां दिन बिंदु किया विस्तारा, तीन देवां मिळ परकास।
गगन अगन घर पवणा पाणी, इंड फोड़ किया लोक पैदास॥
अखै सुन्न अटळ अविनासी, तीन देवां रै माथै दिया हाथ।
लिछमी-विष्णु, सावितरी-बिरमा, सगती-शिव किया विकास॥
सिवराणी नेम पाळिया, निस-दिन पूरय्या पाठ।
कर पियालो परमेसर पूज्या, सोजी पड़ी बिंदु परकास॥
नरहर गुरु करी थापना, नेम लिया दसूं अवतार।
निज धरम री बांधो बेड़ी, सत धरम सूं उतरो पार॥
कर परकास पिरथी ऊपर, सुर-नर-मुनि दसों अवतार।
बध्या धरम हुया विस्तारा, रतना तणा हुया बोवार॥
सतजुग में पहळाद सिंवरिया, रिष मार्कंडेजी रै लाग्या पाँव।
गुरु नरहरि नेम झेलिया, पाँच किरोड़ पहळाद री लार॥
सतजुग लार तारणौ तेता, रिष मातंगजी कियौ उपकार।
गुरु वसीठजी नेम झेलिया, सात किरोड़ हरचंद री लार॥
कुंता माता सती द्रोपदा, सत धरम री बांधी पाज।
गुरु दुरवासा नेम झेलिया, नव किरोड़ जुधिष्ठर री लार॥
निकलंग देव नेम झेलै, रिष मार्कंडेजी करै उपकार।
बारै किरोड़ उबरिया जांरी, जुग चौथे व्हैला सार॥
रिख रौ राज राम मत भूली, कोई भूल्या भरम रै जाळ।
बीती पौ'र घड़ी दिन लारै, सतवादियाँ नैं लेसूं लार॥
दसल्या भगत काढ़द्यो बारै, कूकर बिणज करै बोपार।
सोजी पड़ी सबद परवाणै, निकलंग पियालो सदा निकाळ॥
दसल्या करम कियो मिळ, दुरमत दुविधा दोषण जाळ।
कर-कर निंदिया पड्या नारकी, डूबूड़ां री झाली चाळ॥
साध गुरु कर बूझौ, साची राखौ सबद री सार।
काळ किरोध नै कानै करदौ, लेखौ लेसी बाबो बारंबार॥
बावन पदम संत व्है भेळा, पेड़ियां बंधसी नव लाख।
धरम निजार पूजै साध, सदा ज्यांरा मोटा भाग॥
पांचां ,सातवां, नवां, बारवां, मिळसी पोकर पावन पाट।
रिष मार्कंडेजी पाट विराजै, निकलंग होसी कोटवाळ॥
रीत पूरबली चालो संतां, मत भरमो भूल्यां री लार।
नुगरां री गत कदै नीं हुवै, सतवादी सुगरा व्है पार॥
बांणी अलख री सांभळी साधो, तन-मन कर गाढ़ा बोवार।
अजलम सुत रांमदे भणै, निज नांव री बेड़ी उतरै भव जळ पार॥

रळमिळ रेवौ हेत सूं हालो

बाबा रामदेव

रळमिळ रेवौ हेत सूं हालो, कठिण पंथ है खांडै री धार।
साचा जिकै नर रांम रंग राच्या, हरि भज उतरै परलै पार॥
पहलां सबद सून्य मांहि होता, अलख निरंजण पूजा थाय।
तीनूं देव नै माया सगती, परगट करया निरंजण राय॥
मूंगा सबद सूंगा कर दीना, मथ इमरत कर नाख्यौ खार।
हंसलां री होड करै नर बुगला, नीं पहुंचे वै परलै पार॥
झीणी-झीणी चाल साध गत चालै, मन लालच रुळियांरां लार।
मांयलै रौ मेल करयौ नीं अळगी, बिण करणी क्यूं बाजै साथ॥
पांचू दौड़ करै रस भोग, मनवो भयौ मगन महाराज।
भूल्यौ जाय गांव गम चूकै, लेखौ लेवै बाबो सिरजणहार॥
पांचूं विषय वश कर राखै, सुरता करै सबद री लार।
तज अभिमांन मेट देवै आपौ, जद बाजै परियाणी साध॥
चेतन रेवौ चाल मत चूकौ, गुरु वचनां सूं करी वौहार।
अजमल सुत रामदेव बोलै, सब में सायब है इकसार॥

