संत चरणदास जी रा पद : Sant Charandas Pad
संत चरणदास (1703–1781) राजस्थान के प्रमुख संत और भक्त कवि थे। उनका जन्म मेवात क्षेत्र के डेहरा गाँव में माना जाता है। उन्होंने चरणदासी संप्रदाय की स्थापना की और भक्ति, सदाचार तथा आत्मज्ञान को अपने उपदेशों का आधार बनाया। उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, वैराग्य और आध्यात्मिक साधना के भाव प्रमुख हैं। चरणदास की शिक्षाओं का प्रभाव उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उनके अनुयायियों के बीच देखने को मिलता है।
निराकार नहिं ना आकार
निराकार नहिं ना आकार, नहिं अडोल नहिं डोलन हारा।पांच तत्व तिरगुण ते आगै, अद्भुत अचरज ध्यान न लागै।
नहिं परगट नहिं गूपून ठाऊं, समझ सकौ नहिं थकि थकि जाऊं।
जो कुछ कहिया नाहीं नाहीं, सो सब देखा बांके मांही॥
पति की ओर निहारिये
पति की ओर निहारिये, औरन सूं क्या काम।सबै देवता छाडि के, जपिये हरि का नाम।
आज्ञाकारी पीव की, रहै पिया के संग।
तन मन सूं सेवा करै, और न दूजो रंग॥
शील बिना नरकै परै
शील बिना नरकै परै, शील बिना यम दंड।शील बिना भरमत फिरै, सात दीप नौ खण्ड।
शील बिना भटकत फिरै, चौरासी के मांहि।
पहले होवै प्रेत ही, यामे संशय नाहिं॥
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