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Ahmed Faraz Ghazal / अहमद फ़राज़ ग़ज़लें

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं : अहमद फ़राज़

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ : अहमद फ़राज़

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ
इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्‌म को तुझ से हैं उमीदें
ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए आ

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें : अहमद फ़राज़

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ : अहमद फ़राज़

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ
क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ
तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ
तू कि यकता था बे-शुमार हुआ
हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ
हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ
हम अगर मंज़िलें न बन पाए
मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ
देर से सोच में हैं परवाने
राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ
इश्क़ भी खेल है नसीबों का
ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ
अब के गर तू मिले तो हम तुझ से
ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ
बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे : अहमद फ़राज़

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे
दिल धड़कता नहीं टपकता है
कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे
हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे
कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'
सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते : अहमद फ़राज़

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते
शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते
कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते
जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी
पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते
इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था
तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ : अहमद फ़राज़

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
याद क्या तुझ को दिलाएँ तिरा पैमाँ जानाँ
यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है
किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ
ज़िंदगी तेरी अता थी सो तिरे नाम की है
हम ने जैसे भी बसर की तिरा एहसाँ जानाँ
दिल ये कहता है कि शायद है फ़सुर्दा तू भी
दिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ
अव्वल अव्वल की मोहब्बत के नशे याद तो कर
बे-पिए भी तिरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ
आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहीं
रग-ए-मीना सुलग उट्ठी कि रग-ए-जाँ जानाँ
मुद्दतों से यही आलम न तवक़्क़ो न उमीद
दिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ
हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रक्खा था
ग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ
अब के कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँ
सर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गरेबाँ जानाँ
हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता है
हर कोई अपने ही साए से हिरासाँ जानाँ
जिस को देखो वही ज़ंजीर-ब-पा लगता है
शहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िंदाँ जानाँ
अब तिरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आए
और से और हुए दर्द के उनवाँ जानाँ
हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थे
हम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ
होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा रेज़ा
जैसे उड़ते हुए औराक़-ए-परेशाँ जानाँ

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा : अहमद फ़राज़

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा
ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला
तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'
ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला : अहमद फ़राज़

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला
वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला
अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा
सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला
सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत-ए-गुल की सूरत
रात को ग़ुंचा-ए-दिल में सिमट आने वाला
क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से
वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला
तेरे होते हुए आ जाती थी सारी दुनिया
आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला
मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं
कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला
क्या ख़बर थी जो मिरी जाँ में घुला है इतना
है वही मुझ को सर-ए-दार भी लाने वाला
मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते
है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला
तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

सामने उस के कभी उस की सताइश नहीं की : अहमद फ़राज़

सामने उस के कभी उस की सताइश नहीं की
दिल ने चाहा भी अगर होंटों ने जुम्बिश नहीं की
अहल-ए-महफ़िल पे कब अहवाल खुला है अपना
मैं भी ख़ामोश रहा उस ने भी पुर्सिश नहीं की
जिस क़दर उस से त'अल्लुक़ था चला जाता है
उस का क्या रंज हो जिस की कभी ख़्वाहिश नहीं की
ये भी क्या कम है कि दोनों का भरम क़ाएम है
उस ने बख़्शिश नहीं की हम ने गुज़ारिश नहीं की
इक तो हम को अदब आदाब ने प्यासा रक्खा
उस पे महफ़िल में सुराही ने भी गर्दिश नहीं की
हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं
हम ने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की
ऐ मिरे अब्र-ए-करम देख ये वीराना-ए-जाँ
क्या किसी दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की
कट मरे अपने क़बीले की हिफ़ाज़त के लिए
मक़्तल-ए-शहर में ठहरे रहे जुम्बिश नहीं की
वो हमें भूल गया हो तो अजब क्या है 'फ़राज़'
हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं की

क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता : अहमद फ़राज़

क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता
वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता
आँखें हैं कि ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से
और ज़ख़्म-ए-जुदाई है कि भर भी नहीं जाता
वो राहत-ए-जाँ है मगर इस दर-बदरी में
ऐसा है कि अब ध्यान उधर भी नहीं जाता
हम दोहरी अज़िय्यत के गिरफ़्तार मुसाफ़िर
पाँव भी हैं शल शौक़-ए-सफ़र भी नहीं जाता
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है
और तुझ से बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता
पागल हुए जाते हो 'फ़राज़' उस से मिले क्या
इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं : अहमद फ़राज़

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं
'फ़राज़' अब ज़रा लहजा बदल के देखते हैं
जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र
कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं
रह-ए-वफ़ा में हरीफ़-ए-ख़िराम कोई तो हो
सो अपने आप से आगे निकल के देखते हैं
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार बार जो आँखों को मल के देखते हैं
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में
जो लालचों से तुझे मुझ को जल के देखते हैं
ये क़ुर्ब क्या है कि यक-जाँ हुए न दूर रहे
हज़ार एक ही क़ालिब में ढल के देखते हैं
न तुझ को मात हुई है न मुझ को मात हुई
सो अब के दोनों ही चालें बदल के देखते हैं
ये कौन है सर-ए-साहिल कि डूबने वाले
समुंदरों की तहों से उछल के देखते हैं
अभी तलक तो न कुंदन हुए न राख हुए
हम अपनी आग में हर रोज़ जल के देखते हैं
बहुत दिनों से नहीं है कुछ उस की ख़ैर-ख़बर
चलो 'फ़राज़' को ऐ यार चल के देखते हैं

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें : अहमद फ़राज़

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें
दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें
आज तक अपनी बेकली का सबब
ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें
बे-तरह हाल-ए-दिल है और तुझ से
दोस्ताना नहीं कि तुझ से कहें
एक तू हर्फ़-ए-आश्ना था मगर
अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें
क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का
इक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें
ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त
आब-ओ-दाना नहीं कि तुझ से कहें
अब तो अपना भी उस गली में 'फ़राज़'
आना जाना नहीं कि तुझ से कहें

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे : अहमद फ़राज़

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे
किस को सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे
उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे
हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे
दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है
जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे
कम नहीं तम-ए-इबादत भी तो हिर्स-ए-ज़र से
फ़क़्र तो वो है कि जो दीन न दुनिया रक्खे
हँस न इतना भी फ़क़ीरों के अकेले-पन पर
जा ख़ुदा मेरी तरह तुझ को भी तन्हा रक्खे
ये क़नाअ'त है इताअत है कि चाहत है 'फ़राज़'
हम तो राज़ी हैं वो जिस हाल में जैसा रक्खे

ये क्या कि सब से बयाँ दिल की हालतें करनी : अहमद फ़राज़

ये क्या कि सब से बयाँ दिल की हालतें करनी
'फ़राज़' तुझ को न आईं मोहब्बतें करनी
ये क़ुर्ब क्या है कि तू सामने है और हमें
शुमार अभी से जुदाई की साअ'तें करनी
कोई ख़ुदा हो कि पत्थर जिसे भी हम चाहें
तमाम उम्र उसी की इबादतें करनी
सब अपने अपने क़रीने से मुंतज़िर उस के
किसी को शुक्र किसी को शिकायतें करनी
हम अपने दिल से ही मजबूर और लोगों को
ज़रा सी बात पे बरपा क़यामतें करनी
मिलें जब उन से तो मुबहम सी गुफ़्तुगू करना
फिर अपने आप से सौ सौ वज़ाहतें करनी
ये लोग कैसे मगर दुश्मनी निबाहते हैं
हमें तो रास न आईं मोहब्बतें करनी
कभी 'फ़राज़' नए मौसमों में रो देना
कभी तलाश पुरानी रिफाक़तें करनी

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो : अहमद फ़राज़

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो
ऐ जान-ए-जहाँ ये कोई तुम सा है कि तुम हो
ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है
ये धुँद है बादल है कि साया है कि तुम हो
इस दीद की साअत में कई रंग हैं लर्ज़ां
मैं हूँ कि कोई और है दुनिया है कि तुम हो
देखो ये किसी और की आँखें हैं कि मेरी
देखूँ ये किसी और का चेहरा है कि तुम हो
ये उम्र-ए-गुरेज़ाँ कहीं ठहरे तो ये जानूँ
हर साँस में मुझ को यही लगता है कि तुम हो
हर बज़्म में मौज़ू-ए-सुख़न दिल-ज़दगाँ का
अब कौन है शीरीं है कि लैला है कि तुम हो
इक दर्द का फैला हुआ सहरा है कि मैं हूँ
इक मौज में आया हुआ दरिया है कि तुम हो
वो वक़्त न आए कि दिल-ए-ज़ार भी सोचे
इस शहर में तन्हा कोई हम सा है कि तुम हो
आबाद हम आशुफ़्ता-सरों से नहीं मक़्तल
ये रस्म अभी शहर में ज़िंदा है कि तुम हो
ऐ जान-ए-'फ़राज़' इतनी भी तौफ़ीक़ किसे थी
हम को ग़म-ए-हस्ती भी गवारा है कि तुम हो

न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो : अहमद फ़राज़

न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो
किसे बज़्म-ए-शौक़ में लाएँ हम दिल-ए-बे-क़रार कोई तो हो
किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब
मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए'तिबार कोई तो हो
कहीं तार-ए-दामन-ए-गुल मिले तो ये मान लें कि चमन खिले
कि निशान फ़स्ल-ए-बहार का सर-ए-शाख़-सार कोई तो हो
ये उदास उदास से बाम ओ दर ये उजाड़ उजाड़ सी रह-गुज़र
चलो हम नहीं न सही मगर सर-ए-कू-ए-यार कोई तो हो
ये सुकून-ए-जाँ की घड़ी ढले तो चराग़-ए-दिल ही न बुझ चले
वो बला से हो ग़म-ए-इश्क़ या ग़म-ए-रोज़गार कोई तो हो
सर-ए-मक़्तल-ए-शब-ए-आरज़ू रहे कुछ तो इश्क़ की आबरू
जो नहीं अदू तो 'फ़राज़' तू कि नसीब-ए-दार कोई तो हो

उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया : अहमद फ़राज़

उस ने सुकूत-ए-शब में भी अपना पयाम रख दिया
हिज्र की रात बाम पर माह-ए-तमाम रख दिया
आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थी
मैं ने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही
उस ने जो फेर ली नज़र मैं ने भी जाम रख दिया
उस ने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे
मैं ने तो उस के पाँव में सारा कलाम रख दिया
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया
अब के बहार ने भी कीं ऐसी शरारतें कि बस
कब्क-ए-दरी की चाल में तेरा ख़िराम रख दिया
जो भी मिला उसी का दिल हल्क़ा-ब-गोश-ए-यार था
उस ने तो सारे शहर को कर के ग़ुलाम रख दिया
और 'फ़राज़' चाहिएँ कितनी मोहब्बतें तुझे
माओं ने तेरे नाम पर बच्चों का नाम रख दिया

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ : अहमद फ़राज़

उस को जुदा हुए भी ज़माना बहुत हुआ
अब क्या कहें ये क़िस्सा पुराना बहुत हुआ
ढलती न थी किसी भी जतन से शब-ए-फ़िराक़
ऐ मर्ग-ए-ना-गहाँ तिरा आना बहुत हुआ
हम ख़ुल्द से निकल तो गए हैं पर ऐ ख़ुदा
इतने से वाक़िए का फ़साना बहुत हुआ
अब हम हैं और सारे ज़माने की दुश्मनी
उस से ज़रा सा रब्त बढ़ाना बहुत हुआ
अब क्यूँ न ज़िंदगी पे मोहब्बत को वार दें
इस आशिक़ी में जान से जाना बहुत हुआ
अब तक तो दिल का दिल से तआ'रुफ़ न हो सका
माना कि उस से मिलना मिलाना बहुत हुआ
क्या क्या न हम ख़राब हुए हैं मगर ये दिल
ऐ याद-ए-यार तेरा ठिकाना बहुत हुआ
कहता था नासेहों से मिरे मुँह न आइयो
फिर क्या था एक हू का बहाना बहुत हुआ
लो फिर तिरे लबों पे उसी बेवफ़ा का ज़िक्र
अहमद-'फ़राज़' तुझ से कहा ना बहुत हुआ