साधो भाई संगत शरण आवै

बाबा रामदेव

साधो भाई संगत शरण आवै।
तन मन वचन तीनां सूं सेवा, गुण गोविंद रा गावै॥
भगति करै ज्यांरी भव दुख भागे, जो कोई करतब जांणै।
नवधा भगति निरंजण दरसे, पांचूं परचे आंणै॥
भगति करै भेद नई जांणै, वै कांई अभे पद पावै।
देखा देखी सब कोई करै, स्वारथ सूत लगावै॥
भगति कर ब्रह्म में मिळिया, वै चौथा पद पावै।
गुरु गम ग्यान ध्यान जप करणी, अपणी अणभव पावै॥
खण पांचूं छवूं परचै लैणा, निरंजण धावै।
काम किरोध कानै कर देवै, भगति पूरण पद पावै॥
पद सेवा संतां री भगति, निज मन शीश निवावै।
कर सिंवरण माला कोई फेरै, निवण डंडोत करावै॥
दरसण जावै देव उपासी, धूप अर दीप चढ़ावै।
आ रीत जांणै कोई साधु, भव जळ सूं तिर जावै॥
सब कोई रीत गुरां सूं पावै, बिन गुरु विरथा जावै।
मन रै मतै कहो कुण सीधै, मूरख मूळ गमावै॥
भगवत गत भगति सूं पावै, आठू जाम नेम निभावै।
धुर लग पूरौ धणीं यूं धावै, कोई शंका नई लावै॥
समझै सैन बेण में पूरा, जग बंधन नहीं आवै।
संत समागम नित जाय कीजौ, श्रवण मगन करावै॥
द्वारका सूं आया रूणीचे, अजमल भगति भारी।
भणत रांमदेव सरणै रइजौ, भगति कठण करारी॥

सुणलौ गुरु गम ग्यान निहारी

बाबा रामदेव

सुणलौ गुरु गम ग्यान निहारी।
गुरु किरपा गोविंद गत जाणौ, आवै भरोसौ भारी॥
ग्यानी गुरु भव दुख सगळा मेटै, अग्यानी आप उळझावै।
मंगतां आगे मंगता मांगै, भूल्या औरां नैं भूलावै॥
गुरु बिना ग्यान ध्यान नईं पावै, संसय कौण मिटावै।
सरणै आयां री संका सह मेटै, निरभै मुगति पावै॥
केई गुरु इसा आरंभ कर, भला ढूंग पाखंड चलावै।
पे'रै भेख भरम रा भांडा, यूँ कांईं मुगति पावै॥
भेदी जकौ भरमै नई कदै नीं पाखंड बणावै।
वेद सास्त्र परचै करिया, भळै न पाछौ आवै॥
आपो नई खोजै औरां नै परमोदै, भूल्या नै भरमावै।
जळ डूबै जळ गह धारा, दूणौ पींदै जावै॥
अग्यानी गुरु नई कीजै, नहचै नाव डुबोवै।
ज्यूं सांग बहरूपिया बाजी, यूँ भूल्या भेख बणावै॥
सिमरथ गुरु सांसौ सब मेटै, निजमन होय ध्यावै।
लट भंवराँ ज्यूँ गत होई जाई, होय भंवर उड़ जावै॥
घर-घर में चेला कर लेवै, स्वारथ लोभ लगावै।
आसा लागी आसरी बांधै, चादर धोती मंगावै॥
गुरु गोविंद एक कर जाणौ, चवदह लोक गुरु सम नांईं।
गुरु महिमा बरणी न जावै, वेद सास्त्र सगळा गावै॥
बालीनाथ गुरु सेन बताई, निज धरम रै मांही।
अजमल सुत रामदे भाखै, अपणै में आप समाही॥

दुर्लभ साध कळू में पूरा

बाबा रामदेव

दुर्लभ साध कळू में पूरा,
ज्यांरी कळजुग जातां करूं संभाळ॥
भूल्या जिकै किण विध मिळसी,
आद गुरु रा मान्या नी उपकार।
सीखे सबद अरथ नईं जाणे,
वां नुगरां नै देस्यूं टाळ॥
सीखे सबद भेद नई पावै,
तन मन दरसै दोय निजार।
आत्म बिना असल नई मांनै,
ऊघै मारग हालै संसार॥
सूझै साच ऊदर रह उळटा,
वायक धरम बिना करै बोवार।
भेट भरम रांम नई मांनै,
विषयां तणा करै व्यभिचार॥
पुळ बिना पाट किण विध पूरै,
रहणी कळस धरम उपकार।
पांच सबद बिना पड़दो बांधै,
मांनै नई असल आधार॥
साधु जिकै सरव गत हालै,
समझ गुरां रा पूजै पांव ।
करणी बिना रहे कण काचा,
नेम बिना दरसै निराधार॥
बैठो साधु भेष कर,
कांई पूजै, आंधो संसार।
बुगला काग करै कचरोळो,
बाचाहीण व्है बेकार॥
बैठो जोगी अलख कर पूजै,
सूझै नई सबद री सार।
निकळंक केरी पेड़ियां दुख पावसी,
गुपत पड़ै गुरजां री मार॥
गुपत रिया तीनों जुग पै'ली,
प्रगट भयो कळि अवतार।
ओगण करै असल नई मानै,
साध कळू सूं देस्यूं टाळ॥
एक बूंद रौ अमर प्यालो,
दूजो है कळजुग रौ काळ।
रोळम रोळ भरम कर भूल्या,
वां नुगरां नै देस्यूं टाळ॥
दोय पुरषां सूं सुर नर सीध्या,
दोय पुरषां सूं जती अवतार।
अजर अमर म्हारौ दुर्लभ पूजो,
अमर दान झेलै सचियार॥
पड़दे धरम अलख री पूजा,
शिव नगरी पूगा सचियार।
पेड़ी पांच धरम तुलै,
आगे अलख धरम है अपरंपार॥
आद अलख रा अथंग प्याला,
नेम धरम री बांधी पाळ।
चवदह लोक असंख जुग ऊपर,
निकळंक प्यालो अखै निजार॥
'रांम कंवर' लखै निज नामा,
शिवजी सबद करै उपकार।
बारह किरोड़ नै कदी नईं विसरूं,
असंग जुगां रा म्हारी लार॥

