वाजिद के सबद : Wajid Ke Sabad
वाजिद दादू दयाल के प्रमुख शिष्यों और निर्गुण संत-कवियों में गिने जाते हैं। उनके जीवन के बारे में बहुत अधिक प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। परंपरा के अनुसार वे पठान थे और एक घटना के बाद उनके भीतर जीव-प्रेम और करुणा की भावना जागी, जिसके बाद वे दादू दयाल की शरण में आए। उनकी वाणी में राम-भक्ति, दया, जीव-प्रेम, विरह, वैराग्य और देह की नश्वरता के भाव प्रमुख हैं।वाजिद ने पद, सबद, साखी, दोहे और अरिल्ल आदि में रचना की। उनकी भाषा सरल, सरस और प्रवाहपूर्ण है, जिसमें आध्यात्मिक विचारों के साथ लोकजीवन के अनुभव भी दिखाई देते हैं। दादूपंथी संत साहित्य में वाजिद की वाणी विशेष रूप से दया और मानवीय संवेदना के लिए उल्लेखनीय है।
उपदैस कौ अंग
हरिजन बैठा होय तहाँ चल जाइये।
हिरदै उपजै ग्यान रामगुण गाइये॥
परिहरिये वह ठाम भगति नहिं राम की।
हरि हाँ, वाजिद वीन विहूणी जान कहो किस काम की॥
साधां सेती नेह लगे तो लाइये।
जे घर होवे हांण तहुँ न छिटकाइये॥
जे नर मूरख जान सो तो मन में डरै।
हरि हाँ, वाजिद, सब कारज सिध होय कृपा जे वह करै॥
बेग करहु पुन दान बेर क्यूँ बनत है।
दिवस घड़ी पल जाम जुरा सो गिनत है॥
मुख पर देहैं थाप सूँझ सब लूटि है।
हरि हाँ, जम जालिम सूँ वाजिंद जीव नहिं छूटिहै॥
कहै वाजिद पुकार सीख एक सुन्न रे।
आड़ो बांकी वार आइहै पुन्न रे॥
अपनों पेट पसार बड़ौ क्यूँ कीजिये।
हरि हाँ, सारी मैं तै कौर और कूँ दीजिये॥
धन तो सोई जांण, धणी के अरथ है।
बाकी माया वीर पाप को गरथ है॥
जो अब लागी लाय बुझावै भौन रे।
हरि हाँ, वाजिद, बैठ पथर की नाव पार गयो कौन रे॥
जो भी होय कुछ गांठि खोलिकै दीजिये।
सांईं सबही मांहि, नांहिं क्यूँ कीजिये॥
जाको ताकूँ सोंप क्यूँ न सुख सोवही।
हरि हाँ, अंत लुणों वाजिद खेत जो बोवही॥
जोध मुये ते गये, रहे ते जाहिंगे।
धन साँचता दिन-रैण कहो कुण खांहिंगे॥
तन-धन है मिजमान दुहाई राम की।
हरि हाँ, दे ले खर्च खिलाय धरी किहि काम की॥
गहरी राखी गोय कहो किस काम कूँ।
या माया वाजिंद समर्पो राम कूँ॥
कान अंगुली मेलि पुकारे दास रे।
हरि हाँ, फूल धूल में धरै न फैलै बास रे॥
जरणा कौ अंग
सतगुरु शरणें आयक तामस त्यागिये।
बुरी-भली कह जाय ऊठ नहिं लागिये॥
उठ लाग्या में राड़, राड़ में मीच है।
हरि हाँ, जा घर प्रगटै क्रोध सोइ घर नीच है॥
कहि-कहि वचन कठोर खरूँठ नहिं छोलिये।
सीतल सांत स्वभाव सबन सूँ बोलिये॥
आपन सीतल होय और भी कीजिये।
हरि हाँ, बलती में सुण मीत न पूला दीजिये॥
चिंतामणि कौ अंग
टेढ़ी पगड़ी बाँध झरोखा झाँकते।
ताता तुरग पिलाण चहूँटे डाकते॥
लारे चढ़ती फौज नगारा बाजते।
वाजिंद, वे नर गये विलाप सिंह ज्यूँ गाजते॥
दो-दो दीपक जोय सु मंदिर पोढ़ते।
नारी सेतीं नेह पलक नहीं छोड़ते॥
तेल फुलेल लगाय क काया चाम की।
हरि हाँ, वाजिद, मर्द गर्द मिल गये दुहाई राम की॥
सिर पचरंगी पाग क जामां जरकसी।
हाथों ढाल कमाण कमर में तरकसी।
जो घर चंगा नारि दिखावे आरसी।
हरि हाँ, वाजिद, वे नर चले मसांण पढ़ंता फारसी॥
घड़ी-घड़ी घड़ियल पुकार्या कहत है।
