फूलीबाई के सबद : Phoolibai Ke Sabad
फूलीबाई (1568–1646) राजस्थान की संत-कवयित्री थीं, जिनका संबंध नागौर क्षेत्र के किसान परिवार से बताया जाता है। उन्होंने साधारण लोकभाषा में ऐसे आध्यात्मिक विचार रखे जिन्हें सामान्य व्यक्ति भी आसानी से समझ सके। उनके लिए बाहरी आडंबर से अधिक गुरु का ज्ञान, राम-स्मरण और मन की निर्मलता मायने रखती थी। देह की क्षणभंगुरता और सांसारिक मोह से सावधान करने वाली उनकी उक्तियों में निर्भीकता भी दिखाई देती है।
‘जब लग स्वांस सरीर में’, ‘फूली सतगुर उपरै’ और ‘सब घट मांहि राम है’ जैसी रचनाओं में जीवन की नश्वरता, सद्गुरु की महिमा और ईश्वर की सर्वव्यापकता सामने आती है। उनकी भाषा में राजस्थानी लोकबोली का रंग है, जिसके कारण आध्यात्मिक बात भी उपदेशात्मक होने के बजाय सीधे जीवन से जुड़ी हुई लगती है।
जब मन होवे माया का
जब मन होवे माया का, तब माया ही जान।
जब मन होवे राम का, तब होय राम समान॥
कभी ना करिये कामना, भजिये राम निष्काम।
ऐसी जिनकी भावना, बैकुंठा मांहि धाम॥
जग कारण सगुण है, नहीं तो निर्गुण रूप।
सगुण पहलां जाणलो, पछे निरंजन रूप॥
प्रितम को पतियां लिखूँ, जो होवे परदेश।
मेरा पिव हिरदे बसे, क्या लिखूँ संदेस॥
प्रेम छवि नैणा बसी, दूजी आवे ना दाय।
हिरदे प्रितम रम रह्या, दूजा कहाँ समाय॥
कहि ना जावे मुख सूं, राम प्रेम री बात।
पूर्ण चराचर जगत में, राम ही राम दरसात॥
खट पट सगली मेट दो, निर्भे करलो मन।
वृत्ति ब्रह्म में जोड़ लो, मुक्ति असली धन॥
राम-राम सब ही कहें, नुगरा सुगरा तात।
बिना प्रेम रीझे नहीं, फूली के मन राम॥
झीणों मारग ग्यान रो
झीणों मारग ग्यान रो, प्रेम भगति चित लाय।
पाप धुप्यां बस जावसी, एक ब्रह्म रे मांय॥
कांई कहेऊं प्रेम री, कहि ना जावे बात।
बाहर भीतर एक ज्यों, रामहि राम लखात॥
राम जिह्वा राम हिरदे, छाय गयो सब ओर।
एक राम रे कारणे, नैण बरस्या घनघोर॥
फूली माणस तन पायने, हिरदे बसाओ राम।
एको एक होय जावेला, ब्रह्मलोक मांहि जाय॥
भाइयां सिमरण करो सवाया
भाइयां सिमरण करो सवाया।
प्रेम बिना सायब नां मिलसी, झूठा गोता खाया॥
किण कारण अठे थे आया, उणरी निगे कराया।
माया तो कोरी छाया है, ईश्वर खेल खेलाया॥
करमां सूं बंध्योड़ा थे तो, आया गिया जाया।
सिमरण करलो राम रा थे, राम मांहि समाया॥
राम भजन सूं कटे चौरासी, सतलोक में थाया।
फूली रिझावे राम ने जद, बेड़ा पार लगाया॥
आज आतम राम पाया
आज आतम राम पाया, मन में घणो हुलास।
पल-पल वारूं वारणा, घणा दिनां री आस।
पाँच पचीस मिल मंगल गावे, सुरति होगी खास।
एको एक मैं निरख्या, दूजा ना दिख्या पास।
निरखता निज पड़ी पारख, खुदो खुद परकास।
पीव ऐड़ा परस्यां खुद, ग्यान रो ही वास॥
आत्म अेक जद जोविया, धरम करम सब नाश।
पारब्रह्म ने जाणंता ही, सगला मिट्ग्या त्रास॥
देह में दीदार पाया, अचल रचाया रास।
जीव सीव मिल एक हुया जद, फूली रही ना सेस॥
सब घट मांहि राम है
सब घट मांहि राम है, रीता घट ना कोय।
धिन्न-धिन्न है उण घट री, जिणमें परगट होय॥
पाणी सरवर एक है, पणिहारी अनेक।
न्यारे-न्यारे बरतनों में, पाणी एक का एक॥