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो : अहमद फ़राज़

आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो
बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो
जस्ता जस्ता पढ़ लिया करना मज़ामीन-ए-वफ़ा
पर किताब-ए-इश्क़ का हर बाब मत देखा करो
इस तमाशे में उलट जाती हैं अक्सर कश्तियाँ
डूबने वालों को ज़ेर-ए-आब मत देखा करो
मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब
बज़्म-ए-साक़ी में अदब आदाब मत देखा करो
हम से दरवेशों के घर आओ तो यारों की तरह
हर जगह ख़स-ख़ाना ओ बर्फ़ाब मत देखा करो
माँगे-ताँगे की क़बाएँ देर तक रहती नहीं
यार लोगों के लक़ब-अलक़ाब मत देखा करो
तिश्नगी में लब भिगो लेना भी काफ़ी है 'फ़राज़'
जाम में सहबा है या ज़हराब मत देखा करो

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे : अहमद फ़राज़

क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
दिल वो बे-मेहर कि रोने के बहाने माँगे
हम न होते तो किसी और के चर्चे होते
ख़िल्क़त-ए-शहर तो कहने को फ़साने माँगे
यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिए
अब यही तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहाने माँगे
अपना ये हाल कि जी हार चुके लुट भी चुके
और मोहब्बत वही अंदाज़ पुराने माँगे
ज़िंदगी हम तिरे दाग़ों से रहे शर्मिंदा
और तू है कि सदा आईना-ख़ाने माँगे
दिल किसी हाल पे क़ाने ही नहीं जान-ए-'फ़राज़'
मिल गए तुम भी तो क्या और न जाने माँगे

गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा : अहमद फ़राज़

गुफ़्तुगू अच्छी लगी ज़ौक़-ए-नज़र अच्छा लगा
मुद्दतों के बाद कोई हम-सफ़र अच्छा लगा
दिल का दुख जाना तो दिल का मसअला है पर हमें
उस का हँस देना हमारे हाल पर अच्छा लगा
हर तरह की बे-सर-ओ-सामानियों के बावजूद
आज वो आया तो मुझ को अपना घर अच्छा लगा
बाग़बाँ गुलचीं को चाहे जो कहे हम को तो फूल
शाख़ से बढ़ कर कफ़-ए-दिलदार पर अच्छा लगा
कोई मक़्तल में न पहुँचा कौन ज़ालिम था जिसे
तेग़-ए-क़ातिल से ज़ियादा अपना सर अच्छा लगा
हम भी क़ाइल हैं वफ़ा में उस्तुवारी के मगर
कोई पूछे कौन किस को उम्र भर अच्छा लगा
अपनी अपनी चाहतें हैं लोग अब जो भी कहें
इक परी-पैकर को इक आशुफ़्ता-सर अच्छा लगा
'मीर' के मानिंद अक्सर ज़ीस्त करता था 'फ़राज़'
था तो वो दीवाना सा शा'इर मगर अच्छा लगा

फिर उसी रहगुज़ार पर शायद : अहमद फ़राज़

फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद
जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को
मिल गए और हम-सफ़र शायद
जान-पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद
अज्नबिय्यत की धुँद छट जाए
चमक उठ्ठे तिरी नज़र शायद
ज़िंदगी भर लहू रुलाएगी
याद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद
जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं 'फ़राज़'
फिर भी तू इंतिज़ार कर शायद

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम : अहमद फ़राज़

अब और क्या किसी से मरासिम बढ़ाएँ हम
ये भी बहुत है तुझ को अगर भूल जाएँ हम
सहरा-ए-ज़िंदगी में कोई दूसरा न था
सुनते रहे हैं आप ही अपनी सदाएँ हम
इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब
इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम
तू इतनी दिल-ज़दा तो न थी ऐ शब-ए-फ़िराक़
आ तेरे रास्ते में सितारे लुटाएँ हम
वो लोग अब कहाँ हैं जो कहते थे कल 'फ़राज़'
हे हे ख़ुदा-न-कर्दा तुझे भी रुलाएँ हम

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे : अहमद फ़राज़

करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे
ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे
ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के
मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे
मगर वो ज़ूद-फ़रामोश ज़ूद-रंज भी है
कि रूठ जाए अगर याद कुछ दिलाऊँ उसे
वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ
तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे
जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है 'फ़राज़'
अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे

मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकला : अहमद फ़राज़

मैं तो मक़्तल में भी क़िस्मत का सिकंदर निकला
क़ुरआ-ए-फ़ाल मिरे नाम का अक्सर निकला
था जिन्हें ज़ो'म वो दरिया भी मुझी में डूबे
मैं कि सहरा नज़र आता था समुंदर निकला
मैं ने उस जान-ए-बहाराँ को बहुत याद किया
जब कोई फूल मिरी शाख़-ए-हुनर पर निकला
शहर-वालों की मोहब्बत का मैं क़ाएल हूँ मगर
मैं ने जिस हाथ को चूमा वही ख़ंजर निकला
तू यहीं हार गया है मिरे बुज़दिल दुश्मन
मुझ से तन्हा के मुक़ाबिल तिरा लश्कर निकला
मैं कि सहरा-ए-मोहब्बत का मुसाफ़िर था 'फ़राज़'
एक झोंका था कि ख़ुश्बू के सफ़र पर निकला

रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं : अहमद फ़राज़

रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं
इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है
बाद में सैकड़ों आज़ार से लग जाते हैं
पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है
फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं
बेबसी भी कभी क़ुर्बत का सबब बनती है
रो न पाएँ तो गले यार से लग जाते हैं
कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं
दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के 'फ़राज़'
कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो : अहमद फ़राज़

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो
बहुत कड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो
तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है
ये जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो
नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं
बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो
ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है
किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो
अभी तो जाग रहे हैं चराग़ राहों के
अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो
तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है
'फ़राज़' तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो

तुझे है मश्क़-ए-सितम का मलाल वैसे ही : अहमद फ़राज़

तुझे है मश्क़-ए-सितम का मलाल वैसे ही
हमारी जान थी जाँ पर वबाल वैसे ही
चला था ज़िक्र ज़माने की बेवफ़ाई का
सो आ गया है तुम्हारा ख़याल वैसे ही
हम आ गए हैं तह-ए-दाम तो नसीब अपना
वगरना उस ने तो फेंका था जाल वैसे ही
मैं रोकना ही नहीं चाहता था वार उस का
गिरी नहीं मिरे हाथों से ढाल वैसे ही
ज़माना हम से भला दुश्मनी तो क्या रखता
सो कर गया है हमें पाएमाल वैसे ही
मुझे भी शौक़ न था दास्ताँ सुनाने का
'फ़राज़' उस ने भी पूछा था हाल वैसे ही

तेरी बातें ही सुनाने आए : अहमद फ़राज़

तेरी बातें ही सुनाने आए
दोस्त भी दिल ही दुखाने आए
फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आए
ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आए
इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आए
अजनबी दोस्त हमें देख कि हम
कुछ तुझे याद दिलाने आए
दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आए
अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आए
क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आए
सो रहो मौत के पहलू में 'फ़राज़'
नींद किस वक़्त न जाने आए

मिसाल-ए-दस्त-ए-ज़ुलेख़ा तपाक चाहता है : अहमद फ़राज़

मिसाल-ए-दस्त-ए-ज़ुलेख़ा तपाक चाहता है
ये दिल भी दामन-ए-यूसुफ़ है चाक चाहता है
दुआएँ दो मिरे क़ातिल को तुम कि शहर का शहर
उसी के हाथ से होना हलाक चाहता है
फ़साना-गो भी करे क्या कि हर कोई सर-ए-बज़्म
मआल-ए-क़िस्सा-ए-दिल दर्दनाक चाहता है
इधर उधर से कई आ रही हैं आवाज़ें
और उस का ध्यान बहुत इंहिमाक चाहता है
ज़रा सी गर्द-ए-हवस दिल पे लाज़मी है 'फ़राज़'
वो इश्क़ क्या है जो दामन को पाक चाहता है

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते : अहमद फ़राज़

ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते
जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं
मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं
कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते
शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा
नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते
कैसे ही तलातुम हों मगर क़ुल्ज़ुम-ए-जाँ में
कुछ याद-जज़ीरे हैं कि ओझल नहीं होते
उश्शाक़ के मानिंद कई अहल-ए-हवस भी
पागल तो नज़र आते हैं पागल नहीं होते
सब ख़्वाहिशें पूरी हों 'फ़राज़' ऐसा नहीं है
जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते

शो'ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो : अहमद फ़राज़

शो'ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो
मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो
जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया
अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो
ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी
ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो
ऐसा न हो कभी कि पलट कर न आ सकूँ
हर बार दूर जा के सदाएँ मुझे न दो
कब मुझ को ए'तिराफ़-ए-मोहब्बत न था 'फ़राज़'
कब मैं ने ये कहा है सज़ाएँ मुझे न दो

तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए : अहमद फ़राज़

तुझ से बिछड़ के हम भी मुक़द्दर के हो गए
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गए
फिर यूँ हुआ कि ग़ैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफ़रतें थीं कि बाहर के हो गए
क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर 'अज़ीज़ थे
अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए
ऐ याद यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गए
समझा रहे थे मुझ को सभी नासेहान-ए-शहर
फिर रफ़्ता रफ़्ता ख़ुद उसी काफ़र के हो गए
अब के न इंतिज़ार करें चारागर कि हम
अब के गए तो कू-ए-सितमगर के हो गए
रोते हो इक जज़ीरा-ए-जाँ को 'फ़राज़' तुम
देखो तो कितने शहर समुंदर के हो गए

Nadeem Qasami Ghazal / अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़लें


अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल



अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal

अजीब रंग तिरे हुस्न का लगाव में था
गुलाब जैसे कड़ी धूप के अलाव में था


है जिस की याद मिरी फ़र्द-ए-जुर्म की सुर्ख़ी
उसी का अक्स मिरे एक एक घाव में था


यहाँ वहाँ से किनारे मुझे बुलाते रहे
मगर मैं वक़्त का दरिया था और बहाव में था


उरूस-ए-गुल को सबा जैसे गुदगुदा के चली
कुछ ऐसा प्यार का आलम तिरे सुभाव में था


मैं पुर-सुकूँ हूँ मगर मेरा दिल ही जानता है
जो इंतिशार मोहब्बत के रख-रखाव में था


ग़ज़ल के रूप में तहज़ीब गा रही थी 'नदीम'
मिरा कमाल मिरे फ़न के इस रचाव में था


अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal






अपने माहौल से थे क़ैस के रिश्ते क्या क्या
दश्त में आज भी उठते हैं बगूले क्या क्या


इश्क़ मे'आर-ए-वफ़ा को नहीं करता नीलाम
वर्ना इदराक ने दिखलाए थे रस्ते क्या क्या


ये अलग बात कि बरसे नहीं गरजे तो बहुत
वर्ना बादल मिरे सहराओं पे उमडे क्या क्या


आग भड़की तो दर-ओ-बाम हुए राख के ढेर
और देते रहे अहबाब दिलासे क्या क्या


लोग अशिया की तरह बिक गए अशिया के लिए
सर-ए-बाज़ार तमाशे नज़र आए क्या क्या


लफ़्ज़ किस शान से तख़्लीक़ हुआ था लेकिन
उस का मफ़्हूम बदलते रहे नुक़्ते क्या क्या


इक किरन तक भी न पहुँची मिरे बातिन में 'नदीम'


सर-ए-अफ़्लाक दमकते रहे तारे क्या क्या




अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal




अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की
कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की


अपनी पोशाक से हुश्यार कि ख़ुद्दाम-ए-क़दीम
धज्जियाँ माँगते हैं अपने गरेबानों की


सनअतें फैलती जाती हैं मगर इस के साथ
सरहदें टूटती जाती हैं गुलिस्तानों की


दिल में वो ज़ख़्म खिले हैं कि चमन क्या शय है
घर में बारात सी उतरी हुई गुल-दानों की