आव गई सब बीत अल्पसी रहत है॥
सोवे कहाँ अचेत जग जप पीव रे।
हरि हाँ, वाजिद, जलणा आज कि काल बटाऊ जीव रे॥
सिर पर लंबा केस चले गज चालसी।
हाथ गह्यां समसेर ढलकती ढाल सी॥
एता यह अभिमान कहाँ ठहराहिंगे।
हरि हाँ, वाजिंद, ज्यूँ तीतर कूँ बाज झपट ले जाहिंगे॥
पातशाह के सेझ पथरण पाट का।
हीरां जड्या जडावक पाया खाट का॥
हुरमां खड़ी हजूरि करति है बंदगी।
हरि हाँ, बिना भज्या भगवान पड़ेगा गंदगी॥
कारीगर कर्तार क हूंदर हद किया।
दस दरवाज़ा राख शहर पैदा किया॥
नखसिख महल बनायक दीपक जोड़िया।
हरि हाँ, भीतर भरी भँगार क ऊपर रंग दिया॥
मेटै पुन्न की रेख क दौड़े पाप नें।
साला न्यौत जिमाय धका दे बाप नें॥
करै नारि की भीड़ गालि दे बहन कूँ।
हरि हाँ, वाजिद, सो नर का जाय ठौर नहीं रहन कूँ॥
पतिव्रता कौ अंग
सूर कमल वाजिंद न सुपने मेल है।
जरै द्यौस अरु रैण कड़ाई तेल है॥
हम हीं में सब खोट दोष नहिं स्याम कूँ।
हरि हाँ वाजिद, ऊँच-नीच सों बँधे कहो किंहि काम कूँ॥
आवेंगे किंहि काम पराई पौर के।
मोती जर-वर जाहु न लीजै और के॥
परिंहरिये वाजिंद न छूवे माथ को।
हरि हाँ, पाहन नीको बीर नाथ के हाथ को॥
भूखे भोजन देइ उघारे कापरो।
खाय घी को लूण जाय कहाँ बापरो।
भली बुरी वाजिंद सबै ही सहेंगे।
हरि हाँ, दरगाह को दरवेश यहाँ ही रहेंगे॥
विरह कौ अंग
कहियो जाय सलाम हमारी राम कूँ।
नैण रहे झड़ लाय तुम्हारे नाम कूँ॥
कमल गया कुमलाय कल्याँ भी जायसी।
हरि हाँ वाजिद, इस बाड़ी में बहुरि न भँवरा आयसी॥
चटक चांदणी रात बिछाया ढोलिया।
भर भादव की रैण पपीहा बोलिया॥
कोयल सबद सुणाय रामरस लेत है।
हरि हाँ वाजिद, दाज्यो ऊपर लूण पपीहा देत है॥
रैण सवाई बार पपीहा रटत है।
ज्यूँ-ज्यूँ सुरिणे कान करेजा कटत है॥
खानपान वाजिंद सहात न जीव रे।
हरि हाँ, फूल भये सम सूल बिना वा पीव रे॥
इक तो कारी रैण ऐन मनो सांपनी।
दूजी चमकै बीजु डरावैं पापनी॥
हरि, हाँ हूँ बलिजाऊँ मिलावो पीव कूँ।
हरि हाँ, बिना नाथ के मिलै चैन नहिं जीव कूँ॥
मोर करत अति सोर चमक रही बीजरी।
जाको पीव बिदेस ताहि कहाँ तीज री॥
बदन मलिन मन सोच खान नहिं खाति है।
हरि हाँ, वाजिद, अति उनमन तन छीणर हति इह भांति है॥
पंछी एक संदेह कहो उस पीव सूँ।
बिरहनि है बेहाल जायेगी जीव सूँ॥
सींचनहार सुदूर, सूक भई लाकरी।
हरि हाँ, वाजिद, घर ही में वन कियो वियोगनि बापरी।
बालम बस्यो विदेस भयावह भौन है।
सोवै पाँव पसार जु ऐसी कौन है॥
अति ही कठिन यह रैण बीतती जीव कूँ।
हरि हाँ, वाजिद, कोई चतुर सुजान कहै जाय पीव कूँ।
पीव बस्या परदेस कि जोगन मैं भई।
उनमनि मुद्रा धार फकीरी मैं लई॥
ढूँढ्या सब संसार क अलख जगाइया।
हरि हाँ, वाजिद, वह सूरत वह पीव नहिं पाइया॥
पत्री हू हम पास न आई रावरी।
दृगन बहै बहु नीर कहैं सब बावरी॥
कौन जिये में जिये हानि है नेह में।
हरि हाँ, निसदिन, तलफै प्राण रहै क्यूँ देह में॥
जब तें कीनो गौन भौन नहिं भावही।
भई छमासी रैण नींद नहिं आवही॥
मीत, तुम्हारी चीत रहत है जीव कूँ।
हरि हाँ, वाजिद, वो दिन कैसो होइ मिलौं हरि पीव कूँ॥
काजल तिलक तमोल तुमारो नाम है।
चोवा चंदन अगर इसी का काम है॥