भायां देखो माया पद नै हेठो

बाबा रामदेव

भायां देखो माया पद नै हेठो।
ईश्वर अचळ विराट कहीजै, भली विधि साखी भेंटो॥
जमी आसमान आद ले देखो, रवि शशि उडगण माया।
नवसै नदियां निनाणु नाळा, सात समंदर माय॥
चवदा तबक इकीस ब्रमंड, आवत जावत माया।
बोलत वचन में सब ही आवै, उपजै सब ही माया॥
बोलै मौन पीवे अर खावै, सब अनछर है माया।
बैठे गवण सोवै अर जागै, औ सब देखो माया॥
पुत्र परिवार कुटम अर भाई, औ सब धोखा पाया।
जो कोई ग्यान कर देखौ, घटत बढ़त सभी माया॥
पाँच तत्त्व गुण तीनूं जांणै, तत्त्व चौबीस माया।
प्रेरक सही कर सोधौ, त्यागौ तिरगुण माया॥
उपजै खपै घरै अवतारा, करम की फांस बंधाया।
चेतन इण में चौकस कर ली, तजी पदारथ माया॥
राज तेज थिर नांई रैवै, सब परळै में आया।
यां सूं वैराग राखे कोई साधु, दरसै सारी माया॥
जगत करम कोई कर देखी, दूणा संकट पाया।
अंत समय तो रीतौ जावै, ऐसी दुष्टण माया॥
प्रविरत होय नर रैवै निविरत, अग्यानी गम नई जांणै।
इण विध ग्यानी बधै नई बंधण, माया मिटै ब्रह्म पिछांणै॥
तंवरां रै घर जामी पायौ, आप कुल में कंवर कैवाया।
अजमल सुत रामदेव दाखै, मेटी तिरगुण माया॥

निज आनंद म्हें ओळख्यौ है जी

बाबा रामदेव

निज आनंद म्हें ओळख्यौ है जी,
ऊग्यौ सहजै सूर॥
वचन बुद्धि सूं ओ पार है जी,
इसड़ो अद्भुत नूर।
कलम क्रिया पहुंचे नई जी,
लिखूं तो होय कूड़॥
जप तप उणनै लागे नई जी,
मुगति रहत मंजूर।
करम क्रिया सारा थाक गया जी,
हुय गया चकनाचूर॥
बाहर खोजतां घर में मिल गया जी,
बाज्या म्हारे अनहद नूर।
साच कहूं म्हे सांसा मिटग्या है जी,
ऊगी म्हारै ग्यान अंकूर॥
वारी हो वारी बालीनाथजी,
म्हे तो परस्या जरूर।
रामदेव परचो पायौ है जी,
सब में समाया पूरमपूर॥

देखो भायां जोग जुगत सुखदाई

बाबा रामदेव

देखो भायां जोग जुगत सुखदाई।
बिना जोग विजोग नीं होई, यूं अणभै उपजाई॥
अष्ट अंग जोग जप क्रिया, आसण चौरासी मांही।
पदम आसण धर पवन चढ़ावै, सुरता सिंवरण लाई॥
छवूं समाधि समझे सतगुरु सूं, दोय समाधि फळ पाई।
सविकळ्प पुरुषार्थ जांणै, निरविकल्प निरभै पाई॥
छवूं करम जोग रा जांणौ, नेती धोती बस्ती जमाई।
त्राटक न्यौळी बस्ती, सूरत समझ घर पाई॥
दसूं पवण परचै कर लेणा, दसूं बाजा शिखर में पाई।
दसवें दरवाजे झिगमिग ज्योति, दरसिया देव वां मांही॥
पूगा धाम परम पद पायौ, गुरु गम सूं गत पाई।
जोग विजोग जद मिळिया, तिरविध ताप मिटाई॥
मिळिया पीव मगन भई पियारी, आयौ भरोसो भारी।
सुखमण सेनी जाय निरखिया, मिळी पीव सूं पियारी॥
दसवें द्वार फोड़ डंड मेरु, अगली भोम म्हांरी।
उळटा पवन संग चली पियारी, दरस्या देव अपारी॥
सेंसदळकमळ सनमुख दरसे, रीझी राजवण पियारी।
अणहद नाद अनेकूं बाजै, भळे न हुवै अब नियारी॥
अजपा जाप अमर फळ पायौ, सतगुरु सूं गम पाई।
आठूं जांम एकसर देखी, हमें नीं धोखौ कांई॥
इण देश ने कोई बिरळा जाणै, अवर बावै करम रा भारा।
कहे रांमदेव सुणी भाई साधों, औई देश म्हांरा॥