उन को क्या फ़िक्र कि मैं पार लगा या डूबा
बहस करते रहे साहिल पे जो तूफ़ानों की


तेरी रहमत तो मुसल्लम है मगर ये तो बता
कौन बिजली को ख़बर देता है काशानों की


मक़बरे बनते हैं ज़िंदों के मकानों से बुलंद
किस क़दर औज पे तकरीम है इंसानों की


एक इक याद के हाथों पे चराग़ों भरे तश्त

काबा-ए-दिल की फ़ज़ा है कि सनम-ख़ानों की




इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़ ओ समा दे दूँगा अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


इक मोहब्बत के एवज़ अर्ज़ ओ समा दे दूँगा
तुझ से काफ़िर को तो मैं अपना ख़ुदा दे दूँगा


जुस्तुजू भी मिरा फ़न है मिरे बिछड़े हुए दोस्त
जो भी दर बंद मिला उस पे सदा दे दूँगा


इक पल भी तिरे पहलू में जो मिल जाए तो मैं
अपने अश्कों से उसे आब-ए-बक़ा दे दूँगा


रुख़ बदल दूँगा सबा का तिरे कूचे की तरफ़
और तूफ़ान को अपना ही पता दे दूँगा


जब भी आएँ मिरे हाथों में रुतों की बागें
बर्फ़ को धूप तो सहरा को घटा दे दूँगा


तू करम कर नहीं सकता तो सितम तोड़ के देख
मैं तिरे ज़ुल्म को भी हुस्न-ए-अदा दे दूँगा


ख़त्म गर हो न सकी उज़्र-तराशी तेरी
इक सदी तक तुझे जीने की दुआ दे दूँगा







उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


उम्र भर उस ने इसी तरह लुभाया है मुझे
वो जो इस दश्त के उस पार से लाया है मुझे


कितने आईनों में इक अक्स दिखाया है मुझे
ज़िंदगी ने जो अकेला कभी पाया है मुझे


तू मिरा कुफ़्र भी है तू मिरा ईमान भी है
तू ने लूटा है मुझे तू ने बसाया है मुझे


मैं तुझे याद भी करता हूँ तो जल उठता हूँ
तू ने किस दर्द के सहरा में गँवाया है मुझे


तू वो मोती कि समुंदर में भी शो'ला-ज़न था
मैं वो आँसू कि सर-ए-ख़ाक गिराया है मुझे


इतनी ख़ामोश है शब लोग डरे जाते हैं
और मैं सोचता हूँ किस ने बुलाया है मुझे


मेरी पहचान तो मुश्किल थी मगर यारों ने
ज़ख़्म अपने जो कुरेदे हैं तो पाया है मुझे


वाइज़-ए-शहर के नारों से तो क्या खुलती आँख
ख़ुद मिरे ख़्वाब की हैबत ने जगाया है मुझे


ऐ ख़ुदा अब तिरे फ़िरदौस पे मेरा हक़ है

तू ने इस दौर के दोज़ख़ में जलाया है मुझे


इस ब्लॉग पर अन्य शायर / ग़ज़लकार /ग़ज़लें 




एहसास में फूल खिल रहे हैं अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


एहसास में फूल खिल रहे हैं
पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं


कुछ इतनी शदीद तीरगी है
आँखों में सितारे तैरते हैं


देखें तो हवा जमी हुई है
सोचें तो दरख़्त झूमते हैं


सुक़रात ने ज़हर पी लिया था
हम ने जीने के दुख सहे हैं


हम तुझ से बिगड़ के जब भी उठे
फिर तेरे हुज़ूर आ गए हैं


हम अक्स हैं एक दूसरे का
चेहरे ये नहीं हैं आइने हैं


लम्हों का ग़ुबार छा रहा है
यादों के चराग़ जल रहे हैं


सूरज ने घने सनोबरों में
जाले से शुआ'ओं के बुने हैं


यकसाँ हैं फ़िराक़-ओ-वस्ल दोनों
ये मरहले एक से कड़े हैं


पा कर भी तो नींद उड़ गई थी
खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं


जो दिन तिरी याद में कटे थे
माज़ी के खंडर बने खड़े हैं


जब तेरा जमाल ढूँडते थे
अब तेरा ख़याल ढूँडते हैं


हम दिल के गुदाज़ से हैं मजबूर
जब ख़ुश भी हुए तो रोए हैं


हम ज़िंदा हैं ऐ फ़िराक़ की रात

प्यारी तिरे बाल क्यूँ खुले हैं






क़लम दिल में डुबोया जा रहा है अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


क़लम दिल में डुबोया जा रहा है
नया मंशूर लिक्खा जा रहा है


मैं कश्ती में अकेला तो नहीं हूँ
मिरे हमराह दरिया जा रहा है


सलामी को झुके जाते हैं अश्जार
हवा का एक झोंका जा रहा है


मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हर तरफ़ हैं
मगर हर शख़्स तन्हा जा रहा है


मैं इक इंसाँ हूँ या सारा जहाँ हूँ
बगूला है कि सहरा जा रहा है


'नदीम' अब आमद आमद है सहर की
सितारों को बुझाया जा रहा है



कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा


तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा
घर में घिर जाऊँगा सहरा में बिखर जाऊँगा


तेरे पहलू से जो उठ्ठूँगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख़्स को पाऊँगा जिधर जाऊँगा


अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा


तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा


चारासाज़ों से अलग है मिरा मेआ'र कि मैं
ज़ख़्म खाऊँगा तो कुछ और सँवर जाऊँगा


अब तो ख़ुर्शीद को गुज़रे हुए सदियाँ गुज़रीं
अब उसे ढूँडने मैं ता-ब-सहर जाऊँगा


ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा

Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


खड़ा था कब से ज़मीं पीठ पर उठाए हुए
आब आदमी है क़यामत से लौ लगाए हुए


ये दश्त से उमड आया है किस का सैल-ए-जुनूँ
कि हुस्न-ए-शहर खड़ा है नक़ाब उठाए हुए


ये भेद तेरे सिवा ऐ ख़ुदा किसे मालूम
अज़ाब टूट पड़े मुझ पे किस के लाए हुए


ये सैल-ए-आब न था ज़लज़ला था पानी का
बिखर बिखर गए क़र्ये मिरे बसाए हुए


अजब तज़ाद में काटा है ज़िंदगी का सफ़र
लबों पे प्यास थी बादल थे सर पे छाए हुए


सहर हुई तो कोई अपने घर में रुक न सका
किसी को याद न आए दिए जलाए हुए


ख़ुदा की शान कि मुनकिर हैं आदमियत के
ख़ुद अपनी सुकड़ी हुई ज़ात के सताए हुए


जो आस्तीन चढ़ाएँ भी मुस्कुराएँ भी
वो लोग हैं मिरे बरसों के आज़माए हुए


ये इंक़िलाब तो तामीर के मिज़ाज में है
गिराए जाते हैं ऐवाँ बने-बनाए हुए


ये और बात मिरे बस में थी न गूँज इस की
मुझे तो मुद्दतें गुज़रीं ये गीत गाए हुए


मिरी ही गोद में क्यूँ कट के गिर पड़े हैं 'नदीम'
अभी दुआ के लिए थे जो हाथ उठाए हुए





जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


जाने कहाँ थे और चले थे कहाँ से हम
बेदार हो गए किसी ख़्वाब-ए-गिराँ से हम


ऐ नौ-बहार-ए-नाज़ तिरी निकहतों की ख़ैर
दामन झटक के निकले तिरे गुलसिताँ से हम


पिंदार-ए-आशिक़ी की अमानत है आह-ए-सर्द
ये तीर आज छोड़ रहे हैं कमाँ से हम


आओ ग़ुबार-ए-राह में ढूँडें शमीम-ए-नाज़
आओ ख़बर बहार की पूछें ख़िज़ाँ से हम


आख़िर दुआ करें भी तो किस मुद्दआ' के साथ
कैसे ज़मीं की बात कहें आसमाँ से हम





जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी
दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर दी


तुझ से किस तरह मैं इज़्हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मुआ'नी ने बग़ावत कर दी


मैं तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले
तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी


तुझ को पूजा है कि असनाम-परस्ती की है
मैं ने वहदत के मफ़ाहीम की कसरत कर दी


मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है
तिरी उल्फ़त ने मोहब्बत मिरी आदत कर दी


पूछ बैठा हूँ मैं तुझ से तिरे कूचे का पता
तेरे हालात ने कैसी तिरी सूरत कर दी


क्या तिरा जिस्म तिरे हुस्न की हिद्दत में जला
राख किस ने तिरी सोने की सी रंगत कर दी





जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


जी चाहता है फ़लक पे जाऊँ
सूरज को ग़ुरूब से बचाऊँ


बस मेरा चले जो गर्दिशों पर
दिन को भी न चाँद को बुझाऊँ


मैं छोड़ के सीधे रास्तों को
भटकी हुई नेकियाँ कमाऊँ


इम्कान पे इस क़दर यक़ीं है
सहराओं में बीज डाल आऊँ


मैं शब के मुसाफ़िरों की ख़ातिर
मिश्अल न मिले तो घर जलाऊँ


अशआर हैं मेरे इस्तिआरे
आओ तुम्हें आइने दिखाऊँ


यूँ बट के बिखर के रह गया हूँ
हर शख़्स में अपना अक्स पाऊँ


आवाज़ जो दूँ किसी के दर पर
अंदर से भी ख़ुद निकल के आऊँ


ऐ चारागरान-ए-अस्र-ए-हाज़िर
फ़ौलाद का दिल कहाँ से लाऊँ


हर रात दुआ करूँ सहर की
हर सुब्ह नया फ़रेब खाऊँ


हर जब्र पे सब्र कर रहा हूँ
इस तरह कहीं उजड़ न जाऊँ


रोना भी तो तर्ज़-ए-गुफ़्तुगू है
आँखें जो रुकें तो लब हिलाऊँ


ख़ुद को तो 'नदीम' आज़माया
अब मर के ख़ुदा को आज़माऊँ



तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


तू जो बदला तो ज़माना भी बदल जाएगा
घर जो सुलगा तो भरा शहर भी जल जाएगा


सामने आ कि मिरा इश्क़ है मंतिक़ में असीर
आग भड़की तो ये पत्थर भी पिघल जाएगा


दिल को मैं मुंतज़िर-ए-अब्र-ए-करम क्यूँ रक्खूँ
फूल है क़तरा-ए-शबनम से बहल जाएगा


मौसम-ए-गुल अगर इस हाल में आया भी तो क्या
ख़ून-ए-गुल चेहरा-ए-गुलज़ार पे मल जाएगा


वक़्त के पाँव की ज़ंजीर है रफ़्तार-ए-'नदीम'
हम जो ठहरे तो उफ़ुक़ दूर निकल जाएगा



फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


फ़ासले के मअ'नी का क्यूँ फ़रेब खाते हो
जितने दूर जाते हो उतने पास आते हो


रात टूट पड़ती है जब सुकूत-ए-ज़िंदाँ पर
तुम मिरे ख़यालों में छुप के गुनगुनाते हो


मेरी ख़ल्वत-ए-ग़म के आहनी दरीचों पर
अपनी मुस्कुराहट की मिशअलें जलाते हो


जब तनी सलाख़ों से झाँकती है तन्हाई
दिल की तरह पहलू से लग के बैठ जाते हो


तुम मिरे इरादों के डोलते सितारों को
यास के ख़लाओं में रास्ता दिखाते हो


कितने याद आते हो पूछते हो क्यूँ मुझ से
जितना याद करते हो उतने याद आते हो





तेरी महफ़िल भी मुदावा नहीं तन्हाई का अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


तेरी महफ़िल भी मुदावा नहीं तन्हाई का
कितना चर्चा था तिरी अंजुमन-आराई का


दाग़-ए-दिल नक़्श है इक लाला-ए-सहराई का
ये असासा है मिरी बादिया-पैमाई का


जब भी देखा है तुझे आलम-ए-नौ देखा है
मरहला तय न हुआ तेरी शनासाई का


वो तिरे जिस्म की क़ौसें हों कि मेहराब-ए-हरम
हर हक़ीक़त में मिला ख़म तिरी अंगड़ाई का