हार हमेल सिंगार न सोहैं राखड़ी।
हरि हाँ, वाजिद, जब जिव लागै पीव और क्यूँ आखड़ी॥
कहिये सुणिये राम और नहिं चित्त रे।
हरि चरणन को ध्यान सु धरिये नित्त रे॥
जीव बिलंब्या पीव दुहाई राम की।
हरि हाँ, सुख संपति वाजिद कहो किस काम की॥
तुमहि बिलोकत नैण भई हूँ बावरी।
झोरी डंड भभूत पगन दोऊ पाँवरी॥
कर जोगण को भेष सकल जग डोलिहूँ।
वाजिद, ऐसो मेरो नेम राम मुख बोलिहूँ॥
अज्ञान कौ अंग
कहा करे उपदेश अज्ञानी जीव कूँ।
भई जनम की भल जपै कि न पीव कूँ।
सृष्टि भली न वाजिद दुहाई राम की।
हरि हाँ, अंधे आरसि दई कहो किहि काम की॥
पाहन पड़ गई रेख रात-दिन धोवहीं।
छाले पड़ गये हाथ मूड़ गहि रोवहीं॥
जाको जोइ सुभाव जाइहै जीव सूँ।
हरि हाँ, नीम न मीठी होइ सींच गुड़ घीव सूँ॥
विश्वास कौ अंग
रिदै न राखी वीर कलपना कोय रे।
राई घटे न मेर होय सो होय रे।
सप्तदीप नवखंड जोय कि न ध्यावही।
हरि हाँ, लिख्यो कलम की कोर वोहि पुनि पावही॥
रिजकन राखी राम सबन को पूरही।
काहे को वाजिद वृथा तूँ झूरही॥
जन्म सफल कर लेयक गोविंद गायके।
हरि हाँ, जाको ताके पास रहेगो आयके॥
ज्यूँ ग्रीषम के अंत सुवर्षा आत है।
वर्षा भये व्यतीत शीत मधुरात है॥
ऐसे ही सुख दुःख अनुक्रम लेखिहैं।
हरि हाँ, कबहुँक दई सुदृष्टि हमहुँ पर देखिहैं॥
दया कौ अंग
जल में झीणा जीव थाह नहिं कोय रे।
बिन छाण्या जल पियां पाप बहु होय रे।
काठै कपड़े छाण नीर कूँ पीजिये।
हरि हाँ वाजिद, जीवाणी जल मांहि जुगत सूँ कीजिये॥
साहिब के दरबार पुकार्यां बाकरा।
काज़ी लीया जाय कमर सों पाकरा॥
मेरा लीया सीस उसी का लीजिये।
हरि हाँ, वाजिद, राव रंक का न्याव बरावर कीजिये॥
काल कौ अंग
काल फिरत है हाल रैंण-दिन लोइ रे।
हनै राव रंक गिणै नहिं कोइ रे॥
यह दुनियाँ वाजिद बाट की दूब है।
हरि हाँ, पाणी पहिले पाल बँधे तो ख़ूब है॥
मैं कहियो वाजिद तोहि बर बीस रे।
करिहै खंड बिहंड हाथ पर सीस रे॥
जुरा हैं बड़ी बलाय न छाड़ै जीव कूँ।
हरि हाँ, दूर जिन जाय पकड़ रह पीव कूँ॥
सुकरित लीनो, साथ पड़ी रहि मातरा।
लांबा पाँव पसार बिछाया साँथरा॥
लेय चल्या बनवास लगाई लाय रे।
हरि वाजिद, देखै सब परिवार अकेलो जाय रे॥
दातव्य कौ अंग
भूखो दुर्बल देख नाहिं मुँह मोड़िये।
जो हरि सारी देय तो आधी तोड़िये॥
दे आधी की आध अरध की कोर रे।
हरि हाँ, अन्न सरीखा पुण्य नाहिं कोइ ओर रे॥
खैर सरीखी और न दूजी वसत है।
मेल्हे वासण मांहि कहा मुहँ कसत है॥
तूँ जिन जानें जाय रहेगो ठाम रे।
हरि हाँ, माया दे वाजिद धणी के काम रे॥
मंगण आवत देख रहे मुहुँ गोय रे।
जद्यपि है बहु दाम काम नहिं लोय रे॥
भूख भोजन दियो न नागा कापरा।
हरि हाँ, बिन दीया वाजिंग पावे कहा वापरा॥
सुमरण कौ अंग
अरध नाम पाषाण तिरे नर लोइ रे।
तेरा नाम कह्यो कलि मांहि न बूड़े कोई रे।
कर्म सुक्रति इक वार बिलै हो जाहिंगे।
हरि हाँ वाजिद, हस्ती के असवार न कूकर खाहिंगे॥
रामनाम की लूट फवी है जीव कूँ।
निस-वासर वाजिंद सुमरता पीव कूँ।
यही बात परसिद्ध कहत सब गांव रे।
हरि हाँ, अधम अजामेंल तिर्यो नारायण-नांव रे॥
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