अवतार रामा लखो नामा

बाबा रामदेव

अवतार रामा लखो नामा, साथ सार सांभळे।
अमर बीज जो हाथ झेल्यी, जिकै भूल्या क्यूं फिरे॥
आ विध जाणसी कोई संत साचा, ब्रह्मवाचा देवता दरसण करै।
एक तुल असमान तोलै, जिकै जम सूँ क्यूं डरे॥
कठण क्रिया क्रूर मारग, अजर जरणा कुण जरै।
मरजीवा संत जलम पायो, चोट घण री वै सहै॥
हाथ सजीवण लियां डोलै, जिकै जम सूं क्यूं डरै।
अमर बीजक हाथ लाग्या, जिकै भूल्या क्यूं फिरै॥
धरण कूआ असमान बाड़ी, पावन पुळ पाणी चढ़ै।
अमर फळ असमान पाक्यौ, जिकी विध बिरला करै॥
एरण माता धरण जाई, सुमेरु वांरा पुत्र है।
इंद्र नै आसीस दीन्हीं, भांण ससि हरि साख है॥
पांव पियाळां सीस अंबर, जिकै जोगी जग घड़ै।
पवन पाणी पुत्र वांरा, तीन गुण सेवा करै॥
पांच तत्त्व प्रकाश ऊपर, त्रिवेणी पूजा चढ़ै।
अखे जोगी अमर आसण, अलख रै भेळी मिळै॥
जिकै बोवै जिकै ऊगे, जिकै गुरु प्रमाण है।
ज्यांरी बांधी सृस्टि हालै, जिकै सघड़ दिवांण है॥
बिना पाणी पुत्र खेले, धरण पैली धार है।
लोक चवदा जिकै घड़िया, जिकै ही अवतार है॥
ॐ सोऽहम् बिरम साजै, रणुकार आधार है।
नाम तो अबीज वांरौ, आद जात अनाद है॥
सहस्र इंद्र भांण शशि अर, ब्रह्मा विष्णु सार है।
सुर नर देव पाट पूज्या, वो आपो आप है॥
वेद बिरला ग्यान गीता, ध्यान तपस्या सार है।
तेज तुरिया बणज करिया, निज धरम अधिकार है॥
सहस्र करणी किरोड़ क्रिया, एक अक्षर पार है।
पार में प्रमांण खोजौ, सोही संत री सार है॥
पांच देव पाट बैठा, निज धरम अधिकार है।
छट्टौ निकलंक ठिकांणै, बिना सत बेकार है॥
सुर लोक ऊपर सैस जोजन, प्रमळा रै पार है।
ऊरस ऊपर पुरस खेलै, चवदा लोक विस्तार है॥
शोध सबदां तोल बोधां, जपै अजपा जाप है।
प्रमाणी नर पूगसी ज्यांरा, असंग जुगां सूं राज है॥
महापद प्रमांण गाया, सहस्र पेड़ी ऊपरै।
बोलिया अजमाल सुत, कोई साध नै सोझी पड़े॥

ध्रुव लग पहुंच्या धणी नै ध्याया

बाबा रामदेव

ध्रुव लग पहुंच्या धणी नै ध्याया, जिकै पाछा नई आया।
ब्रह्म में वै समाया, जिकै सहजै सुरत लगाया॥
बिण स्वासा सुमरण किया, सहजै जोगी सून्य में पाया।
दुतिया दुविधा भाव तजिया, तज जीव ब्रह्म होया॥
करता करम अकर्ता बंधन में नीं पड़ता नीं मरता।
निडर होय निज सरूप निरखता, अपनी धुन में ध्यान करता॥
नई माय नई बाप, अपनै आप विचरता।
नईं अजपा नई जाप, नई करणी करता॥
चंदा नीं सूरा सहज नूरा, निकट निकटा नई दूरा।
सहज बाजा अणहद तूरा, अपणै में आप पूरमपूरा॥
नई देवा नई सेवा, एकाएक अलख अभेवा।
बिण पायां कुण जांण्या, अलख अगोचर देवा॥
हंस रौ हाल हंसा जांणै, बुगला जांणत नांय।
कहे रांमदे सुणो भाई साधो, ब्रह्म महिमा बरणी न जाय॥

साधो भाई म्हें हूँ नेड़ै सूं नेड़ौ

बाबा रामदेव

साधो भाई म्हें हूँ नेड़ै सूं नेड़ौ।
दूर जांणै ज्यांनै दुरमत कहिजै, पावै कष्ट घणैरौ,
साधो भाई म्हें हूँ नेड़े सूं नेडौ॥
पाँच तीन जो कहिजै भेद नईं जांणे म्हारौ।
इण सूँ नेड़ी रहूँ हरदम, इण सह नै प्रेरौ॥
मन बुद्धि चित्त अहंकार चारूं, म्हारो रूप नई हेरौ।
साथ रह इयां नै नई सूझै, हुय रयौ अंधेर घणैरौ॥
सबसूं पैलां म्हें ई इक हुतौ, पछै हुयौ है बखेड़ौ।
सगळा समेट एक में करलौ, औ सगळौ रूप म्हारौ॥
आपौ आप में जग सगळौ, अरस-परस करलौ म्हारौ।
सकळ संसार आंख थकां आंधौ, भेद बीजौ संतां रौ॥
सही कर जांणौ साधो, थांरौ चेतन नीं है म्हांसूं न्यारौ।
केवै रांमदेव सुणौ भाई साधो, निज अवतार पतियारौ॥