उफ़ुक़-ए-ज़ेहन पे चमका तिरा पैमान-ए-विसाल
चाँद निकला है मिरे आलम-ए-तन्हाई का


भरी दुनिया में फ़क़त मुझ से निगाहें न चुरा
इश्क़ पर बस न चलेगा तिरी दानाई का


हर नई बज़्म तिरी याद का माहौल बनी
मैं ने ये रंग भी देखा तिरी यकताई का


नाला आता है जो लब पर तो ग़ज़ल बनता है
मेरे फ़न पर भी है परतव तिरी रानाई का





फिर भयानक तीरगी में आ गए अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


फिर भयानक तीरगी में आ गए
हम गजर बजने से धोका खा गए


हाए ख़्वाबों की ख़याबाँ-साज़ियाँ
आँख क्या खोली चमन मुरझा गए


कौन थे आख़िर जो मंज़िल के क़रीब
आइने की चादरें फैला गए


किस तजल्ली का दिया हम को फ़रेब
किस धुँदलके में हमें पहुँचा गए


उन का आना हश्र से कुछ कम न था
और जब पलटे क़यामत ढा गए


इक पहेली का हमें दे कर जवाब
इक पहेली बन के हर सू छा गए


फिर वही अख़्तर-शुमारी का निज़ाम
हम तो इस तकरार से उकता गए


रहनुमाओ रात अभी बाक़ी सही
आज सय्यारे अगर टकरा गए


क्या रसा निकली दुआ-ए-इज्तिहाद
वो छुपाते ही रहे हम पा गए


बस वही मेमार-ए-फ़र्दा हैं 'नदीम'
जिन को मेरे वलवले रास आ गए





फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


फूलों से लहू कैसे टपकता हुआ देखूँ
आँखों को बुझा लूँ कि हक़ीक़त को बदल दूँ


हक़ बात कहूँगा मगर ऐ जुरअत-ए-इज़हार
जो बात न कहनी हो वही बात न कह दूँ


हर सोच पे ख़ंजर सा गुज़र जाता है दिल से
हैराँ हूँ कि सोचूँ तो किस अंदाज़ में सोचूँ


आँखें तो दिखाती हैं फ़क़त बर्फ़ से पैकर
जल जाती हैं पोरें जो किसी जिस्म को छू लूँ


चेहरे हैं कि मरमर से तराशी हुई लौहें
बाज़ार में या शहर-ए-ख़मोशाँ में खड़ा हूँ


सन्नाटे उड़ा देते हैं आवाज़ के पुर्ज़े
बारों को अगर दश्त-ए-मुसीबत में पुकारूँ


मिलती नहीं जब मौत भी माँगे से तो यारब
हो इज़्न तो मैं अपनी सलीब आप उठा लूँ





मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


मरूँ तो मैं किसी चेहरे में रंग भर जाऊँ
'नदीम' काश यही एक काम कर जाऊँ


ये दश्त-ए-तर्क-ए-मोहब्बत ये तेरे क़ुर्ब की प्यास
जो इज़्न हो तो तिरी याद से गुज़र जाऊँ


मिरा वजूद मिरी रूह को पुकारता है
तिरी तरफ़ भी चलूँ तो ठहर ठहर जाऊँ


तिरे जमाल का परतव है सब हसीनों पर
कहाँ कहाँ तुझे ढूँडूँ किधर किधर जाऊँ


मैं ज़िंदा था कि तिरा इंतिज़ार ख़त्म न हो
जो तू मिला है तो अब सोचता हूँ मर जाऊँ


तिरे सिवा कोई शाइस्ता-वफ़ा भी तो हो
मैं तेरे दर से जो उठूँ तो किस के घर जाऊँ


ये सोचता हूँ कि मैं बुत-परस्त क्यूँ न हुआ
तुझे क़रीब जो पाऊँ तो ख़ुद से डर जाऊँ


किसी चमन में बस इस ख़ौफ़ से गुज़र न हुआ
किसी कली पे न भूले से पाँव धर जाऊँ


ये जी में आती है तख़्लीक़-ए-फ़न के लम्हों में
कि ख़ून बन के रग-ए-संग में उतर जाऊँ





मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


मैं किसी शख़्स से बेज़ार नहीं हो सकता
एक ज़र्रा भी तो बे-कार नहीं हो सकता


इस क़दर प्यार है इंसाँ की ख़ताओं से मुझे
कि फ़रिश्ता मिरा मेआर नहीं हो सकता


ऐ ख़ुदा फिर ये जहन्नम का तमाशा किया है
तेरा शहकार तो फ़िन्नार नहीं हो सकता


ऐ हक़ीक़त को फ़क़त ख़्वाब समझने वाले
तू कभी साहिब-ए-असरार नहीं हो सकता


तू कि इक मौजा-ए-निकहत से भी चौंक उठता है
हश्र आता है तो बेदार नहीं हो सकता


सर-ए-दीवार ये क्यूँ निर्ख़ की तकरार हुई
घर का आँगन कभी बाज़ार नहीं हो सकता


राख सी मज्लिस-ए-अक़्वाम की चुटकी में है क्या
कुछ भी हो ये मिरा पिंदार नहीं हो सकता


इस हक़ीक़त को समझने में लुटाया क्या कुछ
मेरा दुश्मन मिरा ग़म-ख़्वार नहीं हो सकता


मैं ने भेजा तुझे ऐवान-ए-हुकूमत में मगर
अब तो बरसों तिरा दीदार नहीं हो सकता


तीरगी चाहे सितारों की सिफ़ारिश लाए
रात से मुझ को सरोकार नहीं हो सकता


वो जो शेरों में है इक शय पस-ए-अल्फ़ाज़ 'नदीम'
उस का अल्फ़ाज़ में इज़हार नहीं हो सकता



मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


मैं हूँ या तू है ख़ुद अपने से गुरेज़ाँ जैसे
मरे आगे कोई साया है ख़िरामाँ जैसे


तुझ से पहले तो बहारों का ये अंदाज़ न था
फूल यूँ खिलते हैं जलता हो गुलिस्ताँ जैसे


यूँ तिरी याद से होता है उजाला दिल में
चाँदनी में चमक उठता है बयाबाँ जैसे


दिल में रौशन हैं अभी तक तिरे वा'दों का चराग़
टूटती रात के तारे हों फ़रोज़ाँ जैसे


तुझे पाने की तमन्ना तुझे खोने का यक़ीं
तेरे गेसू मिरे माहौल में ग़लताँ जैसे


वक़्त बदला पे न बदला मिरा मे'आर-ए-वफ़ा
आँधियों में सर-ए-कोहसार चराग़ाँ जैसे


अश्क आँखों में चमकते हैं तबस्सुम बन कर
आ गया हाथ तिरा गोशा-ए-दामाँ जैसे


तुझ से मिल कर भी तमन्ना है कि तुझ से मिलता
प्यार के बा'द भी लब रहते हैं लर्ज़ां जैसे


भरी दुनिया में नज़र आता हूँ तन्हा तन्हा
मर्ग़-ज़ारों में कोई क़र्या-ए-वीराँ जैसे


ग़म-ए-जानाँ ग़म-ए-दौराँ की तरफ़ यूँ आया
जानिब शहर चले दुख़्तर-ए-दहक़ाँ जैसे


अस्र-ए-हाज़िर को सुनाता हूँ इस अंदाज़ में शे'र
मौसम-ए-गुल हो मज़ारों पे गुल-अफ़शाँ जैसे


ज़ख़्म भरता है ज़माना मगर इस तरह 'नदीम'
सी रहा हो कोई फूलों के गरेबाँ जैसे







लबों पे नर्म तबस्सुम रचा के धुल जाएँ अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


लबों पे नर्म तबस्सुम रचा के धुल जाएँ
ख़ुदा करे मिरे आँसू किसी के काम आएँ


जो इब्तिदा-ए-सफ़र में दिए बुझा बैठे
वो बद-नसीब किसी का सुराग़ क्या पाएँ


तलाश-ए-हुस्न कहाँ ले चली ख़ुदा जाने
उमंग थी कि फ़क़त ज़िंदगी को अपनाएँ


बुला रहे हैं उफ़ुक़ पर जो ज़र्द-रू टीले
कहो तो हम भी फ़सानों के राज़ हो जाएँ


न कर ख़ुदा के लिए बार बार ज़िक्र-ए-बहिश्त
हम आसमाँ का मुकर्रर फ़रेब क्यूँ खाएँ


तमाम मै-कदा सुनसान मय-गुसार उदास
लबों को खोल के कुछ सोचती हैं मीनाएँ





वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


वो कोई और न था चंद ख़ुश्क पत्ते थे
शजर से टूट के जो फ़स्ल-ए-गुल पे रोए थे


अभी अभी तुम्हें सोचा तो कुछ न याद आया
अभी अभी तो हम इक दूसरे से बिछड़े थे


तुम्हारे बा'द चमन पर जब इक नज़र डाली
कली कली में ख़िज़ाँ के चराग़ जलते थे


तमाम उम्र वफ़ा के गुनाहगार रहे
ये और बात कि हम आदमी तो अच्छे थे


शब-ए-ख़मोश को तन्हाई ने ज़बाँ दे दी
पहाड़ गूँजते थे दश्त सनसनाते थे


वो एक बार मिरे जिन को था हयात से प्यार
जो ज़िंदगी से गुरेज़ाँ थे रोज़ मरते थे


नए ख़याल अब आते हैं ढल के आहन में
हमारे दिल में कभी खेत लहलहाते थे


ये इर्तिक़ा का चलन है कि हर ज़माने में
पुराने लोग नए आदमी से डरते थे


'नदीम' जो भी मुलाक़ात थी अधूरी थी
कि एक चेहरे के पीछे हज़ार चेहरे थे





साँस लेना भी सज़ा लगता है अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


साँस लेना भी सज़ा लगता है
अब तो मरना भी रवा लगता है


कोह-ए-ग़म पर से जो देखूँ तो मुझे
दश्त आग़ोश-ए-फ़ना लगता है


सर-ए-बाज़ार है यारों की तलाश
जो गुज़रता है ख़फ़ा लगता है


मौसम-ए-गुल में सर-ए-शाख़-ए-गुलाब
शोला भड़के तो बजा लगता है


मुस्कुराता है जो इस आलम में
ब-ख़ुदा मुझ को ख़ुदा लगता है


इतना मानूस हूँ सन्नाटे से
कोई बोले तो बुरा लगता है


उन से मिल कर भी न काफ़ूर हुआ
दर्द ये सब से जुदा लगता है


नुत्क़ का साथ नहीं देता ज़ेहन
शुक्र करता हूँ गिला लगता है


इस क़दर तुंद है रफ़्तार-ए-हयात
वक़्त भी रिश्ता-बपा लगता है





शुऊर में कभी एहसास में बसाऊँ उसे अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


शुऊर में कभी एहसास में बसाऊँ उसे
मगर मैं चार तरफ़ बे-हिजाब पाऊँ उसे


अगरचे फ़र्त-ए-हया से नज़र न आऊँ उसे
वो रूठ जाए तो सौ तरह से मनाऊँ उसे


तवील हिज्र का ये जब्र है कि सोचता हूँ
जो दिल में बस्ता है अब हाथ भी लगाऊँ उसे


उसे बुला के मिला उम्र भर का सन्नाटा
मगर ये शौक़ कि इक बार फिर बुलाऊँ उसे


अँधेरी रात में जब रास्ता नहीं मिलता
मैं सोचता हूँ कहाँ जा के ढूँड लाऊँ उसे


अभी तक उस का तसव्वुर तो मेरे बस में है
वो दोस्त है तो ख़ुदा किस लिए बनाऊँ उसे


'नदीम' तर्क-ए-मोहब्बत को एक उम्र हुई
मैं अब भी सोच रहा हूँ कि भूल जाऊँ उसे



सूरज को निकलना है सो निकलेगा दोबारा अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