पत सूं रहवे पृथ्वी, पत सूं होवे दिन-रात।
पत सूं चालो सब जणां, लांबा होसी हात॥
काम, क्रोध, मद, लोभ सब, अंतर शत्रु होय।
एक मित्र है रामजी, उणने लो थे जोय॥
सुख-दुख बाहर है नहीं, भीतर ही लो जाण।
फूली भीतर रामजी, जिणरी करो पिछाण॥
मैं तो अमर देस री वासी
मैं तो अमर देस री वासी।
राम करदी मेहर मो पे, नहीं जाऊंली काशी।
हिरदे मांहि ग्यान हुग्यो, राम ज्यों परकासी।
एकहि ज्योति झलके अब तो, नहीं रहूं उदासी।
अमर देस में आसण करिया, छूटगी गल पासी।
परमानंद परकास सूं, सगली माया नासी।
फूली आतम राम पाया, ना आसी ना जासी॥
बीत गया सो ठीक है
बीत गया सो ठीक है, जो होवेला ठीक।
फूली समझ बणायलो, राम करेला ठीक॥
मिनखां देह मुंहगी मिली, करलो भजन उपाय।
पल-पल दिनड़ा जावसी, रीतां भूंडी होय।
माया तूं मोटी घणी, है राम री दास।
जीव-जीव है न्यारी-न्यारी, गले बंधावे पास।
दुख-सुख दोनों भोग है, आँसू आगे ओर।
सांचो सुख है राम रो, बाकी सगला चोर।
दिन थोड़ो पैंडो घणो, ओघट पड़या घाट।
औसर मिल्यो भाग सूं, करम भरम दो काट॥
फूली भगति प्रेम री, जीव सीव एक रूप।
भीतर राम बसायलो, पार करलो भव कूप॥
राम रस भीजगी मैं भूलगी संसार
राम रस भीजगी मैं भूलगी संसार।
गुरु मेहर करदी जोर री, हो गई भवपार॥
दुख दरद सगला मेटिया, सुख सागर वाली धार।
आदि अंत नांही आविया, ऐड़ा है किरतार।
सतचित आनंद रूप है, देख्या नज़र पसार।
दूजा नज़र नांही आविया, लिया हिरदे मांहि धार।
नांहि नेड़ा नांहि दूर है, ऐड़ा देख्या नूर।
अंदर बाहर एक सा, व्यापक है भरपूर॥
फूली भूली जगत ने, फिरगी चारों ओर।
निज रूप मांहि डूबगी, जहाँ और ना छोर॥
रामजी सुन ज्यो म्हारी बात
रामजी सुन ज्यो म्हारी बात।
दिन में मारा नैण बरसग्या, चैन पड़े ना रात॥
आप किण जगा बिराजो, बा बता दो ठोड़।
घंणां-घणां रा कारज सार्या, कांई म्हामें खोट॥
कियां हुआ नाराज़ रामजी, कांई हो गई चूक।
सोया हुय्या कई दिन बितग्या, प्यास लगे ना भूख॥
अबकी बेड़ा पार करो नी, दरसन री है आस।
फूली रो-रो कह रही है, राम ने अरदास॥
राम सांच जग झूठ है
राम सांच जग झूठ है, बण-बण के मिट जाय।
सत धूरि पर बैठज्या, जनम-मरण नहीं होय॥
माया रचाई राम ने, सब जीवां रे ताय।
है झूठी, सांची लगे, समझ्याँ झूठी होय॥
निराकार जो राम है, महिमा अपरंपार।
सदचित आनंद रूप है, इण रो करो विचार॥
शरणागत जो राम का, पूर्ण हिरदे से होय।
काल ऊपर पग धरे, आवागमन मुक्त होय॥
बुद्धि न देवे सत्ता, बो चेतन है खास।
आर-पार ज्यों का त्यों, हरदम रहवे पास॥
ज्ञान मारग है झिणो, अनुभव से ही जाण।
कहणे को है कुछ नहीं, ज्यों गूंगे का स्वाद॥
फूली ब्रह्म परकासता, तीन काल इकसार।
काल ख्याल जहाँ है नहीं, सबरो है सुखसार॥
राम नाम का मिणका कीजै
राम नाम का मिणका कीजै।
सुरत तार में पोय'र लीजै॥
सांस उसास सिंवरीयै रामा।
तो बाबो सारै सबही कामा॥
राम नाम सूं बांणक बण्या।
राम नाम चूको मत ठाणा॥
राम नाम बिन झूठी करणी।
ज्यूँ बीज बिना सुधारी धरणी॥
माला मिणकां सूँ क्या होई।
यूँ तो राम न पावो कोई॥
सांचै मन सूँ सिमरण कीजै।
फूली सिर बाबै कूं दीजै॥
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