उण दिन आलम आवसी

बाबा रामदेव

उण दिन आलम आवसी, इसड़ा मंडेला मंडांण भाई।
स्वेत घोड़े श्याम चढ़सी, आप लेसी अवतार निकलंक राम भाई॥
नव लाख नखतर माळ सजिया, किया ससि अर भांण।
सात सायर मेरु पर्वत, नव सो नदी निवांण॥
धवळ सिर धारा ठाणी, कंवळ बासंग नाग।
थंभ बिन आकास थाम्यौ, सोई सदर दीवांण॥
नव किरोड़ कुंजर घुरै, थरहरै घर असमांन।
अमी धारा इंदर बरसै, भरसी नीर निवांण॥
षट रस अन्न उपजाविया, जड़ उद्बुद खांण।
अठारभार बणराय, फूलै फळे निरवांण॥
आप कंवर नाग नाथ्यौ, थाग्यौ जळ प्रमांण।
गूजरी रै घर आणंद बरतियौ, कळाधारी आंण॥
सात सायर महण मथियो, कियो मेरु मथांण।
मार रावण लंका लीनी, मंदोदरी सिर हांण॥
बीज थावर पूनम पड़वा, तीज लेसी मलांण।
वासंग राजा रौ नेतरो कियौ, रतन चवदा मांण॥
जति लिछमण बांण साँधियौ, मारियौ मेघनाद सिर तांण।
पांचू पांडू करण साथै, धूजसी धरा पाषांण॥
पांचां सूं पहळाद आवसी, सातां हरचंद रांण।
नौवां सूं युधिष्ठर आवसी, बारां बाबो आप प्रमाण॥
नव पद माया मैंगी पड़े, पाखर हस्ती किरोड़ पच्चास।
तेतीस किरोड़ रथ आवसी, पैदल रौ नहीं पार॥
आलम रा दळ आवसी, छायो गिरदां भांण।
संत सूरा लड़े सनमुख, कालिंगड़ा सिर हांण॥
हडूमांन बायक झेलसी, फिरै नवखंडां आंण।
उत्तर दिखण पूरब पिछम, सेंस दळ प्रमाण॥
सिद्ध चौरासी बावन भेरू, आवसी नवनाथ।
अगम निगम जंगम जोगी, श्याम रै दळ साथ॥
कोप सायब रौ दुष्ट दळसी, मारसी महसांण।
काढ़ तिलक पाट बैठे, फिरै नवखंडां आंण॥
स्वेत घोड़ा स्वेत गुरजां, स्वेत ही पिलांण।
सायब रा दळ सही होसी, कळू रे दळ हांण॥
चित्तौड़ चंवरी दिल्ली डेरा, बाजसी सुर तांत।
हिंदू तुरक एक पियालै, बाबो भांगसी भ्रांत॥
इळा अंबर पळटसी, पळटै ससि अ’र भांण।
बोलिया सिद्ध रांमदे आगम रा अहनांण॥

घोर-घोर शंख बाजसी

बाबा रामदेव

घोर-घोर शंख बाजसी, तुरियां तंग तणेला।
आगम भाखै रांमदे, जुग चौथे में बरतेला॥
पिछम धरा सूं दळ ऊमटै, आलम आप आवेला।
धोळा नेजा फरहरै, गिरदां भांग छिपेला॥
गेहूं चिणा दळ में आवसी, गिणवां नाज बिकेला।
नीर नदियां रा मिट जावसी, जळ तो टांकियां तुलेला॥
पै'लां बड़ाबड़ बामणां, पाछे वाणियां नै पकड़ेला।
पाछै जुगत विहूणां जोगियां, ज्यांने जकड़ेला॥
ए’ड़ौ पवन बाजसी, परबत पाखांण उड़ेला।
रूई ज्यूं परबत जावसी, गिर मेर उड़ेला॥
सेंस किरण सूरज तापसी, धरणी तांबा वरणी व्हैला।
तेल कड़ावां ऊकळेला, इण विध नीर तपैला॥
लाखूं मण लोह गळेला, जिणरी चौडाळ घड़ेला।
हसती एरावत जुतसी, वासंग नेता बणेला॥
सवा लाख मण लोह गळेला, ज्यांरी घांणियां घड़ेला।
अनड़ जोधा इनवी जागसी, ज्यांरी तेल पड़ेला॥
पांच लाख दळ दिवला जुपसी, ज्यां में तेल भरेला।
दीप मशालां चांनणै, सायब तुरा टांकेला॥
दिल्ली डेरा देवसी, चित्तोड़ चंवरी रचेला।
धोळो घोड़ो हर रे हांसली, सायब मेघड़ी परणेला॥
हंस बुगला काळा व्हैला, कोयल कागा धोळा बणेला।
चारूं खूंट आलम फिरै, रिषिजन साख भरेला॥
निज धरमी संत साचा, हर री हाजरी भरेला।
आगम भाखै रांमदेव, जुग चौथे में व्हैला॥