सूरज को निकलना है सो निकलेगा दोबारा
अब देखिए कब डूबता है सुब्ह का तारा


मग़रिब में जो डूबे उसे मशरिक़ ही निकाले
मैं ख़ूब समझता हूँ मशिय्यत का इशारा


पढ़ता हूँ जब उस को तो सना करता हूँ रब की
इंसान का चेहरा है कि क़ुरआन का पारा


जी हार के तुम पार न कर पाओ नदी भी
वैसे तो समुंदर का भी होता है किनारा


जन्नत मिली झूटों को अगर झूट के बदले
सच्चों को सज़ा में है जहन्नम भी गवारा


ये कौन सा इंसाफ़ है ऐ अर्श-नशीनो
बिजली जो तुम्हारी है तो ख़िर्मन है हमारा


मुस्तक़बिल-ए-इंसान ने ऐलान किया है
आइंदा से बे-ताज रहेगा सर-ए-दारा





हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


हम कभी इश्क़ को वहशत नहीं बनने देते
दिल की तहज़ीब को तोहमत नहीं बनने देते


लब ही लब है तो कभी और कभी चश्म ही चश्म
नक़्श तेरे तिरी सूरत नहीं बनने देते


ये सितारे जो चमकते हैं पस-ए-अब्र-ए-सियाह
तेरे ग़म को मिरी आदत नहीं बनने देते


उन की जन्नत भी कोई दश्त-ए-बला ही होगी
ज़िंदा रहने को जो लज़्ज़त नहीं बनने देते


दोस्त जो दर्द बटाते हैं वो नादानी में
दर-हक़ीक़त मिरी सीरत नहीं बनने देते


फ़िक्र फ़न के लिए लाज़िम मगर अच्छे शायर
अपने फ़न को कभी हिकमत नहीं बनने देते


वो मोहब्बत का तअल्लुक़ हो कि नफ़रत का 'नदीम'
राब्ते ज़ीस्त को ख़ल्वत नहीं बनने देते





हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है अहमद नदीम क़ासमी ग़ज़ल / Ahmed Nadeem Qasami Ghazal


हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है
तू क्यूँ मिरे दिल में बस गया है


चिलमन में गुलाब सँभल रहा है
ये तू है कि शोख़ी-ए-सबा है


झुकती नज़रें बता रही हैं
मेरे लिए तू भी सोचता है


मैं तेरे कहे से चुप हूँ लेकिन
चुप भी तू बयान-ए-मुद्दआ है


हर देस की अपनी अपनी बोली
सहरा का सुकूत भी सदा है


इक उम्र के बअ'द मुस्कुरा कर
तू ने तो मुझे रुला दिया है


उस वक़्त का हिसाब क्या दूँ
जो तेरे बग़ैर कट गया है


माज़ी की सुनाऊँ क्या कहानी
लम्हा लम्हा गुज़र गया है


मत माँग दुआएँ जब मोहब्बत
तेरा मेरा मुआमला है


अब तुझ से जो रब्त है तो इतना
तेरा ही ख़ुदा मिरा ख़ुदा है


रोने को अब अश्क भी नहीं हैं
या इश्क़ को सब्र आ गया है


अब किस की तलाश में हैं झोंके
मैं ने तो दिया बुझा दिया है


कुछ खेल नहीं है इश्क़ करना
ये ज़िंदगी भर का रत-जगा है

Asrar Ul Haq Majaz Ghazal / असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़लें


असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल 



आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


आसमाँ तक जो नाला पहुँचा है
दिल की गहराइयों से निकला है


मेरी नज़रों में हश्र भी क्या है
मैं ने उन का जलाल देखा है


जल्वा-ए-तूर ख़्वाब-ए-मूसा है
किस ने देखा है किस को देखा है


हाए अंजाम इस सफ़ीने का
नाख़ुदा ने जिसे डुबोया है


आह क्या दिल में अब लहू भी नहीं
आज अश्कों का रंग फीका है


जब भी आँखें मिलीं उन आँखों से
दिल ने दिल का मिज़ाज पूछा है


वो जवानी कि थी हरीफ़-ए-तरब
आज बर्बाद-ए-जाम-ओ-सहबा है


कौन उठ कर चला मुक़ाबिल से
जिस तरफ़ देखिए अंधेरा है


फिर मिरी आँख हो गई नमनाक
फिर किसी ने मिज़ाज पूछा है


सच तो ये है 'मजाज़' की दुनिया
हुस्न और इश्क़ के सिवा क्या है


Asrar Ul Haq Majaz Ghazal



आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


आशिक़ी जाँ-फ़ज़ा भी होती है
और सब्र-आज़मा भी होती है


रूह होती है कैफ़-परवर भी
और दर्द-आश्ना भी होती है


हुस्न को कर न दे ये शर्मिंदा
इश्क़ से ये ख़ता भी होती है


बन गई रस्म बादा-ख़्वारी भी
ये नमाज़ अब क़ज़ा भी होती है


जिस को कहते हैं नाला-ए-बरहम
साज़ में वो सदा भी होती है


क्या बता दो 'मजाज़' की दुनिया

कुछ हक़ीक़त-नुमा भी होती है




आओ अब मिल के गुलिस्ताँ को गुल्सिताँ कर दें असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


आओ अब मिल के गुलिस्ताँ को गुल्सिताँ कर दें
हर गुल-ओ-लाला को रक़्साँ ओ ग़ज़ल-ख़्वाँ कर दें


अक़्ल है फ़ित्ना-ए-बेदार सुला दें इस को
इश्क़ की जिंस-ए-गिराँ-माया को अर्ज़ां कर दें


दस्त-ए-वहशत में ये अपना ही गरेबाँ कब तक
ख़त्म अब सिलसिला-ए-चाक-ए-गरेबाँ कर दें


ख़ून-ए-आदम पे कोई हर्फ़ न आने पाए
जिन्हें इंसाँ नहीं कहते उन्हें इंसाँ कर दें


दामन-ए-ख़ाक पे ये ख़ून के छींटे कब तक
इन्हीं छींटों को बहिश्त-ए-गुल-ओ-रैहाँ कर दें


माह ओ अंजुम भी हों शर्मिंदा-ए-तनवीर 'मजाज़'

दश्त-ए-ज़ुल्मात में इक ऐसा चराग़ाँ कर दें




अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


अक़्ल की सतह से कुछ और उभर जाना था
इश्क़ को मंज़िल-ए-पस्ती से गुज़र जाना था


जल्वे थे हल्क़ा-ए-सर दाम-ए-नज़र से बाहर
मैं ने हर जल्वे को पाबंद-ए-नज़र जाना था


हुस्न का ग़म भी हसीं फ़िक्र हसीं दर्द हसीं
उन को हर रंग में हर तौर सँवर जाना था


हुस्न ने शौक़ के हंगामे तो देखे थे बहुत
इश्क़ के दावा-ए-तक़दीस से डर जाना था


ये तो क्या कहिए चला था मैं कहाँ से हमदम
मुझ को ये भी न था मालूम किधर जाना था


हुस्न और इश्क़ को दे ताना-ए-बेदाद 'मजाज़'

तुम को तो सिर्फ़ इसी बात पर मर जाना था




इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम
हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम


क्या पूछते हो झूमते आए कहाँ से हम
पी कर उठे हैं ख़ुम-कदा-ए-आसमाँ से हम


क्यूँकर हुआ है फ़ाश ज़माने पे क्या कहें
वो राज़-ए-दिल जो कह न सके राज़-दाँ से हम


हमदम यही है रहगुज़र-ए-यार-ए-ख़ुश-ख़िराम
गुज़रे हैं लाख बार इसी कहकशाँ से हम


क्या क्या हुआ है हम से जुनूँ में न पूछिए
उलझे कभी ज़मीं से कभी आसमाँ से हम


हर नर्गिस-ए-जमील ने मख़मूर कर दिया
पी कर उठे शराब हर इक बोस्ताँ से हम


ठुकरा दिए हैं अक़्ल ओ ख़िरद के सनम-कदे
घबरा चुके थे कशमकश-ए-इम्तिहाँ से हम


देखेंगे हम भी कौन है सज्दा तराज़-ए-शौक़
ले सर उठा रहे हैं तिरे आस्ताँ से हम


बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुरअतें 'मजाज़'

डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम


ऐश से बे-नियाज़ हैं हम लोग असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


ऐश से बे-नियाज़ हैं हम लोग
बे-ख़ुद-ए-सोज़-ओ-साज़ हैं हम लोग


जिस तरह चाहे छेड़ दे हम को
तेरे हाथों में साज़ हैं हम लोग


बे-सबब इल्तिफ़ात क्या मअ'नी
कुछ तो ऐ चश्म-ए-नाज़ हैं हम लोग


महफ़िल-ए-सोज़ ओ साज़ है दुनिया
हासिल-ए-सोज़ ओ साज़ हैं हम लोग


कोई इस राज़ से नहीं वाक़िफ़
क्यूँ सरापा नियाज़ हैं हम लोग


हम को रुस्वा न कर ज़माने में
बस-कि तेरा ही राज़ हैं हम लोग


सब इसी इश्क़ के करिश्मे हैं

वर्ना क्या ऐ 'मजाज़' हैं हम लोग






कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं


तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं


ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं


इस इक हिजाब पे सौ बे-हिजाबियाँ सदक़े
जहाँ से चाहता हूँ तुम को देखता हूँ मैं


बताने वाले वहीं पर बताते हैं मंज़िल
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं


कभी ये ज़ोम कि तू मुझ से छुप नहीं सकता
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छुपा हुआ हूँ मैं


मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादा-ए-इशरत

'मजाज़' टूटे हुए दिल की इक सदा हूँ मैं






करिश्मा-साजी-ए-दिल देखता हूँ असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


करिश्मा-साजी-ए-दिल देखता हूँ
तुम्हें अपने मुक़ाबिल देखता हूँ


जहाँ मंज़िल का इम्काँ ही नहीं है
वहाँ आसार-ए-मंज़िल देखता हूँ


सदा दी तू ने क्या जाने कहाँ से
मगर मैं जानिब-ए-दिल देखता हूँ


कहाँ का रहनुमा और कैसी राहें
जिधर बढ़ता हूँ मंज़िल देखता हूँ


इशारा है तिरा तूफ़ाँ की जानिब
मगर मैं हूँ कि साहिल देखता हूँ


मोहब्बत ही मोहब्बत है जहाँ पर
मोहब्बत की वो मंज़िल देखता हूँ


मिरे हाथों में भी है साज़ लेकिन
अभी मैं रंग-ए-महफ़िल देखता हूँ


तिरे हाथों से जो टूटा था इक दिन
वही टूटा हुआ दिल देखता हूँ


कभी तूफ़ाँ ही तूफ़ाँ है नज़र में
कभी साहिल ही साहिल देखता हूँ


ग़ुरूर-ए-हुस्न-ए-बातिल पर नज़र है
नियाज़-ए-इश्क़-ए-कामिल देखता हूँ


'मजाज़' और हुस्न के क़दमों पे सज्दे

मआल-ए-ज़ोम-ए-बातिल देखता हूँ


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ख़ामुशी का तो नाम होता है असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


ख़ामुशी का तो नाम होता है
वर्ना यूँ भी कलाम होता है


इश्क़ को पूछता नहीं कोई
हुस्न का एहतिराम होता है


आँख से आँख जब नहीं मिलती
दिल से दिल हम-कलाम होता है


हुस्न को शर्मसार करना ही
इश्क़ का इंतिक़ाम होता है


अल्लाह अल्लाह ये नाज़-ए-हुस्न 'मजाज़'

इंतिज़ार-ए-सलाम होता है




ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई
हाँ लुत्फ़ जब है पा के भी ढूँडा करे कोई


तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई


दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँ-नसीब की
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई


मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद
उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई


रंगीनी-ए-नक़ाब में गुम हो गई नज़र
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई


या तो किसी को जुरअत-ए-दीदार ही न हो
या फिर मिरी निगाह से देखा करे कोई


होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मजाज़'

इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुस्वा करे कोई


जिगर और दिल को बचाना भी है असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


जिगर और दिल को बचाना भी है
नज़र आप ही से मिलाना भी है


मोहब्बत का हर भेद पाना भी है
मगर अपना दामन बचाना भी है


जो दिल तेरे ग़म का निशाना भी है
क़तील-ए-जफ़ा-ए-ज़माना भी है


ये बिजली चमकती है क्यूँ दम-ब-दम
चमन में कोई आशियाना भी है


ख़िरद की इताअत ज़रूरी सही
यही तो जुनूँ का ज़माना भी है


न दुनिया न उक़्बा कहाँ जाइए
कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है


मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है


ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़'

ज़माने को आगे बढ़ाना भी है






धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


धुआँ सा इक सम्त उठ रहा है शरारे उड़ उड़ के आ रहे हैं
ये किस की आहें ये किस के नाले तमाम आलम पे छा रहे हैं


