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राजा मानसिंह रा पद : Raja Mansingh Ke Pad

राजा मानसिंह (1783–1843) राजस्थान के प्रमुख कवि और साहित्य-प्रेमी शासक थे। वे जोधपुर के महाराजा रहे और हिंदी साहित्य तथा काव्य-रचना में उनकी विशेष रुचि थी। उन्होंने स्वयं भी काव्य की रचना की और अपने आश्रय में साहित्यकारों एवं कलाकारों को प्रोत्साहन दिया। उनकी रचनाओं में भक्ति, नीति और काव्य-सौंदर्य के विविध भाव देखने को मिलते हैं।


चालो उण देश में रे जोगिया

चालो उण देश में रे जोगिया, जहाँ नहीं मजहब नहीं पन्थ॥टेर॥
चार वेद षट शास्त्र नहीं रे जोगिया, नहीं धरम नहीं ग्रन्थ।
अल्ला राम दोनों नहीं रे जोगिया, नहीं स्वर्ग न जिन्नत॥
ना वैकुण्ठ ना बहिश्त है रे जोगिया, नर्क दोजख ना कहन्त।
ना कोई पंडित काजी मुल्ला रे जोगिया, ना कोई संत महन्त॥
जीव ब्रह्म दोनों नहीं रे जोगिया, जहाँ है सबको अनंत।
रति पुरान कुरान नहीं रे जोगिया, सबसे अलग रहन्त॥
देवनाथ गुरु गह्यो रे जोगिया, जब ये बात लखन्त।
मानसिंह आनन्द सदा रे जोगिया, अपने में आप बसन्त॥

चाल सखी उण देश में

चाल सखी उण देश में, जहाँ अजब फागण होयजी।
पीव के संग खेल हरदम वहाँ न रोके कोय जी॥
मन का पड़दा दूर करले, गफलत में मत सोय जी।
खेल निज प्रीतम से होरी, सूरत सोहं पोयजी॥
मरुधर पति कहे मान प्यारी, मत विषय बिच रोय जी।
करना है तो अभी करले, पीछे बने नहीं कोयजी॥

छीलारियों में कुण न्हावे

छीलरियों मे कुण न्हावे, पड़्यो समदां सीर रे।
भूलने कुण जहर पीवे, मिली सुन्दर खीर रे॥टेर॥
ज्ञान गम रो ओढ्यो दुशालो, अब कौण ओढे चीर रे।
घर में धन और कौण मांगे, कौण बणे फकीर रे॥
पथर पाथर कौण पूजे, स्वतः हैं हम पीर रे।
आप अपना करे सब कुछ, क्या करे तकदीर रे॥
जगत तो मतिहीन हो गई, झूले दुःख रे तीर रे।
ज्ञान दियो गुरुदेव जी, जद टूट गई जंजीर रे॥
तोड़िया तकदीर म्हे तो, भया ज्ञान गम्भीर रे।
ज्ञान रो, दरियाव उलट्यो, समता शुद्ध समीर रे॥
हम गोपाल और गाय हम हैं, कौन बने अहीर रे।
अपनो पय हम आप पीयो, पीयत भया बेपीर रे॥
नाथजी रो साथ कीनो, मेटी झूठी लकीर रे।
मान लकीर ने सांप मान्यो, जिते न लगी तदबीर रे॥

फकीरी असल फकीरी और

फकीरी असल फकीरी और।
असली छोड़ नकल कर बैठा, सब ही मन के चोर॥टेर॥
त्याग भाग लक्षणा लीना, ज्याँरे दिल बिच ऊगा भोर।
समझ सूँ समझ रमझ कर लीनी, दे डंके पर ठोर॥
ज्याँरी लहर जगत क्या जाने, मिले चोर सूँ चोर।
धर पाखण्ड दण्ड कई भाँति, जावे वां संग दौर॥
मन मुदड़ा मिल मस्त रहे वें, बाँने न परवा और।
चाहे बिगड़े और चाहे रहे जग, निरख लियो निज जोर॥
नाम संन्यस्त गृहस्थ सूँ बदतर, कर रह्या होडा होड।
अपनी अपनी खैंच खैंच कर, रह गये ज्यूँ त्यूँ मोड॥
त्याग ग्रहण उनके कछु नाँही, वाद विवाद न झौर।
अपनो स्वरूप परख लियो आप ही, जैसे चंद्र चकोर॥
वाचक ज्ञान बके बहुतेरा, उपनिषद् पर जोर।
अपनी आपकी सूझी नाँही, यों ही रहे निकोर॥

फकीरी कायर सूँ कद होय

फकीरी कायर सूँ कद होय।
सुगरा खेल इणी पर खेले, कायर देवे रोय।
इण शूली पर काँई तू सोवे, हम नहीं माने कोय।
निश्चय री शूली कलेजे पोवे, मरद जाणूं जद तोय।
काँई तू लकड़ जगावे गैला, क्यों दम अमोलख खोय।
जब तक ज्ञान अगन नहीं जागी, शिर कूटाई होय।
काँई तू साँकल कसे कमर में, दीवी बुद्धि ने खोय।
नित साँकल जो बन्धे म्हारे गज रे, वजन तोल मण दोय।
यूँ होयाँ नहीं मानों फकीरी, म्हाँने भोळा न जानो कोय।
सिंहा रा सुत सिंह ही होसी, खाल भेड़ां री खोय।
देवनाथ गुरु दीवी फकीरी, अब रेया बेफिकरी में सोय।
सूताँ पछे जागण री है सौगन्ध, मत बतळाओ मोय।
जगत बहके ज्यों मैं नहीं बहकूँ, सोच फिकर दिया खोय।
मानसिंह कहे मेरे घर आई जो, सुरत आप में पोय।