अबै थां सांभळी जुग संत सारा

बाबा रामदेव

अबै थां सांभळी जुग संत सारा, अलख रा प्रमाण न्यारा।
चार जुगां री राय पूछौ, अलख गुरां रा पाँव पूजौ।
पाँव पूज्यां पारख पड़ेली, तंवर रामदे सांची भणै॥
कर क्रिया अर करम लागौ, अखै मारग अखंड।
जाणता ईं अजाण होग्या, निपट आंधा वै फिरै॥
करतूत काचा विचल वाचा, कुणसी तिरणी वै तिरै।
पार रा प्रमाण पूछे, आप घट ताळा जड़ै॥
साध सती रौ भरै कांकण, भ्रांत मिळ चोरी करै।
चार जुगां रा नेम लिया, कालर भगति क्यूं करै॥
मन मैला जाय पहलां, स्वार्थ रा सौदा करै।
अलख सेनी नई मांनै, लोभ रा लूंदा भरै॥
एक भगति अलख लेखै, दूजी कमसल करै।
काग बुगला करम मांड्या, अलख बाड़ी ऊजड़े॥
हंस बुगला बैठ भेळा, चुगण तो मोती चुगे।
सेंस धारा गुप्त गंगा, जकै परगट क्यूँ करे॥
एक बुध है संत री, दूजी दोजख पड़ै।
तीजी हरि नांव पियाले, करतूत क्रिया पार पड़ै॥
नेम बिना जिका संत बाजै, ज्यांरा धृक जमार है।
जमले मिळ भ्रांत राखे, ज्यांरी भगति बेकार है॥
षटनाथ दर्शन पाट बैठा, और तपस्या सार है।
निज धरम झेलिया, जद पाया अधिकार है॥
चोसठ कळा में खेल्या तो ई, बिना सत बेकार है।
साधु जिकै भजन खोजै, ध्यावे धरम निजार है॥
साध सबदां तोलतां, जपै हरि रा जाप है।
प्रमाणी संत पूगसी, ज्यांरा असंख जुगां सूं राज है॥
सात सायर नौ सौ नदियाँ, एक पियाले आ भरै।
सेंस कळियाँ चंपो फूल्यौ, अलख रै पूजा चढ़े॥
आप देवै आप लेवै, ख्याल जूवा रौ करै।
भेख भय नै त्याग दीन्हौ, साथ संत विलास करै॥
साध रा सभाव भारी, मरण पहलां वै मरै।
जीवता बैकुंठ म्हालै, सुरगां पहली सत करे॥
रतन मूंगै मोल रा, अलख रै लेखै करे।
पांचा साताँ नौवाँ बाराँ, तेतीसाँ में वै मिळे॥
कळू नेजा नूर बरतै, मेघां घर मै'मा बंटै।
भरिया कांकण फेर भरसी, भेख में इमरत बंटै॥
पाट पूजै पिछम रा, असमान री आसा करै।
साथ तो अथाग थागै, अबीज मोती वै चुगे॥
दान दुर्लभ वस्तु निर्मळ, अजर जरणा वै जरे।
अजरा जर ईमान राखै, किरोड़ कारज जद सरै॥
दोय पुरसां देव पूज्या, दोय सूं अवतार है।
एक पूजो साध निर्मळ, अलख रौ आधार है॥
साथ रै घर अटळ भगति, इंद्र रै घर नित बटै।
शक्ति, शंकर, ब्रह्मा, विष्णु, निजार री आसा करै॥
एक सत री बूँद जावै, दूजी दोजख पड़ै।
तीजी जळ मेल पियाले, करतूत करणी सब हरे॥
प्रमाण गाया अलख रा, अवतार पूजा संत करै।
बोलिया अजमाल सुत, साध नै सोजी पड़े॥