नक़ाब रुख़ से उठा चुके हैं खड़े हुए मुस्कुरा रहे हैं
मैं हैरती-ए-अज़ल हूँ अब भी वो ख़ाक हैराँ बना रहे हैं


हवाएँ बे-ख़ुद फ़ज़ाएँ बे-ख़ुद ये अम्बर-अफ़्शाँ घटाएँ बे-ख़ुद
मिज़ा ने छेड़ा है साज़ दिल का वो ज़ेर-ए-लब गुनगुना रहे हैं


ये शौक़ की वारदात-ए-पैहम ये वादा-ए-इल्तिफ़ात-ए-पैहम
कहाँ कहाँ आज़मा चुके हैं कहाँ कहाँ आज़मा रहे हैं


सुराहियाँ नौ-ब-नौ हैं अब भी जमाहियाँ नौ-ब-नौ हैं अब भी
मगर वो पहलू-तही की सौगंद अब भी नज़दीक आ रहे हैं


वो इश्क़ की वहशतों की ज़द में वो ताज की रिफ़अतों के आगे
मगर अभी आज़मा रहे हैं मगर अभी आज़मा रहे हैं


अता किया है 'मजाज़' फ़ितरत ने वो मज़ाक़-ए-लतीफ़ हम को

कि आलम-ए-आब-ओ-गिल से हट कर इक और आलम बना रहे हैं




नहीं ये फ़िक्र कोई रहबर-ए-कामिल नहीं मिलता असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


नहीं ये फ़िक्र कोई रहबर-ए-कामिल नहीं मिलता
कोई दुनिया में मानूस-ए-मिज़ाज-ए-दिल नहीं मिलता


कभी साहिल पे रह कर शौक़ तूफ़ानों से टकराएँ
कभी तूफ़ाँ में रह कर फ़िक्र है साहिल नहीं मिलता


ये आना कोई आना है कि बस रस्मन चले आए
ये मिलना ख़ाक मिलना है कि दिल से दिल नहीं मिलता


शिकस्ता-पा को मुज़्दा ख़स्तगान-ए-राह को मुज़्दा
कि रहबर को सुराग़-ए-जादा-ए-मंज़िल नहीं मिलता


वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता


ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए

ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता






बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


बर्बाद-ए-तमन्ना पे इताब और ज़ियादा
हाँ मेरी मोहब्बत का जवाब और ज़ियादा


रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना है अभी मुझ को ख़राब और ज़ियादा


आवारा ओ मजनूँ ही पे मौक़ूफ़ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझ को ख़िताब और ज़ियादा


उट्ठेंगे अभी और भी तूफ़ाँ मिरे दिल से
देखूँगा अभी इश्क़ के ख़्वाब और ज़ियादा


टपकेगा लहू और मिरे दीदा-ए-तर से
धड़केगा दिल-ए-ख़ाना-ख़राब और ज़ियादा


होगी मिरी बातों से उन्हें और भी हैरत
आएगा उन्हें मुझ से हिजाब और ज़ियादा


उसे मुतरिब-ए-बेबाक कोई और भी नग़्मा

ऐ साक़ी-ए-फ़य्याज़ शराब और ज़ियादा




यूँही बैठे रहो बस दर्द-ए-दिल से बे-ख़बर हो कर असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


यूँही बैठे रहो बस दर्द-ए-दिल से बे-ख़बर हो कर
बनो क्यूँ चारागर तुम क्या करोगे चारागर हो कर


दिखा दे एक दिन ऐ हुस्न-ए-रंगीं जल्वा-गर हो कर
वो नज़्ज़ारा जो इन आँखों में रह जाए नज़र हो कर


दिल-ए-सोज़-आशना के जल्वे थे जो मुंतशिर हो कर
फ़ज़ा-ए-दहर में चमका किए बर्क़ ओ शरर हो कर


वही जल्वे जो इक दिन दामन-ए-दिल से गुरेज़ाँ थे
नज़र में रह गए गुल-हा-ए-दामान-ए-नज़र हो कर


फ़लक की सम्त किस हसरत से तकते हैं मआज़-अल्लाह
ये नाले ना-रसा हो कर ये आहें बे-असर हो कर


ये किस के हुस्न के रंगीन जल्वे छाए जाते हैं

शफ़क़ की सुर्ख़ियाँ बन कर तजल्ली की सहर हो कर






ये मेरी दुनिया ये मेरी हस्ती असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


ये मेरी दुनिया ये मेरी हस्ती
नग़्मा-तराज़ी सहबा-परस्ती


शाइर की दुनिया शाइर की हस्ती
या नाला-ए-ग़म या शोर-ए-मस्ती


सब से गुरेज़ाँ सब पर बरसती
आँखों की मस्ती महँगी न सस्ती


या ख़ुल्द ओ साक़ी ऐ जज़्ब-ए-मस्ती
या टुकड़े टुकड़े दामान-ए-हस्ती


महव-ए-सफ़र हूँ गर्म-ए-सफ़र हूँ
मेरी नज़र में रिफ़अत न पस्ती


इन अँखड़ियों का आलम न पूछो
सहबा ही सहबा मस्ती ही मस्ती


वो आ भी जाते वो हो भी जाते
चश्म-ए-तमन्ना फिर भी तरसती


उन का करम है उन की मोहब्बत

क्या मेरे नग़्मे क्या मेरी हस्ती




रह-ए-शौक़ से अब हटा चाहता हूँ असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


रह-ए-शौक़ से अब हटा चाहता हूँ
कशिश हुस्न की देखना चाहता हूँ


कोई दिल सा दर्द-आश्ना चाहता हूँ
रह-ए-इश्क़ में रहनुमा चाहता हूँ


तुझी से तुझे छीनना चाहता हूँ
ये क्या चाहता हूँ ये क्या चाहता हूँ


ख़ताओं पे जो मुझ को माइल करे फिर
सज़ा और ऐसी सज़ा चाहता हूँ


वो मख़मूर नज़रें वो मदहोश आँखें
ख़राब-ए-मोहब्बत हुआ चाहता हूँ


वो आँखें झुकीं वो कोई मुस्कुराया
पयाम-ए-मोहब्बत सुना चाहता हूँ


तुझे ढूँढता हूँ तिरी जुस्तुजू है
मज़ा है कि ख़ुद गुम हुआ चाहता हूँ


ये मौजों की बे-ताबियाँ कौन देखे
मैं साहिल से अब लौटना चाहता हूँ


कहाँ का करम और कैसी इनायत

'मजाज़' अब जफ़ा ही जफ़ा चाहता हूँ




वो नक़ाब आप से उठ जाए तो कुछ दूर नहीं असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


वो नक़ाब आप से उठ जाए तो कुछ दूर नहीं
वर्ना मेरी निगह-ए-शौक़ भी मजबूर नहीं


ख़ातिर-ए-अहल-ए-नज़र हुस्न को मंज़ूर नहीं
इस में कुछ तेरी ख़ता दीदा-ए-महजूर नहीं


लाख छुपते हो मगर छुप के भी मस्तूर नहीं
तुम अजब चीज़ हो नज़दीक नहीं दूर नहीं


जुरअत-ए-अर्ज़ पे वो कुछ नहीं कहते लेकिन
हर अदा से ये टपकता है कि मंज़ूर नहीं


दिल धड़क उठता है ख़ुद अपनी ही हर आहट पर
अब क़दम मंज़िल-ए-जानाँ से बहुत दूर नहीं


हाए वो वक़्त कि जब बे-पिए मद-होशी थी
हाए ये वक़्त कि अब पी के भी मख़्मूर नहीं


हुस्न ही हुस्न है जिस सम्त उठाता हूँ नज़र
अब यहाँ तूर नहीं बर्क़-ए-सर-ए-तूर नहीं


देख सकता हूँ जो आँखों से वो काफ़ी है 'मजाज़'

अहल-ए-इरफ़ाँ की नवाज़िश मुझे मंज़ूर नहीं




साज़गार है हमदम इन दिनों जहाँ अपना असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


साज़गार है हमदम इन दिनों जहाँ अपना
इश्क़ शादमाँ अपना शौक़ कामराँ अपना


आह बे-असर किस की नाला ना-रसा किस का
काम बार-हा आया जज़्बा-ए-निहाँ अपना


कब किया था इस दिल पर हुस्न ने करम इतना
मेहरबाँ और इस दर्जा कब था आसमाँ अपना


उलझनों से घबराए मय-कदे में दर आए
किस क़दर तन-आसाँ है ज़ौक़-ए-राएगाँ अपना


कुछ न पूछ ऐ हमदम इन दिनों मिरा आलम
मुतरिब-ए-हसीं अपना साक़ी-ए-जवाँ अपना


इश्क़ और रुस्वाई कौन सी नई शय है
इश्क़ तो अज़ल से था रुस्वा-ए-जहाँ अपना


तुम 'मजाज़' दीवाने मस्लहत से बेगाने

वर्ना हम बना लेते तुम को राज़-दाँ अपना




सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं
हम अपने दिल को तूर बनाए हुए तो हैं


तासीर-ए-जज़्ब-ए-शौक़ दिखाए हुए तो हैं
हम तेरा हर हिजाब उठाए हुए तो हैं


हाँ क्या हुआ वो हौसला-ए-दीद-ए-अहल-ए-दिल
देखो ना वो नक़ाब उठाए हुए तो हैं


तेरे गुनाहगार गुनाहगार ही सही
तेरे करम की आस लगाए हुए तो हैं


अल्लाह-री कामयाबी-ए-आवारगान-ए-इश्क़
ख़ुद गुम हुए तो क्या उसे पाए हुए हैं


यूँ तुझ को इख़्तियार है तासीर दे न दे
दस्त-ए-दुआ हम आज उठाए हुए तो हैं


ज़िक्र उन का गर ज़बाँ पे नहीं है तो क्या हुआ
अब तक नफ़स नफ़स में समाए हुए तो हैं


मिटते हुओं को देख के क्यूँ रो न दें 'मजाज़'

आख़िर किसी के हम भी मिटाए हुए तो हैं




हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए असरार-उल-हक़ मजाज़ ग़ज़ल / Asrar Ul Haq Majaz Ghazal


हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए
दिल की जानिब नज़र है क्या कहिए


फिर वही रहगुज़र है क्या कहिए
ज़िंदगी राह पर है क्या कहिए


हुस्न ख़ुद पर्दा-वर है क्या कहिए
ये हमारी नज़र है क्या कहिए


आह तो बे-असर थी बरसों से
नग़्मा भी बे-असर है क्या कहिए


हुस्न है अब न हुस्न के जल्वे
अब नज़र ही नज़र है क्या कहिए


आज भी है 'मजाज़' ख़ाक-नशीं
और नज़र अर्श पर है क्या कहिए

अल्लामा इक़बाल ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal







 हुआ न ज़ोर से उस के कोई गरेबाँ चाक  अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal



हुआ न ज़ोर से उस के कोई गरेबाँ चाक
अगरचे मग़रबियों का जुनूँ भी था चालाक

मय-ए-यक़ीं से ज़मीर-ए-हयात है पुर-सोज़
नसीब-ए-मदरसा या रब ये आब-ए-आतिश-नाक

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी के मुंतज़िर हैं तमाम
ये कहकशाँ ये सितारे ये नील-गूँ अफ़्लाक

यही ज़माना-ए-हाज़िर की काएनात है क्या
दिमाग़ रौशन ओ दिल तीरा ओ निगह बेबाक

तू बे-बसर हो तो ये माना-ए-निगाह भी है
वगरना आग है मोमिन जहाँ ख़स ओ ख़ाशाक

ज़माना अक़्ल को समझा हुआ है मिशअल-ए-राह
किसे ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इदराक

जहाँ तमाम है मीरास मर्द-ए-मोमिन की
मिरे कलाम पे हुज्जत है नुक्ता-ए-लौलाक

हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़्लाक में है  अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़्लाक में है
अक्स उस का मिरे आईना-ए-इदराक में है

