संत पीपाजी के पद : Sant Pipaji Ra Pad Sangrah
संत पीपाजी (जन्म नाम प्रताप सिंह) राजस्थान के मध्यकालीन संत और भक्त कवि थे। वे हाड़ौती क्षेत्र से संबंधित माने जाते हैं और भक्ति आंदोलन की संत परंपरा में उनका महत्वपूर्ण स्थान है। पीपाजी ने बाहरी आडंबरों के बजाय ईश्वर-भक्ति, सदाचार और आत्मज्ञान पर बल दिया। उनकी वाणी में सहज भक्ति, वैराग्य और मानवीय समानता के भाव प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं। उनके कुछ लोकप्रिय पद निम्नलिखित हैं ।
देव भ्रमतौ भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ
देव भ्रमतौ भ्रमतौ तेरै सरनै आयौ।सरणाई बिजै पंजर, सखि रामइया वाई॥टेक॥
लोह कौ साँकल कैसे तूटै हो घण दै धाइ।
मोहकौ साँकल कैसे तूटै हो रामइया राई।
देखी विद्या देख्यौ दान, देखी काया कृतम तंन।
साधु संगति बिन मेरौ कहीं न मानै मंन।
देख्यौ पुंनर देख्यौ पाप, संकल जग देख्या संताप।
प्रणवत पीपौ नरहरि, उद्यमी लै आयै आप॥
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा
देसड़ लौं बिड़ाणौ रे जीवड़ा, पाहुणों दिन चारि।सीख हमारी मानि लै, हरिभज जनम सुधारि॥टेक॥
हाथी घोड़ा गाँव गढ़ डूंगर, सत द्वारे धन धाम।
थामैं जिवड़ौ घालि कैं, तैं भज्यों न राजा राम।
मुलमुल कागा पहन तो, चलतो घुड़लां री जोड़ी।
अंतकाल जम आय पहुँचो, राख्यों तिणा ज्यूं तोड़ी।
सुबुधि बुहारि हाथिलै, कुबधि जोड़ो झारी।
पीपो कहै म्हारी आतमां, तू राम रतन उर धारी॥
एक अचंभा अैसा देख्या
एक अचंभा अैसा देख्या, सोतत रे काहू बिरलै पेख्या॥ टेक॥नाद ब्यंद थै रहै नियारा, सो पद परमत भया उजियारा।
त्रिकुटी मध्य ज्योति जे कहिये, ताहू थैं अगम अगोचर लहिये॥
त्रिबिधि थान त्रिदेव थैं रहिता, त्रिगुण अतीत निरंतर रमता।
जन पीपा सतगुरि बलिहारी, जाके सबदौं मिल्यों हो मुरारी॥
इण घट अन्दर बाग बगीचा
इण घट अन्दर बाग बगीचा, इण में सिरजन हारा रे।इण घट अन्दर सात समन्दर, इण में नव लख तारा रे।
इण घट अन्दर अणहद गूंजे, इण में सब संसारा रे।
पीपा के तो घणो भरसो, इण भज सांई म्हारा रै॥
जै कलि नाम कबीर न होते
जै कलि नाम कबीर न होते,तौ लोक बेद अरू कलिजुग मिलि करि। भगति रसातलि देते॥टेक॥
आगम निगम कहत ए पांडे, फल भागौत लगायौ।
रजस तामस सातिग कथि-कथि, यूँ यहु जगत भुलाया॥
बकता सुरता इन्यूँ भूले, दुनिया सबै भुलाई।
कल्पवृच्छ की छाया बैठे, तौ क्यूँ न कल्पना जाई॥
सर्गुण कथि कथि मिष्ट खवाया, काया रोग बढ़ाया।
निर्गुण नींव पिया नहिं गुरगामि, यूँ अटकी जीव विकाया॥
अंध लकुटिया अंध गही है, परत कूप कत थोरै।
अबरण बरण दुइै रस अंजन, आँखि सबनि की फौरे॥
हमसे पतित कहा कहि रहते, कौण प्रतीति मन धरते।
नाना बाणी देखि सुणि श्रवननि, बहु माराग अनसरते॥
करि हरि भगति भगति कण लीना, त्रिविध रहित थिति मोहे।
पाखण्ड रूप भेष सब कंकर, ग्यान सूपक सोहे॥
तिरगुण रहित भक्ति भगवंतहि, बिराला कोई पावै।
दया होई जौ कृपा नाथ की, तौ नाम कबीरा गाई॥
भगति प्रताप राखिऐ कमनि, निज जन आप पढ़ाया।
नाम कबिरा साच प्रकास्या, तहाँ पीपै कछु पाया॥
जियरा करि रे कोई उपाया
जियरा करि रे कोई उपाया, जाथै बेगि मिले राम राया॥टेक॥खणि खणि मूली खाइये, भ्रमि भ्रमि तीरथ न्हाइये।
कोटि बैद संगि फिरिये, तऊ देखतां मरिये।
केई राजा केई राना, केई पाति साह सुलताना।
बहुनाइक जौ फिरिये, तऊ देखतां मरिये।
ऊँचा कोट मरोड़ा, तहां नही धन तोड़ा।
दरि बघिलै घोड़ा हाथी, तेरे संगि न आवै साथी।
पीपौ प्रणवै अंतर्जामी, तूं जनमि मैरो स्वामी।
मेहि जनम का पासा, तुम्ह ठाकुर मैं दासा॥
साधो ब्रह्म अलख लखाया
साधो ब्रह्म अलख लखाया।बीज मांहि ज्यो बिरछ दिखे, बिरछ मांहि ज्यो छाया॥टेक॥
नी मांहि ज्यों सुन्न देखिये, सुन्न अनन्त आकास।
निअच्छर से अच्छर तैसे, अच्छर घर विस्तारा।
रखे मोहिं ज्यों किरन दीखे, किरन मांहि परकासा।
जैसे जीव ब्रह्म परमातम, जीव मांझ ज्यो धांसा।
सांसा माहि सब्द पर मीटें, अरथ शब्द के माहिं।
ब्रह्म से जीव, जीव से ब्रह्म, यों पीपै लगा सदा ही॥
पद, Pad, Sant Peepa, Sant Pipa
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