अगलोड़ी रीत सही कर

बाबा रामदेव

अगलोड़ी रीत सही कर, पछे करौ गुरु चेला।
आदू रीत सांभळौ साधां, महाधरम है भेळा॥
धरा ठहराई जद चरम रचायौ, नेमिया तीनूं देवा।
बध्या धरम हुया विसतारा, फळ कोई बिरळा पाया॥
तन-मन दिया सोई अभै पद लिया, मुगति बिरळा पाया।
दसूं दोष कळेस टाळिया, पूरण संत कैवाया॥
असंग जुगां सूं धरम चल्यौ आयौ, पड़दै रा भेद दरसाया।
सूरज, बिंद, चंद घर साजौ, इण विध ब्रह्म पाया॥
पाँच भजन री करजौ थे सेवा, पछै भगति आया।
पाँच भजन बिना नारकी में जावोला, चौरासी गिराया॥
सगुण-निरगुण भगति गम कर देखौ, मूळ एक में पाया।
निज धरम री सेन सांभळौ, अंत एक में समाया॥
नांव रौ सिंवरण निरभय हुय साजौ, दुरमत दूर हटाया।
धरम झेलियां सूं करम कट जावैला, एक अखंडी में समाया॥
जोग कमाय जुगति सूं देखी, सरब एक में आया।
दुविधा मेटो माया सेन सांभळौ, वचनां सूं धरम हलाया॥
इण साखा सूं अनंत संत तिरिया, चौरासी दोष हटाया।
ऐड़ी राय जुगति सूं करजौ, ऐड़ा संत समझाया॥
अड़सठ तीरथ घट भीतर, बिन सतगुरु नहीं पाया।
तन-मन-धन दिया सतगुरु नै, सत सबद ओळखाया॥
साधु बाजे कळु में कूड़ा, वै मुगति पद नहीं पावै।
अजमल सुत रामदे भाखै, बीज प्रमाण दरसावै॥

विषय रचाय साखी रहे सामिल

बाबा रामदेव

विषय रचाय साखी रहे सामिल, व्यष्टि भरमन भूल्या।
समष्टि समझ सांसो नहीं व्यापै, सो पड़पंच है ऊँचा॥
भगति कीयां भरम सब भागै, जो कोई भेदज पावै।
एकादश भगति है भाई, करतब कौण बतावै॥
भूल्या जकै भेद नहीं पावै, मन सूं साथ कहावै।
इंद्रिय पांचूं लख आपौ नहीं खोजै, भूल्या भेद नहीं पावै॥
पांचूं खण परचै कर लीजै, छठौ चेतन पावै।
सप्त धात रौ बण्यौ पींजरौ, सातूं सुरत मिळावै॥
पूछ गुरु नै गोविंद गति पावै, साखी सामिल रहावै।
ऐड़ी जांण गुरां सूं जांणौ, जद चौथै पद पावै॥
निर्बंधन सोहि निरंजण पावै, निर्बंधन होय रहणा।
एको जांण दुतिया कर दूरी, अणभव अंदर लेणा॥
गावै सुळट आप रहे उळटा, सांची सैन नहीं पावै।
देखा-देखी करै गत गूंगा, भूल्या जग भरमावै॥
बिना ग्यान तो गम नी पावै, झुक-झुक सीस निवावै।
ग्यानी गुरु नीं करे गुमानी, मन का पता चलावै॥
गीता शास्त्र गम कर देखो, वेद वेदांत बतावै।
पूंजी बिना नहीं होत पसारा, विरथा जलम गमावै॥
समझै श्वास उश्वासा मांही, अजपा जाप जपावै।
सोहं तार हजूरी हाजिर, सभी एक में पावै॥
ऐड़ी रीत कोई बिरळा जांणै, पूरब अंकुर उगावै।
कहे रामदे बेगा चेतो, प्रांण निकळ जावै॥

अमर बधावो म्हारे होय रह्यौ

बाबा रामदेव

अमर बधावो म्हारे होय रह्यौ, होय रह्या मंगळाचार।
आया हो निकळंक नाथ म्हारे पावणा, जूना जोगेसर अपार।
हालो ए सइयां जुगत सूं बधावां, नई तर रह जासां लार॥
मारग बेखरी बारियो, मेट्यौ सब अळूजाड़।
पोळ पश्यंति खोल दीवी, मध्यमा कियौ निहार॥
परा नगर में सतगुरु नै लावणा, ब्रह्मानंद दरबार।
तुरिया तख्त बिछावणा,जड़िया रतन अपार॥
पाँच पच्चीस दस भेळा हुया, होय रही भीड़ अपार।
उमंगै सुरत सहेलड़ी, गज मोतियाँ रो भर थाळ॥
ढोल बाजै ए सइयां ध्यान रौ, घुळ रह्या रंग अपार।
संत बधाव घर लाविया, मिट गयौ भेद विकार॥
राम रीझ राजी हुया, एक दीठ सूँ निहार।
सगळां ने आप में भेळिया, कोई नहीं राख्या लार॥
मेळो हुतो सो मिट गयी, सुरता कियौ रे विचार।
म्हें अ'र सतगुरु दोय जणा, करसां वचन विहार॥
हंस बोल्या निकळंक नाथ, तूँ है मूरख गिंवार।
म्हें सो तूँ, तूँ सो म्हें हूँ, रह्यौ नीं भेद लिगार॥
म्हें अ'र तूँ दोनूं मिटग्या, अपणा ही आप आधार।
इण विध जोगेसर बधावजी, कदेई न पड़े जम री मार॥
सत रौ बधावौ साधां गावियौ, कर-कर मन में प्यार।
कहे रामदेव पहुंचियौ, हद बेहद सूँ पार॥