न सितारे में है ने गर्दिश-ए-अफ़्लाक में है
तेरी तक़दीर मिरे नाला-ए-बेबाक में है

या मिरी आह में ही कोई शरर ज़िंदा नहीं
या ज़रा नम अभी तेरे ख़स-ओ-ख़ाशाक में है

क्या अजब मेरी नवा-हा-ए-सहर-गाही से
ज़िंदा हो जाए वो आतिश जो तिरी ख़ाक में है

तोड़ डालेगी यही ख़ाक तिलिस्म-ए-शब-ओ-रोज़
गरचे उलझी हुई तक़दीर के पेचाक में है

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं 
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं 

तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ 
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं 

क़नाअत न कर आलम-ए-रंग-ओ-बू पर 
चमन और भी आशियाँ और भी हैं 

अगर खो गया इक नशेमन तो क्या ग़म 
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं 

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा 
तिरे सामने आसमाँ और भी हैं 

इसी रोज़ ओ शब में उलझ कर न रह जा 
कि तेरे ज़मान ओ मकाँ और भी हैं 

गए दिन कि तन्हा था मैं अंजुमन में 
यहाँ अब मिरे राज़-दाँ और भी हैं 


समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा
ग़लत था ऐ जुनूँ शायद तिरा अंदाज़ा-ए-सहरा

ख़ुदी से इस तिलिस्म-ए-रंग-ओ-बू को तोड़ सकते हैं
यही तौहीद थी जिस को न तू समझा न मैं समझा

निगह पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल तजल्ली ऐन-ए-फ़ितरत है
कि अपनी मौज से बेगाना रह सकता नहीं दरिया

रक़ाबत इल्म ओ इरफ़ाँ में ग़लत-बीनी है मिम्बर की
कि वो हल्लाज की सूली को समझा है रक़ीब अपना

ख़ुदा के पाक बंदों को हुकूमत में ग़ुलामी में
ज़िरह कोई अगर महफ़ूज़ रखती है तो इस्तिग़ना

न कर तक़लीद ऐ जिबरील मेरे जज़्ब-ओ-मस्ती की
तन-आसाँ अर्शियों को ज़िक्र ओ तस्बीह ओ तवाफ़ औला

बहुत देखे हैं मैं ने मशरिक़ ओ मग़रिब के मय-ख़ाने
यहाँ साक़ी नहीं पैदा वहाँ बे-ज़ौक़ है सहबा

न ईराँ में रहे बाक़ी न तूराँ में रहे बाक़ी
वो बंदे फ़क़्र था जिन का हलाक-ए-क़ैसर-ओ-किसरा

यही शैख़-ए-हरम है जो चुरा कर बेच खाता है
गिलीम-ए-बू-ज़र ओ दलक़-ए-उवेस ओ चादर-ए-ज़हरा

हुज़ूर-ए-हक़ में इस्राफ़ील ने मेरी शिकायत की
ये बंदा वक़्त से पहले क़यामत कर न दे बरपा

निदा आई कि आशोब-ए-क़यामत से ये क्या कम है
' गिरफ़्ता चीनियाँ एहराम ओ मक्की ख़ुफ़्ता दर बतहा '

लबालब शीशा-ए-तहज़ीब-ए-हाज़िर है मय-ए-ला से
मगर साक़ी के हाथों में नहीं पैमाना-ए-इल्ला

दबा रक्खा है इस को ज़ख़्मा-वर की तेज़-दस्ती ने
बहुत नीचे सुरों में है अभी यूरोप का वावेला

इसी दरिया से उठती है वो मौज-ए-तुंद जौलाँ भी
नहंगों के नशेमन जिस से होते हैं तह ओ बाला

ग़ुलामी क्या है ज़ौक़-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबाई से महरूमी
जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बंदे है वही ज़ेबा

भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर
कि दुनिया में फ़क़त मर्दान-ए-हूर की आँख है बीना

वही है साहिब-ए-इमरोज़ जिस ने अपनी हिम्मत से
ज़माने के समुंदर से निकाला गौहर-ए-फ़र्दा

फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर होगए पानी
मिरी इक्सीर ने शीशे को बख़्शी सख़्ती-ए-ख़ारा

रहे हैं और हैं फ़िरऔन मेरी घात में अब तक
मगर क्या ग़म कि मेरी आस्तीं में है यद-ए-बैज़ा

वो चिंगारी ख़स ओ ख़ाशाक से किस तरह दब जाए
जिसे हक़ ने किया हो नीस्ताँ के वास्ते पैदा

मोहब्बत ख़ेशतन बीनी मोहब्बत ख़ेशतन दारी
मोहब्बत आस्तान-ए-क़ैसर-ओ-किसरा से बे-परवा

अजब क्या गर मह ओ परवीं मिरे नख़चीर हो जाएँ
' कि बर फ़ितराक-ए-साहिब दौलत-ए-बस्तम सर-ए-ख़ुद रा '

वो दाना-ए-सुबुल ख़त्मुर-रुसुल मौला-ए-कुल जिस ने
ग़ुबार-ए-राह को बख़्शा फ़रोग़-ए-वादी-ए-सीना

निगाह-ए-इश्क़ ओ मस्ती में वही अव्वल वही आख़िर
वही क़ुरआँ वही फ़ुरक़ाँ वही यासीं वही ताहा

'सनाई' के अदब से मैं ने ग़व्वसी न की वर्ना
अभी इस बहर में बाक़ी हैं लाखों लूलू-ए-लाला


हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही 
क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही 

तू मर्द-ए-मैदाँ तू मीर-ए-लश्कर 
नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही 

कुछ क़द्र अपनी तू ने न जानी 
ये बे-सवादी ये कम-निगाही 

दुनिया-ए-दूँ की कब तक ग़ुलामी 
या राहेबी कर या पादशाही 

पीर-ए-हरम को देखा है मैं ने 
किरदार-ए-बे-सोज़ गुफ़्तार वाही 


सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

सख़्तियाँ करता हूँ दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूँ मैं
हाए क्या अच्छी कही ज़ालिम हूँ मैं जाहिल हूँ मैं

मैं जभी तक था कि तेरी जल्वा-पैराई न थी
जो नुमूद-ए-हक़ से मिट जाता है वो बातिल हूँ मैं

इल्म के दरिया से निकले ग़ोता-ज़न गौहर-ब-दस्त
वाए महरूमी ख़ज़फ़ चैन लब साहिल हूँ मैं

है मिरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील
जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं वो ग़ाफ़िल हूँ मैं

बज़्म-ए-हस्ती अपनी आराइश पे तू नाज़ाँ न हो
तू तो इक तस्वीर है महफ़िल की और महफ़िल हूँ मैं

ढूँढता फिरता हूँ मैं 'इक़बाल' अपने-आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं


वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

वही मेरी कम-नसीबी वही तेरी बे-नियाज़ी
मिरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै-नवाज़ी

मैं कहाँ हूँ तू कहाँ है ये मकाँ कि ला-मकाँ है
ये जहाँ मिरा जहाँ है कि तिरी करिश्मा-साज़ी

इसी कशमकश में गुज़रीं मिरी ज़िंदगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-'रूमी' कभी पेच-ओ-ताब-ए-'राज़ी'

वो फ़रेब-ख़ुर्दा शाहीं कि पला हो करगसों में
उसे क्या ख़बर कि क्या है रह-ओ-रस्म-ए-शाहबाज़ी

न ज़बाँ कोई ग़ज़ल की न ज़बाँ से बा-ख़बर मैं
कोई दिल-कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी

नहीं फ़क़्र ओ सल्तनत में कोई इम्तियाज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़-बाज़ी वो निगह की तेग़-बाज़ी

कोई कारवाँ से टूटा कोई बद-गुमाँ हरम से
कि अमीर-ए-कारवाँ में नहीं ख़ू-ए-दिल-नवाज़ी


ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

ला फिर इक बार वही बादा ओ जाम ऐ साक़ी
हाथ आ जाए मुझे मेरा मक़ाम ऐ साक़ी

तीन सौ साल से हैं हिन्द के मय-ख़ाने बंद
अब मुनासिब है तिरा फ़ैज़ हो आम ऐ साक़ी

मेरी मीना-ए-ग़ज़ल में थी ज़रा सी बाक़ी
शेख़ कहता है कि है ये भी हराम ऐ साक़ी

शेर मर्दों से हुआ बेश-ए-तहक़ीक़ तही
रह गए सूफ़ी ओ मुल्ला के ग़ुलाम ऐ साक़ी

इश्क़ की तेग़-ए-जिगर-दार उड़ा ली किस ने
इल्म के हाथ में ख़ाली है नियाम ऐ साक़ी

सीना रौशन हो तो है सोज़-ए-सुख़न ऐन-ए-हयात
हो न रौशन तो सुख़न मर्ग-ए-दवाम ऐ साक़ी

तू मिरी रात को महताब से महरूम न रख
तिरे पैमाने में है माह-ए-तमाम ऐ साक़ी


ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

ये पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुब्ह-गाही
कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मक़ाम पादशाही

तिरी ज़िंदगी इसी से तिरी आबरू इसी से
जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रू-सियाही

न दिया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तू ने
मुझे क्या गिला हो तुझ से तू न रह-नशीं न राही

मिरे हल्क़ा-ए-सुख़न में अभी ज़ेर-ए-तर्बियत हैं
वो गदा कि जानते हैं रह-ओ-रस्म-ए-कज-कुलाही

ये मुआमले हैं नाज़ुक जो तिरी रज़ा हो तू कर
कि मुझे तो ख़ुश न आया ये तरिक़-ए-ख़ानक़ाही

तू हुमा का है शिकारी अभी इब्तिदा है तेरी
नहीं मस्लहत से ख़ाली ये जहान-ए-मुर्ग़-ओ-माही

तू अरब हो या अजम हो तिरा ला इलाह इल्ला
लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तिरा दिल न दे गवाही

ये कौन ग़ज़ल-ख़्वाँ है पुर-सोज़ ओ नशात-अंगेज़ अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

ये कौन ग़ज़ल-ख़्वाँ है पुर-सोज़ ओ नशात-अंगेज़
अंदेशा-ए-दाना को करता है जुनूँ-आमेज़

गो फ़क़्र भी रखता है अंदाज़-ए-मुलूकाना
ना-पुख़्ता है परवेज़ी बे-सल्तनत-ए-परवेज़

अब हुजरा-ए-सूफ़ी में वो फ़क़्र नहीं बाक़ी
ख़ून-ए-दिल-ए-शेराँ हो जिस फ़क़्र की दस्तावेज़

ऐ हल्क़ा-ए-दरवेशाँ वो मर्द-ए-ख़ुदा कैसा
हो जिस के गरेबाँ में हंगामा-ए-रुस्ता-ख़ेज़

जो ज़िक्र की गरमी से शोले की तरह रौशन
जो फ़िक्र की सुरअत में बिजली से ज़ियादा तेज़

करती है मुलूकियात आसार-ए-जुनूँ पैदा
अल्लाह के निश्तर हैं तैमूर हो या चंगेज़

यूँ दाद-ए-सुख़न मुझ को देते हैं इराक़ ओ पारस
ये काफ़िर-ए-हिन्दी है बे-तेग़-ओ-सिनाँ ख़ूँ-रेज़

यूँ हाथ नहीं आता वो गौहर-ए-यक-दाना अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

यूँ हाथ नहीं आता वो गौहर-ए-यक-दाना 
यक-रंगी ओ आज़ादी ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना 

या संजर ओ तुग़रल का आईन-ए-जहाँगीरी 
या मर्द-ए-क़लंदर के अंदाज़-ए-मुलूकाना 

या हैरत-ए-'फ़राबी' या ताब-ओ-तब-ए-'रूमी' 
या फ़िक्र-ए-हकीमाना या जज़्ब-ए-कलीमाना 

या अक़्ल की रूबाही या इश्क़-ए-यदुल-लाही 
या हीला-ए-अफ़रंगी या हमला-ए-तुरकाना 

या शर-ए-मुसलमानी या दैर की दरबानी 
या नारा-ए-मस्ताना काबा हो कि बुत-ख़ाना 

मीरी में फ़क़ीरी में शाही में ग़ुलामी में 
कुछ काम नहीं बनता बे-जुरअत-ए-रिंदाना 

मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का
मुरव्वत हुस्न-ए-आलम-गीर है मर्दान-ए-ग़ाज़ी का

शिकायत है मुझे या रब ख़ुदावंदान-ए-मकतब से
सबक़ शाहीं बच्चों को दे रहे हैं ख़ाक-बाज़ी का