जोग पंथ है झीणो

जोग पंथ है झीणो, पैणो होय पीणो, लख लेणो सार असार॥टेर॥
पोल री गळियाँ बहुत है रे, जोग पन्थ रे माँय।
सीधा होय ने चालज्यो रे, फँसिया तो निकळोला नाँय रे॥
जंत्र ने मंत्र ने तंत्र सिद्धाई, ए तो झपटेला आय।
कहे महाराज न आवे ध्यावे, पकड़ ने देसी गिराय रे॥
होय जोगी कोई जुलम मती कीजो, दुख अनन्त होय जाय।
ओ तो डूबे भलाँई डूबो, पर जन्म अनन्त निकळो नाँय रे॥
मान कहे मैं तो जोगी न हुआ, रंगिया न भगवाँ भेष।
देवनाथ उपदेश दियो म्हाँने, निश्चय कर जोयो वो देश रे॥

लखो निज श्याम ने रे जोगिया

लखो निज श्याम ने रे जोगिया, जद सरसी थारो काज॥टेर॥
सत रङ्ग लेवो माँयलो रे जोगिया, तज दो उपरला साज।
काम उपरला नहीं आवसी रे जोगिया, बिगड़ जाय निज राज॥
जोग फकीरी तो झीणी घणी रे जोगिया, क्या कहूँ कही न जाय।
महा बारीक सूक्ष्म अति रे जोगिया, कहन कथन में नहीं आय॥
जोग जुगति कछु ओर है रे जोगिया, बहुत पर की बात।
बड़ा बड़ा ई गिर पड़्या रे जोगिया, औरों री कोण चलात॥
पाँच पचीसों मारलो रे जोगिया, सहज ही जुड़े समाध।
मन ने पलट निज मन करो रे जोगिया, जद निज आनन्द आत॥
देवनाथ गुरु पूरा मिल्या रे जोगिया, दियो सब भरम मिटाय।
मान फकीरी असल करे रे जोगिया, नकल में ध्यान मत लाय॥

मिथ्या मैं तो भटक मर

मिथ्या मैं तो भटक मर जाती। बिना सतगुरु गम कैसे पाती॥
पिछली बात याद मोहे आवे, उमगत है मेरी छाती।
हा हा जन्म खोया कई मुफ्ता, फिर भी मुफ्त खो जाती॥
बहुत ही बार मनुष्य जन्म लियो, भटक यूँ ही दुःख पाती।
जो मिलिया सो मिलिया स्वारथिया, दिन दिन रही मैं जराती॥
सतगुरु मिलिया अन्तर टलिया, बाची प्रेम की पाती।
ऐड़ा सतगुरु भव दुःख मेट्या मेटी त्रिविध दुःख राती॥
देवनाथ गुरु समरथ मिलिया, नहीं तो बहुत अळुझाती।
मानसिह घर बैठा ही जोया, ऐसी बात सुहाती॥

सुण रे भँवर सैलाणी

सुण रे भँवर सैलाणी, बात मेरी सुण रे भँवर सैलाणी॥टेर॥
और तो बातें बहुत सुनी तैं, इधर उधर की कहाणी।
अब मेरी बात सुनो रे मेरे भँवरा, कहूं साची सैनाणी॥
काची कळी को रस क्या पीवे, पीवत जाय कुमलाणी।
जब रस खूटे तब दुःख पावे, मन ही मन में गिलानी॥
एक कली तोहे ऐसी बताऊँ, हरदम रस टपकाणी।
उस रस से सब जगत रच्यो है, पी जीवे सब प्राणी॥
वह रस पीवे सकल दुःख छूटे, खुद मस्ती छिकजानी।
जगत विषय रस मिथ्या लागे, जीवित मोक्ष दिखाणी॥
मानसिंह कहे कहूँ मैं कब तक, माने न जगत दीवानी।
जन्मो जन्म जहर फल खावे स्वाद अमी नीं पिछाणी॥

सूता सारंगधर जोग में रे

सूता सारंगधर जोग में रे जोगिया, क्यों कर सारंग जमाय॥टेर॥
सारँग लखे सारँग पियाँ रे जोगिया, रहूँ नित सारँग माँय।
मीठी रँग आ सारँगी रे जोगिया, मो मन घणी सुहाय॥
पाँच प्राण पाचूँ कोश है जोगिया, इन्द्री दश के लार।
एक मन दूज बुद्धि बसे रे जोगिया, ए तार बाईस सुणाय॥
उत्तम मध्यम कनिष्ठ है रे जोगिया, है तीनूँ ही ग्राम।
सातूं भोम सो सप्त सुर रे जोगिया, जिण पर लियो मैं विश्राम॥
आवत जावत रो गज कियो रे जोगिया स्वासो ही स्वास चलाय।
ओहँ सोहँ री रागणी रे जोगिया, सुणियाँ मन स्थिर हो जाय॥
सारँगधर सारंगी बजे रे जोगिया, इण सारङ्ग लियो बुलाय।
सारंग ताणने मारियो रे जोगिया, सारँग प्राण गमाय॥
सारँग मर शाह रंग भई रे जोगिया, अब सारंग मिलियो आय।
मानसिंह शाहरंग चढ्यो रे जोगिया, अब दूजो चढ़सी नाँय॥

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