भांगो भ्रांत भाव नै पाळौ

बाबा रामदेव

भांगो भ्रांत भाव नै पाळौ, भजन बिना दिन अहळा जाय।
अन्न देव री केवूं बारता, सुणजी साधो कान लगाय॥
सिंवरूं सगति मुगति री दाता, मदद करो मोटी माय।
गुण रौ देव बिनायक सिंवरूं, ध्यान धरे ज्यानै ग्यान बताय॥
दरसण आय देवता ऊभा, करता रै मन आवै नहीं दाय।
थे आवो प्रभु बोल्या, अंग सूं मिळिया अंग लगाय॥
सुर तेतीस रीस कर बोल्या, दिल में कीन्हौ किरोध अपार।
सगळा ई देव एक कर मानी, अैड़ी दीठ धरौ किरतार॥
गुण अर ग्यांन रची रचना, आदि अनादि श्रीपत राव।
इण विध अन्न अधिकेरो मानौ, सब रावां में कहिये राव॥
पड़ियौ चुगल हलचल कीन्ही, कारी लागे नीं किरोड़ उपाय।
पड़ियौ वाद-विवाद विकारा, बिन आदर बैठ्यौ नी जाय॥
करियौ सोच मन में माधू, आप बड़ा श्रीपत राव।
अन्न देव दरसण मत आवी, दिन दस दूर बसो थे जाय॥
अन्न देव सती घर आया, राहू केतू उठ लाग्या पाँव।
सांची कहो सुरां रा नायक, आया हो हर किण भाव॥
सुर तैतीसां करी म्हारी निंदा, देव सभा में आयौ नहीं दाय।
गुप्त करौ पाताळां मांहीं, जग रा जीव देखण नहीं पाय॥
आप परम गुरु आसी, अन्न देव मांगेला आय।
जोर कियां जावण नीं देस्याँ, अैड़ौ कौल करौ सुर राय॥
आप परम गुरु दीनी म्हाने आग्या, सती सुणो बचन समाय।
केवौ वचन आप रै चालूं, आप केवौ जठै बैठूं जाय॥
धरती रेलमपेल कर बोई, इमरत नीर सींचियौ मांय।
पसरी बेल इमरत फळ लाग्या, जोजन लग रही है छाय॥
तूंबा केर अर बेर बंद दीन्हो, अन्न देव बैठायो मांय।
सत री कार दीवी सतवंती, सप्त पीयाळां गाडियौ जाय॥
जोत बिना सुर नर बिलखावै, सौरम बिना नहीं आवै दाय।
अन्न देव बैगौ लावौ, अन्न देव बिन काया जाय॥
जळ रा जीव रच्या जग जाचण, नदियाँ सौध समुंदरां में जाय।
नीर तीर सारै फिर आया, अन्न देवता कठै नीं पाया॥
आप परम गुरु किया पंखेरू, पंछी गगन पूगौ थै जाय।
गगन मंडळ सारे फिर आया, अन्न रौ पतो कठै नीं थाय॥
करता नाथ उपाई कीड़ी, पग नेवर हरि बांधी जाय।
थळ भीतर सारै फिर आई, अन्न देव री खबर न लाई॥
कीड़ी सोध बोध ले आई, तन में दीन्ही गांठ घुळाय।
अन्न देव सती घर देख्या, वारै होय रह्या आणंद उछाव॥
चढ़ियौ स्याम सकळ ले साथै, नौपत निसांण धजा फहराई।
सत गुरु पूगा सती द्वारे, डेरा दिया पौळियां मांय॥
तेड़ी सती सुहागण नार, कुंभ कळस भर सिर पर ठहराय।
सात सखी मिळ मंगळ गावै, सतगुरुजी नै लिया बधाय॥
सती कहै स्याम सुण लीजी, कर जोड़े पिरथी रा राय।
भांत भांत रा भोजन बणाऊं, सलाह देवो मन भाय॥
केवै स्याम सुणो सतवंती, हूँ पिरथी रच करतार।
भोजन थांरे जद जीमां, अन्न देवण रौ करौ करार॥
आया राज नाज म्हे देस्यां, तोल मोल बिकाय।
लिखिया दांम सवाया लेस्यां, अवर केवी तो नीं आवै दाय॥
अन्न देव दरसण ले आऔ, मन में सती मत घबराय।
चाँद सूरज जामन ले ले, रिषीजन ऊभा साख भरे॥
ब्रह्मा, विष्णु महेश अर करता, सब देव जीमण बैठा आय।
भांत भांत रा भोजन पुरस्या, रुचि रुचि जीमी श्रीपत राय॥
केवै स्याम सती सुण लीज्यौ, थोड़ी आगी उरे री लाय।
चंगा चीर कांचळी दीनी, आप परम गुरु मन हरषाय॥
सरिया काज नाज ले आया, सुर नर देवां घर आणंद उछाव।
अन्न प्रमाण सांभळौ साधो, गंगा में दीनी ज्यूं दूजती गाय॥
गुरु ग्यान कर सुणजौ, आया संतां रै लागी पांय।
अजमल सुत रांमदेव बोलै, अन्न प्रमांण सुणो चित्त लाय॥

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