बहुत मुद्दत के नख़चीरों का अंदाज़-ए-निगह बदला
कि मैं ने फ़ाश कर डाला तरीक़ा शाहबाज़ी का

क़लंदर जुज़ दो हर्फ़-ए-ला-इलाह कुछ भी नहीं रखता
फ़क़ीह-ए-शहर क़ारूँ है लुग़त-हा-ए-हिजाज़ी का

हदीस-ए-बादा-ओ-मीना-ओ-जाम आती नहीं मुझ को
न कर ख़ारा-शग़ाफ़ों से तक़ाज़ा शीशा-साज़ी का

कहाँ से तू ने ऐ 'इक़बाल' सीखी है ये दरवेशी
कि चर्चा पादशाहों में है तेरी बे-नियाज़ी का

मिरी नवा से हुए ज़िंदा आरिफ़ ओ आमी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

मिरी नवा से हुए ज़िंदा आरिफ़ ओ आमी
दिया है मैं ने उन्हें ज़ौक़-ए-आतिश आशामी

हरम के पास कोई आजमी है ज़मज़मा-संज
कि तार तार हुए जामा हाए एहरामी

हक़ीक़त-ए-अबदी है मक़ाम-ए-शब्बीरी
बदलते रहते हैं अंदाज़-ए-कूफ़ी ओ शामी

मुझे ये डर है मुक़ामिर हैं पुख़्ता-कार बहुत
न रंग लाए कहीं तेरे हाथ की ख़ामी

अजब नहीं कि मुसलमाँ को फिर अता कर दें
शिकवा-ए-संजर ओ फ़क़्र-ए-जुनेद ओ बस्तामी

क़बा-ए-इल्म ओ हुनर लुत्फ़-ए-ख़ास है वर्ना
तिरी निगाह में थी मेरी ना-ख़ुश अंदामी

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू
पिला के मुझ को मय-ए-ला-इलाहा-इल्ला-हू

न मय न शेर न साक़ी न शोर-ए-चंग-ओ-रबाब
सुकूत-ए-कोह ओ लब-ए-जू व लाला-ए-ख़ुद-रू

गदा-ए-मय-कदा की शान-ए-बे-नियाज़ी देख
पहुँच के चश्मा-ए-हैवाँ पे तोड़ता है सुबू

मिरा सबूचा ग़नीमत है इस ज़माने में
कि ख़ानक़ाह में ख़ाली हैं सूफ़ियों के कदू

मैं नौ-नियाज़ हूँ मुझ से हिजाब ही औला
कि दिल से बढ़ के है मेरी निगाह बे-क़ाबू

अगरचे बहर की मौजों में है मक़ाम इस का
सफ़ा-ए-पाकी-ए-तीनत से है गुहर का वज़ू

जमील-तर हैं गुल ओ लाला फ़ैज़ से इस के
निगाह-ए-शाइर-ए-रंगीं-नवा में है जादू


मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

मकतबों में कहीं रानाई-ए-अफ़कार भी है 
ख़ानक़ाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है 

मंज़िल-ए-रह-रवाँ दूर भी दुश्वार भी है 
कोई इस क़ाफ़िले में क़ाफ़िला-सालार भी है 

बढ़ के ख़ैबर से है ये मारका-ए-दीन-ओ-वतन 
इस ज़माने में कोई हैदर-ए-कर्रार भी है 

इल्म की हद से परे बंदा-ए-मोमिन के लिए 
लज़्ज़त-ए-शौक़ भी है नेमत-ए-दीदार भी है 

पीर-ए-मय-ख़ाना ये कहता है कि ऐवान-ए-फ़रंग 
सुस्त-बुनियाद भी है आईना-दीवार भी है 

 मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे
नज़्ज़ारे की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे

वाइज़ कमाल-ए-तर्क से मिलती है याँ मुराद
दुनिया जो छोड़ दी है तो उक़्बा भी छोड़ दे

तक़लीद की रविश से तो बेहतर है ख़ुद-कुशी
रस्ता भी ढूँड ख़िज़्र का सौदा भी छोड़ दे

मानिंद-ए-ख़ामा तेरी ज़बाँ पर है हर्फ़-ए-ग़ैर
बेगाना शय पे नाज़िश-ए-बेजा भी छोड़ दे

लुत्फ़-ए-कलाम क्या जो न हो दिल में दर्द-ए-इश्क़
बिस्मिल नहीं है तू तो तड़पना भी छोड़ दे

शबनम की तरह फूलों पे रो और चमन से चल
इस बाग़ में क़याम का सौदा भी छोड़ दे

है आशिक़ी में रस्म अलग सब से बैठना
बुत-ख़ाना भी हरम भी कलीसा भी छोड़ दे

सौदा-गरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है
ऐ बे-ख़बर जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे

जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार
शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे

शोख़ी सी है सवाल-ए-मुकर्रर में ऐ कलीम
शर्त-ए-रज़ा ये है कि तक़ाज़ा भी छोड़ दे

वाइज़ सुबूत लाए जो मय के जवाज़ में
'इक़बाल' को ये ज़िद है कि पीना भी छोड़ दे


फ़ितरत ने न बख़्शा मुझे अंदेशा-ए-चालाक अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

फ़ितरत ने न बख़्शा मुझे अंदेशा-ए-चालाक
रखती है मगर ताक़त-ए-परवाज़ मिरी ख़ाक

वो ख़ाक कि है जिस का जुनूँ सयक़ल-ए-इदराक
वो ख़ाक कि जिबरील की है जिस से क़बा चाक

वो ख़ाक कि परवा-ए-नशेमन नहीं रखती
चुनती नहीं पहना-ए-चमन से ख़स ओ ख़ाशाक

इस ख़ाक को अल्लाह ने बख़्शे हैं वो आँसू
करती है चमक जिन की सितारों को अरक़-नाक

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर 
तस्ख़ीर-ए-मक़ाम-ए-रंग-ओ-बू कर 

तू अपनी ख़ुदी को खो चुका है 
खोई हुई शय की जुस्तुजू कर 

तारों की फ़ज़ा है बे-कराना 
तू भी ये मक़ाम-ए-आरज़ू कर 

उर्यां हैं तिरे चमन की हूरें 
चाक-ए-गुल-ओ-लाला को रफ़ू कर 

बे-ज़ौक़ नहीं अगरचे फ़ितरत 
जो उस से न हो सका वो तू कर 


पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही
तू साहिब-ए-मंज़िल है कि भटका हुआ राही

काफ़िर है मुसलमाँ तो न शाही न फ़क़ीरी
मोमिन है तो करता है फ़क़ीरी में भी शाही

काफ़िर है तो शमशीर पे करता है भरोसा
मोमिन है तो बे-तेग़ भी लड़ता है सिपाही

काफ़िर है तो है ताबा-ए-तक़दीर मुसलमाँ
मोमिन है तो वो आप है तक़दीर-ए-इलाही

मैं ने तो किया पर्दा-ए-असरार को भी चाक
देरीना है तेरा मरज़-ए-कोर-निगाही


परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
जो मुश्किल अब है या रब फिर वही मुश्किल न बन जाए

न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवाँ फ़िरदौस में हूरें
मिरा सोज़-ए-दरूँ फिर गर्मी-ए-महफ़िल न बन जाए

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैदा-कराँ मुझ को
ये मेरी ख़ुद-निगह-दारी मिरा साहिल न बन जाए

कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी
वही अफ़्साना-ए-दुंबाला-ए-महमिल न बन जाए

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए

ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

ने मोहरा बाक़ी ने मोहरा-बाज़ी 
जीता है 'रूमी' हारा है 'राज़ी' 

रौशन है जाम-ए-जमशेद अब तक 
शाही नहीं है ब-शीशा-बाज़ी 

दिल है मुसलमाँ मेरा न तेरा 
तू भी नमाज़ी मैं भी नमाज़ी 

मैं जानता हूँ अंजाम उस का 
जिस मारके में मुल्ला हों ग़ाज़ी 

तुर्की भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं 
हर्फ़-ए-मोहब्बत तुर्की न ताज़ी 

आज़र का पेशा ख़ारा-तराशी 
कार-ए-ख़लीलाँ ख़ारा-गुदाज़ी 

तू ज़िंदगी है पाएँदगी है 
बाक़ी है जो कुछ सब ख़ाक-बाज़ी 

नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

नाला है बुलबुल-ए-शोरीदा तिरा ख़ाम अभी
अपने सीने में इसे और ज़रा थाम अभी

पुख़्ता होती है अगर मस्लहत-अंदेश हो अक़्ल
इश्क़ हो मस्लहत-अंदेश तो है ख़ाम अभी

बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़
अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी

इश्क़ फ़र्मूदा-ए-क़ासिद से सुबुक-गाम-ए-अमल
अक़्ल समझी ही नहीं म'अनी-ए-पैग़ाम अभी

शेवा-ए-इश्क़ है आज़ादी ओ दहर-आशेबी
तू है ज़ुन्नारी-ए-बुत-ख़ाना-ए-अय्याम अभी

उज़्र-ए-परहेज़ पे कहता है बिगड़ कर साक़ी
है तिरे दिल में वही काविश-ए-अंजाम अभी

सई-ए-पैहम है तराज़ू-कम-ओ-कैफ़-ए-हयात
तेरी मीज़ाँ है शुमार-ए-सहर-ओ-शाम अभी

अब्र-ए-नैसाँ ये तुनुक-बख़्शी-ए-शबनम कब तक
मेरे कोहसार के लाले हैं तही-जाम अभी

बादा-गर्दान-ए-अजम वो अरबी मेरी शराब
मिरे साग़र से झिजकते हैं मय-आशाम अभी

ख़बर 'इक़बाल' की लाई है गुलिस्ताँ से नसीम
नौ-गिरफ़्तार फड़कता है तह-ए-दाम अभी


न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए
जहाँ है तेरे लिए तू नहीं जहाँ के लिए

ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के
वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए

मक़ाम-ए-परवरिश-ए-आह-ओ-लाला है ये चमन
न सैर-ए-गुल के लिए है न आशियाँ के लिए

रहेगा रावी ओ नील ओ फ़ुरात में कब तक
तिरा सफ़ीना कि है बहर-ए-बे-कराँ के लिए

निशान-ए-राह दिखाते थे जो सितारों को
तरस गए हैं किसी मर्द-ए-राह-दाँ के लिए

निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए

ज़रा सी बात थी अंदेशा-ए-अजम ने उसे
बढ़ा दिया है फ़क़त ज़ेब-ए-दास्ताँ के लिए

मिरे गुलू में है इक नग़्मा जिब्राईल-आशोब
संभाल कर जिसे रक्खा है ला-मकाँ के लिए


न आते हमें इस में तकरार क्या थी अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

न आते हमें इस में तकरार क्या थी 
मगर व'अदा करते हुए आर क्या थी 

तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला 
ख़ता इस में बंदे की सरकार क्या थी 

भरी बज़्म में अपने आशिक़ को ताड़ा 
तिरी आँख मस्ती में होश्यार क्या थी 

तअम्मुल तो था उन को आने में क़ासिद 
मगर ये बता तर्ज़-ए-इंकार क्या थी 

खिंचे ख़ुद-बख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा 
कशिश तेरी ऐ शौक़-ए-दीदार क्या थी 

कहीं ज़िक्र रहता है 'इक़बाल' तेरा 
फ़ुसूँ था कोई तेरी गुफ़्तार क्या थी 


दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है

है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ
ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है

वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन
पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है

क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की
उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है

कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक
या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है

बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी
मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है

आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास
मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना
वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना

ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में
न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना

नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त
ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना

रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की
कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना

मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे
उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना

मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा
सिला-ए-शहीद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना

तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं
न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ अल्लामा इक़बाल  ग़ज़ल /Allama Iqbal Ghazal

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ 
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ 

सितम हो कि हो वादा-ए-बे-हिजाबी 
कोई बात सब्र-आज़मा चाहता हूँ 

ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को 
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ 

ज़रा सा तो दिल हूँ मगर शोख़ इतना 
वही लन-तरानी सुना चाहता हूँ 

कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहल-ए-महफ़िल 
चराग़-ए-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ 

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी 
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ 

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